इसराइल में क्या नेतन्याहू युग ख़त्म होने जा रहा है?

नेतन्याहू

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    • Author, हरेंद्र मिश्र
    • पदनाम, यरुशलम से, बीबीसी हिंदी के लिए

स्थानीय मीडिया में चुनाव आयोग के सूत्रों के हवाले से प्रकाशित चुनाव परिणामों के मुताबिक़ नेतन्याहू की लिकुड पार्टी को 120 सदस्यों वाली कनेसेट (इसराइली संसद) में महज़ 32 सीटें मिली हैं.

उनके मुख्य विपक्षी दल, ब्लू एंड वाइट पार्टी, को भी उतनी ही सीटें मिलती दिख रही है. ऐसे में कोई भी विजय का दावा नहीं कर सकता और दोनों नेता सम्पूर्ण परिणाम आने तक संभावित सहयोगी पार्टियों के नेताओं से विमर्श में लग गए हैं.

नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी ब्लॉक को 56 सीटें मिलती दिख रही हैं. विपक्ष की सभी पार्टियों को मिलाकर 55 सीटें हो रही हैं जो कि 61 के जादुई संख्या से कम हैं. ऐसे में एक राष्ट्रीय एकता की सरकार बनने की संभावना सबसे प्रबल दिख रही है.

इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू का दौर ख़त्म हो गया है?

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एविगडोर लीबरमैन, जो पहले नेतन्याहू के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश और रक्षा मंत्री रह चुके हैं, उन्हें इन चुनाव के नतीजे के अनुसार किंगमेकर के रूप में देखा जा रहा है.

उनकी इसराइल बेतेनु पार्टी को 9 सीटें मिलती दिख रही हैं और इस अल्ट्रा-नेशनलिस्ट नेता ने स्पष्ट कर दिया है कि वो एक राष्ट्रीय एकता की सरकार बनता देखना चाहते हैं, भले ही दोनों पार्टियां उन्हें उसमें स्वीकार भी न करें.

मौजूदा हालत में उनकी पार्टी के समर्थन के बगैर दोनों ही खेमे सरकार का गठन नहीं कर सकते.

बुधवार को रात 10 बजे मतदान ख़त्म होने के बाद अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए लीबरमैन ने कहा कि देश में राजनैतिक और आर्थिक, दोनों ही पहलुओं से, आपातकालीन स्थिति बनी हुई है.

ऐसे में वो और उनकी पार्टी अपने विचार पर कायम हैं और सिर्फ़ एक राष्ट्रीय एकता की सरकार के गठन का समर्थन करेंगे.

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एक मत से चूके

अप्रैल 9 के चुनावों के बाद इसराइल बेतेनु पार्टी ने प्रधानमंत्री पद के लिए नेतन्याहू के नाम की सिफ़ारिश राष्ट्रपति रूवेन रिवलिन से की थी मगर सैन्य सेवा से अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों को छूट मिलने के सवाल पर उन्होंने नेतन्याहू के नेतृत्व में बन रही दक्षिणपंथी सरकार में शामिल होने से इनकार कर दिया था.

इसराइल बेतेनु के समर्थन के बगैर नेतन्याहू 61 सदस्यों का समर्थन जुटाने में महज़ एक मत से चूक गए और उन्होंने संसद निरस्त करने की मांग करते हुए फिर से चुनाव करवाने को कहा.

इसराइल के इतिहास में पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई जब 160 दिनों के अंतराल में दोबारा चुनाव करवाए गए.

क्या इसराइल में प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का दौर ख़त्म हो गया है? तकरीबन 92 फ़ीसदी वोटों की गिनती के बाद सामने आ रहे नतीजों पर गौर करें, तो इसराइल के इतिहास में सर्वाधिक समय तक प्रधानमंत्री पद पर सेवारत रहे नेतन्याहू रिकॉर्ड पाँचवे कार्यकाल की तलाश में विफल होते नज़र आ रहे हैं.

तो क्या ये माना जाए कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर इसराइल की पहचान बन गए नेतन्याहू अब उसके राजनैतिक पटल से लुप्त हो जाएंगे या फिर उनका दौर ख़त्म हो गया है?

इसराइली प्रधानमंत्री को अपने पद पर बने रहने के लिए कम से कम एक और पार्टी का समर्थन हासिल करना होगा जो उनके दक्षिणपंथी ब्लॉक में शामिल नहीं है. फ़िलहाल ऐसी सभी पार्टियों ने इस गुंजाइश से इनकार किया है मगर राजनीति में इस समय किसी भी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता.

इसराइल में बिन्यामिन नेतन्याहू का दौर ख़त्म हो गया है?

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दूसरी तरफ़ अगर राष्ट्रीय एकता की सरकार बनती है तो उसका नेतन्याहू के राजनैतिक भविष्य पर क्या असर पड़ेगा.

ऐसी परिस्थिति में आम तौर पर दोनों बड़ी पार्टियों के नेता दो-दो सालों के लिए प्रधानमंत्री का पद हासिल करते हैं.

इसराइल में ऐसा सफल प्रयास पहले हो चुका है. मगर ऐसी स्थिति में नेतन्याहू के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी अपनी पार्टी के सांसदों को अपने साथ रख पाना.

नेतन्याहू के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के कई मामलों में गंभीर आरोप हैं और ब्लू एंड वाइट पार्टी के नेता, बेनी गैन्ट्ज़, कह चुके हैं कि वो उनके नेतृत्व में सरकार में शामिल नहीं होंगे. अगर वो इस पर कायम रहते हैं और राष्ट्रीय एकता की सरकार के अलावा और कोई विकल्प सामने नहीं आता तो लिकुड पार्टी पर अपने नेता को बदलने का दबाव पड़ सकता है.

सवाल उठता है कि क्या नेतन्याहू की पार्टी के सांसद ऐसे हालात में भी उनका साथ देंगे?

जहां बड़ी पार्टियां उभरते हालात से सुलझने के प्रयास में लगी है वही इन चुनावों से एक बात साफ़ तौर पर नज़र आ रही है. दोबारा चुनावों के सबसे बड़े विजेता अरब आबादी द्वारा समर्थित जॉइंट यूनिटी लिस्ट है जिसके अगले पार्लियामेंट में 12 सांसद शामिल होंगे.

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राष्ट्रपति पर नज़रें

चुनाव आयोग के सूत्रों ने कहा कि जहां अप्रैल 9 के चुनाव में 50 फ़ीसदी से भी कम अरब मतदाताओं ने वोट दिया था वहीं इस बार उसमें तकरीबन 13 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है.

आम तौर पर अरब पार्टियां किसी भी सरकार में शामिल नहीं होतीं मगर गन्त्ज़ ने जॉइंट यूनिटी लिस्ट के नेता अयमान ओदेह से संपर्क किया है. अरब नेता ने भी अपने पत्ते दबा कर रखे हैं और अपना स्टैंड साफ़ नहीं किया है.

स्पष्ट विजेता की ग़ैर-मौजूदगी में सभी की नज़रें राष्ट्रपति रुबेन रिवलिन की और हैं. उन्होंने कहा है कि वो तीसरे चुनाव को असफल करने के लिए किसी भी हद तक जाएंगे और नई सरकार के गठन के लिए हर सम्भावना पर नज़र डालेंगे.

राष्ट्रपति के मीडिया सलाहकार, जोनाथन कम्मिंग्स, ने कहा कि वो चुनाव आयोग के साथ निरंतर समन्वय बनाए हुए हैं और चुनावी नतीजे सामने आते ही सभी दल के नेताओं से विमर्श करेंगे. राष्ट्रपति के मीडिया सलाहकार ने भी दोहराया कि रिवलिन का पूरा प्रयास रहेगा की लोगों के मत को ध्यान देते हुए सही फ़ैसला किया जाए, मगर एक और चुनाव होने से रोकने के लिए भी हर संभव प्रयास किए जाएं.

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चुनाव के इन नतीजों का भारत-इसराइल संबंध पर क्या असर पड़ेगा?

नेतन्याहू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत केमिस्ट्री को लेकर काफ़ी चर्चा होती रही है. मोदी इसराइल का दौरा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने. नेतन्याहू ने उनकी खातिर कुछ इस क़दर किया कि वो सिर्फ़ अमरीकी राष्ट्रपति और पोप के लिए इसराइल में देखने को मिलता है.

दरअसल ये स्वागत कहीं अमरीकी राष्ट्रपति और पोप से भी आगे बढ़कर था क्योंकि नेतन्याहू मोदी के साथ साया बनकर पूरे तीन दिन साथ रहे.

दोनों नेताओं की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हुई जिसमें वो नंगे पांव समुद्र में प्रवेश कर रहे हैं. इस तस्वीर के बाद इसराइल में ब्रोमांस की चर्चा रही.

दरअसल, देखें तो नेतन्याहू के प्रचार का एक केंद्रीय बिन्दु रहा उनकी वैश्विक स्तर पर मुख्य नेताओं के साथ व्यक्तिगत पहचान. उन्होंने अपने मतदाताओं को ये दिखने का प्रयास किया की उनके कद का इसराइल में और कोई नेता नहीं है और इसराइल की सुरक्षा और सम्पन्नता के लिए उनका पद पर बने रहना बेहद आवश्यक है.

उनकी पार्टी ने अपने मुख्या कार्यालय पर तीन बड़े-बड़े बैनर लगवाए जिनमें उनकी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और मोदी के साथ हाथ मिलते हुए तस्वीरें थी. इन तस्वीरों के साथ मोटे अक्षरों में लिखा था "नेतन्याहू, एक अलग ही लीग में".

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ट्रंप और पुतिन ने नेतन्याहू की खुलकर मदद भी की, ख़ासकर अप्रैल 9 के चुनावों के पहले. नेतन्याहू ने अपने अंतरराष्ट्रीय कद के प्रदर्शन के लिए दो बार भारत जाने का कार्यक्रम भी बनाया मगर किन्हीं वजहों से दोनों बार उससे रद्द करना पड़ा.

भारत जाने का ये निमंत्रण नेतन्याहू की पहल पर हुआ और जानकार बताते हैं कि इस दौरे का कोई विशेष औचित्य नहीं था. दोनों देशों के बीच गहरे सम्बन्ध हैं और इस वक़्त कोई ऐसा ख़ास मामला नहीं था जिसकी वजह से नेतन्याहू का भारत जाना आवश्यक रहा हो.

भारत इसराइली हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीददार है. दोनों देशों के दरमियान कई क्षेत्रों में गहरा सहयोग दिखाई देता रहा है. मोदी के दौरे के दौरान इसे रणनीतिक साझेदारी का चोला भी पहनाया जा चुका है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत-इसराइल संबंधों का ये स्वरूप मोदी-नेतन्याहू के बीच संबंधों की वजह से हैं. ये सही है कि इन दोनों नेताओं के बीच अच्छे संबंध हैं मगर भारत और इसराइल के बीच संबंध आपसी ज़रूरत और राष्ट्रीय हितों को मद्देनज़र हैं.

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भारत कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान भी इसराइल से सभी क्षेत्रों में सहयोग पा रहा था और हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीददार था.

मगर ये बिल्कुल सही है कि जब-जब बीजेपी के नेतृत्व में दिल्ली में सरकार बनती है तब-तब भारत और इसराइल के संबंध सुर्ख़ियों में रहते हैं.

वैसे दोनों देशों के बीच के संबंध इंस्टिट्यूशनल हैं और सरकारों के बदलने से इस पर उतना फ़र्क़ नहीं पड़ता. चर्चा थोड़ी कम या ज़्यादा ज़रूर हो जाती है मगर नीतिगत फ़ैसलों पर इसका मूलभूत असर नहीं दिखता.

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