अफ़ग़ान पत्रकार बिलाल सरवरी: जिस शहर से मुझे इश्क़ था, वहां झटके में सब ख़त्म-सा हो गया

बिलाल सरवरी, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, बिलाल सरवरी 2014 में अफ़ग़ानिस्तान के पाग़मान में

अफ़ग़ान पत्रकार बिलाल सरवरी ने साल 2001 में तालिबान के पांव उखड़ते देखे और अपने देश को फिर से खड़ा होते देखा है. अब वो मानते हैं कि अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान में स्थायी शांति क़ायम करने का एक अच्छा मौका गंवा दिया. पिछले दो हफ़्तों के दौरान उनके देश में घटनाओं ने एक भयावह मोड़ लिया है, जिससे ख़ुद की उनकी जान ख़तरे में पड़ गई. उनकी कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी:

मैं साल 2001 में पाकिस्तान के पेशावर के पर्ल कॉन्टिनेंटल होटल में कालीन बेचने वाला सेल्समैन था. काम के लिहाज़ से वो एक आम सा दिन था. क

काम करते-करते अचानक टीवी पर नज़र गई और जो देखा उसे मैं कभी नहीं भू​ल सकता. मैंने न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से विमान टकराने का लाइव फ़ुटेज देखा और फिर एक अन्य विमान पेंटागन की इमारत से टकराया.

उसके बाद हमारी ज़िंदगी ही बदल गई.

पूरी दुनिया का ध्यान अफ़ग़ानिस्तान पर टिक गया. तब अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का राज था. तालिबान पर आरोप लगा कि उसने हमले के प्रमुख संदिग्ध- ओसामा बिन लादेन और उनके सगंठन अल-क़ायदा को अपनी पनाह में रखा है.

अगले ही दिन होटल की लॉबी में अचानक विदेशी मीडिया के सैंकड़ो लोग जमा हो गए थे. उन्हें किसी ऐसे किसी व्यक्ति की तलाश थी जो अंग्रेज़ी बोलना जानता हो और पास के बॉर्डर को पार करके जब वो अफ़ग़ानिस्तान जाएं तो उनके लिए दुभाषिए का काम कर सके. मैंने वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और तब से मेरी यात्रा लगातार जारी है.

अफ़ग़ानिस्तान, तालिबान

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इमेज कैप्शन, 2001 में काबुल छोड़ भागते तालिबान. लेकिन 20 साल बाद वे फिर से लौट आए हैं

काबुल में दहशत के वो दिन

मैं बचपन से अफ़ग़ानिस्तान के बाहर रह रहा था. 1990 के दशक में सोवियत सेना के जाने के बाद गृह युद्ध भड़का और हमारा परिवार वहां से पलायन कर गया.

जब कई साल बाद मैं पहली बार काबुल पहुंचा तो वहां हुई बर्बादी देखकर दंग रह गया. इमारतें मलबे का ढेर बन चुकी थीं. उनमें लगाया गया लोहा कबाड़ बन गया था. काबुल की चहल-पहल गायब हो चुकी थी. चारों ओर गरीबी और डर फैला हुआ था.

शुरू में मैं अबू धाबी टीवी के साथ काम कर रहा था और पांच अन्य पत्रकारों के साथ इंटर कॉन्टिनेंटल होटल में रह रहा था. हर रोज मेरी नींद डर के साए में खुलती थी, क्योंकि काबुल अमेरिकी हवाई हमलों का मुख्य केंद्र बन गया था. अल-क़ायदा और तालिबान के लड़ाके हमारे होटल आते-जाते रहते थे. हमने उन्हें पास की गलियों में घूमते देखा. रात भर विस्फोट होते रहते थे. ऐसे में मुझे डर लगता था कि कहीं अगला नंबर हमारे होटल का न हो.

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इमेज कैप्शन, तालिबान के जाने के बाद मर्द अपनी दाढ़ी बनाने लगे ​थे.

नया अफ़ग़ानिस्तान

और फिर दिसंबर की एक सुबह, तालिबान काबुल छोड़कर चले गए.

इसके कुछ घंटे बाद, लोग अपनी दाढ़ी कटवाने के लिए नाई की दुकानों पर उमड़ पड़े. साथ ही, धमाकों से वीरान हो चुकी गलियों को सुरीले अफ़ग़ानी संगीत ने भर दिया. उस सुबह अफ़ग़ानिस्तान का फिर से जन्म हुआ था.

उस घटना के बाद, मैं आम अफ़ग़ानों के जीवन को गहराई से सीधे तौर पर देख रहा था. अब मैं अनुवादक की बजाय पत्रकार बन गया था. तोरा बोरा की लड़ाई कवर करने से लेकर, पख़्तिया में शाई कोट की लड़ाई तक, मैंने तालिबान को हारते देखा था.

उनके लड़ाके पहाड़ी ग्रामीण इलाकों में छिप गए, जबकि उनके नेता पाकिस्तान भाग गए. पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि वह मौका हाथ से निकल गया. अमेरिका को उस समय तालिबान के साथ शांति समझौते के लिए बैठना चाहिए था. मैंने तालिबान के आम लड़ाकों के बीच अपने हथियार डालने और अपना जीवन फिर से शुरू करने की बेचैनी देखी थी. हालांकि अमेरिकी ऐसा नहीं चाहते थे. मेरी रिपोर्टिंग से, मुझे और कई दूसरे अफ़ग़ानों को ये महसूस हुआ था कि अमेरिका की इच्छा 9/11 की घटना का बदला लेने की थी.

गाड़ियां

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और भविष्य में कई गलतियां हुईं

गरीब और निर्दोष अफ़ग़ान ग्रामीणों पर बमबारी की गई. उन्हें हिरासत में लिया गया. विदेशी ताक़तों को युद्ध करते रहने की अनुमति देने की अफ़ग़ान सरकार की इच्छा ने उसके और आम लोगों के बीच एक खाई पैदा कर दी. मुझे साफ तौर पर एक घटना याद है, जब अमेरिकी सैनिकों ने ग़लती से काबुल और गरदेज़ के बीच के राजमार्ग पर सैयद अबासिन नाम के एक टैक्सी ड्राइवर को गिरफ़्तार करके हिरासत में ले लिया था. उनके पिता रोशन जो बुजुर्ग थे और एरियाना एयरलाइंस के एक नामी कर्मचारी थे. हमने जब अमेरिकी सैनिकों की ग़लती सामने लाई तब अबासन को छोड़ दिया गया. हालांकि अन्य ऐसे लोग इतने भाग्यशाली नहीं थे.

अमेरिकियों ने काफी सख़्त रुख अपनाया था. इससे आम अफ़ग़ानों को जान-माल का काफी नुक़सान उठाना पड़ा. हताहत होने वाले अमेरिकी सैनिकों की संख्या को कम करने के लिए अमेरिका ने जमीनी सैनिकों की बजाय बम और ड्रोन को प्राथमिकता दी. धीरे-धीरे लोगों के बीच अमेरिका को लेकर भरोसा लगातार कम होता गया और शांति वार्ता की उम्मीदें फीकी पड़ती गईं.

ग्रामीण महिला

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कुछ सालों के लिए ही सही पर यह पता चला ​कि अफ़ग़ानिस्तान क्या बन सकता है? उस समय मैं बिना मौत के डर के खुली सड़क पर हजारों किलोमीटर गाड़ी चला सकता था. मैंने देर रात या अहले सुबह काबुल से ख़ोस्त और पक्तिका प्रांतों के दूरदराज के गांवों के साथ पूरे देश का भ्रमण किया. इस दौरान, अफ़ग़ानिस्तान के असाधारण ग्रामीण इलाकों को जानना भी संभव हो गया था.

2003 एक 'टर्निंग पॉइंट'

उस समय विद्रोहियों ने नए सिरे से हमला करना शुरू कर दिया था. मुझे अच्छे से याद है कि एक दिन एक विशाल 'ट्रक बम' काबुल के बीचोबीच फट गया. इस धमाके ने पूरे शहर को हिलाकर रख दिया और खिड़कियों को चकनाचूर कर दिया. मैं घटनास्थल पर पहुंचने वाले कुछेक पत्रकारों में से एक था. मैंने वहां जो देखा था, उसके बारे में सोचकर अब भी सिहर जाता हूं. वहां चारों ओर खून, मांस और लाशें फैली थीं. वैसा मंज़र तब मैंने पहली बार देखा था.

शादी समारोह, तालिबान, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, 2019 में एक शादी समारोह में हुए धमाके में क़रीब 60 लोग मारे गए थे.

और सब बर्बाद हो गया. बाद में हमें समझ में आया कि अफ़ग़ान और विदेशी सुरक्षा बलों के साथ निहत्थे नागरिकों के खिलाफ़ शहर के बीचोबीच ट्रक बमों और आत्मघाती धमाकों से हमला, संघर्ष के एक बहुत ही क्रूर अध्याय की शुरुआत के प्रतीक होंगे. इसके जवाब में, अमेरिका ने हवाई हमले बढ़ा दिए. उसके बाद, तालिबान को लक्ष्य बनाते हुए गांवों में होने वाली शादियों और अंतिम यात्राओं पर भी हवाई हमले होने लगे.

आम अफ़ग़ानी आसमान देखकर भी डरने लगे. ख़ुद को प्रसन्न रखने के लिए सूर्योदय, सूर्यास्त या तारों को देखने के दिन लद गए.

एक बार कंधार शहर के क़रीब, हरी-भरी अरगंडब नदी घाटी की यात्रा पर, मैं देश के सबसे प्रसिद्ध अनारों को देखने को बेचैन था. लेकिन जब मैं वहां पहुंचा, तो पाया कि वहां अनार की बजाय लोगों का ख़ून बह रहा था. मैंने जो देखा था, वह देश के गांवों में जो हो रहा था, उसकी एक छोटी सी झलक थी.

2009 में रूस के टैंकों से जवानों को दी जा रही ट्रेनिंग, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, 2009 में रूस के टैंकों से जवानों को दी गई ट्रेनिंग,

तालिबान अपने लड़ाकों को घाटी में धकेलने को बेताब था, लेकिन सरकारी बल उन्हें पीछे धकेलने की हरसंभव कोशिश कर रहे थे. इलाके पर दोनों पक्षों का नियंत्रण आगे-पीछे होता रहा. इस माहौल में आम अफ़ग़ानी फंस गए थे. उस दिन, मैंने 33 अलग-अलग हवाई हमलों की गिनती की थी. इसके जवाब में, तालिबान के शुरू किए गए आत्मघाती कार बम हमलों की गिनती करनी मैंने छोड़ दी. घर, पुल और बाग़ सभी नष्ट हो गए.

अमेरिका के कई हवाई हमले तो ग़लत खुफ़िया जानकारी के आधार पर किए गए. ऐसी सूचनाएं किसी ऐसे इंसान ने दिए थे, जो गांव में अपनी निजी लड़ाई या भूमि विवाद को सुलझाना चाहता था. जमीन पर मौजूद सुरक्षा बलों और आम अफ़ग़ानों के बीच बढ़ रही भरोसे की कमी का यह मतलब था कि अमेरिकी सेना झूठ का सहारा लेकर सच नहीं बता सकती थी. तालिबान ने इन हमलों का इस्तेमाल अफ़ग़ानों को उनकी ही सरकार के खिलाफ करने के लिए किया. यह स्थिति उनके भर्ती अभियान के लिए उपजाऊ जमीन तैयार कर दी.

2001 से 2010 के बीच, अफ़ग़ानिस्तान की 9/11 पीढ़ी यानी भारत, मलेशिया, अमेरिका और यूरोप पढ़ने गए युवा अफ़ग़ानी, देश के पुनर्निर्माण के प्रयास में शामिल होने को अपने वतन लौट आए थे. इस नई पीढ़ी को एक महान राष्ट्रीय कायाकल्प कार्यक्रम का हिस्सा बनने की उम्मीद थी. इसकी बजाय, उन्होंने ख़ुद को नई चुनौतियों से घिरा पाया. वे देख रहे थे कि देश में अमेरिका द्वारा तैयार किए गए नए सरदार उभर आए थे. और उनके बीच घोर भ्रष्टाचार मौजूद था. जब किसी देश की वास्तविक दशा उसके आदर्शों से बहुत दूर चली जाती है, तो रोजमर्रा की व्यावहारिकता ही इंसान की मुख्य संचालक बन जाती है. अब देश में माफ़ी की संस्कृति प्रचलित होने लगी थी.

2001 में नॉर्दन अलायंस के लड़ाके, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, 2001 में नॉर्दन अलायंस के लड़ाके

अफ़ग़ानिस्तान का नज़ारा मायावी है

इसकी खूबसूरत घाटियां, नुकीली चोटियां, घुमावदार नदियों और छोटी बस्तियों का नज़ारा बेहद आम है. लेकिन इससे जो शांति देने वाली तस्वीर उभरती है, वाकई में इससे आम अफगानों को कोई शांति नहीं मिलती. आप अपने घर में सुरक्षा के बिना शांति नहीं पा सकते.

क़रीब चार साल पहले मैं वर्दाक प्रांत के एक छोटे से गांव में एक शादी में गया था. जब रात हुई और लोग इकट्ठे हुए तो बिल्कुल खुले आसमान के नीचे खाने लगे. अचानक ड्रोन और विमानों की आवाज से पूरा आसमान गूंज उठा. ज़ाहिर सी बात है कि पास में एक ऑपरेशन चल रहा था. इस शोरगुल ने शादी के जश्न को क़यामत के माहौल में बदल डाला था.

उस रोज़ मैंने बाद में, खुद को एक तालिबानी लड़ाके के पिता के साथ काबुली पुलाव, रोटी और गोश्त बांटते हुए पाया. उन्होंने हेलमंद में अपने बेटे की हत्या के बारे में विस्तार से बताया. उनका बेटा तब केवल 25 का था और अपने पीछे एक विधवा और दो छोटे बच्चों को छोड़ गया था.

वीडियो कैप्शन, अफ़ग़ानिस्तान का ये इलाक़ा तालिबान को चुनौती दे रहा है

मैं तब अवाक रह गया, जब उसके पिता ने उदासी भरे गर्व के साथ बताया था कि वह भले एक मामूली किसान है, पर उसका बेटा प्रतिभाशाली लड़ाका था, जो अलग जीवन के लिए लड़ने में विश्वास करता था. मैं उस बूढ़े शख़्स के चेहरे पर केवल दर्द और उदासी देख सकता था. तालिबान के नियंत्रण में, शादियों में भी संगीत की अनुमति नहीं थी. इसकी बजाय, गांव वालों की सभी बैठकें ऐसी ही दुखद कहानियों से भरी हुई थीं.

लोग अक्सर तालिबान को ख़त्म करने की चाह में इंसानी कीमत को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. देश में विधवा औरतों, अपने बेटों को खोने वाले पिताओं और युद्ध में अपंग हो चुके युवाओं की भरमार हो गई.

जब मैंने तालिबानी लड़ाके के पिता से पूछा कि वे क्या चाहते हैं, तो उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा, "मैं लड़ाई का अंत चाहता हूं. अब बहुत हो गया. मैं एक बेटे को खोने का दर्द जानता हूं. अब अफ़ग़ानिस्तान में शांति प्रक्रिया शुरू करने और युद्धविराम लगाने की जरूरत है."

काबुल का मेरा कार्यालय एक बड़े सैन्य अस्पताल से कुछ ही किलोमीटर दूर था.

मेरे गृह प्रांत कुनार के मेरे दोस्तों, परिजनों और परिचितों ने अक्सर मुझे अस्पताल में बुलाया, ताकि अफ़ग़ान सुरक्षा बलों में काम करने वाले अपने रिश्तेदारों की लाशों की वे पहचान कर सकें. कभी-कभी मुझे ऐसा लगता था कि इन ताबूतों के वजन से मेरे प्रांत की आत्मा दबी जा रही है.

अमेरिका-तालिबान समझौते के वक़्त दोहा में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो और तुर्क़ी के विदेश मंत्री मेवलुत कैवुसोगलु, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, क़तर की राजधानी दोहा में 2020 में तालिबान और अमेरिका के बीच समझौता हुआ, अफ़ग़ानिस्तान

तालिबान से वार्ता को लेकर लोग आशावादी थे

अमेरिका ने जब हाल ही में दोहा में तालिबान के साथ बातचीत शुरू की, तो शुरू में हम आशा से काफी ओतप्रोत थे. देश व्यापक और स्थायी युद्धविराम की ओर अग्रसर हो रहा था. और वार्ता को ही एकमात्र रास्ता के रूप में देखा जा रहा था. करोड़ों अफ़गानों की तरह, मैंने भी अपने जीवन में अपने देश में शांति नहीं देखी थी.

लेकिन हमारे सपनों के चकनाचूर होने में ज्यादा देर नहीं लगी. यह साफ हो गया है कि वार्ता केवल मैदान की जीत को भुनाने को लेकर हो रही थी, न कि शांति पर सहमत होने के लिए. एक आम अफ़ग़ान के दृष्टिकोण से यह बेकार था. अमेरिकियों ने 6,000 तालिबान लड़ाकों और कमांडरों को जेल से रिहा कर दिया. इसे भरोसेमंद और सार्थक शांति प्रक्रिया के साथ एक स्थायी युद्धविराम के लिए जरूरी बताकर बेचा गया था. हालांकि ऐसा कभी हुआ नहीं.

वीडियो कैप्शन, तालिबान बोला, 31 अगस्त तक चला जाए अमेरिका वर्ना...

इसकी बजाय, पूरी शांति प्रक्रिया हाई-प्रोफाइल हत्याओं के दहला देने वाले अभियान में धूमिल हो गई. मीडिया, कानून और न्यायपालिका के क्षेत्र से जुड़े देश के कई प्रभावी लोग काबुल और देश के दूसरे इलाकों के अपने ही घरों में मारे जा रहे थे.

मुझे याद है कि अमेरिका और तालिबान के बीच जैसे ही बातचीत होने लगी, तब एक स्थानीय पुलिस प्रमुख वार काउंसिल की बैठक में खड़े होकर अचानक आरोप लगाने लगे कि अमेरिका अपने दुश्मन से बात करके अफ़ग़ान बलों का साथ छोड़ रहा है. उन्होंने गुस्से में कहा था, "उन्होंने हमारी पीठ में छुरा घोंपा है." कई अफ़ग़ानों की तरह अमेरिका के साथ उसके रिश्ते भी दर्द में डूबे हुए हैं.

मेरा एक पूर्व सहपाठी तालिबान का सदस्य है. हम एक ही उम्र के हैं. पिछले 20 साल में, हमने उसकी अलग विचारधारा के बावजूद उससे बात करना जारी रखा है. लेकिन हाल में जब मैंने उसे एक शादी में देखा तो मैंने पाया कि उसका रवैया बहुत सख्त और कड़वा हो गया था. मैंने देखा और महसूस किया कि कैसे इस संघर्ष ने वास्तव में अफ़ग़ानों को बांट दिया है. जब हम मिले तो बड़ी मुश्किल से बातचीत कर सके थे. ये वो आदमी नहीं था, जिसे मैं पेशावर के दिनों से जानता था. मैंने उसके साथ क्रिकेट खेला था और मस्ती की थी.

लेकिन तब मुझे कैसे पता चलता कि काफी सालों बाद मैं उसे दूसरी तरफ पाऊंगा?

मेरे उस सहपाठी का जीवन भी दर्दनाक अनुभवों से भरा हुआ था. उनके भाई, पिता और चाचा झूठी और निजी दुश्मनी से प्रेरित खुफ़िया जानकारी के आधार पर डाले गए एक छापे के दौरान मारे गए थे. हम अलग थे और मदद नहीं कर सकते थे, लेकिन उम्मीद करते थे कि भविष्य में कभी सुलह होगी. लेकिन अब यह संभावना नजर नहीं आ रही.

तालिबान के क़ब्ज़े के बाद एयरपोर्ट पर शरणार्थी, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, तालिबान के क़ब्ज़े के बाद एयरपोर्ट पर शरणार्थी

नहीं सोचा कि काबुल पर भी क़ब्ज़ा हो जाएगा

हमने बीते कुछ हफ़्तों में अपनी प्रांतीय राजधानियों को तालिबान के हवाले कर दिया. सुरक्षा बलों ने बिना लड़ाई किए आत्मसमर्पण कर दिया. हालांकि मैंने नहीं सोचा था कि वे काबुल में घुसकर शहर पर कब्जा कर लेंगे.

काबुल पर क़ब़्जा होने के एक रात पहले, जिन अधिकारियों से मेरी बात हुई थी, वे तब सोच रहे थे कि वे अमेरिकी हवाई हमलों की मदद से कब्ज़ा बनाए रख सकते हैं. वे कह रहे थे कि एक समावेशी सरकार बनाने के लिए सत्ता के शांतिपूर्ण परिवर्तन की बात चल रही है. लेकिन तभी पूर्व राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी हेलीकॉप्टर से काबुल छोड़कर चले गए. और अचानक से तालिबान काबुल में आ गए. डर हवा में घूम रहा था कि तभी तालिबान को वापस आता देखकर सब बहुत डर गए.

तब मुझे बताया गया कि मेरी जान को ख़तरा है.

मैंने अपने कपड़े लिए. उसके बाद मुझे अपनी पत्नी, बेटी और माता-पिता के साथ एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया. एक ऐसा शहर, जिसके चप्पे-चप्पे से मैं वाकिफ़ था और अब यकीन नहीं हो रहा था कि वहां की कोई भी जगह मेरे लिए सुरक्षित नहीं थी.

मैंने अपनी बेटी सोला, जिसका अर्थ 'शांति' होता है, के बारे में सोचा. यह सोचना बहुत दर्दनाक था कि हम उसके जिस भविष्य की आशा कर रहे थे, वो अब बर्बाद हो गया है. मैं जैसे ही हवाई अड्डे के लिए निकला, मुझे याद आया कि मैं अपने जीवन में दूसरी बार अफ़ग़ानिस्तान छोड़ रहा हूं. वहां लौटने के बाद सालों किए काम की यादें मुझे अभिभूत कर गईं. मुझे अपनी यात्राएं याद आईं, जो मैंने अधिकारियों के साथ या एक पत्रकार के रूप में की थीं.

फिर मैंने काबुल में देखा कि तमाम लोग और परिवार भागने के लिए कतार में खड़े हैं. अफ़ग़ानों की एक पीढ़ी अपने सपनों और आकांक्षाओं को दफ़न कर रही है.

इस बार मैं वहां कोई स्टोरी कवर करने के लिए नहीं गया था. मैं भी उन्हीं की तरह देश छोड़ने जा रहा था.

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