नोबेल पुरस्कार 2020: हेपेटाइटिस C वायरस खोजने वालों को मिला मेडिसिन का नोबेल

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- Author, जेम्स गैलाघर
- पदनाम, बीबीसी विज्ञान संवाददाता
हेपेटाइटिस C वायरस की खोज करने वाले तीन वैज्ञानिकों को साल 2020 का मेडिसिन नोबेल पुरस्कार दिया गया है.
ब्रितानी वैज्ञानिक माइकल हाउटन (Michael Houghton) और अमरीकी वैज्ञानिक हार्वे अल्टर (Harvey Alter) और चार्ल्स राइस ( Charles Rice) को मेडिसिन के क्षेत्र में यह पुरस्कार दिया गया है.
नोबेल पुरस्कार देने वाली कमेटी ने कहा कि इन वैज्ञानिकों की खोज ने लाखों लोगों की जान बचाई है.
हेपेटाइटिस C वायरस से लीवर कैंसर होता है और यह एक बहुत बड़ा कारण है कि लोगों को लीवर ट्रांसप्लांट करवाना पड़ता है.
1960 के दशक में यह एक बड़ी चिंता का विषय था कि जो लोग दूसरों से रक्तदान लेते थे उन्हें एक अज्ञात और रहस्यमयी बीमारी हो जाती थी जिसके कारण उनके लीवर में जलन पैदा हो जाती थी.
नोबेले कमेटी के अनुसार उस समय ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न 'रूसी रुलेट' की तरह था. इसका अर्थ होता है एक ख़तरनाक खेल जिसमें खेलने वाला अपने रिवॉल्वर में सिर्फ़ एक गोली डालता है और फिर सिलेंडर को घुमा देता है. उसके बाद वो अपनी रिवॉल्वर को ख़ुद पर ही तान कर चला देता है. इस खेल में उसकी जान भी जा सकती है और वो बच भी सकता है.
बहुत ही उच्च श्रेणी के ब्लड टेस्ट से अब इस तरह के ख़तरों पर क़ाबू पाया जा चुका है और एंटी-वायरस दवाएं भी विकसित की जा चुकी हैं.
नोबेल कमेटी के अनुसार 1960 के दशक में किसी से ख़ून लेना ऐसा ही ख़तरनाक था कि आपकी जान भी जा सकती थी.
नोबेल कमेटी ने कहा, "इतिहास में पहली बार अब इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है, जिससे दुनिया से हेपेटाइटिस सी वायरस ख़त्म करने की उम्मीद बढ़ गई है."
लेकिन अभी भी इस वायरस के सात करोड़ मरीज़ हैं और इस वायरस से दुनिया भर में हर साल क़रीब चार लाख लोग मारे जाते हैं.

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रहस्यमयी क़ातिल
1960 के दशक में हेपेटाइटिस A और हेपेटाइटिस B को खोजा गया था.
लेकिन प्रोफ़ेसर हार्वे ने साल 1972 में यूएस नेशनल इंस्टीच्यूट्स ऑफ़ हेल्थ में ब्लड ट्रांसफ़्यूजन के मरीज़ों पर शोध करते हुए पाया था कि एक दूसरा रहस्यमीय वायरस भी मौजूद है जो अपना काम कर रहा है.
ब्लड डोनेशन लेने वाले मरीज़ बीमार पड़ रहे थे.
उन्होंने अपनी शोध में पाया कि संक्रमित लोग अगर वनमानुष को अपना ख़ून दे रहे थो तो उससे वनमानुष बीमार पड़ रहे थे.
इस रहस्यमयी बीमारी को नॉन A नॉन B हेपेटाइटिस कहा जाने लगा और इसकी खोज शुरू हो गई.
प्रोफ़ेसर माइकल हाउटन ने दवा की कंपनी शिरोन में काम करते हुए साल 1989 में इस वायरस के जेनेटिक श्रंखला की पहचान करने में सफलता पाई थी.
इससे पता चला कि यह एक तरह का फ़्लैवीवायरस है और इसका नाम हेपेटाइटिस C रख दिया गया.
प्रोफ़ेसर चार्ल्स राइस ने सेंट लुई स्थित वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में रहते हुए साल 1997 में इस वायरस के बारे में अंतिम महत्वपूर्ण खोज की.
उन्होंने हेपेटाइटिस C वायरस को एक वनमानुष के लीवर में इंजेक्ट किया और दिखाया कि वनमानुष को हेपेटाइटिस संक्रमण हो गया है.
नोबेल एसेम्बली के महासचिव प्रोफ़ेसर टॉमस पर्लमैन ने कहा कि वो फ़िलहाल प्रोफ़ेसर ऑल्टर और प्रोफ़ेसर राइस को ही नोबेल पुरस्कार दिए जाने की सूचना दे पाएं हैं.
उन्होंने कहा, "वे लोग अपने फ़ोन के आसपास नहीं बेठे थे क्योंकि मैंने उनलोगों को कई बार फ़ोन किया लेकिन जवाब नहीं मिला. लेकिन जब उनसे संपर्क हुआ तो वे लोग बहुत चौंके और बहुत ख़ुश हुए, कुछ देर के लिए तो वो लोग कुछ बोल ही नहीं पाए. उनसे बात करके मुझे बहुत अच्छा लगा."
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