ट्रंप के बाद जो बाइडन ईरान का क्या करेंगे?

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    • Author, पॉल एड्म्स
    • पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

अमेरिका के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाले डेमोक्रेट नेता जो बाइडन कहते हैं कि "अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेज़ी से बिखर रही है."

उन्होंने 'अमेरिका की प्रतिष्ठा को बचाने' का वादा किया है और यह भी कहा है कि 'वे ऐसा करने की जल्दी में हैं.' विदेशी मामलों पर लिखने वाली एक पत्रिका में जो बाइडन ने इसी साल लिखा था, "अब खोने के लिए और समय नहीं बचा है."

ट्रंप प्रशासन के हटने के बाद, जिन कामों की लिस्ट जो बाइडन ने तैयार की है, उनमें 2015 की ईरान परमाणु संधि में अमेरिका को फिर से शामिल करने की प्रतिज्ञा भी एक है.

हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप हमेशा इसे अपने कार्यकाल की एक उपलब्धि बताते रहे हैं कि "उन्होंने अमेरिका को इस परमाणु संधि से अलग करके एक बड़ा काम किया."

अमेरिका मई 2018 में इस संधि से अलग हुआ था. तभी से राष्ट्रपति ट्रंप इसे पूरी तरह ध्वस्त करने की सारी कोशिशें कर रहे हैं.

लेकिन दो साल बाद भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'अधिकतम दबाव की नीति' का ईरान पर कोई ख़ास असर नहीं दिखा है. बल्कि दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका ने जब से शिकंजा कसना शुरू किया है, तब से ईरान परमाणु हथियारों के लिए आवश्यक तकनीक प्राप्त करने के और क़रीब है.

ऐसे में सवाल है कि क्या बाइडन, जो जनवरी 2021 में राष्ट्रपति का पद संभालने वाले हैं, वे ईरान के साथ संबंधों को पहले जैसा कर पाएंगे? और समय बीतने के साथ, क्या ज़्यादा विभाजित दिख रही अमेरिकी राजनीति के बीच वे ऐसा कर सकते हैं?

आईएईए ने कहा था कि परमाणु संधि के तहत जितना यूरेनियम जमा किया जा सकता है, उससे क़रीब 12 गुना कम-समृद्ध यूरेनियम ईरान ने जमा कर लिया है

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'वापस जाना मुश्किल'

यह कहना ग़लत नहीं होगा कि उनके सामने 'चुनौतियाँ बहुत सारी हैं.'

हालांकि, पिछले दो वर्षों में लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का एक जटिल जाल जो बाइडन को बहुत से संभावित लाभ प्रदान करता है, पर क्या उन्हें इसका उपयोग करने का चयन करना चाहिए? क्योंकि अब तक उन्होंने केवल परमाणु संधि से जुड़े अपने मौजूदा दायित्वों को बरक़रार रखते हुए ही ईरान के संदर्भ में बात की है.

जनवरी में उन्होंने लिखा था, "ईरान को पीछे लौटना चाहिए और प्रतिबद्धताओं का पालन करना चाहिए."

लेकिन यह अपने आप में एक चुनौती है, क्योंकि डोनाल्ड ट्रंप के परमाणु संधि से बाहर निकलने के बाद, ईरान ने अपनी निजी प्रतिबद्धताओं की ओर बढ़ना शुरू कर दिया था.

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने अपनी पिछली त्रैमासिक रिपोर्ट में कहा था कि परमाणु संधि के तहत जितना यूरेनियम जमा किया जा सकता है, उससे क़रीब 12 गुना कम-समृद्ध यूरेनियम ईरान ने जमा कर लिया है.

कम-समृद्ध यूरेनियम कई असैन्य परमाणु संबंधी उद्देश्यों में इस्तेमाल होता है, लेकिन परमाणु हथियार बनाने के लिए उच्च-शुद्धता वाले यूरेनियम की ज़रूरत होती है. ईरान यूरेनियम की शुद्धता बढ़ाने पर काम कर रहा है. पर हथियार बनाने के लिए जितना शुद्ध यूरेनियम चाहिए होता है, फ़िलहाल ईरान उसके क़रीब नहीं है. पर यह अमेरिका के लिए चिंता का विषय है.

इस बारे में ईरानी अधिकारियों ने बार-बार कहा है कि "ग़ैर-अनुपालन की दिशा में बढ़ने वाले उनके सभी क़दम ऐसे होंगे, जिनसे पीछे हटना संभव नहीं होगा और अनुसंधान के क्षेत्र में जो चीज़ें हम विकसित कर लेंगे, उन्हें यूँ ही मिटाया नहीं जा सकेगा."

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में ईरान के पूर्व राजदूत अली असग़र सोलतानेह कहते हैं, "हम पीछे नहीं जा सकते. हम अब एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक पहुँच रहे हैं, और यह वो जगह है जहाँ हम अब हैं."

राष्ट्रपति हसन रूहानी की भी परेशानी बढ़ी है क्योंकि ईरान की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण उनकी पॉलिटिकल-रेटिंग गिरी है

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राजनीतिक दबाव

लेकिन ईरान, जिसने 'ट्रंप नामक तूफ़ान' का सामना किया है, उसकी अपनी माँगें हैं. ईरानी अधिकारियों का कहना है कि 'अब सिर्फ़ प्रतिबंधों को हटाना पर्याप्त नहीं होगा.'

ईरान कहीं ना कहीं यह चाहता है कि अमेरिका की वजह से उसकी अर्थव्यवस्था को जो नुक़सान बीते ढाई साल में पहुँचा है, उसकी भरपाई की जाए. ईरान में भी अगले साल जून के महीने में चुनाव होने हैं. ईरान के सुधारवादी और रूढ़िवादी, दोनों ख़ेमों में इसे लेकर तैयारी चल रही है.

अमेरिका द्वारा लगाये गए प्रतिबंधों के कारण ईरानी करेंसी की हालत ख़राब हुई है और ईरान में महंगाई बढ़ी है. इससे राष्ट्रपति हसन रूहानी की भी परेशानी बढ़ी है क्योंकि ईरान की आर्थिक स्थिति ख़राब होने के कारण उनकी पॉलिटिकल-रेटिंग गिरी है.

ऐसे में क्या जो बाइडन ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील देकर, रूहानी की मुसीबत को कम करना चाहेंगे? क्या वह वाक़ई रूहानी के अवसरों को बढ़ावा देने की आवश्यकता महसूस करेंगे? ये भी बड़े सवाल हैं.

तेहरान विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर नासिर हादियन जैज़ी कहते हैं कि जो बाइडन को पद ग्रहण करने से पहले, ईरान के बारे में अपने इरादे स्पष्ट करने चाहिए.

वे कहते हैं, "ज़रूरत है कि वे एक स्पष्ट सार्वजनिक संदेश दें कि वे अमेरिका को जल्द से जल्द उस संधि से जोड़ना चाहते हैं, बिनी शर्तों के और बहुत तेज़ी से. उनका इतना कहना काफ़ी होगा."

अगर बाइडन यह नहीं कर पाये तब? इस सवाल पर जैज़ी कहते हैं कि "इससे ईरान में चीज़ें ख़राब होंगी और तालमेल की जो संभावनाएं अभी हैं, वो ख़त्म हो सकती हैं."

जानकार मानते हैं कि बाइडन के लिए इस तरह के निर्णय मुश्किल भरे हो सकते हैं और उनके पास काफ़ी सीमित दायरा होगा, क्योंकि अमेरिका में 'जॉइंट कॉम्प्रीहेंसिव प्लान ऑफ़ एक्शन' (जेसीपीओए) यानी ईरान न्यूक्लियर डील को लेकर समर्थन काफ़ी कम हुआ है, ख़ासकर सभी रिपब्लिकन नेता इसके विरोध में हैं.

ट्रंप के कार्यकाल में भी ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी ने काफ़ी कोशिशें की थीं कि यह डील किसी तरह जीवित रह पाए

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नए गठबंधन

बेशक, ईरान न्यूक्लियर डील कभी भी द्विपक्षीय मामला नहीं रहा. इसके अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रायोजकों, जैसे रूस, चीन, फ़्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन समेत यूरोपियन यूनियन ने भी इस डील के भविष्य में निवेश किया है.

यूरोपीय प्रायोजक, विशेष रूप से यह चाहते हैं कि अमेरिका एक बार फिर इस परमाणु समझौते की सफलता के लिए प्रतिबद्धता दिखाए.

ट्रंप के कार्यकाल में भी ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी ने काफ़ी कोशिशें की थीं कि यह डील किसी तरह जीवित रह पाए. और अब ये तीनों देश एक बार फिर अमेरिका की वापसी की शर्तों पर बातचीत करने में भूमिका निभा सकते हैं.

लेकिन ये तीनों देश इस बात को भी समझते हैं कि ढाई वर्षों में दुनिया आगे बढ़ चुकी है और मूल सौदे में ही 'एक साधारण वापसी की संभावना' नहीं है.

जानकारों के अनुसार, अब JCPOA के लिए एक अनुवर्ती समझौते के बारे में ही बात हो सकती है.

एक पहलू यह भी है कि जिन देशों ने ईरान न्यूक्लियर डील का विरोध किया था, जैसे कि इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन - तीनों ने अब आपस में रिश्तों को सामान्य करने के लिए समझौते किए हैं, जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का समर्थन प्राप्त था. अगर बाइडन समीकरण में कुछ बदलाव करते हैं, तो इन तीनों देशों के लिए अपने हितों को दरकिनार करना मुश्किल होगा.

डोनाल्ड ट्रंप अभी भी ईरान पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहे हैं

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इसलिए अब अमेरिका और ईरान के रिश्ते को सुधारना जो बाइडन के लिए किसी 'रूबिक क्यूब' को सुलझाने से कम नहीं होने वाला. साथ ही ध्यान रखने वाली बात यह भी है कि डोनाल्ड ट्रंप ने अब तक अपनी सीट छोड़ी नहीं है.

अमेरिकी मीडिया ने रिपोर्ट किया है कि 'राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले सप्ताह ही अपने वरिष्ठ सलाहकारों से ईरान की परमाणु साइट्स पर हमला करने के विकल्पों के बारे में पूछा था.' पर उन्हें ऐसा ना करने की ही सलाह दी गई.

लेकिन, आमतौर पर होने वाले फ़ैसलों से अलग, डोनाल्ड ट्रंप अभी भी ईरान पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहे हैं. चुनाव में हुई हार के बाद, उन्होंने ना सिर्फ़ ईरान पर नए प्रतिबंध लगाए, पर वो इन प्रतिबंधों की संख्या में बढ़ोतरी करने की बात भी कर रहे हैं.

अब से लेकर जनवरी के अंत तक डोनाल्ड ट्रंप जो भी करने वाले हैं, उससे एक बात तो साफ़ होती है कि वह जो बाइडन के लिए स्थितियाँ इतनी बिगाड़ देना चाहते हैं कि उन्हें आसानी से ठीक ना किया जा सके.

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