कोरोना संकट: चीनी विदेश मंत्री का पहला यूरोप दौरा, क्या हैं मायने

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
चीन के विदेश मंत्री वांग यी फ़रवरी में कोरोना संकट के वैश्विक महामारी बनने के बाद अपने पहले विदेश दौरे में बुधवार को नीदरलैंड्स पहुंचे. वहाँ प्रधानमंत्री मार्क गट के साथ मुलाक़ात के दौरान दोनों नेताओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के क़दमों के साथ-साथ 'एकपक्षीयता' यानी एकतरफ़ा तरीक़े से लिए गए फ़ैसलों पर चर्चा की.
चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने वांग यी के हवाले से कहा है चीन उम्मीद करता है कि वो नीदरलैंड्स के साथ मिलकर मुक्त व्यापार और उस वातावरण को मज़बूत कर सकेगा जिसमें सब मिलकर फ़ैसला कर सकें.
नीदरलैंड्स के पहले वांग यी इटली में थे और चीन के विदेश मंत्रालय के अनुसार, अपने हफ़्ते भर की यात्रा में वो पश्चिमी यूरोप के तीन और देशों नार्वे, फ्रांस और जर्मनी भी जाएंगे.
25 अगस्त से शुरु हुई यात्रा पहली सितंबर तक जारी रहेगी.
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी मानते हैं कि अमरीका जिस तरह सामरिक और आर्थिक क्षेत्र में एशियाई देश को लगातार किनारे करने की कोशिश कर रहा है, उसे देखते हुए चीनी विदेश मंत्री की इस यात्रा को यूरोपीय देशों में पहले से बने रिश्तों को धार देने और मज़बूत व स्थायी सहयोगियों का एक ब्लॉक तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है.
नेपाल के त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी कहते हैं कि चीन उस क्षेत्र में कुछ समय से ठप्प पड़ी अपनी परियोजनाओं को भी फिर से आगे बढ़ाना चाहता है.
वर्तमान में भी एक दूसरे के सबसे बड़े व्यापारिक सहयोगी अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक हितों की रक्षा, चीन के बढ़ते वैश्विक आर्थिक प्रभाव और दक्षिणी चीन सागर में एशियाई देश की 'विस्तारवादी नीतियों' को लेकर ठन गई है.
अमरीकी चुनाव में चीन का मुद्दा
चीन से कोरोना की शुरूआत, फिर दुनिया भर में उसके फैलाव और नवंबर के अमरीकी राष्टपति चुनाव ने मामले को और उलझा दिया है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप न सिर्फ़ चीन के ख़िलाफ़ कई तरह के व्यापारिक फ़ैसले ले चुके हैं और चीनी कंपनियों पर बैन लग रहे हैं बल्कि विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडन को 'बीजिंग बाइडन' तक बुलाया जा रहा है, यानी वो जो चीन के साथ है.

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हालांकि अमरीका और चीन के बीच सोमवार को फिर से एक व्यापार समझौता हुआ है लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप चुनाव रैली में ये भी कह रहे हैं कि 'वो चीन से इस समय बात नहीं करेंगे.'
कुछ का ये भी कहना है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस मुद्दे को उठाकर कोरोना से लड़ाई में नाकामी और उनके कार्यकाल में अमरीकी अर्थवयवस्था की बदहाली जैसे मुद्दों पर पर्दा डालना चाहते हैं.
लेकिन बीबीसी की एशिया संवाददाता करिश्मा वासवानी का मानना है कि बीजिंग को इस बात की ग़लतफ़हमी नहीं कि चीन-विरोधी ये भावनाएं जल्द ख़त्म होंगी. और चीनी कंपनियों का कहना है कि चाहे वो ट्रंप शासन हो या बाइडन, ये दबाव कम नहीं होनेवाला.
कूटनीतिक मामलों की जानी मानी पत्रिका डिप्लोमैट की संपादक शैनन टेज़ी ने चीनी विदेश मंत्री की यूरोप यात्रा को 'असाधारण' बताया है.
कोरोना के बाद पहली विदेश यात्रा के लिए यूरोप को चुनने के सवाल पर ज़ाओ लिजियान ने कहा था कि 'ये साबित करता है कि दोनों पक्ष चीन और यूरोप के संबंधों को कितना अहमियत देते हैं.'
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आगे कहा, "पूरे दौरे में चीन तीन लक्ष्य हासिल करना चाहता है - दोनों पक्ष सामंजस्य से राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को आगे बढ़ाएंगे; वायरस से लड़ाई में सहयोग को और मज़बूत करेंगे और साथ ही विश्व के औद्योगिक क्षेत्र के लिए सामानों की आवाजाही को सुगम करेंगे, और नए क्षेत्रों जैसे डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था पर और बातचीत करेंगे. साथ ही साझा तौर पर संदेश देंगे कि वो मिलकर सामूहिक तौर पर फ़ैसले लेने के माहौल को बढ़ावा देते हैं जिससे विश्व में शांति, स्थायित्व और विकास की शुरुआत होगी.
अमरीका का विकल्प
जानकार मानते हैं कि इस बयान में अगर अमरीका से रिश्ते ख़राब होते हैं तो चीन के पास कुछ दूसरे राजनयिक विकल्प की तलाश और ख़ुद को विश्व की बेहतरी के लिए काम करनेवाले के तौर पर पेश करने का अर्थ निहित है.

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वांग यी से मुलाक़ात के बाद इटली के विदेश मंत्री लुइज़ी डे मेयो ने रोम में पत्रकारों से कहा कि दोनों के बीच 'मुलाक़ात बहुत लाभप्रद रही' और इस बात पर चर्चा हुई कि आर्थिक और औद्योगिक दृष्टिकोण से हमारी कूटनीतिक साझेदारी को कैसे पुन: स्थापित किया जाए.
विश्व के सात विकसित देशों में से इटली पहला मुल्क है जिसने बेल्ट एंड रोड इनेशियेटिव या बीआरआई प्रोजेक्ट को लेकर चीन के साथ समझौता किया है.
सिल्क रोड और समुद्री मार्गों को मिलाकर तैयार किया गया चीन का ये प्रोजेक्ट एशिया को यूरोप और अफ़्रीक़ा से जोड़ना चाहता है.
मार्च में इटली के इस परियोजना में शामिल होने के बाद जर्मनी ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है और इस बाबत पिछले साल सितंबर में बेजिंग में बैठक दोनों मुल्कों के अधिकारियों की बैठक भी हुई थी.
भारत हालांकि बीआरआई का हिस्सा नहीं लेकिन उसके कई पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश इस परियोजना के सहभागी हैं.
शैनन टेज़ी हालांकि मानती हैं कि चीन के लिए यूरोपीय देशों में भी बहुत बड़ी सफ़लता हासिल करना आसान नहीं होगा क्योंकि वो सभी कोरोना की उत्पत्ति को लेकर उसपर कई तरह के इल्ज़ाम लगाते हैं.
वो 5-जी और हुवेई के मामले पर ब्रिटेन और फ्रांस के हालिया फ़ैसलों का भी ज़िक्र करती हैं जिसमें दोनों ने भविष्य में इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी है.
यूरोपीय देशों में एक बड़ा मुद्दा चीन के शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों के कथित मानवधिकार हनन और हांगकांग में उठाये गए उसके क़दमों का भी है.
नीदरलैंड्स के विदेश मंत्री स्टेफ़ ब्लाक और इटालियन विदेश मंत्री डे मेयो ने इन मामलों को चीनी विदेश मंत्री के साथ चर्चा में उठाया भी.
प्रोफ़ेसर पुष्प अधिकारी नीदरलैंड्स और नॉर्वे को वांग यी के पहले दौरे का हिस्सा बनाये जाने के सवाल पर कहते हैं कि ये देश मानवाधिकार के मामलों को हाल के सालों में बार-बार उठाते रहे हैं.
लेकिन प्रोफ़ेसर अधिकारी मानते हैं कि अक्सर मुल्क़ मानवाधिकार के मुद्दों और व्यापारिक हितों को अलग-अलग साधते दिखे हैं.
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