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कोरोना वायरस: प्लाज़्मा थेरेपी क्यों है ख़तरनाक?
- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
प्लाज़्मा थेरेपी को कोविड-19 के गंभीर मरीज़ों के लिए एक उम्मीद के तौर पर देखा गया. लेकिन मंगलवार को भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे लेकर चेतावनी दी है.
मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा कि इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं है कि प्लाज़्मा थेरेपी को कोविड-19 के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. ये अप्रूवड नहीं है और उन तमाम थेरेपी में से एक है, जिसके असर का फ़िलहाल पता लगाया जा रहा है.
उन्होंने चेताया कि प्लाज़्मा थेरेपी को अगर सही तरीक़े और सही गाइडलाइन के साथ इस्तेमाल ना किया जाए तो इससे जान को ख़तरा भी हो सकता है.
लव अग्रवाल ने कहा कि जब तक कोविड-19 के मरीज़ों पर इस थेरेपी का असर सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक इसके बारे में कोई भी दावा करना सही नहीं है. उन्होंने बताया कि आईसीएमआर फ़िलहाल इस थेरेपी पर एक स्टडी कर रहा है और प्लाज़्मा थेरेपी अभी एक्सपेरिमेंटल स्टेज में है.
दरअसल सबसे पहले दिल्ली के एक निजी अस्पताल ने 49 वर्षीय एक मरीज़ पर प्लाज़्मा थेरेपी की सफलता का दावा किया था.
'सकारात्मक' नतीजों के बारे में सुनकर देश के कुछ हिस्सों में प्लाज़्मा थेरेपी के ट्रायल शुरू हो गए. इसकी काफ़ी चर्चा होने लगी और कई प्लाज़्मा डोनर भी सामने आए.
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी रविवार को कहा कि कोरोना मरीज़ों पर प्लाज़्मा थेरेपी के अच्छे नतीजे आ रहे हैं और दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में एक गंभीर मरीज़ इससे काफ़ी बेहतर महसूस कर रहा है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अधिकारियों को निर्देश दिए कि वो इलाज के लिए प्लाज़्मा थेरेपी को प्रोत्साहित करें. लेकिन अब स्वास्थ्य मंत्रालय की चेतावनी के बाद सब चौकन्ने हो गए हैं.
प्लाज़्मा ख़तरनाक कैसे हो सकता है?
दरअसल प्लाज़्मा को डोनर के ख़ून से अलग किया जाता है. प्लाज़्मा में एंटीबॉडी होते हैं जो शरीर को वायरस से लड़ने में मदद करते हैं.
जयपुर स्थित सवाई मानसिंह अस्पताल में मेडिसिन डिपार्टमेंट के एक डॉक्टर कहते हैं, "ब्लड और ब्लड कॉम्पोनेन्ट को चढ़ाने के अपने ख़ुद के रिएक्शन के चांसेस भी होते हैं. आपने सुना ही होगा कि ख़ून चढ़ाने से किसी व्यक्ति की मौत हो गई."
"कोरोना के मरीज़ों पर इसका कितना फ़ायदा हो सकता है, ये तो हमें पता नहीं है. लेकिन इससे हो सकने वाले नुक़सान के बारे में हम कह सकते हैं. इसलिए क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही कोई भी दावा किया जा सकता है."
कोरोना मरीज़ों पर प्लाज़्मा थेरेपी के फ़ायदे के कुछ हालिया दावों के बारे में वो कहते हैं कि कई कोरोना मरीज़ तो ख़ुद भी ठीक हो रहे हैं. फ़िलहाल हम नहीं कह सकते कि वो मरीज़ ख़ुद ठीक हो रहे हैं या प्लाज़्मा थेरेपी के ज़रिए.
हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञ ये मानते हैं कि इस थेरेपी का उन मरीज़ों पर इस्तेमाल करके देखा जा सकता है, जो बहुत ज़्यादा गंभीर हैं और उनके पास कोई और विकल्प नहीं बचा है.
दिल्ली के प्राइवेट अस्पताल में भी ऐसा ही हुआ था. उन्हें आईसीएमआर से प्लाज़्मा थेरेपी की मंज़ूरी नहीं मिली थी. लेकिन मरीज़ के परिवार वालों की सहमति से कम्पैशनेट ग्राउंड, यानी अनुकंपा के आधार पर मरीज़ पर ये ट्रायल किया है और वो रिकवर हो गए.
'मरीज़ का चुनाव अहम'
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में मेडिसिन डिपार्टमेंट के वाइस चेयरमैन डॉ अतुल कक्कड़ कहते हैं कि किसी का भी प्लाज़्मा लेने के वक़त् कुछ चीज़ों का ख़ास ध्यान रखा जाना चाहिए.
कोविड-19 में इलाज से ठीक हुए लोग ही इस थेरेपी में डोनर बन सकते हैं. इस थेरेपी के लिए जारी दिशा-निर्देश के मुताबिक़, "किसी मरीज़ के शरीर से ऐंटीबॉडीज़ उसके ठीक होने के दो हफ्ते बाद ही लिए जा सकते हैं और उस रोगी का कोविड-19 का एक बार नहीं, बल्कि दो बार टेस्ट किया जाना चाहिए."
ठीक हो चुके मरीज़ का एलिज़ा (एन्ज़ाइम लिन्क्ड इम्युनोसॉर्बेन्ट ऐसे) टेस्ट किया जाता है जिससे उनके शरीर में ऐंटीबॉडीज़ की मात्रा का पता लगता है.
लेकिन ठीक हो चुके मरीज़ के शरीर से रक्त लेने से पहले राष्ट्रीय मानकों के तहत उसकी शुद्धता की भी जाँच की जाती है.
तो कैसे हो रहा है ट्रायल
कोविड-19 के मरीज़ का इलाज प्लाज़्मा थेरेपी से करने के लिए आईसीएमआर और ड्रग्स कंट्रोलर-जनरल ऑफ़ इंडिया दोनों की मंज़ूरी लेनी होती है.
ड्रग्स कंट्रोलर-जनरल ऑफ़ इंडिया और आईसीएमआर ने थोड़े दिन पहले कुछ राज्यों में प्लाज़्मा ट्रायल की मंज़ूरी दी है, जिसमें दिल्ली और केरल शामिल हैं.
भारत ही नहीं, ब्रिटेन और अमरीका समेत दुनिया के तमाम हिस्सों में भी प्लाज़्मा थेरेपी के ट्रायल हो रहे हैं.
चीन में हुआ ट्रायल क्या कहता है
कुछ दिन पहले मेडिकल जनरल जामा में एक पेपर छपा. जिनमें उन पाँच लोगों का डेटा था, जो कोविड-19 के गंभीर मरीज़ थे और कॉनवेल्सेंट प्लाज़्मा के ज़रिए उनका इलाज किया गया था.
इस तरह की एक्सपेरिमेंटल थेरेपी देने के बाद ये देखा जाता है कि क्लीनिकल फ़ीचर में कितना इम्प्रूवमेंट हुआ है. मसलन बुख़ार या सांस लेने की दिक्क़त से कितनी राहत मिली है.
प्लाज़्मा थेरेपी उन मरीज़ों को दी जाती है जो आईसीयू में होते हैं. जहां उनकी स्थिति को सोफा स्कोर यानी सिक्वेंशियल ऑर्गन फेलियर असेसमेंट स्कोर के आधार पर देखा जाता है. थेरेपी देने के बाद देखा जाता है कि इस स्कोर में क्या सुधार हुआ.
साथ ही मरीज़ के वायरल लोड यानी उसके अंदर के वायरस में थेरेपी के बाद कितना फ़र्क़ है और क्या इसके बाद वेंटीलेटर की सेटिंग चेंज हुई या नहीं.
चीन के ट्रायल में पता चला की पाँचों मरीज़ों में इम्प्रूवमेंट हुआ. उनमें क्लीनिकल इम्प्रूवमेंट भी हुआ, सोफा स्कोर भी सुधरा और वायरल लोड भी कम हुआ. दो हफ्ते बाद तीन मरीज़ों को वेंटीलेटर से हटा लिया गया. अब तीन ठीक होकर घर जा चुके हैं और दो स्थिर हैं.
डॉक्टर अतुल कक्कड़ कहते हैं कि, "प्लाज़्मा थेरेपी में हम बाहर से रेडिमेड एंटीबॉडी देते हैं. ये एंटीबॉडी मरीज़ के शरीर के अंदर के वायरस लोड को न्यूट्रलाइज़ करती है. उसे न्यूट्रलाइज़ करके उसका लोड कम होता है."
हालांकि इस अध्ययन का सैंपल साइज़ बहुत लिमिटेड था. साथ ही इसमें और क्लीनिकल ट्रायल की भी ज़रूरत बताई गई.
सवाई मानसिंह अस्पताल के मेडिसिन डिपार्टमेंट के डॉक्टर कहते हैं कि कुछ मामलों के आधार पर प्लाज़्मा थेरेपी को कामयाब नहीं माना जा सकता. ये एविडेंस बेस्ड मेडिसिन का ज़माना है और एविडेंस ये होगा कि हमने 100 मरीज़ों पर इसका इस्तेमाल किया और उसमें से इतने मरीज़ बच गए. "इसके लिए कई स्तर पर पहले ट्रायल करने होंगे."
पहले भी कई बीमारियों के इलाज में प्लाज़्मा थेरेपी का इस्तेमाल हुआ है.
2014 में आए इबोला वायरस के इलाज में इसका इस्तेमाल हुआ. इससे पहले 2009 में एचवनएनवन वायरस और 2003 की सार्स महामारी के दौरान भी प्लाज़्मा थेरेपी को इस्तेमाल किया गया था.
लेकिन कोरोना के लिए ये कितनी कारगर है. अभी इसका पता लगाया जाना बाक़ी है.
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