तुर्की और अमरीका के बीच क्यों बढ़ रहा है तनाव

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- Author, प्रवीण शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
अमरीका और तुर्की के बीच रूस के एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम को लेकर विवाद बढ़ता नज़र आ रहा है.
पिछले सप्ताह राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इसकी पुष्टि की कि तुर्की ने रूस में बने एस-400 सिस्टम का परीक्षण किया है. एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम की ख़रीदारी को लेकर अमरीका और तुर्की के बीच पहले से ही बयानबाज़ी चल रही है.
अर्दोआन ने कहा कि इस मुद्दे पर उन्हें अमरीका की आपत्तियों की कोई परवाह नहीं है.
उन्होंने कहा, "परीक्षण किए गए हैं और किए जा रहे हैं. अमरीका के रुख़ की हमें कोई परवाह नहीं है. अगर हम अपने पास मौजूद इन क्षमताओं का परीक्षण नहीं करेंगे, तो हम क्या करेंगे?"
इसके बाद अमरीकी रक्षा मंत्रालय ने इस मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम के परीक्षण की कड़ी निंदा की.
पेंटागन के प्रवक्ता जोनाथन रॉथ हॉफ़मैन ने कहा कि इन परीक्षणों से सुरक्षा संबंधों पर गंभीर ख़तरा पैदा हो रहा है.
उन्होंने कहा, "हमारी स्थिति स्पष्ट है. ये तुर्की के अमरीका और नेटो सहयोगी होने की प्रतिबद्धताओं के मुताबिक़ नहीं है."

अमरीका की चेतावनी
तुर्की के रूस में बने एयर डिफ़ेंस सिस्टम का परीक्षण शुरू करने की रिपोर्ट क़रीब दो हफ़्ते पहले से आ रही थी. इसके बाद पेंटागन, अमरीकी विदेश मंत्रालय और अमरीका के कुछ सांसदों ने कड़ी आपत्ति जताई थी.
पेंटागन ने तुर्की को चेतावनी देते हुए कहा था कि यह सिस्टम एक्टिवेट नहीं किया जाना चाहिए.
तुर्की ने पहली बार 2017 में रूस से एयर डिफ़ेंस सिस्टम ख़रीदने का सौदा किया था. इनकी डिलिवरी पिछले साल जुलाई से शुरू हुई है.
अमरीकी अधिकारियों ने तुर्की को चेतावनी दी थी कि वह एडवांस्ड रूसी रडार टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल न करे, क्योंकि इससे नेटो के मिलिटरी सिस्टम्स ख़तरे में आ सकते हैं.

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तुर्की पहले भी इन चिंताओं को ख़ारिज कर चुका है और अर्दोआन ने पिछले सप्ताह इस बात के संकेत दिए कि अमरीका ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जिससे उन्हें अपना रास्ता बदलने के लिए मजबूर होना पड़े.
अर्दोआन ने कहा था, "ऐसा लगता है कि अमरीकी इस बात को लेकर ज़्यादा परेशान है कि ये हथियार रूस के हैं."
उन्होंने कहा, "हम अपने रास्ते पर चलने के लिए प्रतिबद्ध हैं."
2017 में तुर्की और रूस के बीच एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम का सौदा 2.5 अरब डॉलर में हुआ था.
जबकि इसी साल अगस्त में तुर्की ने रूस के साथ अतिरिक्त एस-400 सिस्टम ख़रीदने का सौदा किया.
अमरीका और तुर्की में तनाव की अन्य वजहें
रक्षा मामलों के जानकार और इंडियन डिफ़ेंस रिव्यू के एसोसिएट एडिटर कर्नल दानवीर सिंह कहते हैं कि अमरीका और तुर्की के बीच कुछ वजहों से तनाव बढ़ रहा है.
वे कहते हैं, "सीरिया में तुर्की, रूस के साथ गठजोड़ बनाकर लड़ रहा है, जबकि अमरीका इससे अलग है. इसके अलावा आर्मीनिया और अज़रबैजान की जंग में भी अमरीका और तुर्की अलग-अलग खेमों में खड़े हैं. तुर्की मध्य पूर्व में अमरीका के बड़े सहयोगी सऊदी अरब को भी चुनौती दे रहा है. इतना ही नहीं वह अमरीका के विरोधी ईरान के साथ भी खड़ा हो गया है."
वे कहते हैं कि यूरोप में तुर्की ग्रीस को परेशान कर रहा है और अभी हाल में ही तुर्की ने फ़्रांस के ख़िलाफ़ भी मोर्चा खोल दिया है और इन तमाम चीज़ों की वजह से दोनों देशों में तनाव पैदा हो रहा है.
सिंह कहते हैं, "नेटो गठबंधन में अगर आप एस-400 को लाएँगे तो तनाव पैदा होगा. अगर तुर्की अपने यहाँ एस-400 लगाता है, तो यह नेटो के लिए ख़तरा है और अमरीकी प्रभाव के लिए भी चुनौती है."
पहली डील के वक़्त से मौजूद अमरीकी आपत्तियों पर तुर्की ध्यान नहीं दे रहा है और उसने इन्हें दरकिनार करते हुए रूस के साथ एस-400 का एक और सौदा कर लिया है. तुर्की के इस रुख़ से अमरीका ख़ासा नाराज़ है.

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सिंह कहते हैं, "हालाँकि, तुर्की और रूस के बीच भी कई मतभेद हैं, ख़ासतौर पर अज़रबैजान-आर्मीनिया और सीरिया को लेकर, फिर भी दोनों देशों के बीच तालमेल का बढ़ना अमरीका को परेशान कर रहा है."
सिंह एक अहम बात बताते हैं कि नेटो में तुर्की का रहना अमरीका के लिए फ़ायदेमंद है, इसलिए अमरीका उसके ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़दम नहीं उठा रहा है.
सिंह कहते हैं, "दरअसल, तुर्की चाहता है कि अमरीका उसे नेटो से निकाल दे. तुर्की को अपनी रणनीतिक अहमियत समझ आ रही है."
रक्षा मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं कि तुर्की के नेटो से रिश्ते अच्छे नहीं हैं.
आगा कहते हैं, "तुर्की में इस वक़्त एक इस्लामपसंद पार्टी सत्ता में है. उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका यूरोप में कम है. वे मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्ऱीका में अपनी भूमिका बढ़ा रहे हैं. साथ ही तुर्की इस्लामिक देशों का नेता बनने की भी कोशिश कर रहा है."
तुर्की को फ़िलहाल इस बात की आशंका नहीं है कि अमरीका उसके ख़िलाफ़ कोई बड़े प्रतिबंध लगाएगा.
आग़ा कहते हैं कि तुर्की को लगता है कि अगर अमरीका में जो बाइडन सत्ता में आते हैं, तो वे सौदेबाज़ी कर सकते हैं. तुर्की को ट्रंप से कोई ख़ास उम्मीद नहीं है. दोनों देशों के बीच अगले कुछ समय तक ऐसे ही रिश्ते रहने के आसार हैं.
आग़ा कहते हैं कि तुर्की ने सीरिया, मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्ऱीका, अज़रबैजान-आर्मीनिया की जंग और ग्रीस जैसे इतने मसलों में हाथ डाल दिए हैं कि आने वाले वक़्त में उसके लिए इन्हें संभालना मुश्किल होगा.

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क्या है एस-400 सिस्टम?
एस-400 ट्रायम्फ एक एयर डिफ़ेंस मिसाइल सिस्टम है, जिसे रूस की अलमाज़ सेंट्रल डिज़ाइन ब्यूरो ने विकसित किया है. नया सिस्टम एस-300पी और एस-200 की जगह लेगा.
एस-400 ज़मीन से हवा में मार करने वाला मिसाइल सिस्टम है. यह सिस्टम अप्रैल 2007 में रूस की सेना में शामिल हुआ था. रूस के पास एस-400 की चार रेजिमेंट्स हैं, जो अलग-अलग जगह तैनात हैं.
एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम एक मल्टीफंक्शन रडार, ऑटोनोमस डिटेक्शन एंड टारगेटिंग सिस्टम्स, एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल सिस्टम्स, लॉन्चर्स और कमांड और कंट्रोल सेंटर से जुड़ा हुआ होता है.
यह तीन तरह की मिसाइलें फ़ायर करने में सक्षम हैं, ताकि एक लेयर्ड डिफ़ेंस तैयार किया जा सके.
यह सिस्टम हर तरह के आसमानी हमलों का मुक़ाबला कर सकता है. इनमें एयरक्राफ्ट, अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (यूएवी) और बैलिस्टिक और क्रूज़ मिसाइलें शामिल हैं.
30 किलोमीटर तक की ऊँचाई पर इसकी रेंज 400 किलोमीटर है. यह सिस्टम एक साथ 36 लक्ष्यों पर निशाना लगा सकता है.
किन देशों ने ख़रीदा रूस से एस-400 सिस्टम?
भारत भी रूस से एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम की डील कर चुका है और फ़िलहाल रूस में इनका निर्माण चल रहा है. माना जा रहा है कि 2021 के अंत तक भारत को यह सिस्टम मिल जाएगा.
भारत ने यह डील 5.43 अरब डॉलर में की है. अमरीका भारत को भी इस डील को न करने की चेतावनी दे चुका है.
भारत और तुर्की के अलावा चीन और सऊदी अरब भी रूस के साथ इस एयर डिफ़ेंस सिस्टम के लिए डील कर चुके हैं.
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