पाकिस्तान: तहरीक़-ए-लब्बैक से निपटना इमरान सरकार के लिए कितना मुश्किल?

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- Author, शुमायला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद, पाकिस्तान
पिछले सप्ताह ईश निंदा विरोधी पार्टी तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) के विरोध प्रदर्शनों और बंदी से देश की मुख्य सड़कों पर यातायात लगभग थम गया.
देश में इस पार्टी के समर्थकों के प्रदर्शन से पहले से ही भारी संकट का सामना कर रही पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ.
प्रदर्शनों के दौरान झड़पों में छह पुलिस वालों की मौत हो गई और सैकड़ों घायल हुए. जगह-जगह पुलिस और प्रदर्शनों के बीच होने वाली झड़पें लगभग एक सप्ताह तक चलती रहीं.
फ्रांस से रिश्ते तोड़ने की मांग
पिछले साल के आख़िर से फ्रांस और पाकिस्तान के रिश्ते ख़राब हो चले हैं. दोनों देशों के संबंधों में दरार उसी वक्त से शुरू हो गई थी, जब पिछले साल फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने अपने देश के एक इतिहास शिक्षक को श्रद्धांजलि दी. अभिव्यक्ति की आज़ादी के विषय पर पढ़ाते वक्त शिक्षक ने कक्षा में छात्रों को पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाया था.
इसके बाद चेचेन मूल के 18 साल के एक युवक ने उनका सिर कलम कर दिया था.
फ्रांस के राष्ट्रपति की ओर से इस टीचर को श्रद्धांजलि दिए जाने के बाद से ही तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान ने इमरान सरकार पर फ्रांस से रिश्ते ख़त्म करने और वहां के राजदूत को निकालने की मांग शुरू कर दी थी.
लेकिन हाल में हालात बिगड़ने तब शुरू हुए जब, 12 अप्रैल को प्रतिबंधित तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान के प्रमुख साद रिज़वी को लाहौर में गिरफ्तार कर लिया गया.
तहरीक़-ए-लब्बैक पैगंबर मोहम्मद के कार्टून छापने के आरोप में फ्रांस के राजदूत को निकालने की मांग करती आ रही थी. लेकिन पिछले दिनों उसने धमकी दी कि अगर उसकी मांग पूरी नहीं हुई तो उसके समर्थक पूरे पाकिस्तान को बंद कर देंगे.
इसके बाद सरकार ने साद रिज़वी को गिरफ्तार किया जिससे पार्टी के समर्थक भड़क उठे और उन्होंने पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिए.
पैगंबर मोहम्मद का यह कार्टून पिछले साल छापा गया था. उसके बाद से ही टीएलपी लगातार फ्रांसीसी राजदूत को निकालने की मांग कर रही थी. इसे लेकर सरकार और पार्टी के बीच एक समझौता भी हुआ था. सरकार ने कहा था कि वह इस मुद्दे पर संसद में चर्चा करेगी.
इस महीने की शुरुआत में टीएलपी ने ऐलान किया चूंकि सरकार ने नेशनल असेंबली में इस मुद्दे की चर्चा न करके समझौता तोड़ा है इसलिए पार्टी समर्थक 20 मार्च को इस्लामाबाद कूच करेंगे.
पार्टी ने कहा जब तक फ्रांसीसी राजदूत को पाकिस्तान से वापस नहीं भेजा जाता तब तक उसके समर्थक फैज़ाबाद इंटरचेंज पर धरना देंगे. यह इंटरचेंज रावलपिंडी और इस्लामाबाद को जोड़ती है.
तहरीक़-ए-लब्बैक के इरादे भांप नहीं पाई इमरान सरकार?
इमरान सरकार ने इस संकट को टालने के लिए टीएलपी की कूच से पहले ही पार्टी के प्रमुख साद रिज़वी को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उसे इसका अंदाजा नहीं था कि पार्टी सरकार के इरादे पहले ही भांप गई थी और उसने सरकार को मजबूर करने के रणनीति बना रखी है.
गृह मंत्री शेख़ रशीद ने भी माना कि सरकार के पास टीएलपी के बड़े पैमाने पर हो रहे विरोध प्रदर्शनों से निपटने की कोई तैयारी नहीं थी.
टीएलपी समर्थकों के हिंसक प्रदर्शनों की वजह से देश के प्रमुख शहरों में पूरी तरह अराजकता फैल गई. सौ से अधिक हाईवे बंद कर दिए गए. टीएलपी ने लाहौर में 11 पुलिसकर्मियों को अगवा कर लिया. इनमें नवाकोट पुलिस थाने के डीएसपी भी शामिल थे.
इसके बाद सोशल मीडिया पर अपहृत पुलिसकर्मियों की ऐसी तस्वीरें वायरल होने लगीं, जिनमें उनके सिर और शरीर के दूसरे हिस्सों में बड़ी-बड़ी पट्टियां लगी हुई थीं. टीएलपी ने दावा किया कि पुलिस के साथ झड़प में उसके भी तीन सदस्यों की मौत हो गई है.
एक तरह कार्रवाई तो दूसरी तरफ सौदेबाज़ी
पुलिसकर्मियों के अपहरण के बाद सरकार ने टीएलपी के ख़िलाफ़ की जा रही कार्रवाई रोक दी और उससे सौदेबाज़ी करने को मजबूर हो गई.
15 मार्च को गृह मंत्री शेख रशीद ने ऐलान किया था कि सरकार ने तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला किया है और पार्टी को ख़त्म करने की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी.
लेकिन सरकार के इस ऐलान के बाद प्रतिबंधित टीएलपी और ईश निंदा विरोधी दूसरे धार्मिक संगठनों हड़ताल शुरू कर दी. पूरे देश के प्रमुख शहरों में कारोबार, दुकानें और सार्वजनिक यातायात बंद रहा.
इसके बाद सरकार और पार्टी के बीच सौदेबाज़ी का दौर चला. तीन दौर की बातचीत के बाद सरकार ने नेशनल असेंबली में फ्रांस के राजदूत को बाहर निकालने का प्रस्ताव पेश किया. सरकार के इस कदम के बाद टीएलपी ने अपने कदम वापस खींच लिए और विरोध प्रदर्शन बंद कर दिए.
सरकार ने जो प्रस्ताव पेश किया उसमें कहा गया था कि फ्रांसीसी राजदूत को देश से बाहर भेजने के मुद्दे पर संसद में विचार होगा.
हालांकि इस प्रस्ताव में कहा गया है विदेश नीति से जुड़े मामलों पर फ़ैसला लेने का अधिकार राज्य (सरकार) का है. किसी भी व्यक्ति या संगठन को इस मामले में सरकार पर दबाव डालने का अधिकार नहीं है.
लेकिन टीएलपी ने इस मामले में सरकार पर दवाब डाला. सरकार की ओर से क़ानून-व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप में गिरफ्तार किए गए पार्टी के सैकड़ों समर्थकों को रिहा करने के आदेश दे दिए गए. हालांकि चरमपंथी गतिविधियों और हत्या के आरोपियों को रिहा नहीं किया गया. इनमें टीएलपी प्रमुख साद रिज़वी भी शामिल हैं.

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इमरान सरकार की मुश्किलें
इमरान ख़ान का दावा है कि वह अपनी सरकार चलाने के लिए रियासत-ए-मदीना से प्रेरणा लेते हैं. रियासत-ए-मदीना एक लोक कल्याणकारी राज की अवधारणा है, जिसे पैगंबर मोहम्मद ने शुरू किया था. आज से चौदह सौ साल पहले जब उन्होंने मक्का पर जीत हासिल की थी तो इसी के अनुसार अपना राज चलाया था.
पिछले कई सालों से खेल के मैदान की एक ग्लैमरस शख्सियत रहे इमरान ख़ान भी अब धार्मिक व्यक्ति के तौर पर उभर रहे हैं. इस्लामोफ़ोबिया के ख़िलाफ़ दुनिया भर में चलाए गए अपने अभियानों की बदौलत उन्हें अपने देश और दूसरे इस्लामी देशों में तारीफ़ भी मिली है.
पाकिस्तान में मोहम्मद पैगंबर का सम्मान बेहद संवेदनशील मुद्दा रहा है. पूरी दुनिया में इस्लाम के अनुयायियों के लिए भी यह भावुक और संवेदनशील मामला है.
चूंकि टीएलपी ख़ुद को इस्लाम के सम्मान के झंडाबरदार के तौर पर पेश करता है इसलिए उसे पता है कि उसके ख़िलाफ़ सरकार की किसी भी सख्ती का उल्टा असर होगा.
इमरान ख़ान भी जानते थे कि अगर इस मुद्दे को ठीक से नहीं संभाला गया तो उन्हें अपने वोटरों और टीएलपी के समर्थक सांसदों का समर्थन खोना पड़ सकता है. ईशनिंदा के मामले में उन्हें संभल कर चलने की जरूरत थी.
यही वजह है कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने में कई दिन लगा दिए. बाद में उन्होंने बताया कि यह कदम उन्हें क्यों उठाना पड़ा.
टीवी पर अपने संबोधन ने इमरान ख़ान ने कहा कि जहां तक पैगंबर मोहम्मद के सम्मान की बात है, सरकार और टीएलपी एक साथ हैं. लेकिन इस तरह के मुद्दों को हल करने का सरकार का तरीका टीलएपी के तरीके से अलग है.
उन्होंने कहा, "क्या फ्रांस के राजदूत को देश से निकाल देने या फ्रांस के साथ रिश्ते ख़त्म कर देने से ईश निंदा रुक जाएगी? इसकी क्या गारंटी है कल फिर कोई पैगंबर साहब के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोलेगा?"
उन्होंने कहा कि वह पश्चिम देशों के बारे में किसी भी शख्स ज्यादा समझ रखते हैं और अगर पाकिस्तान ने फ्रांस के राजदूत को निकाला तो यूरोप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पैगंबर की शान में और गुस्ताख़ियां होंगीं.
उन्होंने कहा कि फ्रांस से रिश्ता तोड़ने का मतलब यूरोपीय संघ से रिश्ता तोड़ना होगा और इससे फ्रांस का नुक़सान नहीं होगा बल्कि इससे सिर्फ पाकिस्तान का नुक़सान होगा.
उन्होंने कहा, "लंबे वक्त के बाद अब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में सुधार दिख रहा है. पाकिस्तान अपना आधे से ज़्यादा कपड़ा यूरोपीय संघ के देशों को निर्यात करता है. अगर फ्रांस के राजदूत को निकाला तो इस निर्यात पर भारी चोट पड़ेगी."

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धर्म का दांव और आर्थिक दिक्कतें
विश्लेषक मुसरत अमीन कहती हैं कि दक्षिण एशिया में धर्म का दांव अब भी काफी असरदार है, यह लोगों को बड़े पैमाने पर अपील करता है.
वो कहती हैं कि इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं है कि टीएलपी ने ईश निंदा का मुद्दा बना कर इतने कम समय में इतना भारी समर्थन जुटा लिया.
मुसरत के मुताबिक़ टीएलपी के समर्थक अधिकतर निम्न और मध्य आय वर्ग के लोग हैं. पाकिस्तान में इस वक्त ये लोग भारी महंगाई और बेरोज़गारी का सामना कर रहे हैं.
वह कहती हैं, "दिक्कत यह है कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर इमरान सरकार बुरी तरह फेल रही है. इसलिए साद रिज़वी की गिरफ्तारी से सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाएं ही आहत नहीं हुई थीं, दरअसल उनका गुस्सा अर्थव्यवस्था की बदहाली के ख़िलाफ़ भी फूट पड़ा. लोगों के सामने भारी आर्थिक दिक्कतें हैं, इसलिए उन्होंने जम कर प्रदर्शन किए.
उनका कहना है, " टीएलपी को बैन करना साहसिक फ़ैसला है. लेकिन साथ ही उससे बातचीत का दरवाजा खोलना भी सही कदम है. आख़िर में सरकार ने टीएलपी को प्रदर्शन बंद करने के लिए मना ही लिया वह भी बगैर उनकी कोई मांग माने."

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सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है चरमपंथ
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए चरमपंथ एक बड़ी चुनौती बन गया है. न यह सिर्फ देश को राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर परेशान कर रहा है बल्कि अर्थव्यवस्था लिए भी यह मुसीबत बन गया है.
डॉ. मुसरत कहती हैं, "पाकिस्तान एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट से बाहर आने की पूरी कोशिश में लगा है. तमाम उपाय किए जा रहे हैं. वह अफ़ग़ान शांतिवार्ता का समर्थन कर रहा है. पाकिस्तान की सकारात्मक छवि पेश करने के लिए विदेशी इन्फ्लुएंसर बुलाए जा रहे हैं."
"सरकार कारोबार के लिए मुफ़ीद माहौल तैयार करने की कोशिश कर रही है ताकि देश में ज़्यादा निवेश आए. लेकिन टीएलपी ने जो हिंसक प्रदर्शन किए, उससे दुनिया भर में पाकिस्तान के बारे में बहुत ग़लत संदेश गया है."
वह कहती हैं "दुनिया मंगल ग्रह पर पहुंच गई है और पाकिस्तान में चरमपंथी ताकतें पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. अगर पाकिस्तान को बचे रहना और आगे बढ़ना है तो उसे ऐसे तत्वों से निपटना ही होगा."
उनका मानना है कि अगर पाकिस्तान में चरमपंथी तत्व इसी तरह हावी रहे तो उसका एफ़एटीएफ़ की ग्रे लिस्ट से निकलना मुश्किल होगा.
वह कहती हैं, "पाकिस्तान की छवि को नुक़सान तो हो ही चुका है. लेकिन अच्छी बात यह है कि सरकार इस मामले से निपटती दिखी. उसने टीएलपी के सामने झुकने से इनकार कर दिया."

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तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान क्या है?
पाकिस्तान के मौलवी खादिम हुसैन रिज़वी ने 2015 में तहरीक़-ए-लब्बैक पाकिस्तान की नींव रखी थी. पार्टी का मुख्यालय लाहौर में है.
इस पार्टी ने 2018 के आम चुनाव में 566 उम्मीदवार उतारे थे. पार्टी को 22 लाख वोट मिले थे और यह देश की पांचवीं बड़ी पार्टी बन कर उभरी. शहर की चौदह नेशनल असेंबली सीटों पर इसे पीएमएल-नवाज़ और पीटीआई के बाद सबसे ज्यादा वोट मिले.
विश्लेषकों का मानना है इतने कम समय में ही पार्टी को इतना ज़्यादा वोट मिलना भविष्य में इसके काफी मजबूत होकर उभरने की निशानी है. हाल के प्रदर्शनों में जिस तरह से इसके समर्थकों का सैलाब उमड़ा उससे इस नज़रिये की पुष्टि होती दिखती है.
पिछले साल कुछ दिन बीमार रहने के बाद हुसैन रिज़वी की मौत हो गई थी जिसके बाद पार्टी की अब उनके बेटे साद रिज़वी को सौंपी गई.
माना जाता है कि टीएलपी की चुनावी सफलता ने पाकिस्तान के सबसे बड़े इस्लामी समुदाय बरेलवी को राजनीतिक नक्शे पर आगे ला खड़ा किया है. ज़्यादा आक्रामक देवबंदी समूहों के साये में रहा यह समुदाय अब पैगंबर मोहम्मद के सम्मान के सवाल पर बड़े पैमाने पर समर्थन जुटाने में कामयाब रहा है. टीएलपी के इस मुद्दे को हर मुस्लिम समुदाय का समर्थन मिला है.
पाकिस्तान में किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए बरेलवियों के वोटों के बगैर काम चलाना मुश्किल है. यही वजह है चरमपंथ विरोधी क़ानून के तहत टीएलपी पर बैन लगाने के कुछ ही दिनों बाद गृह मंत्री शेख़ रशीद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में माफ़ी मांगने के अंदाज में कहा कि लब्बैक राजनीतिक पार्टी है और क़ानून के मुताबिक़ इस पर बैन लगाने का मामला सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के पास भेज दिया है अब अदालतों को ही इसका भविष्य तय करना है.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की ओर से लिए गए बैन के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील करने के लिए लब्बैक के पास अभी एक महीने का वक्त है.
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