पाकिस्तान और यूएई में बढ़ती दूरी की क्या हैं वजहें?

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- Author, तारेंद्र किशोर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान समेत 12 देशों के यात्रियों को वीज़ा देने पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है. लेकिन इन देशों में भारत का नाम नहीं है.
इसे पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के रिश्तों के बीच हाल के दिनों में आई तल्ख़ी से जोड़कर देखा जा रहा है.
हालांकि, पाकिस्तानी अख़बार 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' की रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान के विदेश कार्यालय ने इस ख़बर की पुष्टि करते हुए कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात की ओर से उठाया गया यह क़दम कोरोना वायरस की दूसरी लहर की वजह से उठाया गया मालूम पड़ता है.
पाकिस्तान के विदेश कार्यालय के प्रवक्ता ज़ाहिद हाफ़िज़ चौधरी ने कहा है कि संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान समेत 12 देशों पर अस्थायी तौर पर अगली घोषणा तक नए वीज़ा जारी करने पर रोक लगा दी है.
पाकिस्तान के अलावा जिन देशों के यात्रियों को वीज़ा जारी करने पर संयुक्त अरब अमीरात ने रोक लगाई है उनमें तुर्की, यमन, ईरान, सीरिया, इराक़, सोमालिया, लीबिया, कीनिया और अफ़ग़ानिस्तान शामिल हैं.
पिछले एक हफ़्ते में पाकिस्तान में कोरोना के 2,000 नए मामले दर्ज किए गए हैं.
संयुक्त अरब अमीरात के इस फ़ैसले को भले ही पाकिस्तानी अधिकारी कोरोना की इस दूसरी लहर से जोड़ कर देख रहे हों लेकिन जानकार इसे हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच तल्ख़ हुए रिश्तों के नतीजों के तौर पर भी देख रहे हैं.
हाल में संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच हुए शांति समझौते के बाद पाकिस्तान और यूएई के बीच संबंधों में खटास की शुरुआत हुई है. इस शांति समझौते से पहले तक इसराइल का खाड़ी के अरब देशों के साथ कोई राजनयिक संबंध नहीं था. हालांकि खाड़ी देशों से अलग दो अरब देशों जॉर्डन और मिस्र के साथ इसराइल के राजनयिक संबंध पहले से ज़रूर थे.
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क्या हो सकती हैं रोक की वजहें?
संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच हुए इस शांति समझौते पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने संयुक्त अरब अमीरात की आलोचना की थी.
प्रधानमंत्री इमरान ख़ान इसराइल को लेकर पाकिस्तान की नीति के बारे में हमेशा कहते आए हैं कि पाकिस्तान इसराइल को तब तक मान्यता नहीं दे सकता जब तक कि फ़लस्तीनियों की समस्या को न्यायिक रूप से हल नहीं किया जाता है.
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अफ़ग़ानिस्तान के कंधार में 2017 में हुए बम धमाके में संयुक्त अरब अमीरात के पाँच कूटनीतिक अधिकारियों की मौत हो गई थी.
हिन्दुस्तान टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है कि संयुक्त अरब अमीरात को इस बम धमाके की जाँच में पता चला है कि इसमें हक्क़ानी नेटवर्क और पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई का हाथ था.
तो क्या ये तमाम वजहें हैं जिससे संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान के बीच संबंधों में तल्ख़ी आ रही है?
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में दक्षिण एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज का इस बारे में कहना है कि जिन देशों के यात्रियों पर संयुक्त अरब अमीरात ने रोक लगाई है, लगभग उन सभी देशों में किसी न किसी रूप में उग्रवाद की समस्या मौजूद है.
वो कहते हैं, "संभव है कि संयुक्त अरब अमीरात ने हाल ही में इसराइल के साथ हुए शांति समझौते के संदर्भ में यह क़दम उठाया हो क्योंकि उसे इस बात की आशंका होगी कि इन देशों में मौजूद इस समझौते से नाराज़ अतिवादी समूह कहीं किसी हमले को अंजाम ना दे दें. इसलिए वो इन देशों के साथ सख़्ती बनाकर रखना चाहते हैं."
क्यों आ रही है रिश्तों में तल्ख़ी?
पिछले एक अरसे से पाकिस्तान की सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ दूरी बढ़ती जा रही है और वो तुर्की के क़रीब होता दिख रहा है. इस बात की भी चर्चा है कि पाकिस्तान अब सऊदी अरब के मुक़ाबले तुर्की को प्राथमिकता दे रहा है.
इसराइल के साथ हुए शांति समझौते को लेकर भी तुर्की ने संयुक्त अरब अमीरात को आड़े हाथों लिया था और अब जिन 12 देशों के यात्रियों पर संयुक्त अरब अमीरात ने रोक लगाई है उनमें एक तुर्की भी है.
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज भी तुर्की से पाकिस्तान की बढ़ती नज़दीकी को सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से बढ़ती दूरी की एक बड़ी वजह मानते हैं.

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वो कहते हैं, "तुर्की और पाकिस्तान पहले कभी अमेरिका के क़रीब होते थे, लेकिन अब अमेरिका से उनकी दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं. इसकी एक वजह तुर्की का कट्टरवादी सोच की तरफ़ बढ़ना है और दूसरी वजह चीन है. तुर्की और पाकिस्तान दोनों ही देश चीन के क़रीब जा रहे हैं. चीन इस्लामी दुनिया में सऊदी अरब का नया विकल्प तलाश रहा है जो वो तुर्की और पाकिस्तान में तलाश करता दिखाई पड़ रहा है."
बीबीसी उर्दू की संवाददाता फ़रहत जावेद ने अपनी रिपोर्ट में पूर्व विदेश सचिव शमशाद अहमद के हवाले से लिखा है कि पाकिस्तानी लोग पहले से ही सऊदी अरब के कुछ फ़ैसलों के विरोध में हैं. जैसे कि कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब का भारत को समर्थन या उम्मीद के मुताबिक़ पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन न करना. दूसरी ओर इसराइल के समर्थन के संकेतों से भी पाकिस्तानी जनता का सऊदी अरब पर विश्वास कम हो रहा है.

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भारत के साथ बढ़ते ताल्लुक़ात का असर
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के पश्चिम एशिया अध्ययन केंद्र के प्रोफ़ेसर एके पाशा बताते हैं कि भारत के साथ संयुक्त अरब अमीरात के बढ़ते ताल्लुक़ात का असर भी उसके और पाकिस्तान के आपसी संबंधों पर पड़ा है.
कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच तब अनबन हुई जब पाकिस्तान ने सऊदी अरब के सामने प्रस्ताव रखा कि कश्मीर मसले को लेकर ओआईसी में विदेश मंत्रियों के स्तर पर एक कॉन्फ्रेंस रखी जाए.
इस प्रस्ताव पर संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान का साथ देने से साफ़ इनकार कर दिया. पाकिस्तान के कश्मीर पर ब्लैक डे मनाने के प्रस्ताव को भी अमीरात ने मानने से इनकार कर दिया.
प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि इससे पहले यमन में फ़ौज भेजने के संयुक्त अरब अमीरात के प्रस्ताव को पाकिस्तान ने मानने से इनकार कर दिया था जिसकी वजह से अमीरात में इस बात को लेकर नाराज़गी थी.
इसके अलावा प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि ईरान को लेकर भी दोनों देशों के बीच अनबन हो गई थी और फिर जब इसराइल के साथ संयुक्त अरब अमीरात का शांति समझौता हुआ तब भी दोनों देशों के बीच तनाव पैदा हो गया.
पाकिस्तानियों पर असर
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच ख़राब होते रिश्तों का बुरा प्रभाव संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे पाकिस्तानियों पर पड़ रहा है.
इस रिपोर्ट के अनुसार फ़लस्तीन का समर्थन करने वाले पाकिस्तानी नागरिकों की गिरफ़्तारी हो रही है और छोटे-मोटे अपराधों के लिए भी उन्हें जेल भेजा जा रहा है और अबु धाबी के अल स्वेहान जेल में क़रीब 5000 पाकिस्तानी बंद हैं.

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हाल ही में दुबई से लौटे प्रोफ़ेसर पाशा बताते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात में रह रहे पाकिस्तानी इस बात को लेकर काफ़ी परेशान हैं कि उनकी हुकूमत उनका साथ नहीं दे रही है.
वो बताते हैं कि अर्थव्यवस्था में आए संकट की वजह से भी पाकिस्तानियों की हालत ठीक नहीं है और वो लौटने के बारे में सोच रहे हैं. इसलिए सिर्फ़ राजनीतिक ही नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंध भी बिगड़ते जा रहे हैं.
दशकों से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देश पाकिस्तान को मदद करते आ रहे थे और पाकिस्तान के साथ उनके ताल्लुक़ात एक अलग ही स्तर पर थे.
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