अमेरिकी चुनाव 2020: ट्रंप को क्यों मिला अल्पसंख्यकों का समर्थन

लैटिनो का डोनाल्ड ट्रंप को समर्थन

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    • Author, अशिष्ठा नागेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

राष्ट्रपति चुनावों में हार के बाद भी डोनाल्ड ट्रंप ख़ुशी से एक बात का दावा कर सकते हैं कि वो साल 2016 की तुलना में जातीय अल्पसंख्यकों के बीच अधिक पॉपुलर हुए हैं. हालांकि इसके बावजूद भी उनकी हार कैसे हुई इसने कई जानकारों को हैरत में डाल दिया है.

कुछ लोगों के लिए ये आश्चर्य की बात है कि ट्रंप के राजनीतिक विरोधी उन पर नस्लवाद और इस्लामोफ़ोबिया का समर्थन करने का आरोप लगाते हैं. ख़ुद पर लगाए गए इन आरोपों का ट्रंप हमेशा खंडन करते रहे हैं. वो डेमोक्रेटिक नेताओं पर अफ्रीकी-अमेरिकी मतदाताओं को कम कर आंकने का आरोप लगाते हैं.

काले पुरुषों के बीच रिपब्लिकन पार्टी के नेता ट्रंप के वोट शेयर में छह फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ है. वहीं हिस्पैनिक महिलाओं के बीच उनके वोट शेयर में पाँच फ़ीसद का इज़ाफ़ा दर्ज किया गया है.

इसका मतलब ये है कि साल 2016 के चुनावों में दूसरी पार्टी को वोट देने या फिर किसी को वोट न देने के बाद अब इन मतदाताओं ने अपना मन बदल कर ट्रंप को वोट देने का फ़ैसला किया था. लेकिन वोट शेयर में ये बढ़त इन समुदायों के लिए ट्रंप की विशेष अपील के बारे में काफ़ी कुछ कहता है.

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40 साल के मटेओ मोकार्ज़ेल ने टेक्सस के ह्यूस्टन से पढ़ाई की है. वो मिश्रित नस्ल के हैं, उनके माता-पिता में से एक मेक्सिको मूल के हैं तो दूसरे लेबनन मूल के. 2016 के राष्ट्रपति चुनावों में उन्होंने मतदान नहीं किया था.

उनका कहना है कि किसी ख़ास पार्टी के प्रति उनकी कोई विशेष श्रद्धा नहीं है. लेकिन इस बार उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी को वोट देने का फ़ैसला किया.

मटेओ ने बीबीसी को बताया, "मेरा पालन पोषण बेहद उदारवादी माहौल में हुआ है. साठ के दशक में मेरी दादी टेक्सस में हो रहे नागरिक अधिकार अभियान में शामिल थीं और मैं उसी विचारधारा के साथ पला-बढ़ा हूं."

"चार साल पहले डोनाल्ड ट्रंप जब पहली बार चुनाव में खड़े हुए तब मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं था कि मुझे किसे वोट देना चाहिए. मुझे लगा ये एक सेलिब्रिटी टॉक शो के होस्ट हैं जो राष्ट्रपति बनना चाहते हैं. मैंने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया. मैं कह सकता हूं कि मैं उस वक़्त ट्रंप समर्थक नहीं था. मुझे लगा कि वो बस हिलेरी क्लिंटन के विरोधी हैं. मुझे उनमें कोई दिलचस्पी नहीं थी."

मटेओ कहते हैं कि टेक्सस में पले-बढ़े होने के कारण दोनों राजनीतिक पार्टियों के बारे में उनके विचार बदले हैं.

वो कहते हैं, "उन लोगों के लिए ये समझना मुश्किल है जो टेक्सस में नहीं रहते. लोग भूल गए हैं कि टेक्सस कभी डेमोक्रेटिक पार्टी के खाते में जाता था. लेकिन इसका नाता वैचारिक प्रगति का नहीं था, यहां के लोग पुराने विचारों वाले हैं और 'साउदर्न डेमोक्रेट्स' का समर्थन करते थे जो बेहद नस्लवादी और असहिष्णु थे. तो ऐसे में ये एकदम अलग पार्टी थी और मैंने बचपन में ही नस्लवाद की इस लकीर के दोनों तरफ़ देख लिया था."

मटेओ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर लगाए जाने वाले नस्लवाद के आरोपों को ख़ारिज करते हैं. वो कहते हैं कि ट्रंप की दूसरों को अलग-थलग करने की विदेश नीति और उनकी आर्थिक नीतियों से वो काफ़ी प्रभावित हैं.

वो कहते हैं, "उन्होंने सही मायनों में वैश्वीकरण विरोधी नीति अपनाई है. नव-उदारवादी विस्तारवाद की राजनीति ने अमेरिका और मेक्सिको को काफ़ी नुक़सान पहुंचाया है. जब आपका परिवार वहां है जहां रहना लोगों के लिए मुश्किल हो रहा है, जहां उनके पास नौकरी नहीं है, पैसे नहीं है, एक तरह से देखा जाए तो देश बुरी तरह नशे के कारोबार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़े हुए हैं- वहां ट्रंप एक बड़ा ऐलान करते हैं. वो कहते हैं कि सभी व्यापार समझौतों को रद्द कर देंगे और वो वाक़ई वही करते हैं."

"मेरे लिए ये वो पहला इशारा था कि ये ऐसे नेता हैं जो वही करते हैं जो वो कहते हैं. मुझे लगा कि वो वाक़ई जो कहते हैं उन बातों को लेकर गंभीर हैं."

मटेओ मोकार्ज़ेल

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मटेओ की पत्नी लिलि एक टीचर हैं. वो मेक्सिको-अमेरिका मिश्रित मूल की पहली पीढ़ी हैं और ट्रंप की समर्थक हैं. वो कहती हैं कि उन्होंने आर्थिक कारणों से ट्रंप के पक्ष में वोट किया.

वो कहती हैं, "जब से ट्रंप राष्ट्रपति बने हैं हमारी तन्ख्वाह में इज़ाफ़ा हुआ है."

वो कहती हैं कि उनके साथ काम करने वाले बाइडन का समर्थन करते हैं लेकिन उन्हें ये बात पसंद है कि ट्रंप अपनी बात के पक्के हैं इसलिए वो उन्हें पसंद करती हैं.

वो कहती हैं, "मैंने देखा है कि किस तरह उन पर आरोप लगाए जाते हैं, उनके बारे में झूठ कहा जाता है. मैंने इससे पहले कभी वोट नहीं दिया क्योंकि मुझे लगता था कि मेरे वोट देने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. लेकिन मैं मानती हूं कि ट्रंप के राष्ट्रपति बन कर आने के बाद से हमारी ज़िंदगी बेहतर हुई है."

बीते चार सालों में ट्रंप के प्रति 27 साल की एलिज़ाबेथ का रुख़ भी बदला है.

लारेडो में रहने वाली एलिज़ाबेथ मेक्सिको-अमेरिका मिश्रित मूल की हैं. टेक्सस का ये इलाक़ा मेक्सिको की सीमा से सटा है और यहां बड़ी संख्या में लातिन अमेरिकी लोग रहते हैं. ये उन इलाक़ों में से है जहां ट्रंप भारी मतों से बाइडन से आगे रहे हैं.

साल 2016 में उन्होंने वोट नहीं दिया था और उस वक़्त उन्हें ट्रंप पर भरोसा नहीं था. लेकिन इस बार उन्हें लगा कि रिपब्लिकन पार्टी उनके सामाजिक तौर पर रूढ़िवादी और कैथलिक विचारों के पक्ष में है, ख़ास कर गर्भपात से जुड़े नियमों को लेकर.

राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल में गर्भपात का विरोध करने वाली जज ऐमी कॉनी बैरेट को सुप्रीम कोर्ट जज के लिए नामांकित किया था. और कहा था कि ये "संभव है" कि वो गर्भपात को मान्यता देने वाले 1973 में बने क़ानून पर फिर से विचार करें.

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एलिज़ाबेथ कहती हैं, "मेरे परिवार में सभी डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं. लेकिन इस बार मैंने एक बदलाव देखा. बराक ओबामा समेत कई राष्ट्रपति वादा तो करते हैं लेकिन वो उन्हें पूरा नहीं करते. जब ट्रंप राष्ट्रपति बने उन्होंने भी कई वादे किए. हमें लगा कि ये भी खोखले वादों की ही तरह हैं लेकिन ऐसा नहीं था. हमने उनके वादों को हक़ीक़त में बदलते देखा और मुझे ये बहुत अच्छा लगा कि हमारे राष्ट्रपति ज़िंदादिल हैं, ईश्वर से डरते हैं और मेरे लिए ये बेहद महत्वपूर्ण था."

साल 2020 में अमेरिका में काले समुदाय को पीछे छोड़ते हुए लैटिनो समुदाय सबसे बड़े अल्पसंख्यक वोटिंग समूह के तौर पर उभरा, यानी राजनीतिक तौर पर ये सबसे प्रभावशाली अल्पसंख्यक समुदाय बन गया. हालांकि इसमें भी अलग-अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक विचारधारा के लोग शामिल हैं.

आप्रवासन जैसे मुद्दे पर जिसे लेकर ट्रंप बेहद सख्त रुख़ अपनाते हैं, उस पर लैटिनो समुदाय इतना सख्त रुख़ नहीं रखता. उदाहरण के तौर पर 2017 में हुए एक गैलअप सर्वे में पता चला कि हिस्पैनिक समुदाय के 67 फ़ीसद लोगों का कहना था कि वो अवैध अप्रवासियों के मुद्दे से परेशान हैं, जबकि केवल 59 फ़ीसद ग़ैर-हिस्पैनिक समुदाय के लोग ही इस मुद्दे को चिंता का विषय मानते थे.

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जब राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने शुरू हुए तब कई लोगों को ये जान कर झटका लगा कि मायामी-डेड में डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन कम हो गया है. विश्लेषक चिंता में पड़ गए कि क्या डेमोक्रेटिक पार्टी ने वहां रहने वाले अल्पसंख्यक क्यूबा-अमेरिकी मूल के लोगों को रिझाने के लिए सही क़दम उठाए हैं. यहां काफ़ी बड़ी संख्या में क्यूबा-अमेरिकी मूल के लोग रहते हैं.

हो सकता है कि ट्रंप के अभियान का जो बाइडन और कमला हैरिस को समाजवादी के रूप में दिखाने की कोशिश से क्यूबा-अमेरिकी और वेनेज़ुएला-अमेरिकी मूल के लोगों में उन्हें कुछ सफलता मिली हो.

क्यूबा-अमेरिकी मूल की पाओला रमोस ने वोग पत्रिका लिय़ा, "मैं ख़ुद ऐसे परिवार से आती हूं जिसे क्यूबा से निष्काषित किया गया था. मैं जिस परिवार में पली-बढ़ी वहां रोज़ाना यही चर्चा होती थी कि फिदेल कास्त्रो की सत्ता कब ख़त्म होगी, हम फिर से उस द्वीप पर बने अपने घर में कब जा सकेंगे जिसे 60 के दशक में कम्युनिस्ट विचारधारा ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. हमने जब स्कूल की पढ़ाई शुरू भी नहीं की थी तभी से हमें कास्त्रो का मतलब पता है, हमें समाजवाद और साम्यवाद (कम्युनिस्ट) का मतलब भी पता है."

हालांकि ट्रंप के समर्थकों के रूप में जिस अल्पसंख्यक समुदाय के वोट शेयर में साल 2016 की तुलना में बड़ा इज़ाफ़ा हुआ है, वो है काले पुरुष.

ट्रंप

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माना जाता है कि काले समुदाय के लोग डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन करते हैं और लंबे वक़्त से हर चुनाव में उनका वोट इसी पार्टी को जाता रहा है.

और एग्ज़िट पोल्स की मानें तो ये साल भी पहले के सालों से कुछ अलग नहीं था क्योंकि ट्रंप को वोट देने वालों में गोरे वोटरों की संख्या सबसे अधिक थी.

इस साल ब्लैक स्विंग वोटर प्रोजेक्ट करने वाले सैम फुलवुड ट्रंप के आलोचक रहे हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि ट्रंप का समर्थन करने वाले काले वोटरों की संख्या में कुछ इज़ाफ़ा ज़रूर हुआ है लेकिन इसे बढ़ा चढ़ा कर पेश नहीं किया जाना चाहिए.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि इस बात को बढ़ा चढ़ा कर पेश किया जा रहा है. अमेरिकी समाज में कहीं बड़ी संख्या में काले लोगों ने, ख़ास कर महिलाओं ने जो बाइडन के समर्थन में वोट दिया होगा."

ये बात भी सच है कि काले समुदाय के लोग अधिकतर डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट देते रहे हैं, लेकिन ये कहना भी सही नहीं होता कि इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ.

जनवरी 2020 में पिउ रीसर्च द्वारा की गई एक स्टडी में डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों में से एक चौथाई लोगों ने कहा था कि वो रूढ़िवादी हैं जबकि 43 फ़ीसद लोगों ने कहा कि वो मॉडरेट हैं.

ब्लेक्सिट समूह की एक रैली

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साल 2018 में हार्वर्ड हैरिस पोल में भी ये बात सामने आई थी कि काले अमेरिकी क़ानूनी तौर पर आप्रवासियों की संख्या घटाने के पक्ष में हैं. इस पोल में किसी और अल्पसंख्यक समुदाय की तुलना में इस समुदाय के 85 फ़ीसद लोगों ने कहा था कि वो चाहते हैं कि सरकार को आप्रवासियों की संख्या कम करनी चाहिए, 54 फ़ीसद ने कहा कि सरकार को आप्रवासियों की संख्या सालाना ढाई लाख कर देनी चाहिए. कुछ ने तो यहां तक कहा कि सरकार को आप्रवासियों के देश में आने ही नहीं देना चाहिए.

2018 में लॉस एंजेल्स टाइम्स में एक लेख में पूर्व राजनयिक डेव सेमिनारा ने लिखा था कि ऐसा इसलिए क्योंकि काले समुदाय के युवा लोगों में ये धारणा है कि "हाल में अमेरिकी आए कम कौशल वाले आप्रवासियों के कारण उनके लिए नौकरी में कंपीटिशन बढ़ गया है."

इसी साल फ़रवरी में प्रकाशित किताब स्टेडफास्ट डेमोक्रेट्स में इस्माइल व्हाइट और चिरिल लायर्ड कहते हैं कि बीते सालों में काले समुदाय के लोगों का डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन किसी ख़ास विचारधारा के तहत नहीं था बल्कि "काले समुदाय के दूसरे वोटरों के प्रेशर के कारण था."

हाल में यहां ब्लेक्सिट जैसी संस्थाओं ने भी अधिक उपस्थिति दर्ज कराई. इस संस्था की प्रमुख दक्षिणपंथी रुझान वाली कैन्डेस ओवन्स हैं.

इस साल काले समुदाय से जुड़े कई सेलिब्रिटी ने भी ट्रंप का समर्थन करने का ऐलान किया. रैपस कर्टिस जैकसन (50 सेंट) और आईस क्यूब ने कहा कि वो ट्रंप का समर्थन करते हैं हालांकि बाद में कर्टिस जैकसन अपने इस बयान से पलट गए और ट्रंप के प्लैटिनम प्लान का समर्थन कर रहे आईस क्यूब ने ख़ुद को उनके अभियान से दूर कर लिया.

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ब्लैक एन्टरटेन्मेंट टेलीविज़न के संस्थापक रॉबर्ट जॉनसन ने कहा कि डेमोक्रेटिक पार्टी से काले समुदाय के वोटर नाराज़ हैं. अमेरिकी टेलीविज़न चैनल सीएनबीसी को उन्होंने कहा कि, "मुझे लगता है कि काले समुदाय के लोग अब डेमोक्रेटिक पार्टी को बार-बार वोट देकर थक चुके हैं. बदले में उन्हें न तो अधिक आर्थिक मदद मिलती है, न तो नौकरियां मिलती हैं और न ही रोज़गार के अधि मौक़े मिलते हैं. उस हिसाब से देखा जाए तो काले समुदाय के कई लोगों के लिए जो बाइडन की उम्मीदवारी उत्साहित करने वाली नहीं थी."

फुलवुड ने बीबीसी को बताया कि ब्लैक स्विंग वोटर्स प्रोजेक्ट के तहत जिन काले वोटर्स से उन्होंने बात की थी उनमें से अधिकांश का मानना था कि राष्ट्रपति ट्रंप "नस्लवाद" का समर्थन करते हैं और "अक्षम" हैं, हालांकि ट्रंप की इस बात से वो बेहद प्रभावित थे कि वो किस तरह किसी के ख़िलाफ़ जाकर भी "अपने वादे पूरे करते हैं."

वे कहते हैं, अमेरिकी बेहद स्वतंत्र होते हैं और उन्हें ताक़तवर नेतृत्व पर भरोसा है और ट्रंप की छवि ऐसे ताक़तवर नेता की है जो वादे निभाता है."

वो कहते हैं कि कई अफ्रीकी-अमेरिकी, ख़ास कर युवाओं को ये बात प्रभावित करती हैं कि राष्ट्रपति प्रशासन की बात को नज़रअंदाज़ करते हुए निर्णय लेते हैं. "इन युवाओं को लगता है कि प्रशासन उनके विरोध में ही काम करता है. प्रशासन से उनकी नाराज़गी ने शायद उन्हें ट्रंप का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया. काले समुदाय के लोग ट्रंप की नीतियों को पसंद नहीं करते लेकिन वो जिस तरह प्रशासन से काम करवाते हैं वो उन वोटरों को प्रभावित करता है."

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'ट्रंप्स डेमोक्रेट्स' की लेखिका स्टेफ़नी मुराविक भी कहती हैं कि कई वोटरों को ट्रंप की 'बॉस पॉलिटिशियन' यानी राजनेताओं का आक़ा वाली छवि बेहद प्रभावित करती है. ये एक पुराने ढर्रे के स्थानीय नेता जैसी छवि है जिसके साथ शहर और क़स्बे के लोग अधिक सहज हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये एक संस्कृति की छाप दिखाता है जिसमें पुरुषों को हर हाल में अपमान से ख़ुद को बचाना होता है. ट्रंप इस संस्कृति को समझते हैं और उन्होंने इसे अपनाया भी है. वो आम तौर पर कहते सुने जा सकते हैं कि 'कभी भी मत डरो, खेल हमेशा आपकी ताक़त का होता है.' जब वो कोविड-19 के संक्रमण से ठीक हुए उन्होंने अपना मास्क ऐसे निकाल कर फेंका जैसे उसकी कोई ज़रूरत नहीं. कुछ लोगों के लिए ये बचपना लगा लेकिन इन समुदाय के लोगों ने इसे अलग तरीक़े से देखा."

अमेरिकी नागरिकों को कोविड-19 के दौरान आर्थिक मदद के तौर पर जो चेक भेजे गए थे उन पर राष्ट्रपति ट्रंप के हस्ताक्षर थे. ये एक तरह का उदाहरण था कि 'बॉस पॉलिटिशियन' लोगों के लिए काम कर रहा है.

ट्रंप की दी गई आर्थिक मदद

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स्टेफ़नी मुराविक कहती हैं, "ट्रंप वाक़ई में लोगों को दिए जाने वाले इन चेक पर हस्ताक्षर करना चाहते थे. मेरा चेक बैंक में अपने आप जमा हो गया था, लेकिन मुझे एक खत मिला जिस पर ख़ुद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर थे. उस पर लिखा था, 'हैलो स्टेफ़नी, मैं आपको ये आर्थिक मदद दे रहा हूं. मैं चाहता हूं आप सुरक्षित रहें. - साभार, ट्रम्प'. ये बेतुका लग सकता है लेकिन ये शानदार था क्योंकि ये राजनीति के उस मॉडल की बात करता था कि आपका नेता आपका रक्षक होता है."

इन सभी दलीलों पर विचार करने के बाद भी क्या हम ये मान सकते हैं कि ट्रंप पर लग रहे नस्लवाद के आरोप के कारण अल्पसंख्यक वोटरों ने उनके ख़िलाफ़ वोट दिया होगा?

मटेओ कहते हैं कि इन आरोपों ने उन्हें ट्रंप का समर्थन करने के लिए और उत्साहित किया और उनके ख़िलाफ़ 'मीडिया पूर्वाग्रह' के ख़िलाफ़ बोलने के लिए प्रेरित किया.

मटेओ कहते हैं, "उनमें एक राष्ट्रवादी नेता की छवि है और विरोधी उन्हें नस्लवाद पर यक़ीन करने वाला कहते हैं. हर अमेरिकी अपने देश की सीमाओं को मज़बूत करना, अपने देश को बचाना और अपनी अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाना चाहता है.... मुझे क़त्तई नहीं लगता कि इसे कोई नस्लवाद का समर्थन करना कह सकता है."

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