अमेरिकी जनरल बोले- राष्ट्रपति जो बाइडन को दी थी सलाह, अफ़ग़ानिस्तान में 2,500 सैनिक रखें

जनरल मार्क मिले

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अमेरिकी सेना के दो शीर्ष जनरलों ने अफ़ग़ानिस्तान से सेना की वापसी के पहले राष्ट्रपति जो बाइडन को वहां 2,500 सैनिकों को रखने की सलाह दी थी. अमेरिकी सैनिकों की वापसी अगस्त में पूरी हुई.

जनरल मार्क मिले और जनरल फ्रैंक मैकेंजी ने अमेरिकी संसद में जो बताया है वो राष्ट्रपति बाइडन के उस बयान के विपरीत है जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें याद नहीं कि ऐसी कोई सलाह दी गई थी.

तालिबान ने 15 अगस्त को काबुल पर कब्ज़ा किया. उसके पहले अलग-अलग प्रांतों में नियंत्रण हासिल कर लिया था.

जनरल मिले ने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान सरकार जिस तेज़ी से गिरी उससे अमेरिका हैरान रह गया.

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मंगलवार को सीनेट आर्म्ड सर्विस कमेटी के सामने रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन के साथ दोनों जनरलों की सुनवाई हुई.

यह सुनवाई काबुल हवाईअड्डे से उस अव्यवस्थित वापसी के हफ़्तों बाद हुई जहां तालिबान उन हज़ारों हताश लोगों से देश नहीं छोड़ने की अपील कर रहा था जो ख़ुद को वहां से बाहर निकालने की भीख मांग कर रहे थे.

वापसी अभियान के दौरान हुए एक आत्मघाती हमले में 182 लोग मारे गए थे. 26 अगस्त को हवाईअड्डे के गेट के ठीक बाहर हुए उस हमले में अमेरिकी सेना के 13 और कम-से-कम 169 अफ़ग़ानों की मौत हुई थी.

अमेरिकी सैनिक

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अमेरिकी सेना अफ़ग़ानिस्तान में रहती तो क्या होता?

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के प्रमुख जनरल मैकेंज़ी की निगरानी में ही अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों की वापसी हुई है. रिपब्लिकन सांसदों के सवालों पर वे बोले कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में 2,500 सैनिकों की रखने की सिफारिश की थी.

उनकी यह गवाही 19 अगस्त को एबीसी के पत्रकार के सामने जो बाइडन के किए उस दावे के विपरीत है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि उन्हें याद नहीं है कि किसी ने उन्हें ऐसी सलाह दी थी.

जनरल मिले ने भी कहा कि वो इस सिफारिश से सहमत थे लेकिन जब उनसे अलास्का से रिपब्लिकन सीनेटर डैन सुलिवन ने पूछा कि क्या बाइडन ने झूठा बयान दिया था तो उन्होंने इस पर सीधा जवाब देने से इनकार कर दिया.

बाद में व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी ने इस मुद्दे पर कहा कि "राष्ट्रपति जॉइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ हैं और सेना की सलाह को अहमियत देते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे हमेशा इससे सहमत होते हैं."

उन्होंने कहा कि अगर अगस्त की समय सीमा के बाद भी अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में बने रहते तो अमेरिका अब तक तालिबान के साथ युद्ध कर रहा होता.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन

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बाइडन का बयान कमज़ोर पड़ा

उत्तर अमेरिका में बीबीसी रिपोर्टर एंथनी जर्चर का विश्लेषण

मार्क मिले, लॉयड आस्टिन और केनेथ मैकेंज़ी भले ही संसद में जो भी गवाही दी हो लेकिन ख़ुद जो बाइडन के शब्दों ने राष्ट्रपति को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है.

अगस्त में बाइडन ने एक इंटरव्यू के दौरान यह ज़ोर देकर कहा था कि तालिबान के नियंत्रण को रोकने के लिए किसी भी जनरल ने उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सेना की टुकड़ी रखने की सलाह नहीं दी थी.

दोनों जनरलों मैकेंज़ी और मिले ने कहा कि वहां उन सैनिकों की ज़रूरत है और मैकेंज़ी ने यहां तक कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति तक को इस बारे में बताया था.

जनरलों की बात सामने आने के बाद रिपब्लिकन सांसदों ने राष्ट्रपति के अगस्त में दिए गए बयान को लेकर उन पर हमला किया है.

यह देखते हुए कि सैनिकों की वापसी के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी नागरिक थे, रिपब्लिकन सांसदों ने बाइडन के उस बयान को भी कटघरे में रखा जिसमें वादा किया था कि जब तक एक एक अमेरिकी नागरिक अफ़ग़ानिस्तान ने नहीं निकाल लिए जाते वहां से सैनिकों की पूरी तरह वापसी नहीं होगी.

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अपनी सुनवाई में दोनों जनरलों ने पक्के तौर पर यह भी कहा कि अल-क़ायदा अब भी अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है. यह भी बाइडन के दिए गए उस बयान का खंडन करता है जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि इस आतंकी संगठन को जड़ से उखाड़ दिया गया है.

इस पूरे प्रकरण से रिपब्लिकन पार्टी को राष्ट्रपति पर अमेरिकी नागरिकों से झूठ बोलने का आरोप लगाने के लिए पर्याप्त हथियार मिल गए हैं.

बाइडन को इस तरह से भारी भरकम भरोसा नहीं देना चाहिए था. वे बस ये कह सकते थे कि सेना की सलाह पर विचार किया लेकिन पीछे हटने के फ़ैसले पर कायम रहे. लेकिन पहले के ही कई नेताओं की तरह अब उन्होंने अपने बयान से मुसीबत मोल लिया है.

इस्लामिक स्टेट

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अल-क़ायदा, इस्लामिक स्टेट पर भी बाइडन के उलट बयान

मंगलवार को सुनवाई की शुरुआत ऑस्टिन की गवाही के साथ हुई. उनके बाद जनरल मिले की बारी आई जिन्होंने कहा कि अमेरिकियों को अफ़ग़ानिस्तान से आतंकवादी हमलों से बचाना मुश्किल नहीं होगा.

उन्होंने कहा, "तालिबान आतंकवादी संगठन था और रहेगा और उसने अल-क़ायदा से अब तक अपने संबंध नहीं तोड़े हैं."

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि "इस बात की वास्तविक संभावना है कि अल-क़ायदा या इस्लामिक स्टेट अमेरिका पर हमला करने के अपने इरादों को लेकर पुनर्गठित हों."

जनरल मिले ने कहा कि उन्होंने बीते वर्ष यह बयान दिया था कि अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों की त्वरित वापसी वहां की सरकार के पतन का कारण बन सकती है.

लेकिन वे और ऑस्टिन दोनों ने अपनी गवाही में कहा कि जिस तेज़ी से वहां की सरकार का पतन हुआ उससे अमेरिकी सेना पूरी तरह चकित है.

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आस्टिन ने कहा, "हमने देश के पुनर्निर्माण में मदद की लेकिन हम एक राष्ट्र नहीं बना सके."

उन्होंने कहा, "ये तथ्य है कि हमने और हमारे सहयोगियों ने अफ़ग़ान सेना को ट्रेनिंग दी थी लेकिन वो आसानी से ढह गई- कई मामलों में तो बिना गोली चलाए ही- इससे हम पूरी तरह चकित हैं."

अमेरिकी सेना 9/11 के हमले के बाद पहली बार 2001 के अंत में अफ़ग़ानिस्तान में दाखिल हुई थी. तब से बीते महीने अफ़ग़ानिस्तान से सेना की वापस तक अमेरिका ने वहां हज़ारों की संख्या में अपने सैनिक तैनात किए जो 2011 में 1,10,000 (एक लाख दस हज़ार) की संख्या तक पहुंच गया था और अपने इस पूरे अभियान पर उसने लगभग 985 बिलियन डॉलर खर्च किए.

काबुल पर तालिबान के नियंत्रण और 31 अगस्त को वहां से सैनिकों की वापसी की समयसीमा के बीच के हफ़्तों में अमेरिका के बचे हुए चार हज़ार सैनिकों ने काबुल छोड़ा. वो वहां से क़रीब 50 हज़ार अफ़ग़ान शरणार्थियों को भी ले गया, जिन्हें वहां से एयरलिफ्ट किया गया. तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान पर नियंत्रण के बाद देश छोड़ने की कोशिश में काबुल हवाईअड्डे पर हज़ारों लोग इकट्ठा हो गए थे और उस दौरान अफरातफरी में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई थी.

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