Aukus : चीनी मीडिया ने क्यों कहा- भारत अमेरिका का सहयोगी नहीं, दूसरा अमेरिका बनना चाहता है

ऑकस

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अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा साझेदारी को लेकर एक समझौता हुआ है जिसे ऑकस नाम दिया गया है.

ऑकस समझौते पर यूरोपीय संघ, फ़्रांस और चीन ने आपत्ति भी जताई है. फ़्रांस ने तो ऑस्ट्रेलिया पर 'पीछे से चाकू घोंपने' का आरोप भी लगाया है.

वहीं चीन की सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने ऑस्ट्रेलिया और वॉशिंगटन के रिश्तों पर तंज़ करते हुए लिखा है कि लगता है वॉशिंगटन, ऑस्ट्रेलिया को 'स्पेशल ट्रीटमेंट' दे रहा है.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारत और जापान की ही तरह ऑस्ट्रेलिया भी क्वाड देशों में शामिल है लेकिन लगता है कि उसने इन दोनों देशों की तुलना में उसे कुछ 'ख़ास' महत्व दिया जा रहा है.

24 सितंबर को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन व्हाइट हाउस में क्वाड लीडर्स समिट की मेज़बानी करने वाले हैं.

क्वाड नेता

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'भारत पर पड़ेगा मनोवैज्ञानिक प्रभाव'

ग्लोबल टाइम्स की ख़बर के मुताबिक़, ऑकस समझौते का जापान और भारत पर 'मनोवैज्ञानिक प्रभाव' पड़ेगा. ऑकस समझौते से पता चलता है कि ऑस्ट्रेलिया के प्रति अमेरिका का बर्ताव जापान और भारत की तुलना में बहुत अलग है.

ग्लोबल टाइम्स की ख़बर के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका की हिंद-प्रशांत महासागर में रणनीति का केंद्र है, जिसके पश्चिम में हिंद महासागर और पूर्व में प्रशांत महासागर है. उत्तरी गोलार्ध में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे और सहयोगी हैं लेकिन दक्षिणी गोलार्ध में उसका वैश्विक रणनीतिक गठबंधन अपेक्षाकृत कमज़ोर लगता है.

ऑकस समझौता हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया को परमाणु-संचालित पनडुब्बियों को दिलाएगा. इस बार अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया के साथ राजनीतिक लाभ को और मज़बूत करने के लिए ऑकस समझौते के माध्यम से यह क़दम उठाया है.

ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, अमेरिका भारत को फंसाने की कोशिश कर रहा है. वॉशिंगटन का मुख्य उद्देश्य अपनी एशिया-प्रशांत रणनीति को पश्चिम की ओर हिंद महासागर तक फैलाना है. हालांकि भारत अपनी 'एक्ट ईस्ट' नीति को महत्व देता है. हो सकता है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली के समान हित हों फिर भी दोनों पक्षों के बीच कई मुद्दों पर काफी मतभेद भी हैं.

पनडुब्बी

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ग्लोबल टाइम्स ने और क्या लिखा

अख़बार लिखता है कि भारत ने हाल के सालों में बेहतर नज़दीकी से अमेरिका का अनुसरण किया है लेकिन ऐसा लगता है कि अमेरिका ने भारत को बार-बार निराश ही किया है.

इसका परिणाम ये हुआ कि सवाल उठने लगे कि क्या अमेरिका बिना शर्त भारत को संकट की घड़ी में समर्थन देगा या मुकर जाएगा. इस आशंका के साथ भारत, ऑस्ट्रेलिया की तरह पूरी तरह से अमेरिकी पक्ष की ओर नहीं झुकेगा. वॉशिंगटन और नई दिल्ली की अलग-अलग राजनीतिक ज़रूरतें हैं. भारत, अमेरिका का दूसरा सहयोगी नहीं बनना चाहता, उससे कहीं बढ़कर "एक और अमेरिका" बनना चाहता है.

रही बात जापान की तो जापान के लिए अमेरिका के साथ गठबंधन फ़ायदेमंद हो सकता है. हालांकि जापान की घरेलू राजनीतिक और कानूनी शर्तें अमेरिका के अनुरूप नहीं हैं.

ऑकस समझौते के तहत तकनीकी और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की साझेदारी पर सहमति हुई है. ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक़, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ऑस्ट्रेलिया को अपनी सैन्य ताकत विकसित करने में मदद कर सकता है और उसे एशिया में अमेरिका "गार्ड डॉग" बना सकता है.

चीन-ऑस्ट्रेलिया

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ऑकस समझोते की निंदा कर चुका है चीन

चीन ने अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए ऐतिहासिक सुरक्षा समझौते 'ऑकस' की आलोचना करते हुए इसे बेहद ग़ैर ज़िम्मेदाराना बताया है. चीन ने कहा है कि यह छोटी सोच का उदाहरण है.

चीन ने अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए रक्षा समझौते की निंदा करते हुए कहा कि ये 'शीत युद्ध की मानसिकता' को दर्शाता है. इससे पहले ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने एक विशेष सुरक्षा समझौते की घोषणा की थी.

इस समझौते के तहत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया को न्यूक्लियर पन्नडुबी की तकनीक भी मुहैया करवाएगा. जानकारों का मानना है कि इस नए सुरक्षा समझौते को एशिया पैसेफ़िक क्षेत्र में चीन के प्रभाव से मुक़ाबला करने के लिए बनाया गया है.

यह क्षेत्र वर्षों से विवाद का कारण है और वहां तनाव बना हुआ है. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने कहा, "इन्हीं वजहों से हथियारों के अंतरराष्ट्रीय प्रसार को रोकने के प्रयासों को धक्का लगता है."

उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए इस नए रक्षा समझौते की निंदा करते हुए कहा कि ये 'शीत युद्ध की मानसिकता' को दर्शाता है. चीनी की सरकारी मीडिया ने इस समझौते की निंदा करते हुए संपादकीय लेख प्रकाशित किये हैं.

चीन

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क्या है 'ऑकस'

ऑकस यानी ऑस्ट्रेलिया, यूके और यूएस. इन तीनों देशों के बीच हुए इस रक्षा समझौते को 'ऑकस' नाम दिया गया है.

इसमें आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम टेक्नोलॉजी और साइबर साझेदारी भी शामिल है.

ऑकस सुरक्षा समझौते पर एक संयुक्त बयान जारी कर कहा गया है, "ऑकस के तहत पहली पहल के रूप में हम रॉयल ऑस्ट्रेलियाई नौसेना के लिए परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं."

"इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा और ये हमारे साझा मूल्यों और हितों के समर्थन में तैनात होंगी."

इन पनडुब्बियों के मिलने के साथ ही ऑस्ट्रेलिया दुनिया के उन सात देशों की लिस्ट में शामिल हो जाएगा, जिनके पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियाँ होंगी.

इससे पहले अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, चीन, भारत और रूस के पास ही ये तकनीक थी.

ये पनडुब्बियाँ पारंपरिक रूप से संचालित पनडुब्बियों से ज़्यादा तेज़ होंगी और और इनका पता लगाना बेहद कठिन होगा.

ये महीनों तक पानी में डूबे रह सकती हैं और मिसाइलों से लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं. ये समझौता इसलिए भी अहम है क्योंकि पिछले 50 सालों में अमेरिका ने अपनी सब-मरीन तकनीक, ब्रिटेन के अलावा किसी के साथ साझा नहीं की है.

क्वाड

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'क्वॉड' से कितना अलग है 'ऑकस'

ऑकस समझौते को लेकर एक सवाल ये भी उठ रहा है कि 'क्वॉड' समूह के होते हुए अमेरिका को इसकी ज़रूरत क्यों पड़ी? क्वॉड में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के साथ-साथ जापान और भारत भी है.

ग़ज़ाला वहाब 'फ़ोर्स' मैग़जीन की कार्यकारी संपादक हैं. उन्होंने चीन पर 'ड्रैगन ऑन ऑवर डोरस्टेप' नाम की किताब भी लिखी है.

बीबीसी से बातचीत में वो कहती हैं कि 'ऑकस' को दो नज़रिए से समझने की ज़रूरत है.

"ऐसा प्रतीत होता है कि क्वॉड से अलग हटकर ऑस्ट्रेलिया के साथ इस तरह के समझौते का मक़सद एक तरह से 'मिलिट्री एलायंस' शुरू करना है."

"क्वॉड को भी चारों देशों के बीच 'सैन्य सहयोग' के नज़रिए से बनाया गया था, लेकिन उसमें 'हाई-टेक्नोलॉजी' ट्रांसफ़र की बात नहीं की गई थी. अगर क्वॉड में ऐसे समझौते होते तो फ़ायदा भारत को भी मिलता. इस वजह से ऑकस को क्वॉड से अलग रखा गया है."

ग़ज़ाला का मानना है कि 'ऑकस' का मंच 'मिलिट्री एलायंस' का मंच है, जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन पहले से साथ थे. अब ऑस्ट्रेलिया भी जुड़ गया है.

वो ये भी मानती हैं कि क्वॉड देशों का पूरी तरह से एक दूसरे के साथ 'मिलिट्री एलायंस' बनना थोड़ा मुश्किल लगता है. इसकी वजह भारत और जापान की हिचक है.

"अमेरिका से नज़दीकी के साथ-साथ भारत, रूस और ईरान के साथ भी संबंध बनाना चाहता है. भारत से ज़्यादा जापान झिझक रहा है. जापान का चीन के साथ अच्छा व्यापारिक रिश्ता है. चीन को जापान से बीआरआई परियोजना में भी मदद मिल रही है. इसलिए जापान, चीन के साथ अपने सारे संबंध ख़त्म नहीं करना चाहता है. इस वजह से क्वॉड में कई दूसरे फ़्रंट पर सहयोग की बात भी हो रही है. जैस हाल ही में कोविड वैक्सीन को लेकर हुआ."

ऑकस के एलान के बाद क्वॉड देशों के राष्ट्राध्यक्षों का शिखर सम्मेलन 24 सितंबर को अमेरिका में होना है, जिसमें हिस्सा लेने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जा रहे हैं.

क्वॉड को चीन ख़ुद ही अपने ख़िलाफ़ एक मंच मानता है.

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