क्या अफ़ग़ानिस्तान के कारण पड़ रही है अमेरिका और यूरोप के बीच दरार?

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- Author, मार्क लोवेन
- पदनाम, बीबीसी यूरोप संवाददाता
ट्रंप के साथ उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों के बाद बाइडन के कंधे पर हाथ रखने के दृश्य तक, फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के अभिवादन के अंदाज़ की पूरी कहानी कहते हैं कि कैसे अमेरिकी प्रशासन से यूरोपीय संघ के नेताओं के रिश्ते बदले थे.
मई 2017 में नेटो सम्मेलन के दौरान फ़्रांस के राष्ट्रपति के डोनाल्ड ट्रंप से बेहद ज़ोरदार तरीक़े से हाथ मिलाते हुए और उनके चेहरे को घूरते हुए एक तस्वीर सामने आई थी.
मैक्रों ने बाद में कहा था कि 'वो मासूमियत के साथ नहीं था. मैं अपनी द्विपक्षीय बातचीत में कुछ भी यूं ही नहीं जाने दूंगा.'
चार साल बाद कॉर्नवाल में हुए G7 सम्मेलन के दौरान राष्ट्रपति जो बाइडन जब अपने पहले दौरे पर गए तो मैक्रों ने एक बार फिर इस लम्हे को ख़ुद की ओर मोड़ लिया. जैसे ही कैमरा उनकी ओर घूमा वो बाइडन के कंधे पर हाथ रखकर समुद्र तट की ओर चल दिए और बाइडन ने भी उनके कंधे पर हाथ रख दिया.
यह बॉडी लैंग्वेज साफ़ दिखाती थी कि दोनों पक्ष एक बार फिर बांहों में बांहें डाल रहे हैं.

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ज़्यादा दिन नहीं रही गर्मजोशी
लेकिन अब यूरोप में लंदन से लेकर बर्लिन तक अफ़ग़ानिस्तान ने जो बाइडन के हनीमून पीरियड की मिठास में कड़वाहट घोल दी है. ऐसा नहीं है कि इस कड़वाहट की इकलौती वजह अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलना है बल्कि इसमें अमेरिका के अपने सहयोगी गठबंधन के साथ समन्वय की कमी भी है.
नेटो में 36 देशों की सेनाएं हैं और तीन चौथाई ग़ैर-अमेरिकी सैनिक हैं लेकिन अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के दौरान अमेरिका ने ही इस मिशन का नेतृत्व किया जिससे यूरोप में भरोसे की कमी का एहसास पनपा है.
दूसरे विश्व युद्ध के बाद पहली बार ऐसा हुआ जब जर्मनी किसी पहले बड़े लड़ाकू मिशन में शामिल हुआ था और इसकी इस तरह से समाप्ति ने उसे निराशा कर दिया है. जर्मनी में चांसलर के लिए कंज़रवेटिव उम्मीदवार आर्मिन लाशेत ने चुनावों से पहले कहा है कि अमेरिका का अफ़ग़ानिस्तान से निकलना 'नेटो की उसकी स्थापना के बाद से सबसे बड़ी हार का अनुभव करना है.'

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और तो और चेक रिपब्लिक के राष्ट्रपति मिलोस ज़ेमान ने इस पर 'कायरता' का ठप्पा लगा दिया. उन्होंने कहा कि 'अमेरिका वैश्विक नेता के रूप में अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है.'
स्वीडन के पूर्व प्रधानमंत्री कार्ल बिल्ट्स ने कहा, "जो बाइडन जब प्रशासन में आए तो अपेक्षाएं अधिक थीं, शायद बहुत ही अधिक थीं. ये एक अवास्तविक स्थिति थी."
उन्होंने कहा, "उनके 'अमेरिका इज़ बैक' नारे के अनुसार हमारे रिश्तों को स्वर्ण काल में होना था. लेकिन यह हो नहीं सका और काफ़ी कम समय में इसमें बदलाव आ गया है. (अफ़ग़ानिस्तान से) निकलने के ऊपर किसी भी चर्चा का न करना एक तरह से इसने दाग़ छोड़ गया है."
जब बाइडन को लेकर थी यूरोपवासियों में उम्मीद
पीयू रिसर्च सेंटर के एक पोल में पिछले साल पाया गया था कि डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में 10 फ़ीसदी जर्मन लोगों को लगता था कि वो वैश्विक मामलों में सही चीज़ें करेंगे लेकिन जो बाइडन को लेकर ऐसे जर्मन की संख्या 79 फ़ीसदी पहुंच गई थी. फ़्रांस में भी बिलकुल इसी तरह की बढ़त देखी गई थी.

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लेकिन 2019 तक फ़्रांस की यूरोप मंत्री रहीं नताली लूएज़ो कहती हैं, "बहुत से यूरोपीय संघ के सोचते थे कि उन्हें ट्रंप के जाने तक इंतज़ार करना चाहिए और हम 'पुराने सामान्य' रिश्तों की ओर लौटेंगे. लेकिन 'पुराने सामान्य' रिश्ते अब जीवित नहीं बचे हैं. मुझे उम्मीद है कि यह हमारे लिए अब जाग जाने का समय है."
अमेरिका जिस तरह से अफ़ग़ानिस्तान से बाहर आया और जो बाइडन ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि वो 'दूसरे देशों के पुनर्निर्माण' के लिए अब अमेरिकी सैनिकों को नहीं भेजेंगे इससे यूरोप के नेताओं को डोनाल्ड ट्रंप की 'अमेरिका फ़र्स्ट' नीति याद आ गई.
लेकिन इन सबसे ज़्यादा निराशा यूरोपीय संघ के देशों की अमेरिका द्वारा बातचीत न करने को लेकर है क्योंकि वो चाहते थे कि उनसे अफ़ग़ानिस्तान से निकलने को लेकर सलाह मशविरा किया जाए. अफ़ग़ानिस्तान में तैनात नेटो सैनिकों की संख्या जब घट रही थी तब उसमें तीन चौथाई ग़ैर अमेरिकी सैनिक थे.
हालांकि यह कहना भी जल्दबाज़ी होगी कि अमेरिकी प्रशासन के बदलने से उसको मिलने वाली चौतरफ़ा राहत को कितना नुक़सान होगा.
'सामरिक स्वायत्तता' है बड़ा मुद्दा

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यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख जोसेप बोरेल की सलाहकार और हार्वर्ड की विज़िटिंग प्रोफ़ेसर नताली टोची कहती हैं, "ट्रंप प्रशासन के दौरान ख़ास विदेश नीति निर्णयों को लेकर कम तकरार होती थी और हम अचानक समान मूल्यों को साझा नहीं करते थे."
"ट्रंपवाद का असली आघात सिर्फ़ 'अमेरिका फ़र्स्ट' नहीं था बल्कि वो शी जिनपिंग और पुतिन को लेकर हमेशा आगे नज़र आते थे. हम उनके साथ थे तो हमने कभी अफ़ग़ानिस्तान पर सवाल नहीं किया. अब यह बदलाव आया है कि अमेरिका जैसे जैसे दुनिया में बाक़ी जगहों से निकल रहा है यूरोप में चिंता बढ़ गई है, ये शायद अमेरिकी मूल्यों को सुरक्षित रखने को लेकर प्रतिबद्धता हो लेकिन बाक़ी दुनिया का क्या?"
वास्तव में कुछ लोग इसे ऐसे देखते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान का मसला लंबे समय से चली आ रही अमेरिका की उस प्रवृत्ति को दिखाता है कि वो अकेले ही कहीं से जाता है. क्या इसमें कुछ नया है? टोची कहती हैं, "अमेरिका को लेकर यह हमेशा यूरोप की शिकायत रही है लेकिन अब अमेरिकी बिना सलाह के छोड़ने का फ़ैसला ले रहे हैं जबकि कहीं जाने में ऐसा नहीं होता है."
यूरोप में यह भावना फिर है और हमेशा रहती है और अब 'सामरिक स्वायत्तता' फिर से बहस का विषय बन गया है. जो कि यूरोपीय संघ की विदेश नीति का एक उद्देश्य रहा है. ख़ासकर के इस मुद्दे को फ़्रांस उठाता रहा है जो कि अक्सर अमेरिका के साथ अधिक समान भू-राजनीतिक संतुलन बनाना चाहता है.
फ़्रांस की पूर्व मंत्री लूएज़ो कहती हैं, "ब्रिटेन और जर्मनी जैसे कुछ देश हमेशा सोचते हैं कि सुरक्षा के लिए अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है. ज़ाहिर है कि वे वक़्त बदलने के साथ-साथ डर रहे हैं. लेकिन हम अकसर कहते रहे हैं कि हमें दोबारा सोचना चाहिए कि नेटो कैसे काम करता है. हमें हमेशा खंडन करने की स्थिति में नहीं रहना चाहिए."
अफ़ग़ानिस्तान से पहले भी थे कई मुद्दे

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अमेरिका और यूरोप के बीच अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा अब सबसे ऊपर आ चुका है. और भी कई मुद्दे हैं जिन्होंने यूरोप की जो बाइडन को लेकर गर्मजोशी को ठंडा कर दिया है. यूरोप के सामान पर ट्रंप के कार्यकाल में लगाए गए ट्रेड टैरिफ़ का पूरी तरह बाइडन प्रशासन का न हटाना, बिना यूरोपीय संघ से चर्चा के कोविड वैक्सीन के लिए पैटेंट में राहत देने की अपील करना और यूरोपीय संघ के देशों से महामारी संबंधित यात्रा प्रतिबंध न हटाने जैसे मुद्दे भी दोनों देशों के बीच हैं.
यूरोपीय आयोग के उपाध्यक्ष मार्गारिटिस कीनस ने बताया है कि उन्होंने अपना अगले सप्ताह होने वाले अमेरिकी दौरे को रद्द कर दिया है क्योंकि उन्हें यात्रा नियमों में आपसी संबंधों की कमी दिखती है. वहीं यूरोपीय संघ ने अमेरिका को अपनी यात्रा सूची की 'सेफ़ लिस्ट' से हटा दिया है, जिसे अधिकतर लोग बढ़ते तनाव के तौर पर देखते हैं.
यूरोपीय संघ की अब मुख्यतः दो चिंताएं हैं. पहली अफ़ग़ानिस्तान की अशांति ने एक और रिफ़्यूजी संकट को जन्म दिया है. इसने 2015 की यादों को फिर ताज़ा कर दिया है जब 10 लाख से अधिक लोग सीरिया से भागकर यूरोप में पहुंचे थे.
दूसरी चिंता अमेरिका को लेकर है. अमेरिका अब ख़ुद पर अधिक केंद्रित दिख रहा है. उसने रूस और चीन के लिए मैदान खुला छोड़ दिया है. ये इसी बात का नतीजा है कि चाीन अब बिना पश्चिम के ख़ौफ़ के ताइवान को धमकियां दे रहा है.
कार्ल बिल्ट्स कहते हैं, "एक समय था जब अमेरिका वैश्विक व्यवस्था को बनाए रखने की बात करता था."
"लेकिन अब व्हाइट हाउस से जो भाषा आ रही है वो वैसी नहीं है. यूरोप के साथ संबंधों में फिर से नई जान फूंकने की संभावनाएं अब हवा हो चुकी हैं. और अब जो अमेरिका में आता है वो अपने हिसाब से काम करता है."
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