अफ़ग़ानिस्तान संकट: काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद बढ़ रहा है बाइडन का विरोध

- Author, बोयर डेंग, सैम फ़रज़ानेह और तारा मैकेल्वी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, वॉशिंगटन
अफ़ग़ानिस्तान पर फिर से कब्ज़ा करने के लिए तालिबान के तेज़ी से बढ़ने के बाद अमेरिका में बसे अफ़ग़ान नागरिकों, पूर्व जनरलों और प्रमुख नेताओं ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को इसके लिए दोषी ठहराया है. इन लोगों का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी में अमेरिका ने जल्दबाज़ी दिखाई है. हालांकि ऐसा लगता है अमेरिकी जनता फ़िलहाल बाइडन के पक्ष में खड़ी है.
अमेरिका में रह रही 20 साल की हादिया एसाज़ादा ने बीबीसी फ़ारसी को रोते हुए बताया कि कैसे तालिबान उनके घर पर क़हर बरपा चुका है. उन्होंने बताया कि 90 के दशक में सबसे पहले तो उनके पिता की पिटाई की गई और फिर उनके छोटे भाई को मार दिया गया.
उन्होंने कहा कि जब पहली बार वे हमारे घर पर आए थे तो उन्होंने मेरे पिता को लोहे की छड़ से मारा था. ऐसा इसलिए कि वे उनके बड़े भाई को खोज रहे थे जिन्होंने 90 के दशक में तालिबानी शासन के विरोध के लिए लड़ाई में भाग लिया था.
हादिया ने बताया, ''उस घटना के बाद हमलोग मज़ार-ए-शरीफ़ के अपने घर से भाग गए थे, लेकिन उसके छह महीने बाद जब हमलोग अपने घर लौटे, तो तालिबान के लोग एक बार फिर हमारे घर आए. उस बार वे मेरे छोटे भाई को लेकर चले गए.''
उन्होंने कहा, "पता नहीं कितने दिन बाद हमारे पड़ोस के एक दुकानदार ने मेरे पिता को बताया कि उनका बेटा मार दिया गया है."
तालिबान ने हादिया के भाई को मारकर शव को सड़कों पर घसीटा था. इतना ही नहीं, उनके रिश्तेदारों को हफ़्तों तक शव को दफ़नाने की अनुमति नहीं मिली और तब तक कुत्तों ने उनके भाई के शव को बर्बाद कर डाला था.
हादिया एसाज़ादा अब अमेरिका में रहती हैं. उन्होंने कहा कि अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का एक बार फिर से नियंत्रण हो जाने के बाद अब उन्हें अफ़ग़ानिस्तान और उनके नए घर अमेरिका दोनों की सुरक्षा को लेकर डर लग रहा है.
उन्होंने बताया, "तालिबान अब तक थोड़ा भी नहीं बदला है." उन्होंने आशंका जताई है कि तालिबान फिर से आतंकवादियों को शरण देगा और आतंकी फिर से पश्चिमी देशों को निशाना बनाएंगे.

बाइडन का अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने का वादा
आलोचकों की नज़र में अमेरिका के सबसे लंबे संघर्ष को ख़त्म करने के जो बाइडन के फ़ैसले ने अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल की मेहनत और हजारों लोगों की मौत को बेकार बना दिया है. इनके अनुसार सेना की वापसी से अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय तबाही का रास्ता प्रशस्त होने के साथ दुनिया में अमेरिकी विश्वसनीयता पर सवाल भी उठे हैं.
अफ़ग़ान संघर्ष में अमेरिका के सबसे क़रीबी लोग, चाहे वो अफ़ग़ान नागरिक हों या सैनिक और नेता सभी बहुत पहले से राष्ट्रपति बाइडन की उस बात पर संदेह कर रहे थे कि काबुल की सरकार ख़ुद से देश को सुरक्षित बनाए रखने में सक्षम है.
रविवार को काबुल पर तालिबान के कब्ज़े के बाद कइयों की राय है कि अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिका को बाहर निकालने के वादे पर अमल करने वाले बाइडन के इस फ़ैसले पर अमेरिकी मतदाताओं को शायद कुछ वक़्त बाद पछतावा हो.
हालांकि अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलने के उनके फ़ैसले पर शायद ही किसी को कोई आश्चर्य हुआ होगा. बराक ओबामा के शासन में उपराष्ट्रपति के दिनों से ही उन्होंने इस बात पर हमेशा ज़ोर दिया है कि अफ़ग़ानिस्तान की लड़ाई को सीमित किया जाना चाहिए.
2001 में जब वे डेलावेयर के सीनेटर थे, तब वे अफ़ग़ानिस्तान में सेना भेजने के सर्वसम्मत फ़ैसले में शामिल हुए थे. हालांकि 2009 में उन्होंने ओबामा के अफ़ग़ानिस्तान में और अधिक सैनिक भेजने के फ़ैसले का विरोध किया था.
ओबामा प्रशासन की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठकों में शामिल हो चुके पूर्व राजनयिक ब्रेट ब्रुएन ने बीबीसी को बताया, "अफ़ग़ानिस्तान पर बाइडन की राय बहुत साफ थी. उन्होंने कहा था कि अब हमें वहां से बाहर निकल जाना चाहिए."
ब्रुएन ने याद करते हुए बताया कि बाइडन अपनी बात पर अड़े थे और इसे निजी मामला बना लिया था. उनके अनुसार, "यह बैठक में शामिल लोगों पर अपनी जीत दर्ज़ कराने की एक कोशिश थी."
2019 में राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में जो बाइडन ने वोटरों को याद दिलाया था कि 50 के दशक में आइज़नहावर के बाद से वे पहले राष्ट्रपति होंगे जिन्होंने किसी सक्रिय संघर्ष में एक बच्चे की मदद की थी.

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बाइडन का अतीत
ओबामा प्रशासन के शुरुआती वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान के विशेष दूत रह चुके रिचर्ड होलब्रुक ने उन दिनों को याद किया. उन्होंने बताया कि जो बाइडन ने एक बार उनसे गुस्से में कहा था, ''वे मेरे लड़के को इसलिए वापस नहीं भेज रहे ताकि अफ़ग़ानी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की जा सके. हमारे सैनिक इसलिए अफ़ग़ानिस्तान नहीं गए हैं."
ब्रेट ब्रुएन ने कहा कि विदेश नीति के मामले में बाइडन के लंबे अनुभव ने शायद राष्ट्रपति के रूप में उनकी राय को विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा, "वे न केवल वियतनाम और इराक़ युद्ध बल्कि कोसोवो और ग्रेनेडा जैसे कई संघर्षों से गुजरे हैं, मुझे लगता है कि इतने अनुभवों के साथ उनमें युद्ध को लेकर एक संयम और उत्साहहीनता मौजूद है."
चुनाव प्रचार के दौरान 2020 में बाइडन ने सीबीएस को बताया था कि अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के केवल उतने ही सैनिक हों ताकि तालिबान, आईएस या अल-क़ायदा फिर से वहां पैर न जमा ले.
हालांकि ऐसा नहीं हो पाया. रविवार 15 अगस्त को तालिबानी लड़ाके अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल तक पहुंच गए. अमेरिका और उनके सहयोगियों ने केवल एयरपोर्ट पर अपने कर्मचारियों को देश से बाहर भेजने के लिए थोड़ा प्रतिरोध दिखाया. कुछ ही घंटों के भीतर, करज़ई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे ने वाणिज्यिक उड़ानों को निलंबित कर दिया. वहीं बगराम एयर बेस के पास मौज़ूद अफ़ग़ानिस्तान की मुख्य जेल में सुरक्षा बलों ने तालिबानी विद्रोहियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.
इससे पहले शनिवार को जो बाइडन हजारों अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को मंज़ूरी देने को मजबूर हो गए थे. इसके पीछे की योजना बताते हुए कहा गया, "अमेरिकी कर्मचारियों और अन्य संबद्ध कर्मियों के अलावा 'विशेष जोख़िम' वाले अफ़ग़ान नागरिकों की सुरक्षित निकासी को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाने के लिए सुरक्षा बलों की तैनाती को मंज़ूरी दी गई है."

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शुरुआती चेतावनी
इससे पहले, इस माह एक लीक हुई अमेरिकी ख़ुफ़िया रिपोर्ट में चेताया गया था कि अमेरिकी सैनिकों के जाने के 90 दिनों के भीतर पश्चिमी देशों की समर्थक अफ़ग़ान सरकार गिर सकती है.
बाइडन के पूर्ववर्ती डोनाल्ड ट्रंप ने उन पर 'कमज़ोरी, अक्षमता और रणनीतिक तौर पर पूर्ण विफलता' दिखाने का आरोप लगाया है. हालांकि, कई लोगों ने ट्रंप पर भी निशाना साधा और कहा कि सैनिक वापसी के उनके समझौते भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.
वहीं सेना वापसी की बाइडन की योजना पर कई लोगों ने सालों पहले चेतावनी दी थी.
काबुल में तत्कालीन अमेरिकी कमांडर जनरल स्टेनली मैकक्रिस्टल ने 2009 में ये पूछने पर कि क्या अफ़ग़ानिस्तान से सैनिकों की संख्या कम करने का बाइडन का प्रस्ताव सफल हो सकता है, उन्होंने कहा था, "मेरा संक्षिप्त जवाब 'नहीं' है."
पिछले कुछ हफ़्तों में, तालिबान के वहां तेजी से फैल जाने के बाद वो भविष्यवाणी सही साबित हुई है.
मैकक्रिस्टल के बाद वहां के कमांडर बने जनरल डेविड पेट्रियस ने बीबीसी को बताया, "अब के हालात साफ तौर पर विनाशकारी हैं." उन्होंने कहा, ''हमें सेना वापसी के फ़ैसले को सच में उलट देना चाहिए." वे कहते हैं, "मुझे डर था कि हमें इस निर्णय पर पछतावा होगा और अब हम पछता रहे हैं. सही स्थिति तब तक नहीं होगी, जब तक अमेरिका और उसके सहयोगी यह नहीं मान लेते कि उन्होंने वापसी का फ़ैसला लेकर एक भयंकर भूल की."
वहीं 2009 में अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी ने बीबीसी को बताया, "बाइडन ने हमेशा कहा कि उनकी लड़ाई अल-क़ायदा को लेकर थी, तालिबान से नहीं. मैंने हमेशा से इसे बचकाना माना है."
2003 में अमेरिकी सैनिकों के लिए अनुवादक का काम करते हुए अपना एक हाथ खोने वाले शेर हुसैन जाघोरी अब अफ़ग़ान मूल के अमेरिकी नागरिक हैं. उन्होंने बीबीसी फ़ारसी को अमेरिकी सेना की वापसी पर गुस्से में कहा कि बाइडन ने "अफ़ग़ानियों को तालिबान के हाथों में छोड़ दिया."
वे कहते हैं, "मुझे अब अमेरिका की सरकार पर भरोसा नहीं है." उनके अनुसार, "मेरी पत्नी और मेरे बेटे ने बाइडन को वोट दिया था, लेकिन मैंने उन्हें ऐसा करने से मना किया था. अब वे मुझसे कह रहे हैं कि तब मैं सही था. वे फिर से उन्हें वोट नहीं देने जा रहे हैं."

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सेना वापसी का समर्थन करते अमेरिकी
सर्वेक्षणों में लगातार दिखा है कि अफ़ग़ानिस्तान में 20 साल से चल रही लड़ाई में हुए बेतहाशा ख़र्च और बहने वाले ख़ून से अब अमेरिकी नागरिक थक गए हैं. बराक ओबामा ने अपने शासन के दौरान ही वहां से बाहर निकलने का वादा किया था. राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने भी "अंतहीन युद्ध" लड़ने की नीति की जमकर आलोचना की थी. उन्होंने तो इस साल की 1 मई को अमेरिकी सैनिकों की विदाई की तारीख़ भी तय कर दी थी.
पिछले माह की तरह हाल में भी हैरिस और शिकागो काउंसिल के सर्वेक्षणों में बताया गया कि बाइडन के इस फ़ैसले के पक्ष में 70 फ़ीसदी से भी अधिक अमेरिकी खड़े थे. हालांकि वह सर्वे तालिबान के तेज़ी से आगे बढ़ने के पहले का था.
अफ़ग़ानिस्तान में जैसे-जैसे ज़मीन पर परिस्थितियां बदल रही हैं और ख़बरें मिल रही हैं कि अमेरिका के साथ काम करने वाले अफ़ग़ानों को मारा जा रहा है और अमेरिका के कब्ज़े वाले इलाकों पर तालिबान का नियंत्रण हो रहा है, वैसे-वैसे अमेरिका की अफ़ग़ानिस्तान वापसी की तुलना 1975 की वियतनाम वापसी से होने लगी है.
ब्रुन ने कहा, "सिद्धांत में अमेरिकी अपनी सेना की वापसी तो चाहते थे. पर असल में जब वे अफ़ग़ान सड़कों पर घूमते तालिबानियों और वियतनाम के साइगॉन की तरह भागते अमेरिकी सैनिकों को देखते हैं, तो इसे पचा पाना उनके लिए बहुत कठिन हो जाता है."
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