क्वाड के सामने चीन और रूस का सुरक्षा मंच, भारत अब क्या करेगा?

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- Author, कमलेश मठेनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
चीन और रूस ने क्षेत्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए एक नया मंच बनाने का प्रस्ताव रखा है. इसे 'क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद मंच' कहा गया है.
ये प्रस्ताव दक्षिणी चीन के शहर गुइलिन में चीन के विदेश मंत्री वांग यी और उनके रूसी समकक्ष सर्गेई लावरोफ़ के बीच हुई बैठक के बाद आया है.
बैठक में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने क्षेत्रीय टकराव के लिए छोटे-छोटे समूह बनाने को लेकर अमेरिका पर हमला भी बोला.
ये बैठक 19 मार्च को अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन और 12 मार्च को क्वाड के शिखर सम्मेलन के बाद हुई है.
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दोनों पक्षों ने एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि, “दोनों पक्षों ने क्षेत्र में देशों की सुरक्षा चिंताओं के समाधान के लिए एक नई सहमति बनाने के लिए एक ‘क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद मंच’ की स्थापना का भी प्रस्ताव रखा.”
चीन और रूस पहले से ही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सुरक्षा समूह का हिस्सा हैं, जिसमें भारत भी शामिल है.
प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, “अंतरराष्ट्रीय समुदाय का मानना है कि संयुक्त राज्य अमेरिका को हाल के वर्षों में वैश्विक शांति और विकास को हुए नुक़सान पर विचार करना चाहिए, अन्य देशों के घरेलू मामलों में दख़ल देना और क्षेत्रीय टकरावों के लिए छोटे-छोटे समूह बनाना बंद करना चाहिए.
इस बैठक में अमेरिका पूरी तरह चीन और रूस के निशाने पर रहा. जिन छोटे-छोटे समूह बनाने को लेकर अमेरिका को चेतावनी दी गई है उसका इशारा चार देशों के समूह क्वॉड की तरफ़ है.
क्षेत्रीय सुरक्षा मंच का प्रस्ताव भी क्वाड की तर्ज़ पर ही देखा जा रहा है.
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क्या है क्वाड
द क्वाड्रिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग (क्यूसिड) जिसे क्वाड (QUAD) के नाम से भी जाना जाता है, ये अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच अनौपचारिक राजनीतिक वार्ता समूह है.
साल 2007 में जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने पहली बार इसका प्रस्ताव रखा था जिसे भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने समर्थन दिया. इसके बाद इसी साल इनकी बैठक हुई थी.
क्वाड की स्थापना के पीछे की वजह चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना बताया जाता है. अमेरिका चीन को एक बढ़ती चुनौती के तौर पर देख रहा है.
दोनों देशों के बीच ट्रेड वॉर से लेकर अंदरूनी मामलों में बयानबाज़ी कई बार खुले तौर पर सामने आई है.
वहीं, ऑस्ट्रेलिया और जापान का भी दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ टकराव है. भारत का चीन से सीमा विवाद बरसों पुराना है और हाल ही में दोनों देशों की सीमाएं लद्दाख में सीमा पर आमने-सामने मौजूद हैं.
क्वाड सिक्योरिटी डायलॉग के ज़रिए चारों सदस्य देश, यानी भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान क्षेत्र में एक मंच पर साथ आये हैं.
क्वाड पर चीन और रूस ख़फ़ा
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लेकिन, चीन और रूस दोनों ही क्वाड को लेकर अपनी आपत्ति ज़ाहिर कर चुके हैं.
चीन के उप विदेश मंत्री, लुओ झाओहुई क्वाड को 'चीन विरोधी फ्रंटलाइन' या 'मिनी-नाटो' भी कह चुके हैं. जानकार मानते हैं कि चीन में चिंता है कि क्वाड समूह भविष्य में चीन विरोधी आकार लेकर उसके लिए ख़तरा बन सकता है.
वहीं, रूस ने भी इसमें चीन का पूरी तरह साथ दिया है. रूस ने भी क्वाड से अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को ख़तरे की आशंका ज़ाहिर की थी.
उसने क्वाड देशों में हुए 'बेका' समझौते को लेकर भी चिंता जताई है.
बेका यानी बेसिक एक्सचेंज ऐंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA). इस समझौते के तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे के साथ अत्याधुनिक सैन्य प्रौद्योगिकी, साज़ो-सामान और भू-स्थानिक मानचित्र साझा करेंगे.
अमेरिकी चुनौती और चीन-रूस की नज़दीकी

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इसी तरह कई मामलों में रूस और चीन पिछले लंबे समय से साथ आते दिख रहे हैं. दोनों देशों के बयानों में करीबी और सकारात्मकता झलकती है.
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जून 2019 में तीन दिवसीय दौरे के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अपना ‘सबसे अच्छा दोस्त’ कह चुके हैं.
उस दौरान चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध चल रहा था और दोनों एक-दूसरे पर लगातार टैरिफ़ बढ़ा रहे थे.
इसके अलावा अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भी चीन का रूस के साथ व्यापार चलता रहा है.
अफ़ग़ान-तालिबान वार्ता में भी दोनों देश प्रमुखता से भूमिका निभा रहे हैं. कई मसलों और क्षेत्रों में दोनों ने नज़दीकियां दिखाई हैं.
रूस और चीन की यही नज़दीकी और क्वाड से मिली चुनौती ने क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए एक अलग मंच के विचार को जन्म दिया है.
दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में डायरेक्टर डॉक्टर हर्ष पंत कहते हैं, “शीत युद्ध के समय से देखें तो रूस और चीन विरोधी देश रहे हैं. लेकिन आज दोनों एक ही मंच पर दोस्त की तरह नज़र आते हैं. दरअसल, इस समय चीन और रूस दोनों पश्चिम विरोधी एजेंडे पर चल रहे हैं. अमेरिका से मिल रही चुनौती ने पिछले कुछ सालों में दोनों देशों को एकसाथ ला दिया है.”
“रूस की विदेश नीति भी इस समय पश्चिमी देशों के विरोध पर आधारित है. वहीं, चीन भी लागातार अमेरिका के निशाने पर बना हुआ है. इस तरह दोनों के हित आपस मे जुड़ गए हैं. इसलिए वो मिलकर अमेरिका की चुनौती से निपटना चाहते हैं.”
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दबाव की राजनीति
अमेरिका चीन में वीगर मुसलमानों और हॉन्ग-कॉन्ग में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर मानवाधिकार का मसला कई बार उठा चुका है. दोनों देशों के बीच 2018-2019 में व्यापार युद्ध चला है. वहीं, चीन और भारत के बीच सीमा विवाद में भी अमेरिका ने खुलकर भारत का समर्थन किया है.
हाल ही में यूरोपीय संघ ने शिन्ज़ियांग प्रांत में हो रहे कथित मानवाधिकार हनन को लेकर चीन पर प्रतिबंध लगाए हैं जिस पर चीन ने पलटवार भी किया.
रूस की बात करें तो हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने व्लादिमीर पुतिन को ‘घातक’ कहा था तो पुतिन ने कहा था कि ''हम जैसे होते हैं, दूसरा भी हमें वैसा ही नज़र आता है.''
जो बाइडन ने हाल में ही दिए एक इंटरव्यू में कहा कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को चुनाव में कथित छेड़छाड़ की 'क़ीमत चुकानी होगी.'
हर्ष पंत कहते हैं, “चीन और रूस दोनों अमेरिका को एक बड़ी मुश्किल के तौर पर देख रहे हैं. क्वाड को लेकर पहले इतनी गंभीरता नहीं थी. चीन भी उसे लेकर फ़िक्रमंद नहीं था. भारत भी इसमें शामिल होने से हिचक रहा था. लेकिन, अब देखते ही देखते ही क्वाड ज़मीन पर उतर आया और उसका वर्चुअल सम्मेलन भी हो गया.”
“वहीं, चीन की बाइडन प्रशासन में कुछ बदलाव होने की उम्मीद भी ख़त्म हो गई है. जो बाइडन भी चीन को लेकर उतने ही आक्रामक हैं जितने की डोनाल्ड ट्रंप थे. इसलिए भी चीन रूस के साथ मिलकर अमेरिका को चुनौती दे रहा है.”
हर्ष पंत बताते हैं कि ये एक तरह की दबाव की राजनीति भी है. कोई शक्तिशाली देश चुनौती मिलने पर ये दिखाना चाहता है कि वो भी किसी से कम नहीं है. दोनों देश अमेरिका और उसके सहयोगियों को ये संदेश भी देना चाहते हैं कि वो भी क्वाड की तर्ज़ पर एक व्यवस्था बना सकते हैं.
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शीत युद्ध के से हालात
बदलते भू-राजनीतिक माहौल में इन नए-नए गठजोड़ों का असर पूरे क्षेत्र पर पड़ने के आसार हैं.
जहां अमेरिका एशिया में अपने सहयोगी ढूंढ रहा है वहीं चीन और रूस भी अपने सहयोगियों की तलाश शुरू करेंगे. तब कई देशों के सामने ये चुनौती होगी कि वो किस तरफ जाना चाहेंगे.
सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ़ लंदन में विज़िटिंग फैलो अतुल भारद्वाज कहते हैं कि एक तरह से दुनिया शीत युद्ध जैसी स्थिति में जाती दिख रही है जिसका केंद्र इस बार एशिया है.
वह बताते हैं, “चीन आर्थिक स्तर पर और अमेरिका सैन्य स्तर पर दूसरे देशों के साथ जुड़ा हुआ है. इसिलए आगे चलकर सभी देशों के सामने एक चुनौती होगी कि वो अमेरिका और चीन के बीच संतुलन कैसे बनाएं.”
“ईरान, इराक़, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या यूरेशियाई देश इसमें चीन और रूस का दामन थाम सकते हैं. उन्हें उत्तर कोरिया का साथ भी मिल सकता है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए तरह का उबाल आ रहा है.”
वहीं, हर्ष पंत का कहना है कि 'ये स्थितियां ऐसे संगठन या गठजोड़ बनाने को मजबूर करेंगी जो शीत युद्ध का सा आभास कराएंगे. आज के माहौल में विखंडन तो हो गया है. व्यापार और प्रौद्योगिकी में भी ये विखंडन दिखता है. जैसे पिछले साल ब्रिटेन ने कहा था कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश इकट्ठे होकर 5जी बनाएं. इसके लिए चीन पर क्यों निर्भर करें.'
लेकिन, ये भी ध्यान देना होगा कि चीन और अमेरिका व्यापारिक स्तर पर भी एक-दूसरे पर निर्भर हैं जो कि सोवियत संघ के दौर में नहीं था. वहीं, चीन अभी इतना ताक़तवर नहीं हुआ है कि अमेरिका को सीधे तौर पर चुनौती दे सके. इसलिए शीत युद्ध की स्थिति नहीं है लेकिन देश बंट ज़रूर गए हैं.
भारत के लिए चुनौती

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एशियाई देशों के सामने जो चुनौती आने वाली है उससे भारत भी अछूता नहीं है. भारत के लिए तो अभी से असमंजस की स्थिति बनने लगी है.
भारत के सामने पहली चुनौती रूस को लेकर है. रूस और भारत के संबंधों में बहुत प्रगाढ़ता रही है. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस ने भारत का हमेशा साथ दिया है. वहीं, भारत अपने हथियारों की सबसे ज़्यादा ख़रीद रूस से करता है.
लेकिन, पिछले समय से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव दिख रहा है. रूस चीन से दोस्ती बढ़ा रहा है और उसने हाल ही में पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास भी किया है.
वहीं, रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की ख़रीदारी पर अमेरिका की तिरछी नज़रें रही हैं. वह भी भारत को एक बड़े रक्षा बाज़ार के तौर पर देखता है.
इसी के चलते भारत के लिए अपने नए और पुराने दोस्त के बीच संतुलन बनाना और कठिन हो गया है.

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हर्ष पंत कहते हैं, “भारत चाहेगा कि रूस के साथ उसके संबंध प्रगाढ़ बने रहें. लेकिन, अगर रूस चीन के इतने करीब जा रहा है तो भारत को भी ये आकलन करना पड़ेगा कि उसे रूस के साथ संबंध कैसे बेहतर करने हैं. लेकिन, यहीं पर भारत की भी मजबूरियां हैं और चीन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है. इसलिए रूस को भी ये समझना होगा.”
“चीन और रूस के संबंधों का आधार पश्चिम विरोध है जिसमें भारत साथ नहीं दे सकता क्योंकि चीन के साथ बने गतिरोध में अमेरिका ने भारत का खुलकर समर्थन किया है जबकि रूस ने सुलह की कोशिश की है. यहां दोनों देशों के हित पूरी तरह टकराते हैं. ऐसे में देखना होगा कि विपरीत धाराओं पर सवार दोनों देश कैसे साथ बनें रहते हैं.”
इसी तरह ईरान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देश भी भारत के क़रीबी रहे हैं जो बदलते समीकरणों में चीन के नज़दीक जा रहे हैं. इसलिए भारत के लिए ये एक मुश्किल स्थिति हो सकती है.
अतुल भारद्वाज कहते हैं कि भारत शंघाई सहयोग संगठन व आरआईसी (रूस, भारत और चीन) समूह में भी शामिल है और क्वाड में भी. अगर हालात और गंभीर हुए तो सवाल उठेगा कि भारत दोनों में एकसाथ कैसे रह सकता है. हालांकि, भारत सरकार ज़रूर इस पर सोच रही होगी कि इस अनिश्चित दुनिया में अपने हित कैसे बनाए रखें.
बदलते गठजोड़ों के बीच दूसरे कई देशों के सामने भी अमेरिका या चीन, ये एक बड़ा सवाल होगा.
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