अमरीका चुनाव 2020: ट्रंप का ओबामागेट आख़िर है क्या: दुनिया जहान

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- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीका के इतिहास में यूं तो कई राजनीतिक कांड हुए हैं, लेकिन उनमें सबसे कुख्यात है वॉटरगेट स्कैंडल, जिसकी वजह से राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को साल 1974 में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.
ऐसा माना जाता है कि जासूसी और साज़िशों से भरपूर वॉटरगेट स्कैंडल ने अमरीका के पॉलिटिकल कल्चर (राजनीतिक संस्कृति) को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया.
ये जुमला अमरीका में इस साल तब एक बार फिर सुर्ख़ियों में आया, जब मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वॉटरगेट की तर्ज़ पर ओबामागेट शब्द का इस्तेमाल किया.
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ट्रंप के निशाने पर थे पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, जिन पर उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए हैं.
आइए जानते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि ओबामागेट आख़िर है क्या और नवंबर 2020 में होने वाले अगले राष्ट्रपति चुनाव पर इसका क्या असर पड़ सकता है.
इंटेलीजेंस

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ओबामागेट के केंद्र में है एक लीगल केस, जो उस व्यक्ति के ख़िलाफ़ है, जिसने राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत में नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र की भूमिका अदा की थी.
हम बात कर रहे हैं यूएस आर्मी के पूर्व थ्री स्टार जनरल माइकल फ़्लिन की.
''मैंने आज तक जितने भी इंटेलीजेंस ऑफिसर्स से बात की है, उनमें वो सबसे गज़ब के इंटेलीजेंस ऑफिसर थे. वो यूएस मिलिट्री में 33 साल रहे हैं. उनकी पृष्ठभूमि बाकी अमरीकी जनरलों की तरह नहीं है. वो एक नॉर्मल वर्किंग फैमिली से आते हैं.''
ये मानना है मैथ्यू रोज़नबर्ग का जो न्यूयॉर्क टाइम्स के खोजी रिपोर्टर हैं. मैथ्यू रोज़नबर्ग जब एक दशक पहले अफ़ग़ानिस्तान में रिपोर्टिंग कर रहे थे, उस दौरान माइकल फ़्लिन वहां यूएस मिलिट्री इंटेलीजेंस चीफ़ थे.

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मैथ्यू रोज़नबर्ग बताते हैं, ''वो इस काम में माहिर थे कि इस्लामी चरमपंथियों को पकड़ने या मारने के लिए जाल किस तरह बिछाना है. उनका नेटवर्क ज़ोरदार था. इसी वजह से वो आगे बढ़ने में कामयाब हुए.''
अफ़ग़ानिस्तान में अपनी इस पोस्टिंग के बाद माइकल फ़्लिन को प्रमोशन मिला. तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी का मुखिया बनाया. लेकिन ये डगर कठिन थी.
मैथ्यू रोज़नबर्ग के मुताबिक, ''डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी और ओबामा प्रशासन के कई लोग बताते हैं कि माइकल फ्लिन का रवैया तानाशाह जैसा हो गया था, वो किसी की नहीं सुनते थे और वही सुनना चाहते थे जो उन्हें पसंद है. यही वजह है कि दो साल बाद उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.''

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लेकिन माइकल फ़्लिन ने राष्ट्रपति ओबामा के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर मतभेद को अपनी विदाई की असल वजह बताया. इसके बाद उन्होंने एक एडवाइज़री फर्म बनाई जिसका नाम था- फ्लिन इंटेलीजेंस ग्रुप.
यहां से कुछ विवाद उनके नाम के साथ जुड़ते चले गए. माइकल फ्लिन तुर्की सरकार के सलाहकार बने. उन्हें रूस में एक डिनर में 'पेड-स्पीकर' के तौर पर आमंत्रित किया गया जिसमें रूसी राष्ट्रपति पुतिन भी मौजूद थे.
अमरीका में साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान माइकल फ्लिन ने डोनाल्ड ट्रंप का खुलकर समर्थन किया.

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चुनाव में जीत के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने माइकल फ्लिन को नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र का ज़िम्मा सौंपा. यही वो समय था जब कहानी में एक बड़ा मोड़ आया.
माइकल फ्लिन अभी नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र की कुर्सी पर बैठे नहीं थे, डोनाल्ड ट्रंप भी व्हाइट हाउस में दाख़िल नहीं हुए थे, उससे तीन महीने पहले ही माइकल फ्लिन ने रूसी राजदूत से टेलीफोन पर बात की. इस बातचीत में रूस के ख़िलाफ़ अमरीकी प्रतिबंधों पर चर्चा की गई.
ये सब तब हो रहा था जब रूस पर अमरीकी चुनाव में गड़बड़ी की कोशिश के आरोप सामने आ रहे थे.
आलोचकों का मानना है कि रूसी राजदूत से बातचीत और ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद प्रतिबंधों को हटाने का संकेत देकर माइकल फ्लिन राजनीतिक तौर पर एक्सपोज़ हो गए.

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इस बारे में जब पूछताछ हुई तो माइकल फ्लिन ने एफ़बीआई से झूठ बोला. इतना ही नहीं, उप राष्ट्रपति माइक पेंस ने जब इस पूरे मामले के बारे में जानना चाहा, तब माइकल फ्लिन ने दोबारा झूठ बोला.
नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र के पद पर 24 दिन रहने के बाद माइकल फ्लिन को पद से हटा दिया गया. फिर साल 2017 में उन पर आरोप तय किए गए. लेकिन अब तीन साल के बाद ये मुद्दा कैसे उठा ?
जुर्म

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एवेलान फरकेस, ओबामा प्रशासन में रूस-यूक्रेन के लिए डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस थीं.
एवेलान के मुताबिक, ''तब रूसी राजदूत की हर हरकत पर हमारी पैनी नज़र थी. रूसी सरकार हमारे लिए विरोधी सरकार थी. लेकिन जब साल 2014 में रूस ने क्राइमिया को हड़प लिया, तो संबंध इससे भी ज़्यादा ख़राब हो गए.''

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साल 2014 में रूस ने क्राइमिया को यूक्रेन से अलग करके अपना हिस्सा बना लिया था. इसके लिए दुनियाभर में रूस की आलोचना हुई और कई देशों ने रूस पर प्रतिबंध भी लगाए. इनमें अमरीका भी शामिल था जिसके तत्कालीन राष्ट्रपति थे बराक ओबामा.
दो साल बाद यानी साल 2016 में ये संबंध तब और भी ख़राब हो गए जब राष्ट्रपति चुनाव के दौरान संकेत मिले कि रूस ने अमरीकी चुनाव के नतीजों को प्रभावित करने की कोशिश की है.
इसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा ने रूस के 35 राजनयिकों को अमरीका से निकाल दिया और प्रतिबंधों का शिकंजा पहले से ज़्यादा कस दिया. और यही वो समय था जब रूसी राजदूत ने माइकल फ्लिन से टेलीफोन पर बात की थी.
एवेलान फरकेस के मुताबिक, ''यही तो अलार्मिंग था, क्योंकि अमरीका का एक नागरिक, विरोधी सरकार के राजदूत से बात कर रहा था, वो भी तब जब हम पाबंदियों को बढ़ा रहे थे. ये अमरीकी विदेश नीति के ख़िलाफ़ था. ये अमरीकी क़ानून- लोगन एक्ट का उल्लंघन था. किसी ऑफिशियल पोज़ीशन के बिना, विदेशी सरकार से तोलमोल करना अपराध की श्रेणी में आता है.''
लेकिन माइकल फ्लिन को लोगन एक्ट के तहत कभी चार्ज नहीं किया गया.

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अमरीका में फॉरेन कम्युनिकेशंस मॉनिटर करने वाली इंटेलीजेंस सर्विसेज़ को अमरीकियों की जासूसी करने का अधिकार नहीं है. इसलिए बातचीत की ट्रांसक्रिप्ट में किसी अमरीकी नागरिक की पहचान ज़ाहिर नहीं की जाती है.
एवेलान फरकेस के मुताबिक, ''नाम वाली जगह खाली छोड़ दी जाती है और उसकी जगह अज्ञात अमरीकी नागरिक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है. अगले दिन अख़बारों में वही जानकारी छपती है जो दी गई है.''
लेकिन ओबामागेट के मामले में ऐसा प्रतीत होता है कि माइकल फ्लिन का नाम राजनीतिक वजहों से उजाकर किया गया और इसे जान-बूझकर मीडिया में लीक किया. और यही से शुरुआत हुई उस थ्योरी की, जिसमें कहा गया कि रूस ने ट्रंप को सत्ता में आने में मदद की.
एवेलान फरकेस कहती हैं, ''जब अमरीकी सरकार माइकल फ्लिन और रूसी राजदूत की बातचीत पर नज़र रख रही थी, तब हो ये भी सकता है कि रूसी सरकार भी उस बातचीत को रिकॉर्ड कर रही हो. ऐसे में रूसी सरकार माइकल फ्लिन को ब्लैकमेल भी कर सकती है कि आपने भले ही एफबीआई को बता दिया कि कोई बात नहीं हुई, लेकिन हम जानते है कि क्या बात हुई. इस तरह तो यूएस नेशनल सिक्योरिटी एडवाइज़र रूस की मुट्ठी में हुआ.''

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इस पूरे एपिसोड पर राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि उनके विरोधी बस किसी तरह ये साबित करना चाहते हैं कि ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव वाकई नहीं जीता था.
आरोप
''आरोप ये है कि ओबामा प्रशासन ने साल 2016 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के दौरान विपक्षी पार्टी की जासूसी करने के लिए अपनी इंटेलीजेंस और अन्य सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल किया.''
ऐसा मानना है डेविड हरसानयी का जो कंजरवेटिव न्यूज़ वेबसाइट नेशनल रिव्यू में सीनियर राइटर हैं.
ट्रंप के इलेक्शन कैम्पेन और उसमें रूस की कथित भूमिका की जांच-पड़ताल दो साल तक चली जिसका नतीजा मूलर जांच रिपोर्ट की शक्ल में सामने आया. इसमें सांठगांठ का कोई सबूत तो नहीं मिला, लेकिन ट्रंप को बरी भी नहीं किया गया.
डेविड हरसानयी का मानना है कि ये पूरी जांच-पड़ताल ही राजनीति से प्रेरित थी और राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप के कार्यकाल की शुरुआत मुश्किल भरी रही.

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रिपब्लिकन पार्टी में कई नेताओं का मानना रहा है कि ओबामा ने ट्रंप की छवि ख़राब करने की कोशिश की और जिस तरह से इंटेलीजेंस सर्विसेज़ का कथित इस्तेमाल किया गया, उसमें माइकल फ्लिन साज़िश का निशाना बन गए.
डेविड हरसानयी के मुताबिक, ''एफबीआई एजेंट्स ने जब कहा कि माइकल फ्लिन झूठ बोल रहे हैं, उनके पास लिखित नोट्स थे. शुरुआत में उन्हें नहीं लगा कि माइकल फ्लिन गुमराह कर रहे हैं. लेकिन दस महीने बाद उन्होंने तय किया कि अभियोग चलाना चाहिए. फिर उन्हें नाटकीय तरीके से आरोपमुक्त भी कर दिया गया.''
इस पूरे घटनाक्रम को राष्ट्रपति ट्रंप ने ओबामागेट की संज्ञा दी, ठीक वैसे जैसे वॉटरगेट स्कैंडल हुआ था, जिसकी वजह से राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को साल 1974 में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.

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लेकिन क्या ओबामागेट और वॉटरगेट की कोई तुलना की जा सकती है?
बक़ौल डेविड हरसानयी, ''मुझे लगता है कि ट्रंप की बात में दम है, ये वॉटरगेट जैसे हालात हैं, या उससे भी बुरी स्थिति हो सकती है क्योंकि इस मामले में आने वाले प्रशासन के ख़िलाफ़ इंटेलीजेंस कम्युनिटी को किसी हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया. वो भी तब जब सत्ता का हस्तांतरण होने वाला था, जिस पर अमरीका गर्व करता है. इस लिए इस पूरे घटनाक्रम की ठीक तरह से जांच होना ज़रूरी है.''
लेकिन ओबामागेट के मामले में सबसे बड़ी दिक्कत है कि ये पूरी तरह से संदेहों पर आधारित है और इसे साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण नहीं है. ऐसे में समझना मुश्किल है कि राष्ट्रपति ट्रंप ओबामागेट कहकर आख़िर क्या आरोप लगा रहे हैं.
इस पर डेविड हरसानयी कहते हैं, ''राष्ट्रपति ट्रंप इसे जिस तरह बता रहे हैं, उससे बात बहुत ज्यादा स्पष्ट नहीं होती. लेकिन इससे तथ्य भी नहीं बदलते.''
विशुद्ध राजनीति

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''साल 2015 में ये कह-कह उन्होंने अपना दायरा बढ़ाया था कि ओबामा भ्रष्ट हैं, उन्हें अमरीका की कोई परवाह नहीं है. उन्होंने इसे वर्किंग क्लास के लिए एक मुद्दा बना दिया था.''
ये दावा है लारा ब्राउन का जो जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएट स्कूल ऑफ पोलिटिकल मैनेजमेंट की डायरेक्टर हैं.
पॉलिटिकल साइंटिस्ट के तौर पर लारा ब्राउन का मानना है कि वॉटरगेट की तर्ज़ पर ओबामागेट कहने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप के पास कोई पुख़्ता वजह होनी चाहिए, बेबुनियाद आरोप लगाने से कोई बात नहीं बनती.
लारा ब्राउन का दावा है कि ट्रंप ने साल 2015 में जो आरोप लगाए थे, साल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें इसका फ़ायदा मिला.

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वो कहती हैं, ''लगभग 60 लाख लोग, जिन्होंने बराक ओबामा को वोट दिया, उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को भी वोट दिया. ऐसा भ्रम की वजह से हुआ. लोग समझ नहीं पाए कि ओबामा प्रशासन वर्किंग क्लास के लिए क्या करेगा क्या नहीं करेगा.''
और अब जब अमरीका में एक बार फिर चुनाव की घड़ी नज़दीक आ रही है, डोनाल्ड ट्रंप वही कर रहे हैं जो अमरीका में निवर्तमान राष्ट्रपति अक्सर करते हैं.
लारा ब्राउन का मानना है, ''बराक ओबामा और जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अपना बेस मज़बूत करने और अपने प्रतिद्वंद्वी की चुनौती को कम करने के लिए हर संभव काम किया. उन्होंने कहा कि आप भले ही मुझे पसंद ना करें, लेकिन क्या आप उस दूसरे उम्मीदवार पर भरोसा कर सकते हैं, जो सत्ता में आकर मेरी जगह लेना चाहता है. बराक ओबामा ने मिट रोमनी के ख़िलाफ़ वैसा ही नकारात्मक प्रचार किया था, जैसा जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जॉन कैरी के ख़िलाफ़ किया था.''

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लारा ब्राउन का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप के सामने इस बार जो बाइडन हैं, जहां ट्रंप के पैंतरे शायद काम ना आएं.
वो कहती हैं, ''बाइडन एक ऐसे नेता हैं जिनके बारे में लोगों की राय इस पार या उस पार जैसी नहीं है. बाइडन की छवि ध्रुवीकरण वाले नेता की नहीं है. राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यही दिक्कत की बात होगी. अपने वोटर्स को बाइडन के पास जाने से रोकने के लिए ट्रंप को बहुत ज़ोर लगाना होगा. मुझे लगता है कि ट्रंप बहुत होशियार और अवसरवादी हैं. ये चुनाव उनकी बाक़ी ज़िंदगी की दिशा-दशा तय कर सकता है.''
यही वजह है कि अब सबकी नज़रें टिकी हैं नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर. वॉटरगेट से ओबामागेट की तुलना कितनी सही है कितनी ग़लत, इस पर विवाद हो सकता है.
बराक ओबामा के ख़िलाफ़ आरोप साबित हो या ना हों, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने आम बोलचाल के शब्दकोष में एक नया शब्द तो जोड़ ही दिया है.
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