पाकिस्तान: इमरान ख़ान की पार्टी को मिले चंदे का यूएई, स्विट्ज़रलैंड और अमेरिका कनेक्शन

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    • Author, शहज़ाद मलिक
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद से

पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने प्रतिबंधित फ़ंडिंग केस पर अपने फ़ैसले में कहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ पर विदेश से प्रतिबंधित फ़ंड लेने का आरोप साबित हो गया है.

इस बारे में चुनाव आयोग ने पीटीआई को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा है कि इन फ़ंड को ज़ब्त क्यों न कर लिया जाए.

वहीं तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती देने का एलान किया है.

प्रतिबंधित फ़ंडिंग के इस मामले में 2014 से चुनाव आयोग में सुनवाई चल रही थी. चुनाव आयोग ने 21 जून को इस पर फ़ैसला सुरक्षित रखा था और मंगलवार सुबह मुख्य चुनाव आयुक्त सिकंदर सुल्तान राजा की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय पीठ ने यह फ़ैसला सुनाया.

इस पीठ में निसार अहमद और शाह मोहम्मद जटोई भी शामिल थे. इस मामले के फ़ैसला सुनाने के मौक़े पर चुनाव आयोग और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर पुलिस, रेंजर्स और एफसी के 1400 जवानों को तैनात किया गया था.

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क्या कहता है फ़ैसला

फ़ैसले में कहा गया है कि पीटीआई ने आयोग के सामने सिर्फ़ आठ खातों के स्वामित्व को ही स्वीकार किया है, जबकि उसने 13 खातों को अज्ञात बताया है.

आयोग के अनुसार स्टेट बैंक से मिले आंकड़ों के अनुसार पीटीआई ने जिन खातों से असंबद्धता जताई थी, उन्हें पीटीआई के वरिष्ठ प्रांतीय और केंद्रीय नेतृत्व और अधिकारियों ने खोला और संचालित किया था.

यह भी कहा गया कि पीटीआई ने पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व के तहत चलाए जा रहे तीन और प्रबंधित खातों को छुपाया. आयोग के अनुसार, पीटीआई द्वारा इन 16 बैंक खातों को छिपाना संविधान के अनुच्छेद 17(3) का उल्लंघन है.

इस निर्णय के अनुसार पीटीआई प्रमुख द्वारा वर्ष 2008 से 2013 के लिए जमा किया गया फ़ॉर्म वन, आयोग द्वारा स्टेट बैंक से हासिल किए गए डेटा और अन्य रिकॉर्ड के आधार पर त्रुटियों से भरा है. आयोग ने पार्टी को नोटिस जारी कर रहा है कि क्यों न इन प्रतिबंधित फ़ंड को ज़ब्त किया जाए.

चुनाव आयोग

आयोग के सामने ये हैं सवाल

  • वोटोन क्रिकेट लिमिटेड, ब्रिस्टल इंजीनियरिंग सर्विसेज़ दुबई, ई-प्लैनेट ट्रस्ट और एसएस मार्केटिंग यूके के माध्यम से आरिफ़ नक़वी द्वारा भेजे गए फ़ंड की वैधता क्या है और क्या यह प्रतिबंधित फ़ंडिंग की श्रेणी में आता है?
  • क्या पीटीआई अमेरिका, पीटीआई कनाडा कॉरपोरेशन और पीटीआई प्राइवेट लिमिटेड यूके द्वारा धन का संग्रह और पाकिस्तान में पीटीआई खातों में स्थानांतरण प्रतिबंधित फ़ंड की श्रेणी में आता है?
  • विदेशी नागरिकों और विदेशी कंपनियों से हासिल चंदों और दान की क़ानूनी स्थिति क्या है?
  • अपने व्यक्तिगत खातों में दान प्राप्त करने वाले पीटीआई के चार कर्मचारियों की वैधता क्या है?
  • पीटीआई के अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षरित फ़ॉर्म वन प्रमाणपत्र के संबंध में उनकी कितनी ज़िम्मेदारी है?
  • प्रतिबंधित स्रोतों से चंदा, दान और फ़ंड की जांच करने के लिए आयोग के पास किसी भी संगठन से जानकारी मांगने की कितनी शक्ति है?
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आरिफ़ नक़वी की भूमिका

चुनाव आयोग ने अपने फ़ैसले में अबराज समूह के आरिफ़ नक़वी के ख़िलाफ़ अमेरिका में चल रहे मुक़दमों का ज़िक्र करते हुए कहा कि पीटीआई पाकिस्तान को जान-बूझकर आपराधिक धोखाधड़ी में शामिल एक व्यवसायी द्वारा संचालित कंपनी से चंदा मिला है.

आयोग ने कहा कि पार्टी को इसके लिए अप्रैल 2018 से दिसंबर 2021 तक का समय दिया गया था, लेकिन पार्टी अपने फ़ंडिंग के स्रोतों को छिपाती रही.

चुनाव आयोग ने अपने फ़ैसले में कहा कि जब आयोग ने पार्टी के सामने वोटोन क्रिकेट लिमिटेड से पीटीआई पाकिस्तान को फ़ंड ट्रांसफ़र करने का सबूत पेश किया, तो पीटीआई ने आरिफ़ नक़वी द्वारा हस्ताक्षरित एक हलफ़नामा दिया, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने स्वेच्छा से पार्टी (पीटीआई) फ़ंड में योगदान दिया. संयुक्त अरब अमीरात में रहते हुए दान और चंदे का संग्रह किया और ख़ुद भी योगदान दिया, जो आयोग के अनुसार संयुक्त अरब अमीरात के क़ानूनों का उल्लंघन है.

आयोग के मुताबिक़, ये फ़ंड (21 लाख 21 हज़ार 500 डॉलर) वूटन क्रिकेट लिमिटेड के ज़रिये ट्रांसफ़र किए थे और ये फ़ंड किसने दिया, यह आरिफ़ नक़वी और पीटीआई ने नहीं बताया है. आयोग के निर्णय के अनुसार, ये फ़ंड पाकिस्तानी क़ानूनों के तहत कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को फ़ंडिंग पर प्रतिबंध वाले दायरे में आते हैं.

आयोग ने अपने फ़ैसले में कहा है कि दुबई में पंजीकृत ब्रिस्टल इंजीनियरिंग सेवाओं से प्राप्त 49,965 डॉलर, स्विट्जरलैंड में पंजीकृत ई-प्लैनेट ट्रस्टियों से प्राप्त 100,000 डॉलर, और यूके में पंजीकृत एसएस मार्केटिंग लिमिटेड से प्राप्त 1,741 डॉलर भी कंपनियों की तरफ़ से राजनीतिक दलों को फ़ंडिंग पर प्रतिबंध वाले दायरे में आते हैं.

अकबर एस. बाबर

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केस का विवरण

तहरीक-ए-इंसाफ़ के संस्थापक अकबर एस. बाबर क़रीब साढ़े सात साल पहले इस मामले को आयोग के सामने लाए थे, जब आंतरिक मतभेदों के कारण उन्हें पार्टी और शीर्ष नेतृत्व से अलग कर दिया गया था.

अन्य राजनीतिक दल इस मामले पर शुरू में कुछ समय तक तो चुप रहे, लेकिन जैसे ही इमरान ख़ान ने विपक्षी राजनीतिक दलों को अपना निशाना बनाना शुरू किया, इन दलों के नेतृत्व ने भी मांग करनी शुरू कर दी कि तहरीक-ए-इंसाफ़ को विदेश से मिलने वाली फ़ंडिंग का हिसाब-किताब होना चाहिए.

तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग को इस मामले में अंतिम फ़ैसला देने से रोकने में सक्रिय रही है. कुछ महीने पहले, जब इस्लामाबाद उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय पीठ ने चुनाव आयोग को 30 दिनों के भीतर प्रतिबंधित फ़ंडिंग मामले पर निर्णय देने का आदेश दिया, तो तहरीक-ए-इंसाफ़ पार्टी ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत का दरवाज़ा खटखटाया और यह प्रचारित करने लगी कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है.

पीटीआई ने यह भी कहा कि दूसरे राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ इसी तरह के मामले चुनाव आयोग में लंबित हैं, लेकिन अदालत ने चुनाव आयोग को किसी अन्य राजनीतिक दल के बारे में फ़ैसला देने का आदेश नहीं दिया है.

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इस्लामाबाद उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई के बाद चुनाव आयोग को पीटीआई की प्रतिबंधित फ़ंडिंग पर फ़ैसला करने के लिए 30 दिन का समय देने के एकल पीठ के उस निर्णय को निलंबित कर दिया. वहीं, पीटीआई के उस अनुरोध पर विचार करते हुए कि सभी राजनीतिक दलों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था.

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और उनकी पार्टी पिछले छह साल से दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी पीटीआई को प्रतिबंधित स्रोतों से धन नहीं मिला है. साथ ही यह भी दावा किया कि हासिल किए गए फ़ंड के सारे दस्तावेज़ मौजूद हैं.

अपने ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव की सफलता से कुछ दिन पहले एक निजी टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने दावा किया था कि आम चुनाव में दो देशों ने उन्हें आर्थिक मदद की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने स्वीकार नहीं किया था. इमरान ख़ान ने इन दोनों देशों के नामों का ख़ुलासा नहीं करते हुए कहा कि इनके नामों का ख़ुलासा करने से इन देशों के साथ पाकिस्तान के रिश्ते ख़राब हो जाएंगे.

इमरान ख़ान

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प्रतिबंधित फ़ंडिंग केस क्या है

चुनाव आयोग के पास दायर अपनी याचिका में अकबर एस. बाबर ने आरोप लगाया था कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को विदेशों में रहने वाले पाकिस्तानियों के अलावा अन्य विदेशियों से धन प्राप्त होता है, जिसकी पाकिस्तानी क़ानून अनुमति नहीं देता है.

बीबीसी से बात करते हुए, अकबर एस बाबर ने दावा किया था कि उन्होंने पार्टी अध्यक्ष इमरान ख़ान के सामने पहली बार 2011 में प्रतिबंधित स्रोतों से पार्टी द्वारा कथित रूप से प्राप्त धन का मुद्दा उठाया और अनुरोध किया था कि पार्टी के एक अन्य सदस्य न्यायमूर्ति सेवानिवृत्त वजीहुद्दीन की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जानी चाहिए, जो इस मामले की पड़ताल करे. लेकिन इमरान ख़ान की ओर से इसपर कोई कार्रवाई नहीं किए जाने के चलते वह इस मामले को चुनाव आयोग तक ले गए.

अकबर एस. बाबर ने आरोप लगाया था कि अमेरिका और ब्रिटेन में पार्टी के लिए वहां रहने वाले पाकिस्तानियों से चंदा इकट्ठा करने को सीमित देयता कंपनियां बनाई गईं और उसके बाद उनके ज़रिये प्रतिबंधित स्रोतों से धन प्राप्त किया गया था.

उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि पार्टी को प्रतिबंधित स्रोतों के ज़रिये ऑस्ट्रेलिया और दूसरे देशों से धन प्राप्त हुआ और यह पैसा पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के कार्यकर्तातों के खाते में स्थानांतरित कर दिया गया.

वहीं, मध्य पूर्व के देशों से हुंडी के ज़रिये पार्टी को फ़ंड प्राप्त हुआ. तहरीक-ए-इंसाफ ने हमेशा हर मंच पर इन आरोपों का खंडन किया है और पार्टी का दावा है कि उनके द्वारा प्राप्त सभी फ़ंड पाकिस्तान में इस संबंध में प्रचलित क़ानून के तहत हासिल किए गए.

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चुनाव आयोग में इस आवेदन पर क्या किया

अकबर एस बाबर ने जब चुनाव आयोग को यह आवेदन दिया तो प्रक्रिया शुरू होने से पहले पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का नेतृत्व इस मामले को छह बार इस्लामाबाद उच्च न्यायालय में ले गया. आयोग के पास किसी भी पक्ष के खातों की जांच करने का कोई क़ानूनी अधिकार नहीं है.

तहरीक-ए-इंसाफ़ ने इस मामले में नौ अलग-अलग याचिकाएं दायर कीं और नौ बार वकीलों को भी बदला, जबकि चुनाव आयोग ने बार-बार प्रतिबंधित फ़ंडिंग मामले का विवरण गोपनीय रखने का अनुरोध किया है.

एक बार निषेधाज्ञा दिए जाने के बाद, जब इस्लामाबाद उच्च न्यायालय ने और निषेधाज्ञा देने से इनकार कर दिया, तो मामले की जांच करने वाली जांच समिति के अधिकार क्षेत्र को तहरीक-ए-इंसाफ़ द्वारा चुनौती दी गई और उस समिति को अपना काम करने से रोकने की मांग की गई.

बार-बार निषेधाज्ञा की मांग करने के सवाल पर पार्टी के नेशनल असेंबली के सदस्य फ़र्रुख़ हबीब का कहना था कि एक राजनीतिक दल को उपलब्ध क़ानूनी विकल्प का इस्तेमाल करने से नहीं रोका जा सकता है.

ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ के नेता हनीफ़ अब्बासी ने जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की योग्यता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी तो उनके पास पीटीआई को मिले कथित प्रतिबंधित फ़ंड को लेकर अलग से एक अर्ज़ी भी दाख़िल की गई थी. इसी अर्ज़ी पर सुप्रीम कोर्ट ने साल 2016 में फ़ैसला दिया था कि राजनीतिक दलों की फ़ंडिंग की जांच का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 2009 से 2013 के बीच तहरीक-ए-इंसाफ़ को मिले फ़ंड की जांच करने का भी आदेश दिया था.

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तहरीक-ए-इंसाफ़ ने दर्जनों खातों को गुप्त रखा

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद चुनाव आयोग ने अकबर एस बाबर के अनुरोध पर पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की प्रतिबंधित फ़ंडिंग की जांच के लिए मार्च 2018 में चुनाव आयोग के महानिदेशक की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था.

पाकिस्तान के महालेखा परीक्षक और वित्त मंत्रालय के एक प्रतिनिधि भी इस जांच समिति का हिस्सा थे. पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के खिलाफ प्रतिबंधित विदेशी फ़ंडिंग मामले में चुनाव आयोग की स्क्रूटनी कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया है कि तहरीक-ए-इंसाफ़ ने चुनाव आयोग से 31 करोड़ से ज्यादा की रक़म को गुप्त रखा.

चुनाव आयोग के मुताबिक़ अभी अपने दर्जनों खातों ऐसे हैं, जिनके बारे में तहरीक-ए-इंसाफ़ ने जानकारी ही नहीं दी है.

इस साल जनवरी के पहले सप्ताह में जारी चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि तहरीक-ए-इंसाफ़ ने चुनाव आयोग को चंदे के संबंध में झूठी जानकारी दी थी.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पार्टी ने कुछ व्यक्तियों को छोड़कर विदेशी फ़ंडिंग के सारे स्रोतों का ख़ुलासा नहीं किया है, जिसके कारण जांच समिति इस पर टिप्पणी करने में असमर्थ है.

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रिपोर्ट के मुताबिक़ तहरीक-ए-इंसाफ़ को अमेरिका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, जापान, सिंगापुर, हांगकांग, स्विट्जरलैंड, नीदरलैंड और फिनलैंड समेत यूरोपीय देशों और मध्य पूर्व के देशों से फ़ंड मिला. आयोग के अनुसार, जांच समिति को तहरीक-ए-इंसाफ़ को न्यूजीलैंड से मिले फ़ंड तक पहुंच नहीं दी गई थी.

जांच समिति के अनुसार, जब तहरीक-ए-इंसाफ़ सहित सभी पक्षों ने पूरे डेटा तक पहुंच के संबंध में सहयोग नहीं किया, तब समिति ने 2009 से 2013 तक स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान और पाकिस्तान के दूसरे बैंकों से रिकॉर्ड तक पहुंच हासिल की, जिसके बाद यह रिपोर्ट तैयार की गई.

'विदेशी चंदे में गड़बड़ी के लिए पीटीआई ज़िम्मेदार नहीं'

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने हमेशा इन आरोपों का खंडन किया है और दावा किया है कि उन्होंने विदेशों से जो भी धन जमा किया है वह क़ानून के अनुसार है.

हालांकि तहरीक-ए-इंसाफ़ की ओर से इस साल चुनाव आयोग की स्क्रूटनी कमेटी को दिए गए बयान में कहा गया कि अगर विदेशों से मिलने वाले चंदे में कोई अनियमितता होती है तो इसके लिए पार्टी ज़िम्मेदार नहीं है, बल्कि उस एजेंट पर आती है, जिसकी सेवाएं इस काम के लिए ली गई हैं.

नवाज़ शरीफ़

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इस जवाब के आधार पर, विपक्षी राजनीतिक दलों ने दावा किया कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ ने स्वीकार किया था कि उन्हें प्रतिबंधित स्रोतों से धन हासिल हुआ था.

चुनाव आयोग में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील शाह ख़ावर ने बीबीसी को बताया कि स्क्रूटनी कमेटी के एक सवाल के जवाब में कहा गया था कि अगर एजेंटों ने पाकिस्तान के क़ानून का उल्लंघन करके किसी ग़ैर मुल्की कंपनी या व्यक्ति से चंदा हासिल किया है, तो उसके लिए उनकी पार्टी ज़िम्मेदार नहीं होगी. बल्कि, यह इन एजेंटों की ज़िम्मेदारी होगी और उनसे स्थानीय क़ानून के अनुसार निपटा जाना चाहिए.

पाकिस्तान में राजनीतिक दल विदेशों से धन कैसे जुटाते हैं

पाकिस्तान के विभिन्न राजनीतिक दलों ने अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम सहित विभिन्न विकसित देशों में सीमित देयता कंपनियों की स्थापना की है, जिसके प्रभारी पाकिस्तान में रहने वाले पाकिस्तानी हैं. उनके पास दोहरी नागरिकता है. इन एजेंटों की नियुक्ति विदेशी एजेंट पंजीकरण अधिनियम के तहत की जाती है.

ये एजेंट इन देशों में दोहरी नागरिकता वाले पाकिस्तानियों से या जिनके पास एनआईसीओपी कार्ड हैं, उनसे अपनी पार्टी के लिए फ़ंड इकट्ठा करते हैं और फिर उन्हें पाकिस्तान भेजते हैं. इन एजेंटों को पार्टी का घोषणापत्र भेजा जाता है और उन्हें निर्देश दिया जाता है कि वे पाकिस्तानियों के अलावा किसी भी विदेशी सरकार, व्यक्तित्व या संस्था से पार्टी के लिए फ़ंड हासिल न करें.

वोटिंग

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प्रतिबंधित फ़ंडिंग के बारे में पाकिस्तान का क़ानून क्या कहता है

चुनाव आयोग अधिनियम, 2017 की धारा 204 की उप-धारा 3 के तहत, किसी भी राजनीतिक दल द्वारा किसी भी विदेशी सरकार, बहुराष्ट्रीय या निजी कंपनी या व्यक्ति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हासिल किया गया धन निषिद्ध धन है.

इस अधिनियम में साफ़ तौर पर कहा गया है कि दोहरी नागरिकता रखने वाले पाकिस्तानी या जिन्हें राष्ट्रीय डेटाबेस पंजीकरण प्राधिकरण की ओर से एनआईसीओपी कार्ड जारी किया गया है, उनपर यह क़ानून लागू नहीं होता है.

इसके अलावा धारा 204 की उप-धारा 4 के तहत अगर यह साबित हो जाता है कि किसी राजनीतिक दल ने निषिद्ध साधनों से धन जमा किया है, तो चुनाव आयोग को पार्टी के खाते में मौजूद सारे धन को ज़ब्त करने का अधिकार है.

विदेशी कंपनियों या सरकारों से धन प्राप्त करने वाली पार्टी पर प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है.

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पाकिस्तानी में अब तक सिर्फ़ एक दल पर प्रतिबंध लगा है पाकिस्तान में राजनीतिक दलों पर अलग-अलग दौर में आरोप लगाए जाते रहे हैं कि उन्हें फ़लां दुश्मन देश या ऐसे देश द्वारा वित्तीय सहायता दी जा रही है, जिसका पाकिस्तान में कोई हित है.

लेकिन देश के इतिहास में चुनाव आयोग ने केवल एक राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाया है. यह पार्टी थी नेशनल अवामी पार्टी, जिसपर पार्टी को चलाने के लिए निषिद्ध माध्यमों से धन जुटाने का आरोप साबित हो गया था.

नेशनल अवामी पार्टी एक प्रगतिशील राजनीतिक दल था, जिसकी स्थापना 1958 में अब्दुल मजीद ख़ान भाशानी ने ढाका में की थी. ढाका उस समय पूर्वी पाकिस्तान और वर्तमान बांग्लादेश की राजधानी हुआ करती ​थी.

उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो ने उस पार्टी की पूर्वी पाकिस्तान को बांग्लादेश बनाने में भूमिका के चलते देशद्रोह और भारत से धन लेने के आरोपों के तहत इसे प्रतिबंधित कर दिया था. उसके बाद से किसी भी राजनीतिक दल पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है.

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