नोबेल शांति पुरस्कार: 6 विजेता जो विवादों में रहे और गांधी को सम्मान न देने का मामला

नोबोल शांति पुरस्कार

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इमेज कैप्शन, नोबोल शांति पुरस्कार 1991 से दिया जा रहा है

शुक्रवार को 2021 के नोबल शांति पुरस्कार की घोषणा कर दी गई. इस साल के नोबेल शांति पुरस्कार मारिया रेस्सा और दिमित्री मुरातोव को देने की घोषणा हुई है. इन दोनों को अभियव्यक्ति की स्वतंत्रता की हिफ़ाज़त के प्रयास करने के लिए ये पुरुस्कार दिया गया है.

नोबेल प्राइज़ देने वाली संस्था की ओर से किए गए ट्वीट में कहा गया है, "इन दोनों ने बोलने की आज़ादी की सुरक्षा करने की कोशिश की है जो लोकतंत्र और शांति की एक ज़रूरी शर्त है."

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मारिया रेस्सा फ़िलीपीन्स के जानी-मानी पत्रकार हैं जो रेपलर नाम की वेबसाइट चलाती हैं. सरकार से मुश्किल सवाल पूछने के कारण, फ़िलीपीन्स में उन्हें कई दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा है. रेस्सा का जन्म फ़िलीपीन्स में ही हुआ था लेकिन वे बचपन में ही अमेरिका चली गई थीं. उन्होंने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है.

दिमित्री मुरातोव भी पत्रकार हैं और उन्होंने नोवाजा गज़ेता नाम के एक स्वतंत्र अख़बार की स्थापना की है. वे दशकों से रूस में बोलने की आज़ादी की हिमायत करते रहे हैं.

इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेता को साढ़े आठ करोड़ रुपये के क़रीब राशि मिलती है. इन दोनों का चुनाव 329 उम्मीदवारों में से किया गया है. नोबेल दुनिया के सबसे बड़े पुरस्कारों में से एक हैं. नोबेल शांति पुरस्कार उन छह पुरस्कारों में से एक है जिसकी शुरुआत स्वीडन के वैज्ञानिक, बिज़नेसमैन और समाजसेवी एलफ्रेड नोबल ने की थी.

लेकिन राजनीति से संबंध के कारण, शांति पुरस्कार बाकी के पांच नोबेल पुरस्कारों की तुलना में ज़्यादा विवादों में रहा है. हम यहां कुछ ऐसे लोगों के बारे में बता रहें हैं जिन्हें पुरस्कार दिए जाने पर विवाद हुआ और एक शख्स जिसे पुरस्कार नहीं दिए जाने की आलोचना हुई.

ओबामा

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बराक ओबामा

कई लोगों ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर आपत्ति जताई थी. ख़ुद ओबामा इस पुरस्कार के मिलने से हैरान थे.

उन्होंने साल 2020 में प्रकाशित अपनी जीवनी में लिखा कि पुरस्कार की घोषणा के बाद उन्होंने उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, "किस लिए".

वो नौ महीने पहले ही राष्ट्रपति बने थे और आलोचकों का कहना था कि ये जल्दी में लिया गया फ़ैसला था. ओबामा के पद ग्रहण करने के सिर्फ 12 दिनों बाद ही नोबेल पुरस्कार के नॉमिनेशन की प्रक्रिया ख़त्म हो गई थी.

साल 2015 में नोबेल इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर, गेर लुंडेस्टन ने बीबीसी को बताया था कि जिस कमेटी ने ये फ़ैसला लिया था, उन्हें बाद में इस पर अफ़सोस हुआ था.

यासिर अराफ़ात

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यासिर अराफ़ात

पूर्व फलस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को 1994 में ये पुरस्कार इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री येत्‌ज़ाक रॉबिन और इसराइल के विदेश मंत्री शिमोन पेरेस के साथ ओस्लो शांति समझौते के लिए दिया गया था.

समझौता इसराइल-फ़लस्तीनी विवाद को सुलझाने की एक उम्मीद लेकर आया था.

इसराइल और दूसरे देशों में इसकी आलोचना हुई क्योंकि अराफ़ात पहले अर्धसैनिक गतिविधियों में शामिल थे.

नोबेल कमेटी में इस फ़ैसला पर विवाद हुआ. फ़ैसले के विरोध में एक सदस्य, केयर क्रिस्टेइन्सन ने इस्तीफ़ा दे दिया था.

आंग सान सू ची

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आंग सान सू ची

साल 1991 में सू ची को म्यांमार के सैन्य शासन के ख़िलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन के लिए इस पुरस्कार से नवाज़ा गया.

लेकिन 20 साल बाद, आंग सान सू ची पर सर्वोच्च नेता रहते हुए रोहिंग्या मुसलमानों के मानवाधिकारों का हनन और उनकी हत्या के आरोप लगे. यूएन ने इसे 'नरसंहार' बताया.

आंग सान सू ची से नोबेल सम्मान वापस लेने की भी मांग उठी लेकिन नोबेल पुरस्कारों के नियम इसकी इजाज़त नहीं देते.

अबी अहमद

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अबी अहमद

दिसंबर 2020 में इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद को इस पुरस्कार के नवाज़ा गया. ये पुरस्कार उन्हें पड़ोसी देश इरिट्रिया के साथ लंबे समय से चल रहे विवादों को सुलझाने की कोशिश के लिए दिया गया था.

लेकिन एक साल के बाद ही इस फ़ैसले पर सवाल उठने लगे.

अंतरराष्ट्रीय समुदायों ने सवाल उठाए कि क्या अहमद द्वारा उत्तरी तिगरी में की गई सैन्य तैनाती सही थी.

वहां लड़ते हुए हज़ारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. संयुक्त राष्ट्र ने इसे "दुखद त्रासदी" बताया था.

वंगारी मथाई

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वंगारी मथाई

साल 2004 में कीनिया की पूर्व सामाजिक कार्यकर्ता नोबेल शांति पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला बनीं.

लेकिन एचआईवी और एड्स से जुड़े उनके बयान के सामने आने के बाद उनकी काफ़ी आलोचना हुई.

मथाई ने कहा था कि एचआईवी वायरस कृत्रिम तरीके के बनाया गया एक जैविक हथियार है और इसे काले लोगों को ख़त्म करने के लिए बनाया गया है.

उनके इस दावे को साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है.

हेलरी किसिंगर

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हेरी किसिंजर

साल 1973 में तब के अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था.

किसिंजर का नाम कंबोडिया में सीक्रेट बॉम्बिंग कैंपेन और दक्षिण अमेरिका में क्रूर सैन्य शासन से जुड़ा था, इसलिए उनके नाम पर कई सवाल खड़े किए गए.

किंसिंजर को ये सम्मान वियतनाम के नेता ले डुक थो के साथ दिया गया था जिन्होंने वियतनाम युद्ध को रोकने में अहम योगदान दिया था.

महात्मा गांधी

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गांधी को नहीं मिला नोबेल सम्मान

नोबेल शांति पुरस्कार कई लोगों को नहीं दिए जाने के कारण भी चर्चा में रहा है.

इन नामों में शायद सबसे ऊपर हैं महात्मा गांधी. कई बार नॉमिनेट किए जाने के बावजूद गांधी को ये सम्मान नहीं दिया गया.

साल 2006 में नार्वे के इतिहासकार और तब के शांति पुरस्कार की कमेटी के अध्यक्ष गेर लुंडेस्टैड ने कहा था कि गांधी की उपलब्धियों को सम्मान नहीं देना नोबेल इतिहास की सबसे बड़ी चूक में से एक हैं.

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