किसान आंदोलन का समर्थन क्यों कर रहे हैं ब्रिटेन के कई सांसद

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- Author, गगन सभरवाल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ब्रिटेन
पिछले कुछ हफ़्तों से भारत में चल रहे किसान आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो दुनियाभर में प्रकाशित की गईं. दुनिया भर के कई नेताओं और भारतीय मूल के लोगों से इनपर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं.
इस मुद्दे को ब्रिटेन की संसद में भी उठाया गया, सांसद तनमनजीन सिंह धेसी ने इससे जुड़ा सवाल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से पूछा और ब्रिटिश प्रधानमंत्री के जवाब की काफ़ी चर्चा हुई.
मुद्दे से अनजान लग रहे पीएम बोरिस ने कहा था कि 'यह भारत-पाकिस्तान के बीच का कोई मुद्दा है और कहा कि दोनों देशों को द्विपक्षीय बातचीत के ज़रिए सुलझाना चाहिए'.
इसके अलावा ब्रिटेन के लंदन और बर्मिंघम जैसे शहरों में भी भारतीय मूल के ख़ासतौर पर सिख समुदाय के लोगों ने कई विरोध प्रदर्शन किए.
लेबर पार्टी के वीरेंद्र शर्मा एक ब्रिटिश राजनेता हैं जो कि लंदन के ईस्ट साउथॉल से सांसद हैं. वहां 31 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल के लोगों की है और अंग्रेज़ी के बाद सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा पंजाबी है.

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35 सांसदों ने उठाया मुद्दा
शर्मा समेत 35 सांसदों ने विदेश मंत्री डॉमिनिक राब से गुज़ारिश की है कि वो किसानों के मुद्दे को भारत सरकार के सामने उठाएं.
ब्रिटेन के लेबर पार्टी के सिख सांसद धेसी ने ये चिट्ठी लिखी और इसपर भारतीय मूल के वीरेंद्र शर्मा के अलावा लेबर सांसद सीमा मलहोत्रा और वैलेरी वाज़ ने भी दस्तखत किए.
बीबीसी से बात करते हुए वीरेंद्र शर्मा कहते हैं, "हम ब्रिटिश संसद के सदस्य हैं और एक ब्रिटिश सांसद के रूप में, भारत हमारे लिए एक विदेशी देश है और इसका प्रशासन एक आंतरिक मामला है. हम इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं और न ही हमें इसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए और न ही हम करेंगे, जैसे कि हम नहीं चाहते कि ब्रिटेन के मामलों में कोई दूसरा देश दखल दे."
"लेकिन इसके साथ ही, मैं यहां पहली पीढ़ी का भारतीय हूं जो पंजाब के एक गाँव में पैदा हुआ, पला-बढ़ा, ब्रिटेन चला गया और मैं यहाँ की राजनीति में शामिल हो गया. लेकिन मेरे संसदीय क्षेत्र के ज़्यादातर लोगों के भारत के साथ मज़बूत संबंध हैं, वैसे ही जैसे मेरे."

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भारतीय मूल के लोगों का जुड़ाव
शर्मा जैसे पहली पीढ़ी के भारतीय आप्रवासी अच्छी तरह जानते हैं कि भारतीय मूल लोग भारत के मुद्दों से जुड़े हुए हैं. उनके इलाके के वोटर्स के परिवार अभी भी भारत में रहते हैं और इस मुद्दे को लेकर गंभीर हैं.
वो कहते हैं, "हम इस समस्या का समाधान नहीं दे रहे हैं और न ही हम यह कह रहे हैं कि भारत में जो कुछ भी हो रहा है वह सही है या ग़लत है. हम सभी चाहते हैं कि विदेश सचिव भारतीय उच्चायोग और दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग से बात करें और उन्हें बताएं कि भारत में जो कुछ भी हो रहा है उसके बारे में हमारे संसदीय क्षेत्र के लोग कैसा महसूस कर रहे हैं?"
भारतीय किसानों के मुद्दे को उठाने वाले केवल यही 36 सांसद नहीं हैं.
हाउस ऑफ लॉर्ड्स के इंद्रजीत सिंह ने संसद के ऊपरी सदन में भी इस मुद्दे को उठाया. लेकिन ब्रिटेन के कैबिनेट कार्यालय मंत्री, लॉर्ड निकोलस ट्रू ने सदन में जवाब देते हुए किसी भी राष्ट्र की "व्यापक निंदा" से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, "हमारे मूल्य लोकतांत्रिक हैं, वे बहुत व्यापक रूप से साझा किए जाते हैं और दुनिया भर में प्रचलित हैं. हम चाहते हैं कि उन्हें कायम रखा जाए."

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इसके अलावा, लगभग 25 सामुदायिक और चैरिटी प्रतिनिधियों, धार्मिक और व्यापारिक नेताओं, भारतीय पृष्ठभूमि के पार्षदों और पेशेवर लोगों ने लंदन में भारतीय उच्चायुक्त गायत्री इस्सर कुमार और ब्रिटेन के विदेश मंत्री डॉमिनिक राब को एक संयुक्त पत्र भी भेजा है.
इस्सर कुमार को लिखे अपने पत्र में, उन्होंने भारतीय किसानों के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त की है और "उन किसान और मजदूरों पर प्रशासन द्वारा आंसू गैस और वॉटर कैनन के उपयोग की निंदा की है, जो दिल्ली पहुंच कर सिर्फ शांतिपूर्ण विरोध करना चाहते हैं."
ब्रिटेन के लोगों की क्या है राय?
लेकिन क्या ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मूल के लोग चाहते हैं कि ब्रिटिश सांसद इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर भी उठाएं? इस पर कोई आम सहमति नहीं है.
ओवरसीज़ फ्रेंड्स ऑफ़ बीजेपी यूके के अध्यक्ष कुलदीप शेखावत ने बीबीसी को बताया, "भारतीय किसान भारत में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं,ये उनका अधिकार है, और अगर उनके पास कोई मुद्दा है तो वे इसे भारत सरकार के साथ उठा सकते हैं. भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक राष्ट्र है जिसके पास एक बहुत ही जीवंत लोकतंत्र है और ब्रिटेन के सांसदों को यूके में भारतीय किसानों के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह एक संप्रभु राष्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने जैसा है."
"डोमिनिक राब को लिखना या यूके के पीएम से भारत में विरोध कर रहे किसानों के बारे में एक सवाल पूछना अनुचित है. पीएम मोदी का किसानों की आय को दोगुना करने का एक स्पष्ट एजेंडा है और इस गलत सूचना वाले अभियान को जल्द ख़त्म कर दिया जाएगा."
लंदन निवासी और भारतीय मूल की रश्मि मिश्रा ने भी इसी तरह की चिंताओं को उठाया है. वो कहती हैं, "क्या ब्रिटिश सांसदों और पार्षदों ने किसान के बिल को पढ़ा है? क्या वे किसानों की पहले की पीड़ाओं को समझते हैं? क्या वे जानते हैं कि 1947 आजादी मिलने के बाद से भारतीय किसानों की आत्महत्या दर क्या है? क्या किसी ने इसे हल करने की कोशिश और मदद की? भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का उन्हें क्या अधिकार है?"
राब को लिखी चिट्ठी पर वकील वैशाली नागपाल कहती हैं,"यह उनके द्वारा गलत सूचना फैलाने और हस्तक्षेप करने वाला आधारहीन कार्य है. संभवतः उन्होंने भारत में नए खेती के बिल के बुलेट पॉइंट भी नहीं पढ़े हैं. उनका पत्र पंजाब पर केंद्रित है, उनके मुताबिक वहीं इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा क्योंकि यह भारत की 'ब्रेड बास्केट' है. कृपया गूगल करें और इसकी जाँच कर लें क्योंकि भारत का सबसे अधिक कृषि उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश है और उत्तर प्रदेश के किसान विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले रहे."
वूल्वरहैम्प्टन में रहने वाले एंड्रयू थॉमस, उन लोगों में से एक हैं जो ब्रिटिश सांसदों द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने से खुश नहीं है.
वो कहते हैं, ''यूके में दूसरे अहम मुद्दे हैं जैसे कि कोरोना वायरस महामारी और ब्रेक्सिट. मुझे समझ में नहीं आता है कि हमारे राजनेता एक ऐसे मुद्दे को क्यों उठा रहे हैं जिसका संबंध दूसरे देश से है."
"हमारे सांसदों को हमारे लिए काम करना चाहिए और हमारे मुद्दों और चिंताओं को सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है कि वे अपने कुछ मतदाताओं को खुश रखने के लिए ऐसा कर रहे हों, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह किसी अन्य देश को प्रभावित करने वाले मुद्दों से निपटने के लिए वो ब्रिटेन की संसद में बैठे है. यूके और यहां के लोगों की मदद उनकी प्राथमिकता होनी चाहिए''

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कुछ लोग सांसदों के कदम से खुश हैं, तो कुछ नाराज़
भारतीय व्यापारी संदीप बिष्ट कहते हैं, "भारतीय किसानों को ब्रिटेन सहित दुनिया भर से समर्थन मिलता देख अच्छा लगता है. किसानों के समर्थन में ब्रिटेन में जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी तरह भारत सरकार पर दबाव डालेगा. भारत में जिस भी पार्टी की सरकार रही है, हमेशा किसानों की अनदेखी की जाती रही और यह पहला मौका है जब पूरे भारत के किसान एकजुट हुए हैं और एक साथ एक आम मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं."
"हमारे ब्रिटिश सांसदों को भी समर्थन करते हुए देखना अच्छा है, लेकिन मैंने सांसद तनमनजीत सिंह धेसी की टिप्पणियों को सुना, जहां वह किसानों का समर्थन करने से ज्यादा भारत सरकार पर आरोप लगा रहे थे. ये सही नहीं है. उन्हें संतुलित होना चाहिए और अच्छी कूटनीति बनाए रखनी चाहिए"
लीड्स के बलबीर सिंह को भी लगता है कि ब्रिटेन की सरकार को भारतीय अधिकारियों के साथ इस मुद्दे को उठाना चाहिए क्योंकि भारतीयों ने यूके और इसकी अर्थव्यवस्था के निर्माण में एक अहम भूमिका निभाई है.
उन्होंने कहा, "ब्रिटिश सरकार को किसानों के बारे में चिंतित होना चाहिए क्योंकि मेरे जैसे भारतीयों ने इस देश के लिए बहुत योगदान दिया है और ब्रिटेन के साथ भारत के व्यापार ने भी. इसके अलावा, भारतीयों ने इस देश में इस्पात और कार उद्योग को बचाया है"
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वेस्ट मिडलैंड्स के इतिहासकार और क्यूरेटर राजविंदर पाल भारत में पैदा हुए थे.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "सांसद तनमनजीत सिंह धेसी खुद पंजाबी पृष्ठभूमि से हैं, उनके क्षेत्र में भी ऐसे ही लोग हैं, जिनका वो प्रतिनिधित्व करते हैं, इन मुद्दों को संसद में उठाना सही है. लेकिन हमारे पीएम को इस बात की जानकारी नहीं है कि ढेसी किस बारे में बात कर रहे हैं और यह बहुत ही शर्म की बात है."
भारत के मामलों में ब्रिटिश नेताओं को बोलना कितना सही?
लेकिन ब्रिटिश सांसद और स्थानीय पार्षद भारत के मामलों में खुद को शामिल करके क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं और क्या वे ऐसा करने में सही हैं?
डॉ मुकुलिका बनर्जी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. उनके पास भारत की कृषि पर 20 वर्षों से अधिक शोध का अनुभव है, वो कहती हैं कि भारत में विरोध प्रदर्शन चिंताजनक हैं.
डॉक्टर बनर्जी ने कहा, "ब्रिटिश राजनेताओं ने हमेशा दुनिया के मुद्दों को उठाया है,और इस मामले में, उनके क्षेत्र के लोग भारत में किसानों के परिवार के माध्यम से सीधे जुड़े हुए हैं. एक सांसद अपने क्षेत्र की लोगों की चिंताओं का जवाब देने के लिए बाध्य है, इसी तरह संसदीय लोकतंत्र काम करता है. इसके अलावा, ब्रेक्सिट के बाद, ग्लोबल ब्रिटेन को प्रत्येक राष्ट्र के साथ द्विपक्षीय संबंध बनाने होंगे और भारत के साथ संबंध ज़रूरी है. इंडियन डायस्पोरा दो देशों के बीच एक प्रमुख जीवित पुल है और भारत सरकार इसी कारण से अपने डायस्पोरा के साथ लगातार जुड़ी रहती है और काम करती है."
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वह कहती हैं कि प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर चिंता व्यक्त की है कि भारतीय किसानों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है जिसे हस्तक्षेप नहीं कहा जा सकता. डॉ बनर्जी ने बताया कि यहां रह रहे भारतीय मूल के लोगों ने भारत की सत्ताधारी पार्टी का चुनाव के दौरान पैसे और अभियानों की मदद से समर्थन किया था.
उन्होंने कहा, "भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों द्वारा व्यक्तिगत नेताओं और दलों को वित्तीय समर्थन देना, वो भी तब जब वो खुद उसका हिस्सा नहीं है, इसे विदेशी दखल समझा जा सकता है. लेकिन ब्रिटेन और भारतीय मूल के नागरिक जिनके भारत में परिवार और निवेश हैं, वे जाहिर तौर पर भारत में मामलों से जुड़े रहना चाहते हैं और विकास को करीब से देखेंगे."
2019 के बाद से भारतीय मुद्दों पर यूके में कई विरोध प्रदर्शन हुए हैं - चाहे वह कश्मीर पर हो या नागरिकता कानूनों पर. डॉ बनर्जी कहती हैं," यह अचानक नहीं हुआ है, और इस घटना के पीछे एक कारण है, हाल के वर्षों में ब्रिटेन में आने वाले छात्रों की एक बड़ी संख्या."
बनर्जी के मुताबिक " स्नातकोत्तर छात्र, विशेष रूप से जिन्होंने भारत में अपनी पहली डिग्री के लिए अध्ययन किया है, मुखर हैं और भारतीय होने पर गर्व करते हैं - ये जानकार भारतीय हैं जो भारत के समाचारों को बारीकी से देखते हैं. भारत में क्या हो रहा है इसकी परवाह करते हैं. वो भारत के नागरिकों के साथ अन्याय को नहीं स्वीकार सकते.छात्र हमेशा दुनिया भर में न्याय की लड़ाई में सबसे आगे रहे हैं"
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