अभिजीत और एस्टेयर को मिले नोबेल में दाल का कमाल

अभिजीत बनर्जी और एस्टेयर ड्यूफ़्लो

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    • Author, टीम बीबीसी हिंदी
    • पदनाम, नई दिल्ली

अभिजीत, एस्टेयर ड्यूफ़्लो और माइकल क्रेमर को ग़रीबी मिटाने के प्रयासों के लिए अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है. इससे पहले अमर्त्य सेन को भी ग़रीबी उन्मूलन की दिशा में काम करने के लिए नोबेल सम्मान मिला था.

अमर्त्य सेन ने कहा, "नोबेल समिति ने इस बार सबसे योग्य लोगों को चुना है." क्या आप जानते हैं कि इन तीनों ने ऐसा क्या कमाल कर दिखाया.

अभिजीत बनर्जी का कहना है कि "लोग ग़रीबी के बारे में बहुत बातें करते हैं, हमेशा बड़े और बुनियादी सवाल उठाते हैं, मसलन, ग़रीबी की मूल वजह क्या है, क्या विदेशी अनुदान से ग़रीबी हटाई जा सकती है, या फिर ये कि सरकारी और ग़ैर-सरकारी संगठनों की भूमिका क्या होनी चाहिए. इस तरह ग़रीबी बड़ी बहसों में उलझी रहती है. होना यह चाहिए कि ग़रीबी को सुलझाने लायक़ टुकड़ों में तोड़ा जाए."

अभिजीत और एस्टेयर को मिले नोबेल में दाल का कमाल

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इसका मतलब यह है कि शिक्षा, पोषण और टीकाकरण जैसे कामों पर ध्यान दिया जाए और ग़रीबों को थोड़ी मदद दी जाए तो ऐसे कार्यक्रमों की सफलता की दर बढ़ जाएगी और ग़रीबी उन्मूलन की दिशा में छोटे-छोटे हज़ारों लाखों काम करने की ज़रूरत है, न कि बड़ी-बड़ी बहसों की.

नोबेल समिति की वेबसाइट पर एक ग्राफ़िक प्रकाशित किया गया है जिसमें समझाया गया है कि इन अर्थशास्त्रियों ने किस तरह दाल जैसी मामूली चीज़ को प्रोत्साहन के तौर पर इस्तेमाल करके टीकाकरण की एक परियोजना को कामयाब बना दिया.

दाल

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ये है दाल का कमाल

एस्टेयर ड्यूफ़्लो ने बताया कि जिन बच्चों का पूरी तरह टीकाकरण हो चुका है उनकी तादाद राजस्थान में बहुत कम है. जब यह रिसर्च किया गया तो पूरी तरह इम्युनाइज़्ड बच्चों की तादाद पांच प्रतिशत के क़रीब थी. इसकी वजह ये बताई गई कि इम्युनाइज़ेशन करने वाले कर्मचारी लोगों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं.

ऐसे में लोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक दूर चलकर जाना पड़ता था और इसमें कई बार उनका पूरा दिन लग जाता था जिसका मतलब ये था कि उनकी एक दिन की दिहाड़ी मारी गई, कई बार तो वे बिना टीका लगवाए लौट आते थे क्योंकि कभी टीका ख़त्म हो जाता तो कभी कर्मचारी चले जाते, या कभी क़तार बहुत लंबी होती. ऐसे में लोगों ने टीका लगवाने का इरादा छोड़ दिया.

ऐसी हालत में इन अर्थशास्त्रियों ने एक प्रयोग करने की सोची, उन्होंने एक स्वयंसेवी संस्था सेवा मंदिर की मदद ली. अर्थशास्त्री टीकाकरण की कामयाबी का स्तर बढ़ाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने 120 गांवों को लॉटरी के आधार पर चुना, इन गांवों को तीन श्रेणियों में बांटा गया.

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पहली श्रेणी में ऐसे गांव थे जहां लोगों से स्वास्थ्य केंद्र में जाकर टीके लगवाने को कहा गया.

दूसरी श्रेणी में ऐसे गांव थे जहां टीका लगाने वाली मोबाइल क्लिनिकें लोगों के दरवाज़े तक पहुंचीं.

तीसरी श्रेणी में ऐसे गांव थे जहां टीका लगाने के मोबाइल क्लिनिक तो लोगों तक पहुंचे ही, साथ ही, टीका लगवाने को प्रोत्साहित करने के लिए लोगों को एक किलो दाल भी दी गई.

इसका नतीजा ग्राफ़िक में आप साफ़ देख सकते हैं, जिन गांवों में दाल को प्रोत्साहन के तौर पर इस्तेमाल किया गया वहां पूरी तरह इम्युनाइज़्ड बच्चों की तादाद 39 प्रतिशत तक पहुंच गई जबकि बिना दाल वाले गांवों में यह दर आधी से भी कम रही.

इस तरह अर्थशास्त्री ये साबित कर पाए कि ग़रीबी से निबटने के लिए ग़रीबों को छोटे-मोटे आर्थिक प्रोत्साहन देने के चमत्कारी फ़ायदे होते हैं. अर्थशास्त्री ने पक्के तौर पर साबित किया कि टीकाकरण की वजह से हज़ारों बच्चे स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ नहीं बनेंगे इस तरह सरकार को बहुत मोटी बचत होगी, एक किलो दाल की तुलना में कई हज़ार गुना बचत.

ये लोगों की ज़रूरतें-मजबूरियों को समझने वाले अर्थशास्त्रियों का कमाल है जिन्होंने दाल जैसी मामूली लगने वाली चीज़ से ग़रीबी उन्मूलन की दिशा में इतना बड़ा अंतर पैदा कर दिया.

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