You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कोरोना: अमरीका में प्लाज़्मा थेरेपी से घटेगी मृत्यु दर, क्या कहते हैं भारत के आँकड़े?
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना वायरस से सबसे बुरी तरह जूझ रहे अमरीका ने इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी को मंज़ूरी दे दी है.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस में प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके बताया कि आपात स्थिति में बीमार मरीज़ों के इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी को फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मंज़ूरी दे दी है. उन्होंने कहा कि इससे कई ज़िंदगियां बचाई जा सकेंगी.
ट्रंप ने कहा कि शोध में पाया गया है कि प्लाज़्मा थेरेपी के ज़रिए मृत्यु दर को 35 फ़ीसदी तक कम किया जा सकता है. उन्होंने बताया कि अमरीका में अब तक 70 हज़ार से ज़्यादा लोगों को प्लाज़्मा दिया गया है.
ट्रंप ने इसे कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में एक ऐतिहासिक घोषणा बताया और कहा कि वो बहुत पहले ही ये करना चाहते थे, क्योंकि ये एक 'पावरफुल थेरेपी' है, लेकिन व्हाइट हाउस के कोरोना टास्क फोर्स के सदस्य डॉ एंथनी फाउची समेत कई विशेषज्ञों ने इस तरह के उपचार में सीमित अध्ययन पर चिंता जताई है.
अमरीका में प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल को ऐसे वक़्त में मंज़ूरी दी गई है जब वहां इस बीमारी से 1.76 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. मौतों के बढ़ते आंकड़े को लेकर डोनाल्ड ट्रंप लगातार अमरीकी जनता की नाराज़गी झेल रहे हैं. लेकिन अब ट्रंप सरकार का प्लाज़्मा थेरेपी पर लगाया ये दांव वहां के आम लोगों को कितना फायदा देगा और ये वहां मृत्यु दर को कम करने में कितनी मददगार हो सकता है, ये समझने के लिए उन देशों पर नज़र डाली जा सकती है, जहां पहले से प्लाज़्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है.
इनमें भारत भी है. जहां बहुत पहले से कोविड-19 से पीड़ित मरीज़ों को ठीक करने के लिए प्लाज़्मा थेरेपी की मदद ली जा रही है.
भारत में प्लाज़्मा थेरेपी
भारत में प्लाज़्मा थेरेपी अबतक कितनी कामयाब रही है, कोविड मरीज़ों को इससे कितनी मदद मिल सकी है. ये जानने के लिए हमने भारत में प्लाज़्मा थेरेपी पर काम कर रहे कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञों से बात की.
राजधानी दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंस (आईएलबीएस) के डॉ. एसके सरीन कहते हैं कि भारत में कोविड -19 के मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी से मदद बिल्कुल मिली है, लेकिन ऐसा कहना मुश्किल है कि इससे मृत्यु दर में कमी हुई है, क्योंकि अबतक ऐसा कोई पब्लिश डेटा नहीं है.
भारत के कई हिस्सों में कोविड19 के इलाज के तौर पर प्लाज़्मा थेरेपी के ट्रायल चल रहे हैं. डॉ सरीन के मुताबिक़, उनकी संस्था ने जो शुरुआती ट्रायल किया था, उनके परिणामों में 'मृत्यु दर में कमी नहीं देखी गई थी. लेकिन लोगों के हॉस्पिटल स्टे और बीमारी की तीव्रता में कमी ज़रूर आई थी. साथ ही उनकी ऑक्सीजन रिक्वायरमेंट में और रेस्पिरेटरी रेट, ऑर्गन फेलियर में कमी आई.'
हालांकि उस स्टडी में सिर्फ 29 मरीज़ों ने हिस्सा लिया था. वो भारत में अपने तरह की पहली स्टडी थी. इसके बाद भारत में कई बड़े स्तर पर प्लाज़्मा थेरेपी के ट्रायल हुए, लेकिन डॉ सरीन के मुताबिक़, अभी भी कोई ऐसी स्टडी नहीं है जिसमें ये मृत्यु दर के मामले में इतनी फायदेमंद हो.
डॉक्टर सरीन कहते हैं कि अभी ये कहना मुश्किल है कि प्लाज़्मा थेरेपी साइंटिफिक कसौटी पर उतर गई है.
इस महीने की शुरुआत में एम्स के डायरेक्टर डॉ रणदीप गुलेरिया ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा था कि कोविड19 मरीज़ों पर कोनवेलेसेंट प्लाज्मा के इस्तेमाल से मृत्यु दर कम करने में कोई स्पष्ट फायदा नहीं देखने को मिला. ये ट्रायल कोविड19 के 30 मरीज़ों पर किया गया था.
भारत में कहाँ कहाँ है प्लाज़मा बैंक
आईएलबीएस में भारत का पहला प्लाज़्मा बैंक भी बनाया गया था. जिसमें हर वक़्त क़रीब 900 यूनिट प्लाज़्मा मौजूद रहने का दावा किया जाता है. इसके बाद दिल्ली के लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल में भी एक प्लाज़्मा बैंक बनाया गया. इसके बाद तमिलनाडु के कोयम्बटूर, तेलंगाना के हैदराबाद में, हरियाणा के गुरुग्राम, उत्तर प्रदेश के नोएडा में, मणिपुर समेत कई जगहों पर कोविड-19 के मरीज़ों को प्लाज़्मा की आपूर्ति करने की कोशिश के तहत प्लाज़्मा बैंक बने.
दिल्ली के लोक नायक जय प्रकाश अस्पताल यानी एलएनजेपी में भी मरीज़ों को प्लाज़्मा थेरेपी दी जा रही है. वहां इस वक़्त प्लाज़्मा थेरेपी के दो बड़े ट्रायल भी चल रहे हैं.
एलएनजेपी में प्लाज़्मा ट्रायल के प्रिंसिपल इंवेस्टिगेटर और अस्पातल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट डॉक्टर सुरेश कुमार प्लाज़्मा थेरेपी की प्रगति को लेकर संतुष्ट हैं.
वो कहते हैं कि भारत में प्लाज़्मा थेरेपी से काफ़ी मदद मिली है. डॉक्टर सुरेश कुमार कहते हैं कि 'हमारे यहां के अबतक के डेटा से दिखा है कि जिसको प्लाज़्मा दिया गया उसे मोर्टेलिटी बेनेफिट हुआ है.'
हालांकि ये मोर्टेलिटी बेनेफिट कितना है इसके सटीक आंकड़े वो कहते हैं कि उनके पास नहीं है. डॉक्टर सुरेश ने कहा कि एलएनजेपी में इस वक़्त 200 मरीज़ों को लेकर एक स्टडी चल रही है. जिसके विश्लेषण के बाद सटीक आकड़े बता सकेंगे.
- ये भी पढ़ें: कोरोना वायरस: प्लाज़्मा थेरेपी क्यों है ख़तरनाक?
प्लाज़्मा थेरेपी से किन लोगों को मिल रही मदद
डॉक्टर सरीन कहते है कि सबसे पहले ये समझना ज़रूरी है कि प्लाज़्मा थेरेपी एक सपोर्टिव थेरेपी है. इसे स्टैंडर्ड थेरेपी यानी कोरोना वायरस ठीक करने के पुख्ता इलाज के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक़, प्लाज़्मा थेरेपी के लिए सही मरीज़ों का चुनाव सबसे अहम होता है.
और मरीज़े को कोविड19 से पहले ही रिकवर हो चुके व्यक्ति का प्लाज़्मा दिया जाता है. इस प्लाज़्मा को उनके खून से अलग करके निकाला जाता है.
कोविड से ठीक हो चुके व्यक्ति के खून में कोरोना वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी विकसित हो जाती है. ये एंटीबॉडी वायरस को न्यूट्रलाइज़ करके शरीर में उसके लेवल को थाम सकती है.
डॉक्टर सरीन के मुताबिक़, प्लाज़्मा देना उस वक़्त फायदेमंद हो सकता है जब वायरस शरीर में ज़्यादा मल्टीप्लाई कर रहा हो.
'हां, लेकिन अगर लंग इंजरी हो गई है. मरीज़ वेंटिलेटर पर चला गया है. किडनी, हार्ट में गड़बड़ हो गई है तो तब इसके लिए बहुत देर हो चुकी होती है.'
वहीं डॉक्टर सुरेश बताते हैं कि 'सबसे ज़्यादा फायदा मॉडरेट केटेगरी के मरीज़ों में होता है. साथ ही मरीज़ में कोई और बीमारी ना हो, मान लीजिए किडनी फेलियर नहीं है. साथ ही जो मरीज़ 70 साल से कम उम्र के हैं, उन्हें ज़्यादा फायदा होता है.'
साथ ही वो कहते हैं, 'लेकिन हमने अपनी स्टडी में देखा है कि जिन मरीज़ों को मल्टी ऑर्गन डिस्फंक्शन होता है और जो पहले से वेंटिलेटर पर हैं, उन्हें फायदा होने की संभावना कम होती है.'
क्या प्लाज़्मा थेरेपी से घटती है मृत्यु दर?
स्वास्थ्य विशेज्ञषों का कहना है कि अगर मरीज़ का सही चुनाव किया जाए तो इससे हॉस्पिटल स्टे की अवधि को कम किया जा सकता है और इससे बीमारी की तीव्रता को कम करने में भी मदद मिल सकती है.
अमरीका में यूएस फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए ने पहले भी करोना के मरीज़ों के कुछ 'विशेष परिस्थितियों' में शर्तों के साथ प्लाज़्मा देने की मंज़ूरी दी थी. जैसे जो गंभीर रूप से बीमार हैं या क्लीनिकल ट्रायल में हिस्सा ले रहे हैं.
अब एफडीए ने 'इमरजेंसी इस्तेमाल'की अनुमति दी है. ये मंज़ूरी ये कहते हुए दी गई है कि शुरुआती रिसर्च बताती हैं अगर अस्पताल में भर्ती होने के पहले तीन दिनों में ब्लड प्लाज़्मा दिया जाए तो मृत्यु दर में कमी हो सकती है और मरीज़ की सेहत सुधर सकती है. हालांकि इसके असर को साबित करने के लिए और ट्रायल की ज़रूरत है.
प्लाज़्मा थेरेपी के रिस्क
प्लाज़्मा थेरेपी के इस्तेमाल के अपने रिस्क भी हो सकते हैं. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों कहना है कि सही प्रोटोकॉल अपनाया जाए और हॉस्पिटल की सही निगरानी में सब हो तो ख़तरा नहीं है.
डॉक्टर सुरेश के मुताबिक़, एक हज़ार में से किसी एक मरीज़ को कोई एलर्जिक रिएक्शन हो सकता है, लेकिन मोटे तौर पर ये थेरेपी सुरक्षित है.
वहीं डॉक्टर सरीन कहते हैं कि अमरीका के एफडीए ने प्लाज़्मा थेरेपी को मंज़ूरी दी है. एफडीए बहुत सख़्त है और उसने सोच समझकर ही ये किया होगा. इसलिए कोविड के लिए इसे एक बहुत पॉज़िटिव अप्रोच की तरह देखना चाहिए.
एफडीए ने कहा है कि उपचार हासिल करने वाले 20 हज़ार मरीज़ों की समीक्षा कर वो इस नतीजे पर पहुंची की ये थेरेपी सुरक्षित है.
इस बीच अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपील करते हुए कहा कि जो लोग कोरोना वायरस से ठीक हो चुके हैं वो प्लाज़्मा डोनेट करने के लिए ख़ुद को रजिस्टर करें.
इंफेक्शियस डिजीज सोसायटी ऑफ अमरीका ने एक बयान में कहा है, 'कुछ सकारात्मक संकेत मिले हैं कि कोनवेलेसेंट प्लाज्मा कोविड-19 के मरीज़ों को मदद कर सकता है, लेकिन कोविड-19 के उपचार में उपयोगिता को समझने के लिए कंट्रोल्ड ट्रायल डेटा की कमी है.'
वहीं जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में मेडिसिन कि एक प्रोफेसर जॉनाथन रेनर इसे एक "राजनीतिक स्टंट" कहते हैं.
उन्होंने ट्विटर पर लिखा, कोनवेलेसेंट प्लाज्मा में कुछ क्षमता हो सकते हैं, लेकिन हमें निश्चित डेटा की ज़रूरत होगी."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)