अमरीकी चुनाव 2020: क्या है जल्द मतदान और इसका नतीजों पर क्या होगा असर

अमरीका में चुनाव से पहले ही मतदान

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जल्द मतदान का मतलब ठीक ऐसा ही है जैसा आप समझ रहे हैं. यानी चुनाव की वो प्रक्रिया जिसके तहत लोगों को मतदान के दिन से पहले ही वोट डालने की अनुमति दी जाती है.

यह दो तरीक़े से की जा सकती है. बूथ पर पहुँचकर मतदान करके या फिर पोस्ट के ज़रिए मतपत्र भेजकर. फ़िनलैंड और कनाडा में व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होकर मतदान करना सामान्य बात है जबकि ब्रिटेन, स्विटज़रलैंड और जर्मनी में पोस्ट के ज़रिए वोट स्वीकार किए जाते हैं.

अमरीका में लोग चुनाव के दिन यानी तीन नवंबर से पहले ही दोनों तरीक़ों से वोट डाल सकते हैं. यानी बूथ पर पहुँचकर या पोस्ट से भेजकर.

हर चुनाव के साथ अर्ली वोटिंग यानी जल्द मतदान करने वालों की तादाद भी बढ़ती जा रही है. 1992 के चुनावों के मुक़ाबले साल 2016 के चुनावों में पाँच गुणा अधिक लोगों ने जल्द मतदान किया.

इस साल के चुनाव पर कोरोना महामारी का भी असर है. अमरीका में सभी 50 राज्यों में जल्द मतदान हो रहा है और इस दौरान बूथों पर भारी भीड़ दिखाई दे रही है.

राष्ट्रपति ट्रंप ने भी शनिवार को फ्लोरिडा में अपना वोट डाल दिया.

लेकिन जल्द मतदान की ये प्रक्रिया दुनिया भर में चर्चित नहीं है.

तो फिर कौन लोग हैं जो जल्द मतदान कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं? और इसके ख़िलाफ़ कुछ लोग क्यों हैं? इसे समझने के लिए आपको ये जानना चाहिए.

अब तक अमरीका में कितने लोग जल्द मतदान कर चुके हैं?

यूएस इलेक्शन प्रोजेक्ट के मुताबिक़ 23 अक्तूबर तक 5.3 करोड़ अमरीकी अपना वोट डाल चुके हैं. 2016 में हुए कुल जल्द मतदान को ये संख्या पार कर चुकी है.

यूएस इलेक्शन प्रोजेक्ट एक वेबसाइट है जिसे यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ्लोरिडा के प्रोफ़ेसर माइकल मैकडोनल्ड चलाते हैं. वो जल्द मतदान के विशेषज्ञ हैं और हर राज्य में हुए जल्द मतदान और कुल मतदान के आंकड़ें रखते हैं.

मतदान करते लोग

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उनके आंकड़ों के मुताबिक़ अब तक टेक्सस में सबसे अधिक जल्द मतदान हुआ है. यहां 63 लाख से अधिक लोग अब तक वोट डाल चुके हैं. बीते साल इस राज्य में ट्रंप को वोट देने वाले कुल लोगों से ये संख्या बीस लाख अधिक है और पिछले चुनाव में टेक्सस में डाले गए कुल वोटों से बस बीस लाख ही दूर है.

तारीख़ से पहले मतदान कौन कर रहा है?

ये जानने के अलावा कि जल्द मतदान करने वाले लोग कहां रहते हैं, अब हम ये भी जान पा रहे हैं कि वो लोग कौन हैं.

सबसे पहले तो ये जान लेते हैं कि इस साल जल्द मतदान करने वाले अधिकतर लोग युवा हैं.

टफ़्ट यूनिवर्सिटी के सेंटर फ़ॉर इंफ़ोर्मेशन रिसर्च ऑन सिविक लर्निंग एंड एंगेजमेंट के मुताबिक़ 21 अक्तूबर तक 18-29 साल की उम्र के तीस लाख से अधिक लोग वोट डाल चुके हैं.

इनमें से बीस लाख वोट ऐसे राज्यों में डाले गए हैं जहां दोनों उम्मीदवारों के बीच कड़ी टक्कर है.

अभी तक हुए चुनावी सर्वों से पता चलता है कि बीते चुनाव के मुक़ाबले इस बार युवा वोटर अधिक संख्या में मतदान कर सकते हैं.

2016 में 18-29 आयु वर्ग के सिर्फ़ 46 प्रतिशत वोटरों ने ही मतदान किया था जबकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के 71 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया था.

हार्वर्ड यूथ पोल के मुताबिक़ इस साल 63 फ़ीसद युवा मतदान कर सकते हैं.

इस बार अफ़्रीकी-अमरीकी मूल के वोटर भी जल्द मतदान कर रहे हैं. डाटा फ़र्म टार्गेटस्मार्ट के विश्लेषण के मुताबिक़ 2016 के मुक़ाबले इस बार अफ्रीकी अमरीकी मूल के छह गुणा से अधिक लोगों ने 18 अक्तूबर तक जल्द मतदान किया है.

इतनी बड़ी तादाद में लोग जल्द मतदान क्यों कर रहे हैं?

इसकी एक बड़ी वजह कोरोना महामारी है.

मतदान करने का पारंपरिक तरीक़ा, जिसमें लोग लंबी लाइनों में लगकर मतदान करते हैं, सोशल डिस्टेंसिंग के अनुरूप नहीं है. ख़ासकर तब जब सभी राज्यों ने घरों के भीतर चेहरा ढंकने को लेकर नियम जारी नहीं किेए हैं.

अब तक तीस राज्यों ने जल्द मतदान और पोस्ट के ज़रिए मतदान को सुलभ बनाने के लिए विशेष इंतेज़ाम किए हैं.

इसमें पोस्ट के ज़रिए वोट डालने के लिए वजह बताने की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया है. कोविड महामारी को भी पोस्ट के ज़रिए वोट डालने की वजह के तौर पर स्वीकार कर लिया गया है.

कुछ राज्यों ने मतपत्र डालने के लिए ड्रॉप बॉक्स की व्यवस्था की है तो कुछ ने पोस्ट के ज़रिए मतपत्र भेजने पर चार्ज वापस करने की घोषणा की हैं.

वहीं कैलिफ़ोर्निया और कोलोराडो जैसे राज्यों ने सभी मतदाताओं को पोस्ट बैलेट घर पर ही भेज दिए हैं. इस प्रक्रिया को यूनिवर्सल मेल इन वोटिंग कहा जाता है.

वहीं नॉर्थ कैरोलाइना का कहना है कि तीन नवंबर से पहले भेजे गए सभी पोस्टल बैलट को 12 नवंबर तक गिनती में शामिल किया जा सकेगा.

वहीं कई राज्य ने जल्द मतदान की तिथि को और पहले कर दिया था. उदाहरण के तौर पर टेक्सस में छह दिन पीछे करते हुए जल्द मतदान की तारीख़ 13 अक्तूबर कर दी गई थी.

वहीं मिनेसोटा और साउथ डेकोटा में तो मतदान के दिन तीन नवंबर से 46 दिन पहले ही जल्द मतदान शुरू हो गया था.

सभी राज्य में बूथ पर पहुँचकर जल्द मतदान की व्यवस्था नहीं है. इन राज्यों ने भी पोस्ट के ज़रिए आने वाले मतपत्रों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है.

हालांकि जल्द मतदान का मतलब आसान मतदान नहीं है. उदाहरण के तौर पर जॉर्जिया में, लोगों को जल्द मतदान करने के लिए बूथों पर कई घंटों तक इंतेज़ार करना पड़ा.

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वहीं पेनसिलवीनिया की अदालत ने आदेश दिया है कि पोस्ट के ज़रिए आने वाले मतपत्रों पर गुप्त लिफ़ाफ़ा होना चाहिए ताकि मतदाता की पहचान सुरक्षित रखी जा सके.

हालांकि इस आदेश के बाद ये चिंता भी पैदा हुई है कि बिना गुप्त लिफ़ाफ़े के भेजे गए कुछ मतपत्र अवैध भी घोषित किए जा सकते हैं.

यही नहीं अभी 44 राज्यों में जल्द मतदान की मतगणना और पोस्ट के ज़रिए भेजे गए मत पत्रों को स्वीकार करने की प्रक्रिया को लेकर विवादों से जुड़े तीन सौ से अधिक मुक़दमे दायर किए गए हैं.

रिपब्लिकन पार्टी की सत्ता वाले राज्यों का कहना है कि फ़र्ज़ी मतदान रोकने के लिए कुछ प्रतिबंध ज़रूरी हैं, वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि ऐसा वोटरों को मतदान से वंचित रखने के लिए किया जा रहा है.

इसका चुनाव पर क्या असर हो सकता है?

जल्द मतदान का सबसे बड़ा प्रभाव ये होगा कि कुल मतदान प्रतिशत बढ़ जाएगा.

प्रोफ़ेसर मैकडोनल्ड ने समाचार एजेंसी रायटर्स से कहा है कि इस बार 15 करोड़ से अधिक मतदाता वोट डाल सकते हैं यानी 65 प्रतिशत से अधिक मतदान हो सकता है जो 1908 के बाद से अब तक का सबसे ज़्यादा होगा.

प्रोफ़ेसर मैकडोनल्ड के जुटाए डाटा से संकेत मिलता है कि पोस्ट के ज़रिए आ रहे मतपत्र डेमोक्रेट पार्टी की बहुमत की ओर इशारा करते हैं.

हालांकि ये इस बात का विश्वस्नीय संकेत नहीं है कि अंत में कौन चुनाव जीतेगा.

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राष्ट्रपति ट्रंप ने इसी साल पोस्टल बैलट के ख़िलाफ़ अभियान शूरू किया था. उन्होंने तर्क दिया था कि पोस्ट के ज़रिए मतदान को बढ़ाना अब तक के सबसे भ्रष्ट चुनाव की वजह बन सकता है.

उन्होंने कहा था कि इस व्यवस्था के तहत लोग एक से अधिक बार मतदान कर पाएंगे.

पोस्ट के ज़रिए मतदान के प्रति ट्रंप की नाराज़गी उनके समर्थकों को मतदान के अंतिम दिन का इंतेज़ार करने के लिए प्रेरित कर सकती है.

अभी तक पोस्ट के ज़रिए मतदान से बड़े पैमाने पर फ़र्ज़ीवाड़ा होने के कोई संकेत या सबूत नहीं मिले हैं. हक़ीक़त ये है कि अमरीका में 2017 में हुए एक शोध के मुताबिक़ मतदान में फ़र्ज़ी वोटों की संख्या 0.00004% से 0.0009% तक है. ये शोध ब्रेनन सेंटर फ़ॉर जस्टिस ने किया था.

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