इसराइल की ख़ातिर फलस्तीन को एक और झटका देगा अमरीका?

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने फलस्तीन को मुहैया कराई जाने वाली वित्तीय और सुरक्षा मदद रोकने की धमकी दी है.
ट्रंप ने कहा, "अगर फलस्तीन शांति वार्ता के लिए तैयार नहीं होता है तो ये क़दम उठाया जा सकता है. जब फलस्तीन हमारे लिए कुछ नहीं कर रहा है तो क्यों न हम उसकी वित्तीय मदद बंद कर दें."
ट्रंप ने यह आशंका भी जताई है कि फलस्तीन और इसराइल के बीच शायद ही कभी शांति वार्ता हो सकेगी. उन्होंने कहा, "मैं नहीं जानता कि इसराइल और फलस्तीन के बीच कभी शांति वार्ता हो भी सकती है."
दोनों मुल्क़ों के बीच शांति वार्ता की मध्यस्थता करने की पेशकश अमरीका कई बार चुका है, जिसे फलस्तीन ने स्वीकार नहीं किया है.
फलस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने बीते दिसंबर में यरूशलम को इसराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता दिए जाने के ट्रंप के फैसले को 'सदी का थप्पड़' बताया था.

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'शांति नहीं तो मदद नहीं'
दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में बोलते हुए ट्रंप ने कहा, 'अमरीका हर साल फलस्तीन को करोड़ों डॉलर की मदद और समर्थन देता है. पैसा मेज़ पर है लेकिन हम इसे तब तक फलस्तीन को नहीं देंगे, जब तक वो शांति वार्ता के लिए तैयार न हो जाएं.'
ट्रंप के भाषण के दौरान इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू भी मौजूद थे.
बिन्यामिन नेतन्याहू ने इस मौक़े पर कहा, 'मैं ये कहना चाहता हूं कि ये ऐतिहासिक फ़ैसला है, जो हमेशा हमारी आने वाली पीढ़ियों के दिल में रहेगा. इससे शांति की तरफ हमें बढ़े हैं क्योंकि ये मौजूदा हकीकत और इतिहास को मान्यता देता है. शांति सिर्फ सच के आधार पर स्थापित सकती है. इतिहास को मान्यता देकर आपने इतिहास बनाया था. हम इसे हमेशा याद रखेंगे.'

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इसराइल-फलस्तीन की कितनी मदद करता है अमरीका?
इससे पहले अमरीका ने शुरुआती महीने में फलस्तीनी शरणार्थियों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी का 65 मिलियन डॉलर का फंड रोक दिया था.
अमरीकी स्टेट डिपार्टमेंट ने पुष्टि करते हुए कहा कि ट्रंप इस फंड के बारे में बात नहीं कर रहे थे. बल्कि ट्रंप उस द्विपक्षीय फंडिंग की बात कर रहे थे, जिसका इस्तेमाल आर्थिक मदद और सुरक्षा ट्रेनिंग के लिए किया जाना था.
अमरीका ने साल 2016 में फलस्तीन की 260 मिलियन डॉलर की मदद की थी. जबकि अमरीका इसराइल की हर साल तीन बिलियन डॉलर से सैन्य मदद मुहैया कराता है.

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कभी नहीं हो पाएगी इसराइल, फलस्तीन की दोस्ती?
इसराइल और फलस्तीन के बीच कभी भी शांति स्थापित होने को लेकर ट्रंप ने संदेह जताया.
एक हफ्ते पहले अमरीका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने फलस्तीन नेतृत्व से मिलने की इच्छा ज़ाहिर की थी. लेकिन फलस्तीनी नेताओं से उनसे मिलने से इंकार किया था.
ट्रंप ने कहा, 'हमारे महान उपराष्ट्रपति माइक पेंस से न मिलकर फलस्तीनी नेताओं ने हमारा अनादर किया है.'
ट्रंप के इस बयान के बाद संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में फलस्तीन के राजदूत रियाद मंसूर ने कहा कि यरूशलम को इसराइल की राजधानी कहने के अमरीका के फ़ैसले को न मानने का मकसद अनादर करना नहीं था. बल्कि ये न्याय और समानता के सिद्धांतों पर आधारित था.
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