कोरोना काल में प्लेग के समय बनने वाले खाने की फिर क्यों हो रही है चर्चा

सयूर लोदेह

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इमेज कैप्शन, सयूर लोदेह के कई प्रकार हैं
    • Author, स्कॉट एंथनी
    • पदनाम, बीबीसी ट्रैवल

इंडोनेशिया के जावा में किंवदंती है कि जब योग्याकार्ता शहर में प्लेग फैला था तो सुल्तान ने लोगों को सयूर लोदेह पकाने और 49 दिनों तक घर में रहने का हुक्म दिया था.

प्लेग ख़त्म हो गया और तब से जो परंपरा शुरू हुई वह आज तक चली आ रही है.

सयूर लोदेह आम करी वाली सब्जी है. इसमें सात सब्जियां होती हैं जिनको मसालेदार नारियल के दूध में पकाया जाता है.

जानकारों का मानना है इसमें डाली जाने वाली गैलांगल जैसी सामग्रियों से पेट की जलन कम होती है.

उनका मानना है कि आसानी से मिलने वाली मौसमी सामग्रियों से तैयार यह व्यंजन क्वारंटीन के लिए एकदम सही है.

सयूर लोदेह पकाने के सुल्तान के हुक्म की सबसे अहम बात यह थी कि इसमें सामाजिक एकजुटता की अपील थी. पूरा शहर एक समय पर एक ही चीज पका रहा हो तो इससे साथ होने का भाव पैदा होता है.

बदनसीबी से बचाने वाली करी

वास्तुकार और शिक्षक रेवांतो बुडी सैंटोसो कहते हैं, "जावा के लोगों के विश्वास के कई पहलुओं की तरह इसका मकसद बदनसीबी से बचना है."

"निजी तौर पर कुछ हासिल करने की जगह बुरी चीजों से बचने को तवज्जो दी गई है. जावा के लोग मानते हैं कि जब कोई बाधा न हो तो ज़िंदगी अपना ख़्याल ख़ुद रखती है."

जावा के खाने में प्रतीकों का बहुत महत्व है. मिसाल के लिए, नसी टंपेंग एक व्यंजन है जिसे मांस और सब्जियों को मिलाकर बनाया जाता है.

सयूर लोदेह

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इमेज कैप्शन, सयूर लोदेह में सात सब्जियां होती हैं जिनको मसालेदार नारियल के दूध में पकाया जाता है.

इसे परोसते समय पीले चावल को शंकु की आकार में रखा जाता है. इसके पीछे मान्यता है कि यह दुनिया ईश्वर के अधीन है.

नसी कुनिंग ख़ुशबूदार पीले चावल का व्यंजन है जिसे नये घर में जाने या नया कारोबार शुरू करने पर बनाया जाता है. माना जाता है कि इससे बरकत होती है.

हल्दी के पेय 'जामू' का अर्थ है 'सेहत के लिए दुआ'. कहा जाता है कि इसे पीने से शांति मिलती है.

सयूर लोदेह बनाने के लिए नारियल के दूध में सात प्रमुख सामग्रियां मिलाई जाती हैं- मेलिंजो (जैतून जैसा फल), मेलिंजो के पत्ते, चियोट (एक तरह का स्क्वैश), लंबी बीन्स, बैंगन, कटहल और टेम्पेह.

इन सभी के प्रतीकात्मक अर्थ हैं जो इनकी नाम की ध्वनियों से लिए गए हैं.

जावा की भाषा में टेरोंग वुंगु (बैंगन) के वुंगु का अर्थ होता है बैंगनी. इसका एक मतलब जागृत जैसा भी होता है.

लंजर (हरी बीन्स) का अर्थ होता है आशीर्वाद. इसी तरह सभी सातों चीज़ों के अपने अर्थ हैं.

धार्मिक अनुष्ठान

सयूर लोदेह को पकाना स्लामेंटन (धार्मिक अनुष्ठान) की मिसाल है. मानव विज्ञानी क्लिफ़र्ड गीर्ट्ज़ इसे जावा सभ्यता की ख़ूबी मानते हैं. सयूर लोदेह बनाने में यह अपेक्षा नहीं रहती कि यह वास्तव में काम करेगा ही.

सैंटोसो कहते हैं, "दिलचस्प है कि सयूर लोदेह कोई व्यक्तिगत चीज नहीं है. यह बदनसीबी के लिए एक प्रतिक्रिया है. जिन चीजों को रोका नहीं जा सकता, यह उसे जितना मुमकिन हो उतना कम करने का प्रयास है."

इसकी सामग्रियां जावा के गांव वालों को आसानी से मिल जाती हैं. इसे पकाना भी आसान है- एक बर्तन में सारी सामग्रियों को डालें और उसे चूल्हे के ऊपर टांग दें.

बहुत पहले इसे पकाने से पहले एक रस्म होती थी. एक भाला और एक पवित्र झंडा (जो शायद पैगंबर मोहम्मद के मकबरे से ली गई चीजों से बनाई गई थी) इन दोनों को गलियों में घुमाया जाता था.

आजकल यह एक सामान्य खाना है. भाषाई और सांख्यिकीय जटिलताओं के साथ इसमें एक व्यावहारिकता है.

करी की जटिल उत्पत्ति

सयूर लोदेह को बनाने की विधि सीधी-सादी है लेकिन इसकी उत्पत्ति बहुत जटिल है.

कुछ विद्वानों का मत है कि इसका इतिहास 10वीं सदी की सभ्यता से शुरू होता है. 1006 में माउंट मेरापी में आए भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट के बाद लोगों की लोदेह खाकर अपनी जान बचाई थी.

सयूर लोदेह

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इमेज कैप्शन, सयूर लोदेह के लिए सब्जियां आसपास के इलाकों से आती हैं

फ़ैडली रहमान जैसे खाद्य इतिहासकार इसे 16वीं सदी का मानते हैं जब इंडोनेशिया में स्पेनिश और पुर्तगाली अपने साथ लंबी बीन्स लेकर आए थे. अन्य लोगों का कहना है कि यह 'पुरानी परंपरा' 19वीं सदी में शुरू हुई.

20वीं सदी की शुरुआत में योग्याकार्ता के बुद्धिजीवी इंडोनेशिया की राष्ट्रीय जागृति के केंद्र में थे. उस समय ही कई राष्ट्रीय मिथकों को खोजा गया और उनको मनाया गया.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सयूर लोदेह की किंवदंती 20वीं सदी की शुरुआत में घर-घर तक पहुंची.

इसका सबसे प्रमुख उदाहरण 1931 का है जब सुल्तान एचबी आठवें के शासनकाल में जावा में 20 साल तक ब्यूबोनिक प्लेग का प्रकोप रहा.

दस्तावेजों से पता चलता है कि सयूर लोदेह करी को 1876, 1892, 1946 और 1951 के संकट के समय भी पकाया गया.

सयूर लोदेह समय के साथ पूरे मलय द्वीप समूह में लोकप्रिय हो गया. यह बताना मुश्किल है कि यह व्यंजन क्यों, कहां और कब विकसित हुआ.

विकास के कई केंद्र

इतिहासकार खिर जौहरी को लगता है कि इस तरह के सवाल अप्रासंगिक हो चुके हैं.

सयूर लोदेह

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इमेज कैप्शन, सयूर लोदेह को लेकर व्हाट्सएप पर मेसेज भेजे गए

"जब हम भोजन का इतिहास देखते हैं तो समय के बिंदुओं को मिलाने की कोशिश इतनी ज़्यादा होती है कि कहानी एककेंद्री बन जाती है जबकि इसके विकास के कई केंद्र हो सकते हैं."

वह कहते हैं, "सिंगापुर में रहने वाले चीनी पेरानकन समुदाय के लोग सयूर लोदेह को चावल के साथ पीली सब्जी के रूप में परोसते हैं. सिंगापुर में रहने वाले जावा के लोग सफ़ेद लोदेह बनाते हैं जिसमें हल्दी नहीं होती."

जौहरी के मुताबिक मलय द्वीप समूह की संस्कृतियों में सयूर लोदेह में आए बदलाव असल में खानपान, सामाजिक रीति-रिवाजों और पर्यावरण के संबंधों को दिखाते हैं.

योग्याकार्ता के आसपास खेती की हरी-भरी ज़मीन है जहां सब्जियां उगाई जाती हैं. ताज़ी सब्जियों की आपूर्ति गांववालों को प्लेग और ज्वालामुखी विस्फोट का सामना करने में सक्षम बनाती है.

इस क्षेत्र में बड़े बंदरगाहों की भरमार है जहां क्वारंटीन का मतलब होता है नये यात्रियों को अलग रहने का आदेश.

नाविकों का खाना

संभव है कि जावा के नाविकों ने इस करी को योग्याकार्ता के बाहर लोकप्रिय बनाया होगा. किसी जहाज पर फंस जाने के बाद सूप, चौडर और सयूर लोदेह जैसी करी बनाना व्यावहारिक होता है.

इस व्यंजन का विकास अब भी हो रहा है. दक्षिण पूर्व एशिया के शहरों में सयूर लोदेह हेल्थ फ़ूड के रूप में लोकप्रिय है.

हेरिटेज डिश के रूप में यह तेज़ी से बढ़ रहे मध्य वर्ग को लुभा रहा है. इंस्टाग्राम पीढ़ी के लिए सयूर लोदेह का चटख रंग ध्यान खींचने में बहुत कारगर है.

जकार्ता के एम ब्लॉक में सुवे ओरा जामू कैफ़े चलाने वाली नोवा देवी सेतीबुडी कहती हैं, "जब मैंने पहली बार अपनी दुकान खोली थी तब लोग सोशल मीडिया के लिए जामू पीते थे. यह दिखाने के लिए कि देखो मैं अपनी संस्कृति के साथ कितना जुड़ा हूं."

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"लेकिन अब इंडोनेशिया के लोग अच्छी सेहत के लिए पारंपरिक व्यंजनों के फायदे समझने लगे हैं."

वायरस दूर रखेगी करी!

योग्याकार्ता के लोगों के लिए अब भी यह करी सामान्य खाने से कुछ अधिक है. नोवा कहती हैं, "लोदेह एक सामान्य खाना है लेकिन इस पीछे महान दर्शन और ज्ञान है. इसकी कुंजी है ताज़ी सामग्रियां."

जकार्ता में खान-पान का फ़ैशन बदल रहा है लेकिन योग्याकार्ता में इस व्यंजन की लोकप्रियता पर कोई अंतर नहीं पड़ा है.

वॉट्सऐप समूहों के जरिये कोविड-19 से बचने के लिए सयूर लोदेह बनाने के निर्देश आए तो लोगों ने सच मान लिया.

वॉट्सऐप पर आए संदेशों को योग्याकार्ता के सुल्तान का हुक्म बताया गया था. लोग इस करी को बनाने लगे और पड़ोसियों से भी साझा करने लगे.

पिछले 20 साल में योग्याकार्ता बहुत बदल गया है. यहां होटल, मॉल और नया हवाई अड्डा बन गया है, लेकिन रीति-रिवाज अब भी वही हैं.

संचार के क्षेत्र में हुए तकनीकी विकास ने पुरानी मान्यताओं और विश्वासों को और बढ़ाने का काम किया है.

गणराज्य के अंदर सल्तनत

योग्याकार्ता में कोई नहीं जानता कि वॉट्सऐप पर आए संदेश सुल्तान ने ही भेजे थे या नहीं.

राजमहल की ओर से एक स्थानीय अखबार को बताया गया कि वो संदेश सुल्तान ने नहीं भेजे, लेकिन इस खंडन पर सभी को यकीन नहीं हुआ.

योग्याकार्ता इंडोनेशिया में अपवाद वाली जगह है. यहां गणराज्य के अंदर एक स्वायत्त सल्तनत है.

मौजूदा सुल्तान आधुनिक ख़्यालों वाले हैं और लगता है कि वह इस खाने के साथ जुड़े अंधविश्वासों से ख़ुद को दूर रखना चाहते हैं.

उनकी चुप्पी राजनीतिक जोखिम से जुड़ी हो सकती है. सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को लगता है कि इंडोनेशिया में कोविड-19 के मरीज़ बढ़ सकते हैं.

योग्याकार्ता में कोविड-19 मरीज़ों की तादाद अब भी बहुत ज़्यादा नहीं है, लेकिन यदि संकट के समय सुल्तान की कोशिशों में सयूर लोदेह को ज़्यादा तवज्जो मिली तो यह अच्छा नहीं लगेगा.

फिर भी, भले ही यह तर्क मान लिया जाए लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि सयूर लोदेह को लेकर स्थानीय लोगों का जोश ग़लत है.

योग्याकार्ता के लोगों ने संकट आने पर हमेशा सयूर लोदेह पकाया है और वही काम वे अब भी कर रहे हैं.

उनको इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा कि सुल्तान ने इसका हुक्म दिया है या नहीं दिया.

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