सनाफीर और तिरान: वे वीरान द्वीप जो सऊदी अरब -इसराइल के रिश्तों में फूकेंगे नई जान?

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- Author, पाउला रोजेज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ये रेगिस्तानी द्वीप हैं. आबादी से इनका कोई रिश्ता नहीं है. इनमें से सबसे बड़ा महज 60 वर्ग किलोमीटर का है.
लेकिन लंबे समय से एक दूसरे के दुश्मन रहे इसराइल और सऊदी अरब के बीच के तीखे रिश्तों को सहज करने में इनकी बड़ी भूमिका हो सकती है.
रेड सी के ये दोनों द्वीप हैं - तिरान और सनाफीर. रणनीतिक तौर पर ये दोनों द्वीप बड़ी ही अहम जगह पर हैं. ये ठीक खाड़ी के मुहाने पर हैं.
इसी मुहाने पर जॉर्डन का बंदरगाह अकाबा और इसराइल का बंदरगाह इलात है. दोनों का इतिहास उथलपुथल से भरा रहा है.
सऊदी अरब और इसराइल के बीच रिश्तों को सामान्य करने की शुरुआत इन द्वीपों पर प्रस्ताव लाकर की जा सकती है. इस दिशा में ये एक अहम पहल हो सकती है.
इसराइल ने हाल में मोरक्को, बहरीन, सूडान और संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने रिश्ते सुधारने की शुरुआत की है.
हाल के दिनों में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं. सऊदी अरब ने अपने एयरस्पेस सभी एयरलाइंस के लिए खोलने का एलान किया है. इनमें अब तक प्रतिबंधित रही इसराइल एयरलाइंस भी शामिल है.
ये एलान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की सऊदी यात्रा के दौरान हुआ था. इसराइल इसके बदले तिरान और सनाफीर की संप्रभुता मिस्र से सऊदी अरब के हाथों में दिए जाने को स्वीकार कर सकता है.
हालांकि आधिकारिक तौर पर इसका एलान नहीं हुआ है.

क्या है इन द्वीपों की अहमियत?
तिरान उस जल डमरूमध्य का नाम है, जो अकाबा की खाड़ी को बाकी के रेड सी और सनाफर से जोड़ता है. मिस्र ने 2018 में इन दोनों द्वीपों की संप्रभुता सऊदी अरब को सौंप दी थी. लेकिन इसके लिए इसराइली सरकार को अपनी मंजूरी देनी होगी.
इसराइल और मिस्र के बीच 1978 में शांति समझौता हुआ और इससे दोनों के बीच 30 साल पुराना संघर्ष समाप्त हो गया था. लेकिन इस समझौते के लिए ये जरूरी था कि तिरान और सनाफीर से फौजें पूरी तरह हटा ली जाएं.
यह प्रक्रिया बहुस्तरीय फौजी पर्यवेक्षण में हो. संधि ठीक तरह से लागू हो इसके लिए ये निगरानी जरूरी थी. हालांकि सऊदी अरब चाहता है कि ये शांतिरक्षक इन द्वीपों को छोड़ दे.
बहरहाल अमेरिका गोपनीय तरीके से मिस्र, इसराइल और सऊदी अरब के बीच महीनों से मध्यस्थता करने में लगा है. यह इतना आसान नहीं है क्योंकि इसराइल और सऊदी अरब के बीच राजनयिक रिश्ते नहीं है.
इसलिए वे द्विपक्षीय समझौते पर दस्तखत नहीं कर सकते. लेकिन इसके लिए थोड़ी रचनात्मकता और राजनयिक कलाबाजी की जरूरत होगी.
इसराइल की भूमिका
अगर इसराइल इस बात पर राजी हो जाता है कि यहां की फौजें सिनाई से दक्षिण की ओर चली जाएं और द्वीपों पर निगरानी के लिए कैमरे लगा दिए जाएं तो यह राजनयिक रिश्तों को सामान्य करने की दिशा में एक बड़ी अड़चन को खत्म कर देगा.
लेकिन वो इतना अहम क्यों हैं? इसकी अहमियत समझने के लिए आपको दशकों पीछे लौटना होगा. खास कर सिनाई युद्ध और इसराइली राज्य के स्थापना के दौर में. मिस्र और सऊदी अरब के बीच संप्रभुता की लड़ाई दशकों से चली आई है.
मिस्र का कहना है कि 1906 में यानी सऊदी साम्राज्य की स्थापना से एक चौथाई सदी पहले ओटोमन साम्राज्य और ब्रिटेन के बीच एक समझौता हुआ था. इस समझौते की बदौलत ही मिस्र को द्वीपों को अधिकार मिला था.
इन द्वीपों पर बाद में लगभग आधी सदी तक कोई आबादी नहीं थी. 1950 में सऊदी अरब ने मिस्र को इस बात की अनुमति दे दी कि वह वहां अपनी सेना तैनात कर ले ताकि नए-नए बने इसराइली राज्य को अपने विस्तार का मौका न मिल सके.
1967 में मिस्र के राष्ट्रवादी नेता जमाल अब्दुल नासिर ने तिरान के जल डमरूमध्य को बंद करने और इसराइली बंदरगाह इलात तक पहुंच रोकने के लिए इन द्वीपों का इस्तेमाल किया था. इसे इसराइल और रेड सी का संपर्क कट गया.
इसके जवाब में इसराइली प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने युद्ध छेड़ दिया. छह दिन चले इस युद्ध के बाद इसराइल ने न सिर्फ द्वीप को अपने नियंत्रण में कर लिया, बल्कि इसने पूरे सिनाई प्रायद्वीप पर कब्जा कर लिया.
साल 1982 में इसे लौटाया गया. यानी इस संबंध में समझौता होने के तीन साल बाद.

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मिस्र और सऊदी अरब का विवाद
हालांकि मिस्र दशकों से तिरान और सनाफीर पर सऊदी अरब के दावों को नकारता रहा था लेकिन 2016 में मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुलफतह सीसी ने सऊदी अरब के किंग सलमान अब्दुलअजीज अल सऊदी के सामने ये वादा किया कि ये उनके देश को सौंप दिए जाएंगे.
मिस्र के राष्ट्रपति के इस फैसले का खुद उनके देश में विरोध होने लगा. सीसी ने इस फैसले की कोई वजह नहीं बताई. लेकिन माना जाता है सऊदी अरब ने मिस्र को 25 हजार मिलियन डॉलर की जो मदद की थी, उसी से इस समझौते का रास्ता साफ हुआ. लेकिन इस एलान से मिस्र में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया.
स्थानीय अदालत ने इसे फैसले को पलट दिया. लेकिन मिस्र की संसद में बहुमत होने की वजह से 2017 में इस फैसले को पारित करा लिया गया. आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस विवाद को खत्म किया. उस समय फैसला किया गया कि तिरान और सनाफीर सऊदी अरब के होंगे.
इसराइल समर्थक अमेरिकी थिंक टैंक वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी के पॉलिटिकल साइंटिस्ट डेविड शेंकर ने एक विश्लेषण में कहा है कि इसराइल की असली चिंता ये है कि द्वीपों के हस्तांतरण के बाद रेड सी में इलात तक इसकी नावों को जाने का रास्ता मिले. उसकी दूसरी मांग सऊदी एयरस्पेस में जगह हासिल करने की थी. यह मांग पूरी हो चुकी है.
इसराइली एयरलाइन ईआई की उड़ानें अब भारत और चीन तक आने की राह में सऊदी अरब के आसमान से भी गुजर सकेंगी. बेन गुरियोन से उड़ानें अब सीधे जेद्दाह तक पहुंच सकती हैं. इससे इसराइल में रहने वाले मुस्लिम जायरीन सीधे मक्का आ सकेंगे.

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फलीस्तीन पर असर
आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब ने ये कहा है कि जब तक एक स्वतंत्र फलीस्तीनी राज्य की संप्रभुता नहीं मान ली जाती और यह स्थापित नहीं हो जाता तब तक इस्राइल के साथ उसके रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते.
मौजूदा बादशाह किंग सलमान फलस्तीन के जबरदस्त समर्थक रहे हैं. इसलिए ये मुश्किल लगता है कि उनके रहते इसराइल और सऊदी अरब के बीच पूर्ण राजनयिक रिश्ते कायम हो पाएगा.
लेकिन उनके पुत्र मोहम्मद सलमान सऊदी अरब और इसराइल के बीच रिश्तों के प्रति ज्यादा खुलापन दिखा रहे हैं.
हालांकि आर्थिक हित दांव पर हैं लेकिन क्षेत्र में साझा दुश्मन ईरान के लिए एक गठबंधन बन सकता है.

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हाल के कुछ वर्षों में सऊदी अरब और फलस्तीनी नेशनल अथॉरिटी के बीच के रिश्ते ठंडे पड़े हैं. सऊदी शाही परिवार के कुछ सदस्यों ने फलस्तीन सरकार की आलोचना भी की है.
इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच रिश्तों को सामान्य करने वाले 2020 के कथित अब्राहम अकॉर्ड ने अरब देशों के लिए इस्राइल को मान्यता देने का रास्ता साफ कर दिया है.
इससे दोनों के बीच पूरी तरह राजनयिक रिश्तों कायम करने का भी रास्ता हो गया है.
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