अमेरिका चुनाव: लंबा हो सकता है नतीजों का इंतज़ार

2016 के चुनावी नतीजे बेहद नज़दीकी रहे थे

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03 नवंबर को मतदान के बाद अब अमरीकी लोगों की नज़र इस बात पर है कि जो बाइडन और डोनाल्ड ट्रंप में से कौन अमेरिका का अगला राष्ट्रपति होगा.

एक नज़र उन बातों पर, जिन्हें देखना दिलचस्प होगा.

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कुछ अहम जानकारियाँ:

  • अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के लिए सबसे अधिक मत हासिल करना ज़रूरी नहीं है. बल्कि उम्मीदवार इलेक्टोरल कॉलेज में बहुमत के आंकड़े यानी 270 को पार करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं.
  • इस बार पहले हुए चुनावों के मुक़ाबले कई लाख लोगों ने डाक के ज़रिए मतदान किया है. डाक से आए मतपत्रों को गिनने में अधिक समय लग सकता है और कुछ प्रांतों में तो मतदान शुरू होने के बाद ही डाक से आए मतपत्रों की गिनती होगी. ऐसे में नतीजों में देरी होना स्वाभाविक है.
  • डाक मतदान में हुए अप्रत्याशित इज़ाफ़े की वजह से शुरू में आगे चल रहा उम्मीदवार पिछड़ भी सकता है. ऐसे में नतीजों को ज़रा ध्यान से देखें.
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अमरीकी चुनावों के कुछ अहम शब्द:

  • बेलवेदर स्टेटः ओहायो या मिज़ूरी जैसे प्रांत, जहाँ मतदाताओं ने साल दर साल राष्ट्रपति बनने वाले उम्मीदवार को ही चुना है. ये प्रांत जीतने वाले उम्मीदवार के साथ ही रहे हैं.
  • एक्ज़िट पोल : मतदान करके निकल रहे लोगों के साथ किए जाने वाले व्यक्तिगत साक्षात्कार. इस सर्वे में सीमित संख्या में ही मतदाताओं का साक्षात्कार किया जाता है. ऐसे में एक्ज़िट पोल के नतीजे ग़लत भी साबित हो सकते हैं.
  • इलेक्टोरल कॉलेजः हर प्रांत में आबादी के हिसाब से इलेक्टर्स होते हैं. अधिकतर मामलों में जो उम्मीदवार सबसे ज़्यादा वोट जीतता है, वही प्रांत के इलेक्टर्स के वोट भी जीतता है. ये इलेक्टर ही बाद में राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव करते हैं. कुल मिलाकर 538 इलोक्टोरल कॉलेज वोट हैं. ऐसे में उम्मीदवार को चुनाव जीतने के लिए कम से कम 270 वोट की ज़रूरत होती है.
  • प्रोजेक्शन बनाम कॉलिंगः गिने गए मतपत्रों के आधार पर प्रत्येक प्रांत के संभावित विजेता के नाम की घोषणा की जाती है. इसी आधार पर देशव्यापी मतदान के विजेता को प्रोजेक्ट किया जाता है. हालाँकि किसी प्रांत का नाम तब तक नहीं लिया जाएगा जब तक मतदान के बारे में पर्याप्त डेटा ना आ जाए. इसमें महीनों चला मतदान, एक्ज़िट पोल और वास्तव में हुई वोटों की गिनती शामिल है.
  • स्विंग स्टेट बनाम बैटलग्राउंड स्टेटः ये वो प्रांत हैं, जो स्पष्ट तौर पर किसी एक पार्टी की ओर जाते दिखाई नहीं देते हैं. यानी डेमोक्रेटिक या रिपब्लिकन, किसी भी पार्टी का उम्मीदवार इन प्रांतों को जीत सकता है.
  • रेड बनाम ब्लू स्टेटः ये वो प्रांत हैं, जो आमतौर पर एक ही पार्टी को चुनते हैं. रेड स्टेट रिपब्लिकन को चुनते रहे हैं जबकि ब्लू स्टेट डेमोक्रेटिक पार्टी को चुनते हैं.
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कैसे जानें कि कौन चुनाव जीत रहा है?

इस साल बड़ी संख्या में हुए डाक मतदान की वजह से जल्द ही ये पता चलना मुश्किल होगा कि कौन सा उम्मीदवार आगे चल रहा है.

अलग-अलग प्रांतों में डाक मतपत्रों की गिनती कब और कैसे होगी, इसके लिए अलग-अलग नियम हैं.

ऐसे में प्रांतों के नतीजे भी अलग-अलग समय पर आएँगे. फ़्लोरिडा और एरिज़ोना जैसे प्रांत तीन नवंबर के चुनाव से कई सप्ताह पहले ही डाक मतपत्रों की गिनती शुरू कर देते हैं, जबकि विस्कोंसिन और पेन्सिलवेनिया जैसे प्रांत मतदान के दिन ही गिनती शुरू करते हैं. यानी इन प्रांतों के नतीजे देर से आएँगे.

डाक मतपत्र
इमेज कैप्शन, क्या डाक मतदान अमरीकी चुनाव को समाप्त कर देगा?

असमंजस की एक और वजह ये भी है कि अलग-अलग प्रांतों में डाक मतपत्रों को स्वीकार करने की समयसीमा अलग-अलग है.

जॉर्जिया जैसे प्रांत तीन नवंबर को या उससे पहले मिले मतपत्रों को ही गिनेंगे, जबकि ओहायो जैसे प्रांत ऐसे मतपत्रों को भी गिनेंगे, जिन पर तीन नवंबर की तारीख़ पड़ी होगी.

ये तो अब स्पष्ट है कि कुछ प्रांतों में अंतिम नतीजे आने में कई सप्ताह का समय लग जाएगा. ऐसे में ये बताना लगभग असंभव है कि अगले राष्ट्रपति की अधिकारिक घोषणा कब होगी.

इससे पहले हुए चुनावों में ऐसा नहीं हुआ है. तब आप 23:00 ईएसटी (04:00 जीएमटी) पर अंतिम नतीजों की उम्मीद कर सकते थे. इसी समय पश्चिमी तट पर मतदान समाप्त होता है.

नतीजे ठीक इसी समय आते रहे हैं और साल 2012 में वो बस 15 मिनट देरी से आए थे.

हालाँकि पिछली बार मुक़ाबला कड़ा था. डोनाल्ड ट्रंप के पेन्सिलवेनिया जीत लेने तक लोगों की नज़रें टीवी पर गड़ी रही थीं.

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रुझान ग़लत हो सकते हैं

इस साल कुछ और ऐसी चीज़ें हैं, जिन पर आपको नज़र रखनी होगी.

सबसे पहले तो शुरुआती रुझान धोखा दे सकते हैं. इसकी वजह ये है कि अलग-अलग प्रांतों के नतीजे अलग-अलग समय पर आएँगे.

कुछ प्रांतों में व्यक्तिगत तौर पर हुए मतदान के मतपत्र पहले गिने जाएँगे. ऐसे प्रांत में ट्रंप आगे दिख सकते हैं, क्योंकि चुनावी सर्वों से पता चला है कि ट्रंप के समर्थक पहले मतदान करने के लिए उत्साहित हैं.

लेकिन कुछ और प्रांतों में डाक से आए मतपत्रों की गिनती पहले होगी और या मतदान के दिन हुए मतदान के साथ ही इन्हें गिना जाएगा. ऐसे प्रांतों के शुरुआती रुझान बाइडन के समर्थन में दिख सकते हैं. क्योंकि डेमोक्रेट समर्थक रिपब्लिकन मतदाताओं के मुक़ाबले डाक से मतदान अधिक करेंगे.

चिंता चुनावी फ़र्ज़ीवाड़े को लेकर भी है. ट्रंप तो अपने चुनावी अभियान में बार-बार ये कहते रहे हैं कि इस बार फ़र्ज़ीवाड़ा हो सकता है.

महत्वपूर्ण बात ये है कि अमरीका में मतदान में फ़र्ज़ीवाड़े की घटनाएँ बेहद कम हुई हैं. डाक मतपत्र के साथ छेड़छाड़ के कोई सबूत नहीं मिले हैं. ब्रेनन सेंटर फ़ॉर जस्टिस के मुताबिक़ अमेरिका में मतदान फ़र्ज़ीवाड़े का प्रतिशत 0.00004% से 0.0009% के बीच है.

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प्रांतों की घोषणा कैसे की जाती है?

मतदान समाप्त होने के बाद, अमरीका के अलग-अलग टीवी नेटवर्क अपने चुनावी मॉडलों के आधार पर बताते हैं कि किस प्रांत में कौन जीत सकता है. ये मॉडल एक्ज़िट पोल जैसे अलग-अलग डेटा पर आधारित होते हैं.

इनमें मतदान के दौरान की गई गिनती का डेटा भी शामिल होता है.

जब मीडिया नेटवर्कों को लगेगा कि किसी प्रांत में कोई उम्मीदवार इतना आगे निकल गया है कि अब वो पिछड़ नहीं पाएगा तो वो प्रांत को उस उम्मीदार के खाते में घोषित कर देते हैं.

यही प्रांतीय और स्थानीय चुनावों में भी होता है. लेकिन ये सिर्फ़ रुझान ही होता है, अंतिम नतीजा नहीं.

जब किसी उम्मीदवार को राष्ट्रपति चुनाव विजेता घोषित किया जाता है, तो वो भी इसी तरह होता है. वास्तव में प्रांतों को सभी मतपत्रों को गिनने और अंतिम नतीजा घोषित करने में कई सप्ताह तक लग जाते हैं. इस बार अधिक डाक मतदान की वजह से और अधिक समय लग सकता है.

2016 में हुए पिछले चुनावों में मतदान के दिन के बाद एक महीने तक हिलेरी क्लिंटन को मिले वोटों की संख्या बढ़ती रही, लेकिन ट्रंप पहले ही अधिक प्रांत जीतने के बाद राष्ट्रपति चुने जा चुके थे.

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डाक मतदान की वजह से देर क्यों होती है?

इस साल करोड़ों लोग डाक के ज़रिए मतदान कर रहे हैं. ये 2016 चुनावों के मुक़ाबले दोगुना तक हो सकता है.

ये चिंताएं ज़ाहिर की गईं थीं कि डाक मतपत्रों की भारी संख्या से डाक सेवाएँ सही से नहीं निपट पाएँगी और मतपत्रों की डिलीवरी में देर होगी. लेकिन डाक सेवाओं ने ये भरोसा दिया है कि ऐसा नहीं होगा.

कुछ प्रांतों में मतदान के दिन के बाद आने वाले मतपत्रों को भी स्वीकार किया जाएगा. बशर्ते उन पर तारीख 03 नवंबर से पहले की हो. इससे मतों की गिनती और धीमी हो सकती है.

यही नहीं सामान्य मतदान के मुक़ाबले डाक के ज़रिए आए मतपत्रों को गिनने में अधिक समय लगता है.

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अगर कोई स्पष्ट विजेता नहीं हुआ तो क्या होगा?

अगर अमेरिकी समय के अनुसार तीन नवंबर की रात तक कोई स्पष्ट नतीजा नहीं आया, तो फिर कई दिनों या सप्ताह तक अंतिम मतपत्र गिने जाने तक इंतज़ार करना पड़ सकता है.

इसके अलावा क़ानूनी विवाद भी हो सकते हैं, जो अनिश्चितता को और बढ़ावा देंगे. इससे अदालत की भूमिका के लिए जगह भी बन सकती है.

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प्रांत जिन पर नज़र रहेगी

हम जानते हैं कि अंतिम नतीजे आने में देर लगेगी, लेकिन ऐसे कई प्रांत हैं जो शुरुआत में ही संकेत दे सकते हैं.

नॉर्थ कैरोलाइना: 2016 के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने बेहद नज़दीकी लड़ाई में इस प्रांत को जीता था. इस बार भी मुक़ाबला कड़ा ही है.

फ़्लोरिडा: फ़्लोरिडा में डाक मतपत्र और पहले आए मतदाताओं के वोट पहले गिने जाएँगे.

एरिज़ोना: यहाँ 20 अक्तूबर को ही डाक से आए मतपत्रों की गिनती शुरू हो गई थी. ये प्रांत साल 2016 में ट्रंप ने जीता था. लेकिन अब चुनावी सर्वे बाइडन की बढ़त दिखा रहे हैं.

Poll closure times. . *Results likely delayed.
BBC

ओहायो: ओहायो सिर्फ़ स्विंग स्टेट ही नहीं है बल्कि ये नए राष्ट्रपति का भाग्य भी बताता है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से ये प्रांत हर बार जीतने वाले उम्मीदवार को ही चुनता रहा है.

पेन्सिलवेनिया: व्हाइट हाउस का रास्ता इसी बैटलग्राउंड स्टेट से होकर गुज़रता है. बाइडन का जन्म इसी प्रांत में हुआ है और साल 2016 के चुनाव में ट्रंप ने मात्र एक फ़ीसदी अंतर से ये प्रांत जीता था.

विस्कोंसिन: हिलेरी क्लिंटन 2016 में बेहद मामूली अंतर से ये प्रांत हार गईं थीं. तब से ही डेमोक्रेटिक पार्टी ने यहाँ बहुत मेहनत की है.

मिशिगन: ट्रंप और बाइडन दोनों के लिए ही ये प्रांत अहम है.

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अन्य चुनाव

हालांकि सिर्फ़ ट्रंप और बाइडन का नाम ही मतपत्रों पर नहीं है.

दोनों ही पार्टियां अमेरिकी सीनेट के चुनाव पर भी नज़र रखेंगी. अभी सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी के पास तीन सीटें ज़्यादा हैं.

ट्रंप के सहयोगी लिंडसी ग्राहम साउथ कैरोलाइना से सीनेट की सीट के लिए मैदान में हैं. उन्हें डेमोक्रेट जेमी हैरिसन से कड़ी चुनौती मिल रही है.

ग्राहम के पास ये सीट साल 2003 से है. लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप का हर मुद्दे पर समर्थन करने की वजह से उन्हें कुछ वोट का नुक़सान तो ज़रूर हुआ होगा.

वहीं मेन में रिपब्लिकन सुसान कोलिंस को सीट गँवानी पड़ सकती है. कोलिंस ऐसी चुनिंदा रिपब्लिकन नेताओं में से एक हैं, जो मध्यपंथी हैं और पद पर हैं.

लेकिन उन्हें भी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ संबंधों की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है. उनके प्रांत में ट्रंप लोकप्रिय नहीं हैं.

इसके अलावा अमेरिकी मतदाता कई जनमतंसंग्रहों पर भी अपनी राय दे रहे हैं. कैलिफ़ोर्निया में एक ऐसे क़ानून पर जनता की राय ली जा रही है, जो नक़द ज़मानत को पूरी तरह समाप्त करने जा रहा है.

इसकी जगह सुनवाई से पहले रिस्क-असेसमेंट की प्रक्रिया को लाया जा रहा है.

साउथ डकोटा, एरिज़ोना, मोंटाना और न्यू जर्सी में गांजे पर जनमतसंग्रह किया जा रहा है. यहाँ मतदाताओं से गांजे को वैध करने पर राय मांगी गई है. वहीं मिसीसिपी के मतदाताओं से गांजे के मेडिकल इस्तेमाल को मंज़ूरी देने के लिए राय मांगी गई है.

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