CIA: नंद मूलचंदानी को जिस अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने बनाया अधिकारी वो कैसे काम करती है?

नंद मूलचंदानी

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    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के निदेशक विलियम जे बर्न्स ने भारतीय मूल के नंद मूलचंदानी को एजेंसी का पहला चीफ़ टेक्नोलॉजी ऑफ़िसर नियुक्त किया है.

सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी की ओर से रविवार को जारी बयान में कहा गया है कि नंद मूलचंदानी के पास प्राइवेट और सरकारी महकमों में 25 से ज़्यादा वर्षों का अनुभव है.

वे सिलिकॉन वैली के साथ-साथ अमेरिकी रक्षा मंत्रालय में काम कर चुके हैं. सीआईए से जुड़ने से पहले नंद मूलचंदानी रक्षा मंत्रालय में ज्वाइंट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेंटर के चीफ़ टेक्नोलॉजी ऑफ़िसर और कार्यकारी निदेशक के ओहदे पर थे.

नंद मूलचंदानी कई सफल स्टार्टअप बना चुके हैं. वे ओब्लिक्स, डिटरमिना, ओपन डीएनएस और स्केल एक्सट्रीम के सह संस्थापक और सीईओ भी रह चुके हैं.

नंद मूलचंदानी की लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक उन्होंने दिल्ली के ब्लूबेल्स स्कूल इंटरनेशनल से पढ़ाई की है. साल 1987 में इसी स्कूल से 12वीं की पढ़ाई पूरी कर नंद मूलचंदानी बीए करने अमेरिका चले गए. अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से उन्होंने कंप्यूटर साइंस और मैथ से डिग्री हासिल की है.

2018 में उन्होंने स्टैनफ़र्ड से मैनेजमेंट में मास्टर ऑफ़ साइंस और हार्वर्ड से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स भी की हुई है.

अब नंद मूलचंदानी गोपनीयता और जासूसी क्षमताओं के लिए मशहूर सीआईए में बतौर चीफ टेक्नोलॉजी ऑफिसर की कमान संभालने जा रहे हैं.

सीआईए को अमेरिकी की फ़स्ट लाइन ऑफ डिफेंस भी कहा जाता है. सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि ये एजेंसी काम कैसे करती है और क्यों इसे लेकर दुनियाभर में इतनी चर्चा है.

सीआईए

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क्या है सीआईए

सीआईए यानी सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी की स्थापना साल 1947 में हुई. सीआईए अमेरिका की एक सरकारी एजेंसी है.

सीआईए वैश्विक मुद्दों और अलग अलग देशों की खुफिया जानकारी इकट्ठा करती है जिसे राष्ट्रपति, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और दूसरी संस्थाओं के साथ साझा किया जाता है. ये खुफिया जानकारियां अमेरिका को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णय लेने में मदद करती हैं.

इसमें आतंकवाद से लड़ना, परमाणु और गैर परंपरागत हथियारों के विस्तार को रोकना, विदेशी जासूसों से देश की रक्षा करना और दूसरे देशों की जासूसी करना भी शामिल है.

अमेरिका के वर्जीनिया में सीआईए का मुख्यालय है. इस वक्त विलियम जे बर्न्स अमेरिकी सीआईए के निदेशक हैं. निदेशक को अमेरिका के राष्ट्रपति चुनते हैं जिसमें सीनेट की मंजूरी जरूरी होती है. सीआईए के निदेशक राष्ट्रीय खुफिया निदेशक को रिपोर्ट करते हैं.

सीआईए

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सीआईए का बजट कितना है

अमेरिका में राष्ट्रीय खुफिया कार्यक्रम के लिए सालाना बजट पास होता है. ये रकम अमेरिका की 16 अलग अलग गुप्तचर संस्थाएं मिलकर खर्च करती हैं. इनमें से एक है सीआईए.

साल 2020 में राष्ट्रीय खुफिया कार्यक्रम के लिए कुल 62.7 अरब डॉलर का बजट पास किया गया था. अगर भारतीय रुपयों में बात करें तो ये बजट करीब 4 लाख 80 हजार करोड़ रुपये का है.

इस खुफिया बजट में सैन्य खुफिया कार्यक्रम शामिल नहीं है. उसके लिए अलग से पैसा दिया जाता है जो सालाना करीब 20 अरब डॉलर से अधिक होता है. दुनिया में 100 से ज्यादा ऐसे देश हैं जिनकी जीडीपी अमेरिका के राष्ट्रीय खुफिया कार्यक्रम के बजट से कम है.

अमेरिका कभी ये नहीं बताता है कि उसने किस गुप्तचर संस्था को किस काम के लिए कितने पैसे दिए.

साल 2013 में अमरीकी अख़बार वाशिंगटन पोस्ट ने एडवर्ड स्नोडेन के हवाले से अमेरिका के खुफिया बजट को लेकर कई दावे किए थे. अखबार ने दावा किया था कि साल 2013 में ये बजट 52.6 अरब डॉलर था. इसमें करीब 96 हजार करोड़ रुपयों के बराबर रकम अकेले सीआईए खर्च करती है.

अखबार के मुताबिक सीआईए तकरीबन पांच अरब डॉलर यानी 30 हजार करोड़ से ज्यादा रकम मानवीय जासूसी पर खर्च करती है. इसमें से करीब 440 करोड़ रुपये तो केवल दुनिया भर में फैले अपने जासूसों को फर्जी पहचान देने में खर्च किए जाते हैं.

एबटाबाद

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इमेज कैप्शन, एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन का ठिकाना

सीआईए के खुफिया अभियान

11 सितंबर 2001 को दुनिया का सबसे ख़तरनाक चरमपंथी हमला हुआ था. चरमपंथियों ने दो अमेरिकी यात्री विमानों को न्यूयॉर्क स्थित वर्ल्ड ट्रेड टावर की दो गगनचुंबी इमारतों से टकराया था. इस हादसे में हज़ारों लोगों की मौत हुई थी.

इस्लामी चरमपंथी समूह अल क़ायदा के इस हमले के बाद सीआईए ने ही अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को खोज निकाला था, जिसके बाद 2 मई, 2011 की सुबह अमेरिका ने एक स्पेशल ऑपरेशन में पाकिस्तान में ओसामा को मार गिराया था.

अल क़ायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पकड़ने से लेकर देश की सरकार गिराने तक में सीआईए की अहम भूमिका रही है.

ईरान में किया तख्तापलट

अमरीकी खुफ़िया एजेंसी सीआईए ने पहली बार औपचारिक रूप से स्वीकार किया था कि 1953 में हुए ईरान के तख़्तापलट में उसकी मुख्य भूमिका थी. इस तख़्तापलट में ईरान में लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मुसद्दिक़ को बेदख़ल कर दिया गया था.

दस्तावेज़ों के मुताबिक सीआईए ने तख़्तापलट की तैयारी के लिए ईरानी और अमरीकी मीडिया में मुसद्दिक़-विरोधी खबरों को प्रकाशित करवाना शुरू कर दिया था. इस तख़्तापलट ने शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासन को मजबूत किया, जो ईरान से बाहर रहते हुए मुसद्दिक़ के साथ सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे.

वह तख़्तापलट के बाद ईरान लौट आए और अमरीका के घनिष्ठ सहयोगी बन गए.

सद्दाम हुसैन

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सीआईए ने की असली सद्दाम हुसैन की पहचान

जब साल 2003 में अमेरिका ने इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को पकड़ा था तो अमेरिका इस बात की पुष्टि करना चाहता था कि वह शख्स सद्दाम हुसैन ही है. उस समय ये अफवाह थी कि कई नकली सद्दाम हुसैन हैं.

इस काम की जिम्मेदारी 1988 में सीआईए में शामिल होने वाले निक्सन को सौंपी गई थी. उस समय निक्सन इराक में ही थे. निक्सन ने कुछ देर सद्दाम हुसैन से बातचीत की और उनके असली होने की पुष्टि की.

2011 में सीआईए छोड़ने वाले निक्सन ने कहा था कि उनके दिमाग़ में सद्दाम को पहचानने में कोई दुविधा नहीं हुई थी.

कबूतरों का ख़ुफ़िया मिशन में इस्तेमाल

कबूतरों को पोस्टमैन के तौर पर इस्तेमाल करने की बात हज़ारों साल पहले से सुनने में आती है. लेकिन, उन्हें जासूसी के कामों में इस्तेमाल करने का पहला प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध में देखने को मिला.

द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटिश खुफ़िया विभाग की एक कम जानी मानी ब्रांच एमआई 14 (डी) ने भी खुफ़िया कबूतर सर्विस शुरू की थी. इसके बाद शीत युद्ध के दौरान सीआईए ने कबूतरों को ट्रेनिंग देकर उन्हें जासूसी के लिए तैयार किया था.

कबूतरों को सोवियत संघ के संवेदनशील इलाकों में पहुंचाकर गुप्त तरीकों से तस्वीरें खींचने की ट्रेनिंग दी जाती थी.

कबूतर से जासूसी

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ऑपरेशन 'टकाना' के दौरान कई दूसरे जानवरों के इस्तेमाल के बारे में भी पता चलता है. फाइलों से पता चलता है कि सीआईए ने एक कौए को इस तरह ट्रेनिंग दी थी कि वह 40 ग्राम भार वाली वस्तु को किसी इमारत की खिड़की पर रख सकता था.

1960 की फ़ाइलें बताती हैं कि सीआईए ने दूसरे देशों के बंदरगाहों पर जासूसी के लिए डॉल्फिन का इस्तेमाल भी किया है. पश्चिमी फ़्लोरिडा में दुश्मन के जहाज़ पर हमले के लिए डॉल्फिन को तैयार किया गया था.

इसके साथ ही डॉल्फिन को यह भी सिखाया गया कि वह समुद्र में न्यूक्लियर पनडुब्बी का पता लगा सके या फिर रेडियोएक्टिव हथियारों की पहचान कर सके.

साल 1967 से सीआईए अपने तीन कार्यक्रमों पर 6 लाख डॉलर से ज़्यादा पैसा खर्च कर रही है. इसमें डॉल्फिंस, पक्षी, कुत्ते और बिल्लियों का इस्तेमाल शामिल है.

कैदियों से 'दुर्व्यवहार'

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सीआईए पर कैदियों से 'दुर्व्यवहार' के आरोप

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के शासनकाल में सीआईए पर कैदियों से दुर्व्यवहार के आरोप भी लगे हैं.

अमेरिकी सीनेट की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि सीआईए कैदियों से पूछताछ के लिए एक खुफिया काल कोठरी का इस्तेमाल करता है.

कैदियों से पूछताछ के इन तरीकों में बेहद ठंडे पानी में संदिग्धों को डुबोकर रखना और कैदियों का सर दीवार पर मारना शामिल है.

अमेरिकी सीनेट की यह रिपोर्ट 2009 में सीआईए की गतिविधियों की जांच के लिए शुरू की गई विस्तृत जाँच पर आधारित है.

एक अधिकारी ने बताया था कि अल क़ायदा के संदिग्ध अबु ज़ुबैदा से सारी महत्वपूर्ण जानकारी उन्हें 83 बार ठंडे पानी में डुबोने (वाटर बोर्ड) से पहले ही मिल चुकी थी.

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