बेरूत धमाके से लेबनान में तबाही या तबाही से धमाका!

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- Author, संदीप सोनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
4 अगस्त की शाम बेरूत में हुए ज़बरस्त धमाके में 200 से ज़्यादा लोग मारे गए. छह हज़ार से ज़्यादा लोग घायल हुए और लगभग तीन लाख लोग बेघर हो गए.
धमाके की वजह थी 2750 टन अमोनियम नाइट्रेट, जिसे बेरूत बंदरगाह के पास एक इमारत में स्टोर करके रखा गया था. धमाके की गूँज बेरूत से सैकड़ों किलोमीटर दूर तक सुनाई पड़ी.
दिल दहलाने वाला ये धमाका बेरूत में ऐसे समय हुआ, जब लेबनान भयंकर आर्थिक और राजनीतिक संकट से पहले से ही जूझ रहा था.
भूख, ग़रीबी और महंगाई से लेबनान के लोग पहले से ही परेशान हैं.
कई लोगों का मानना है कि तबाही की वजह बेरूत का धमाका नहीं है, बल्कि, लेबनान की तबाही की वजह से बेरूत में धमाका हुआ.
'पेरिस ऑफ़ द मिडिल ईस्ट'

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"उस समय मैं ब्रिज के ऊपर ड्राइव कर रही थी. मुझे लगा कि ब्रिज गिर गया तो क्या होगा. मैंने बुरी से बुरी हर वो कल्पना कर ली, जो उस समय हो सकती थी."
ये हैं बेरूत में रहने वाली लीना मौंज़ा, जो पेशे से लेखिका और अनुवादक हैं.
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4 अगस्त के धमाके के बाद बेरूत में लोग अभी भी सदमे में हैं, जिसे लीना इन शब्दों में बयाँ करती हैं.
"ऐसा महसूस होता है कि खड़े होने के लिए पैरों के नीचे कोई ठोस जगह नहीं है. ऐसा लगता है कि धरती लगातार हिल रही है, ठीक वैसे ही जैसे भूकंप के बड़े झटके के बाद धरती में कंपन होता रहता है."

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बंदरगाह पर बेहद ख़तरनाक रसायन के विशाल भंडार के बारे में अधिकारियों को कई वर्षों से बताया जा रहा था, लेकिन उनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगी.
लीना मौंज़ा कहती हैं, "हम जानते हैं कि इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है. हम जानते हैं कि उन्हें इसकी कोई सज़ा नहीं मिलने वाली. हम ये भी जानते हैं कि हमें इन्हीं हालात में रहना होगा. चुपचाप, बिना कोई शिकायत किए."
लेबनान में सरकार के ख़िलाफ़ लोगों की शिकायतों की सूची बहुत लंबी है और लापरवाही की सारी हदें जब पार हो जाती हैं, बेरूत का धमाका मानो कुंभकर्ण को नींद से जगाने की कोशिश करता है.
कई सालों से लेबनान की सरकार देश के लोगों को कचरे की सफ़ाई और बिजली की भरोसेमंद आपूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक मुहैया नहीं करा पा रही है.

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लीना मौंज़ा के मुताबिक़, "लंबे समय से हमारे पास कोई बुनियादी ढाँचा ही नहीं है, कोई ढंग का इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड नहीं है, कोई सीवेज़ सिस्टम नहीं है. सरकारी सेवाएँ बड़ी बेकार हैं. हम उसी काम के लिए प्राइवेट पार्टी को भी पैसा देते हैं."
"बिजली का एक बिल सरकार की तरफ़ से आता है, दूसरा बिल जेनरेटर के लिए भरना पड़ता है. पानी के भी दो बिल आते हैं- एक म्यूनिसिपालिटी से और दूसरा जब हम अलग से पानी ख़रीदते हैं क्योंकि म्यूनिसिपालिटी के पानी से ज़रूरतें पूरी नहीं होतीं."
कचरा-प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं होने का नतीजा ये है कि लेबनान के समुद्री किनारे कचरे से भरे पड़े हैं और नालों का गंदा पानी सीधे समुद्र में छोड़ा जाता है.

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लीना बताती हैं कि लग्ज़री बीच रिज़ॉर्ट बनाने वालों ने जब एक ऐसे ही नाले का मुँह बंद किया, तो सड़कें बदबू मारते पानी में डूब गईं.
वो कहती हैं- अगली बार जब बारिश हुई, तो नाले सड़कों पर फट पड़े, सड़कों पर नाले का पानी, नदी की तरह भर गया. लापरवाही और उपेक्षा की ऐसी कई कहानियाँ हैं, जो चारों तरफ़ बिखरी पड़ी हैं, कोई उनकी सुध नहीं लेता जब तक कि बेरूत जैसा धमाका ना हो जाए.
उपेक्षा का साया देश की अर्थव्यवस्था पर भी साफ़ नज़र आता है.
लेबनान, दुनिया के उन देशों में से एक है, जिसके सिर पर भारी क़र्ज़ है. बीते कुछ महीनों में लेबनीज़ पाउंड की वैल्यू 80 प्रतिशत तक गिर गई. नतीजा ये हुआ कि खाने-पीने की चीज़ों के दाम आसमान छूने लगे.
लेबनान का मिडिल क्लास, अचानक ग़रीब हो गया और जो पहले से ग़रीब थे, वो अब पूरी तरह से वंचित हो गए और आत्महत्याएँ करने लगें.

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हताशा के इस चरम पर बेरूत बंदरगाह में दिल दहलाने वाला धमाका हुआ. उसी बेरूत में जिसे कुछ दशकों पहले तक 'पेरिस ऑफ द मिडिल ईस्ट' कहा जाता था.
तो फिर ये देश अचानक गर्त में कैसे चला गया. कुछ सवालों के जबाव शायद अतीत में मिलें, जब लगभग 80 साल पहले ये देश आज़ाद हुआ था.
राजनीतिक प्रणाली

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"लेबनान में आख़िर क्या ग़लत हुआ, क्या गड़बड़ हुई, इस सवाल का जबाव वहाँ के पॉलिटिकल सिस्टम में छिपा हुआ है, जो अपने नागरिकों की परवाह नहीं करता, जो सिर्फ़ अपने शासकों के निजी हितों के हिसाब से काम करता है."
ये मानना है लीना ख़तीब का, जो लंदन में थिंक टैंक, चैटम हाउस में 'मिडिल ईस्ट एंड नॉर्थ अफ़्रीका' प्रोग्राम की डायरेक्टर हैं.
लीना ख़तीब बताती हैं कि समस्या की शुरुआत साल 1943 से होती है, जब फ़्रेंच मैंडेट के बाद एक स्वतंत्र देश के रूप में लेबनान अस्तित्व में आया.
लेबनान का राजनीतिक नेतृत्व ईसाई, शिया मुस्लिम और सुन्नी मुस्लिमों में बँटा हुआ है. देश का संविधान हर समुदाय के लिए अधिकारों की गारंटी देता है.

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लीना ख़तीब बताती हैं, "लेकिन गुज़रते वक़्त के साथ लेबनान की सत्ता में साझेदारी की, संविधान की जो मंशा थी, वो मतभेदों की गहरी खाई में डूब गई. मतभेद अलग-अलग मज़हबों में ही नहीं था, बल्कि नेताओं और नागरिकों में भी बड़े पैमाने पर अलगाव दिखा. राजनीतिक प्रणाली स्थायित्व के बजाए अस्थायित्व की वजह बनी."
लीना ख़तीब का मानना है कि सांप्रदायिक तनाव की वजह से साल 1975 में सिविल वॉर की नौबत आ गई, जिसमें इसराइल, सीरिया और ईरान ने भी अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई.

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15 साल चले संघर्ष के बाद एक नया राजनीतिक समझौता हुआ, जिसमें देश की सत्ता को मान्यता प्राप्त 18 मज़हबी संप्रदायों में बाँट दिया गया. लेकिन इसमें भी ज़िम्मेदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकी.
लीना ख़तीब कहती हैं, "कल्पना कीजिए उस देश की, जहाँ सत्ता में मौजूद लोग सत्ता का इस्तेमाल करके सारे संसाधन चुनिंदा लोगों पर ख़र्च कर दें, इससे देश का तो भला होने से रहा. पहले ये होता था कि वो पैसा चुराते थे, लेकिन देश के लिए भी कुछ कर देते थे. लेकिन समय के साथ उनका लालच इतना बढ़ गया कि अब वो सिर्फ़ अपने लिए करना चाहते हैं."

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लीना ख़तीब का मानना है कि लेबनान में भ्रष्टाचार ने अपनी चरम सीमा को छू लिया है, जिसका उदाहरण पानी है.
"लेबनान अब कोई रेगिस्तान नहीं है. लेबनान में पहाड़ हैं, जहाँ बर्फ गिरती है, नदियाँ बहती हैं. जहाँ पानी की कोई कमी नहीं है. लेकिन कुछ नेताओं ने जानबूझकर पानी की कमी पैदा कर दी है, उनके टैंकर पानी बेच रहे हैं, उन इलाक़ों में जहाँ पानी की सप्लाई बंद कर दी गई है. लोगों के पास पानी ख़रीदने के सिवा कोई विकल्प नहीं है."
लेकिन लेबनान में जब चुनाव होते हैं, तब वहाँ की जनता ऐसे नेताओं को अपने वोट के ज़रिए सबक क्यों नहीं सिखाती?
लीना ख़तीब इस सवाल पर कहती हैं, "दिक़्क़त ये है कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीक़े से नहीं होते. साल 2018 के चुनाव में संसद की 128 सीटों में से केवल एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत पाया था. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि चुनाव में जमकर धांधली हुई."
ऐसे में लेबनान के लोगों के पास सिर्फ़ एक विकल्प बचता है और वो विकल्प है- विरोध में आवाज़ बुलंद करना.
हवा की दिशा

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"धमाके के बाद लोग सड़कों पर उतरे, बदले में उन पर आँसू गैस के गोले दागे गए और गोलियाँ चलाई गईं."
ये दावा है बेरूत में रहने वाली क़मर जहां का, जो पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एसोसिएट प्रोफ़ेसर होने के साथ-साथ पब्लिक एक्टिविस्ट भी हैं.
क़मर जहाँ सरकार विरोधी प्रदर्शन में शामिल रही हैं, इसलिए सरकार के रवैए को भली-भांति जानती हैं.
वो बताती हैं, "हम सड़कों पर उतरे थे साथ मिलकर शोक मनाने के लिए, लेकिन उन्होंने इसका जबाव हमें पीटकर दिया. उन्होंने हमें संसद की ख़ाली इमारत के बाहर भी प्रदर्शन नहीं करने दिया. उन्होंने हमें फ़ूड और मेडिसिन देने के बजाए आँसू गैस के गोले दिए."

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लेबनान में पिछले कुछ वर्षों में सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के दौरान विरोध के स्वर मुखर हुए हैं.
लेबनान में जब कचरे के ढेर पहाड़ की शक्ल लेने लगे, तो साल 2015 में पूरा देश हैशटैग यू स्टिंक के बैनर तले एकजुट हुआ.
क़मर जहां बताती हैं, "हम सड़कों पर ये कहने के लिए उतरे कि सरकार से बदबू आती है. नेताओं से बदबू आती है, क्योंकि वो कचरा तक साफ़ नहीं करवा पाते है. इस विरोध के पीछे कई वजहें थी, क्योंकि सिस्टम ही ऐसा है, जिससे लोगों को बहुत परेशानी होती है. इस प्रदर्शन में हर वर्ग के लोग ये कहते हुए शामिल हुए कि लेबनान एक उदार अर्थव्यवस्था थी, जिसे सिस्टम ने बर्बाद कर दिया."

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लेकिन साल 2015 के विरोध प्रदर्शन से भी लेबनान की राजनीतिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया. साल 2019 में सरकार ने मोबाइल मैसेजिंग टूल वॉट्सऐप के इस्तेमाल पर टैक्स लगाकर अपनी अर्थव्यवस्था की टूटी कमर, सही करना चाही.
क़मर जहां के मुताबिक़, "वॉट्सऐप पर टैक्स लगाया तो लगा कि बस, अब बहुत हो गया. सारी दुनिया जिसे ओपन स्पेस, ओपन प्लेटफ़ॉर्म मान रही है, आप उसी का अतिक्रमण कर रहे हैं. लोग कहने लगे कि ये तो हद हो गई."

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साल 2019 के इस विरोध प्रदर्शन को अक्तूबर रिवोल्यूशन कहा गया, जो लेबनान की आज़ादी के बाद देश में हुआ अब तक का सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन था. लोग अपने देश के लिए एक नई राजनीतिक व्यवस्था की मांग कर रहे थे.
क़मर जहां के मुताबिक़, "सरकार की प्रतिक्रिया तीन तरह से आई, जैसा कि हर निरंकुश सरकार करती है. पहले तो उन्होंने कहा कि अरे, जो आपकी मांग है, वही तो हम चाहते हैं. फिर उन्होंने हवा का रुख़ बदलना चाहा, ये कहते हुए कि अभी सब अस्त-व्यस्त है, जब शांति होगी तो सब ठीक हो जाएगा. तीसरा काम था दमन करो, इसलिए लोगों को हिरासत में लिया गया उन्हें मारा-पीटा गया. हर निरंकुश सरकार के यही तौर-तरीक़े होते हैं."
फिर लगातार ख़स्ताहाल होती अर्थव्यवस्था ने नौबत यहाँ तक ला दी कि लेबनान में आम लोगों के लिए दो वक़्त की रोटी नसीब होना मुश्किल हो गया. जब साल 2020 आया, कोरोना महामारी एक नई त्रासदी बनकर मुँह बाए खड़ी थी.

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क़मर जहां का मानना है कि लेबनान की बेहतरी के लिए राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन ज़रूरी है. हालांकि लेबनान की सरकार इस्तीफ़ा दे चुकी है, लेकिन दशा बदलने के लिए हवा की दिशा बदलना भी ज़रूरी है.
करो या मरो
"लेबनान के लिए ये निश्चित तौर पर एक टर्निंग प्लाइंट है, जो असल में करो या मरो वाली बात है."
ये मानना है कि माहा याहया का, जो कार्नेगी मिडिल ईस्ट सेंटर की डायरेक्टर हैं और बेरूत में ही रहती हैं.
वो कहती हैं, लेबनान के ज़्यादातर नागरिक एक स्वतंत्र सरकार चाहते हैं, जिस पर भरोसा भी किया जा सके. नई सरकार से देश की अर्थव्यवस्था को संकट से उबारने की भी उम्मीद होगी, ताकि लगे कि देश पटरी पर लौट रहा है.

धमाके के दो दिन बाद फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने नुक़सान का ज़ायज़ा लेने के लिए बेरूत का दौरा किया. उन्होंने लेबनान के लिए आर्थिक मदद का भरोसा दिलाया है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक व्यवस्था में सुधार को एक बड़ी शर्त बताया.
लेबनान के ज़्यादातर लोग तो यही चाहेंगे कि राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े मौजूदा वर्ग को पूरी तरह से हटा दिया जाए, लेकिन इतनी जल्दी ये मुमकिन नहीं. वैसे साल 2021 में चुनाव होने की उम्मीद है. लेकिन उस संविधान का क्या, जिसने लेबनान के मौजूदा शासन-व्यवस्था की नींव रखी थी.
माहा याहया कहती हैं कि गृह युद्ध ख़त्म होने के बाद साल 1990 में हुए ताएफ़ एग्रीमेंट में कोई दिक़्क़त नहीं है, परेशानी तो इस बात में है कि इस एग्रीमेंट को कभी ठीक से लागू नहीं किया गया. वरना लेबनान में राजनीतिक सांप्रदायिकता और उससे जुड़ा भ्रष्टाचार कभी पनप ही नहीं पाता.

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लेबनान की चर्चा हिज़्बुल्लाह के बिना अधूरी है, जो देश में शियाओं की नुमाइंदगी करने वाली दो प्रमुख पार्टियों में से एक है.
देश के अधिकतर हथियारों पर हिज़्बुल्लाह का नियंत्रण है. बेरूत बंदरगाह भी एक तरह से हिज़्बुल्लाह के पास है. हिज़्बुल्लाह के सिर पर ईरान का हाथ रहा है और दुनिया के कई देश उसे चरमपंथी संगठन के तौर पर देखते हैं.
माहा याहया के मुताबिक़, हिज़्बुल्लाह और उसके हथियारों का मुद्दा क्षेत्रीय स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है. लेबनान के लोग इसमें कुछ नहीं कर सकते, ना ही उनसे इसकी उम्मीद की जाती है.

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माहा याहया का मानना है कि लेबनान को अपने अतीत में झाँककर, अपने अंतरराष्ट्रीय महत्व का फ़ायदा उठाना चाहिए.
माहा याहया कहती हैं, "तुर्की और रूस के लिए लेबनान एक तरह से सीरिया का ही विस्तार है. तुर्की और रूस, लेबनान में अपना असर और नेटवर्क बढ़ा रहे हैं. लेबनान को कई संस्कृतियों के चौराहे के तौर पर देखा जाता है. ये एक कॉस्मोपॉलिटन सोसाइटी है, जहाँ पहचान की बुनियाद पर ही अब ध्रुवीकरण नज़र आता है. लेबनान को एक ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है जो फ़ेल नहीं हुआ है."
लेबनान की ज़्यादातर आबादी पढ़ी-लिखी है. कारोबार यहाँ लोगों की रगों में है. यही वजह है कि लेबनान मिडिल ईस्ट के लिए एक अहम कॉमर्शियल हब रहा है.
लेकिन सीरिया और इसराइल की सीमाओं की वजह से इसे बेवजह मिडिल ईस्ट के संघर्षों का केंद्र भी बनना पड़ा.
फ़िलहाल लेबनान की असली लड़ाई अपने नेताओं से और मौजूदा शासन-व्यवस्था से है, जिसकी जड़ें गहरी हैं. लेकिन इतिहास ने पहले भी ख़ुद को बदला है और लेबनान अब उसी बदलाव की बाट जोह रहा है.
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