अमेरिका चुनाव: जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने से इसराइल और फ़लस्तीन में से कौन होगा ख़ुश

डोनाल्ड ट्रंप और बिन्यामिन नेतन्याहू

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अमेरिका का अगला राष्ट्रपति कौन होगा? इसका बेसब्री से इंतज़ार इसराइल के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के घनिष्ठ मित्र बिन्यामिन नेतन्याहू भी कर रहे हैं.

उधर फ़लस्तीनी अधिकारियों को भी अगले अमेरिकी राष्ट्रपति का इंतज़ार है. अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन राष्ट्रपति बने तो फ़लस्तीनी ख़ेमे में राहत की सांस ली जायेगी और नेतन्याहू इसे एक बड़े सियासी झटके की तरह देखेंगे.

बिन्यामिन नेतन्याहू की राष्ट्रपति ट्रंप से गहरी दोस्ती उनके लिए इसराइलियों के सामने सबसे बड़ी ताक़त है. एक सर्वेक्षण में 60 प्रतिशत इसराइली ट्रंप को राष्ट्रपति पद पर वापस देखना चाहते हैं. इसके अलावा कट्टरवादी यहूदी पार्टियों ने राष्ट्रपति ट्रंप को चुनाव में जीतने के लिए शुभकामनाएं भेजी थीं.

लेकिन साथ ही, इन दिनों इसराइल में नेतन्याहू के इस्तीफ़े की मांग को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. उनकी मिली-जुली सरकार कमज़ोर है.

दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में मध्य पूर्व और खाड़ी देशों के मामलों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर ए.के पाशा कहते हैं कि बाइडन राष्ट्रपति बने तो नेतन्याहू की सरकार गिर भी सकती है. उनके मुताबिक़, अगर बाइडन राष्ट्रपति बने तो नेतन्याहू के ख़िलाफ़ जारी प्रदर्शन को बल मिलेगा क्योंकि सियासी तौर पर वो और भी कमज़ोर हो चुके होंगे.

जो बाइडन

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हो सकते हैं महत्वपूर्ण बदलाव

लेकिन प्रोफ़ेसर पाशा की राय में बाइडन के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद इस क्षेत्र में काफ़ी 'महत्वपूर्ण' बदलाव आने के आसार हैं.

वो कहते हैं, "पहला बदलाव जिसके बारे में बाइडन ख़ुद कह चुके हैं कि वो ईरान के साथ परमाणु समझौते को कुछ मामूली फेरबदल के साथ बहाल करेंगे. दूसरा ये कि खाड़ी के देशों के साथ जो शांति वार्ता का सिलसिला जारी है, उसकी गति धीमी हो जायेगी.''

"ट्रंप ने नेतन्याहू के कहने पर इन देशों पर काफ़ी दबाव डाल रखा था और तीसरी अहम बात ये है कि जब बाइडन ओबामा के समय में उपराष्ट्रपति थे, तो उस समय उन्होंने फ़लस्तीनियों के साथ समझौते की कोशिशों को निजी टच दिया था, तो नेतन्याहू ने जो घोषणा कर रखी है कि वो जॉर्डन वैली और वेस्ट बैंक के सेटलमेंट को इसराइल में औपचारिक रूप से शामिल कर लेंगे, वो अब ये नहीं कर पाएंगे.''

ए.के पाशा कहते हैं, ''बाइडन वेस्ट बैंक के सेटलमेंट वाले इलाक़ों को इसराइल के क़ब्ज़े में दिए जाने का विरोध करेंगे क्योंकि 'टू स्टेट सॉल्यूशन' या दो-राज्य हल पर बातचीत में ऐसा करना शामिल नहीं है. दो राज्य हल के अंतर्गत फ़लस्तीनियों को एक अलग और स्वतंत्र रियासत मिलेगी और ये आज़ाद इसराइल से सटी होगी.''

प्रोफ़ेसर पाशा मानते हैं कि ऐसा संभव है कि बाइडन के राष्ट्रपति बनने पर ओबामा के आठ साल के शासन में इसराइल और खाड़ी देशों को लेकर जो अमेरिकी नीतियाँ बनायी गयी थीं, वो बहुत हद तक वापस ले ली जाएं.

बिन्यामिन नेतन्याहू

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नेतन्याहू की घबराहट

पिछले महीने प्रधानमंत्री नेतन्याहू को पहली बार अहसास हुआ कि उन्हें जल्द ही व्हाइट हाउस में एक नए राष्ट्रपति का सामना करना पड़ सकता है. अपनी और इसराइल की निष्पक्षता को फिर से उजागर करने का मौक़ा उन्हें 23 अक्टूबर को मिला.

उस दिन व्हाइट हाउस में कई पत्रकार बैठे थे. अवसर था सूडान और इसराइल के बीच समझौते का ऐलान. राष्ट्रपति ट्रंप प्रधानमंत्री नेतन्याहू और सूडान के नेता अब्दुल फ़ताह अल-बुरहान के साथ कांफ्रेंस कॉल पर थे. पत्रकारों ने इस बातचीत को रिकॉर्ड भी किया.

राष्ट्रपति ट्रंप ने इसराइली प्रधानमंत्री से पूछा, "बीबी (नेतन्याहू इस नाम से भी जाने जाते हैं) क्या आपको लगता है कि स्लीपी (जो बाइडन) ये समझौता करा सकते थे?"

लेकिन नेतन्याहू अच्छी तरह से जानते थे कि आने वाले दिनों में वो शायद "राष्ट्रपति बाइडन" के साथ भी फ़ोन पर बात कर सकते हैं.

राष्ट्रपति के सवाल का जवाब उन्होंने यूँ दिया, "राष्ट्रपति ट्रंप, मैं एक बात आपको बता सकता हूँ..." राष्ट्रपति ने कमरे में मौजूद पत्रकारों की तरफ़ मुस्कुराते हुए देखा, इस उम्मीद में कि 'बीबी' उनके दावे की पुष्टि करेंगे. लेकिन, राष्ट्रपति के चेहरे से इसराइली प्रधानमंत्री की आगे की बात सुनकर मुस्कराहट जल्द ही ग़ायब हो गयी. नेतन्याहू ने कहा, "हम यहाँ शांति स्थापित करने में अमेरिका में हर किसी के मदद के आभारी हैं और इस सिलसिले में आपने जो कुछ भी किया है, उसके लिए हम आपके आभारी हैं."

उस समय राष्ट्रपति के चुनाव के अनुमानों में जो बाइडन ट्रंप से आगे चल रहे थे. उस वक़्त तक इसराइली प्रधानमंत्री पर ये आरोप लगाया जा रहा था कि अमेरिकी चुनाव में वो खुले तौर पर अपने क़रीबी दोस्त राष्ट्रपति ट्रंप का साथ दे रहे हैं. 23 अक्टूबर की कांफ्रेंस कॉल के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप को दिया गया जवाब नेतन्याहू की तरफ़ से ये जताने की कोशिश थी कि वो राष्ट्रपति ट्रंप को खुला समर्थन नहीं देना चाहते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप और बिन्यामिन नेतन्याहू

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ट्रंप और नेतन्याहू की बढ़ी दोस्ती

लेकिन क्या नेतन्याहू ने अमेरिकी चुनाव में निष्पक्षता दिखाने में देर कर दी?

इसराइल के शहर हाइफ़ा में डॉक्टरी से पत्रकारिता के पेशे में आने वाले बोआज़ हारिस ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, "दुनिया वालों को ये लगता होगा कि पिछले चार सालों में अमेरिका के साथ हमारी दोस्ती में घनिष्ठता आयी है, लेकिन सच तो ये है कि ये घनिष्ठता दो देशों के बीच दोस्ती में आने के बजाय दो नेताओं के बीच दोस्ती में आयी है. अब अगर बाइडन राष्ट्रपति बने तो नेतन्याहू को शायद उसी तरह की दिक़्क़तें हो सकती हैं जिस तरह की राष्ट्रपति ओबामा के समय में हुई थीं, जब उनके ओबामा के साथ निजी रिश्ते ख़राब थे."

ट्रंप- नेतन्याहू के रिश्ते 2016 में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही फलने-फूलने लगे, जिसका नतीजा ये हुआ कि इसराइल ने इस साल संयुक्त अरब अमीरात, सूडान और बहरीन के साथ शांति समझौते किये और अमेरिका ईरान से हुए परमाणु समझौते से बाहर हो गया.

ये दोनों घटनाएं इसराइल के पक्ष में, ख़ासतौर से नेतन्याहू के हक़ में गयीं. दरअसल ये उनकी लिखी स्क्रिप्ट के अनुसार हुईं. इसका श्रेय राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद और सलाहकार जारेड कुशनर को भी जाता है जो एक अमेरिकी यहूदी हैं और जिनका शांति वार्ता में एक बड़ा योगदान बताया जाता है.

परंपरागत रूप से कोई भी इसराइली प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के उम्मीदवारों का समर्थन या विरोध नहीं करता है. अमेरिका में भी इसराइल का विरोध करके कोई उम्मीदवार राष्ट्रपति का चुनाव जीत नहीं सकता.

इसकी वजह ये है कि इसराइल के मामले में डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी में कोई मतभेद नहीं है. दोनों पार्टियों का इसराइल को हमेशा से भरपूर समर्थन हासिल रहा है. दरअसल, राष्ट्रपति के उम्मीदवारों के बीच मुक़ाबला इस बात पर भी होता है कि कौन उम्मीदवार इसराइल की तरफ़ ज़्यादा झुकाव रखता है.

बराक ओबामा और जो बाइडन

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क्या होगी बाइडन की नीति

अगर बाइडन राष्ट्रपति बने तो इसराइल के लिए ओबामा की नीति से उनकी नीति कितनी अलग होगी ?

राष्ट्रपति बराक ओबामा के आठ साल के कार्यकाल (2008-2016) में इसराइल और खाड़ी देशों के लिए अमेरिकी विदेश नीतियों के निर्माण में उस समय के उप राष्ट्रपति और अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बाइडन का भरपूर योगदान बताया जाता है.

लेकिन, इसके बावजूद प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, "वो ओबामा की नीतियों को 100 प्रतिशत वापस तो नहीं ला सकते क्योंकि अभी भी यहूदी लॉबी का दबाव अमेरिका पर है. इसे जो बाइडन भी महसूस करेंगे. बाइडन इसराइल को छोटी-मोटी छूट देंगे लेकिन मोटे तौर पर ओबामा की ईरान की तरफ़ पॉलिसी और फ़लस्तीनियों की तरफ़ पॉलिसी को बहाल करेंगे और इसराइल को ट्रंप जैसा अंध समर्थन नहीं मिलेगा."

येरुशलम इस्लाम, ईसाई और यहूदी धर्मों का पवित्र स्थल है.

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बोआज़ कहते हैं कि अगर बाइडन राष्ट्रपति बने तो "टू स्टेट सॉल्यूशन" का ज़ोर एक बार फिर पकड़ेगा जो ओबामा के दौर में एजेंडे में काफ़ी ऊपर था. लेकिन इसमें कट्टरवादी यहूदियों की अवैध आबादी एक बड़ा रोड़ा है. नेतन्याहू चाहते हैं कि उन्हें इसराइल में पूरी तरह से शामिल कर लिया जाए. लेकिन ये आबादियाँ अधिकतर फ़लस्तीनी इलाक़ों में बसाई गयी हैं इसलिए फ़लस्तीनी इन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं.

वह बताते हैं कि दूसरा बड़ा मुद्दा पूर्वी येरुशलम के भविष्य का है. इसराइल पूरे येरुशलम को अपनी राजधानी मानता है जबकि फ़लस्तीनी पूर्वी येरुशलम को भविष्य में रियासत बनने पर अपनी राजधानी बनाना चाहते हैं.

जो बाइडन को लेकर नेतन्याहू सरकार में घबराहट महसूस की जा सकती है. सेटलमेंट यानी बस्तियों के बसाने वाले मामलों के मंत्री तजाची हेंग्बी ने बुधवार को कहा कि अगर बाइडन राष्ट्रपति बनते हैं तो इसरायल और ईरान के बीच युद्ध हो सकता है.

हेंग्बी ने कहा, "बाइडन ने लंबे समय से खुले तौर पर कहा है कि वह परमाणु समझौते पर (ईरान के साथ) वापस जाएंगे, जो मुझे लगता है कि इसराइल और ईरान के बीच टकराव पैदा करेगा."

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 3 नवंबर को हुआ था. वोटों की गिनती जारी है. मुक़ाबला काँटे का है, लेकिन अमेरिका में अधिकतर लोगों की राय ये है कि बहुत कम मार्जिन के साथ बाइडन विजेता बने सकते हैं.

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