कोरोना: कुछ नस्लीय समूह वायरस के सामने कमज़ोर क्यों हैं?

कोरोना

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    • Author, क्रिस्टीन रो
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कोविड-19 ने ज़ात-धर्म, रंग-रूप, देश-भाषा जैसी तमाम सरहदों को तोड़कर पूरी दुनिया में लोगों को अपना शिकार बनाया है. लेकिन, अगर हम कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों को देखें, तो ऐसा लगता है कि ये वायरस भी नस्लवादी भेदभाव कर रहा है. क्योंकि इसके शिकार लोगों में कई तरह की असमानताएं देखी गई हैं. इन में नस्ल और जातीयताओं का फ़र्क़ भी शामिल है.

अमरीका के शिकागो में अप्रैल 2020 के शुरु में कोरोना से मरने वालों में 72 फ़ीसद लोग काले अमरीकी थे. इसी तरह, जॉर्जिया में 17 अप्रैल 2020 तक कोरोना वायरस से मरने वालों में 40 फीसद गोरे

लोग थे. जबकि जॉर्जिया की कुल आबादी में गोरों की जनसंख्या 58 फ़ीसद है. ब्रिटेन में शुरुआती 2,249 कोरोना संक्रमित लोगों में से 35 फ़ीसद काले थे. हालिया जनगणना के मुताबिक़ ये आंकड़ा इंग्लैंड और वेल्श में काले लोगों की कुल आबादी के अनुपात से कहीं ज़्यादा है.

लोगों की सेहत को लेकर जिस तरह की ग़ैर-बराबरी हमेशा से रही हैं उसमें ये आंकड़े हैरान करने वाले नहीं. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इस महामारी ने स्वास्थ्य सेवाओं में होने वाले नस्लवाद की गंदी तस्वीर को सामने रख दिया है.

कोरोना मास्क

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गोरी नस्ल की आबादी वाले देशों में आर्थिक संसाधनों तक अन्य नस्लों के लोगों की पहुंच बहुत कम है. फिर चाहे अच्छी नौकरियां हों या निजी कारोबार. इस असमानता का सीधा असर लोगों की सेहत

पर भी पड़ता है. आबादी का एक बड़ा तबक़ा आज भी दिन भर के अच्छे खाने से महरूम है. कोविड-19 महामारी से पहले दक्षिण अफ्रीका में ऐसे क़रीब 91 फ़ीसद काले परिवार थे, जिनके भुखमरी के शिकार हो जाने की आशंका थी. इनकी तुलना में दक्षिण अफ्रीका के केवल 1.3 प्रतिशत गोरे परिवारों के कुपोषण के शिकार होने की आशंका थी.

कनाडा में भी कोविड-19 से पहले ही यहां के 48 फीसद मूल निवासियों के परिवारों के पास खाने के पर्याप्त संसाधन नहीं थे. महामारी के बाद उनकी हालत और भी ख़राब हो गई. अमरीका में भी महामारी से पहले 2018 में गोरे लोगों के परिवारों के मुक़ाबले काले लोगों के परिवारों के खाद्य असुरक्षा का शिकार होने की आशंका दो गुना अधिक थी. हर पांचवे अमरीकी काले परिवार के पास पर्याप्त खाना नहीं था. महामारी के बाद हालात और भी ख़राब हो गए.

नई दिल्ली में कपड़े सिलता टेलर

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खाने पीने और पोषक तत्वों के पर्याप्त संसाधन न होने के कई गंभीर परिणाम होते हैं. क्योंकि, जब शरीर में सभी पोषक तत्व ही नहीं पहुंचेंगे तो कमज़ोरी आएगी ही. और वो किसी भी बीमारी का आसानी से शिकार हो सकते हैं. मिसाल के लिए अमरीका में गोरे लोगों की तुलना में अफ्रीकी मूल के अमरीकियों को शुगर, हृदय रोग और हाइपरटेंशन की शिकायत ज़्यादा होती है. जिससे उनके फेफड़े और रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर हो जाते हैं. जिनकी सेहत पहले ही ख़राब होगी, उन पर कोविड-19 ज़्यादा जल्दी असर करेगा.

आबादी के एक हिस्से के कुपोषित होने के दो मायने होते हैं. पहला तो ये कि ये कोविड-19 की महामारी के शिकार ज़्यादा होंगे. और दूसरा ये कि इसके उन्हें गंभीर आर्थिक नतीजे भी भुगतने होंगे. एक अंदाज़े के

मुताबिक़ लॉकडाउन के चलते 10 फ़ीसद ग़रीब परिवारों की आय में 45 फ़ीसद की कमी आएगी. जो मज़दूर बिना किसी सामाजिक सुरक्षा कवच के काम करते हैं, उन पर इसका और भी ज़्यादा प्रभाव पड़ेगा.

कोरोना टेस्ट

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बहुत से आर्थिक विशेषज्ञ लॉकडाउन बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं. उनका कहना है कि लॉकडाउन में भी एक बड़ी आबादी ऐसी है, जो घरों से काम कर रही है और उनका ख़र्च चल रहा है. बहुत से ऐसे भी लोग हैं जो साल भर भी कोई काम ना करें, तो भी जिंदगी की तमाम ज़रुरतें पूरी कर सकते हैं.

लेकिन एक बहुत बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है, जिनके लिए बिना काम किए एक वक़्त का खाना जुटाना भी मुश्किल है.

हर देश में ग़रीबों, काले, एशियाई मूल के लोग और अन्य जातीय अल्पसंख्यकों के लिए आर्थिक असमानता ही एक मात्र चुनौती नहीं, जिससे उन्हें दो चार होना पड़ता है. बल्कि ऐसे लोग जिन इलाक़ों में रहते हैं, उनकी भौगोलिक स्थिति भी उनके लिए एक चुनौती है. ग़रीब, मज़दूर तबक़े के लोग अक्सर ऐसे इलाक़ों में रहते हैं, जहां का हवा पानी अच्छा नहीं होता.

साफ़ सफ़ाई की सुविधाएं नहीं होतीं. मिसाल के लिए ज़्यादातर मज़दूर और दिहाड़ी कामगार, छोटी जगहों में ज़्यादा बड़े परिवार के साथ अक्सर हाइवे के किनारे या कूड़ा घर के आस-पास रहते हैं. या फिर शहर के बाहरी इलाक़ों में रहते हैं. ये इलाक़े अक्सर सरकार की विकास वाली योजनाओं के दायरे में आते ही नहीं. इसीलिए यहां लोगों का जीवन स्तर अच्छा नहीं होता. ग़रीब मज़दूरों की एक बड़ी आबादी तो उन जगहों पर रहती है, जहां दिन रात निर्माण कार्य चलते रहते हैं. या फिर वो कारखानों के आस-पास ज़िंदगी बसर करते हैं. यही वजह है कि यहां रहने वाले लोगों को अक्सर सांस-संबंधी बीमारियां होती हैं. तभी तो ऐसे लोगों में कोविड-19 का शिकार होने की संभावना भी ज़्यादा है.

चंडीगढ़ में प्रवासी मज़दूर

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स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में भी भयंकर असमानता देखी जाती है. मिसाल के लिए अमरीका में अफ्रीकी मूल और हिस्पैनिक या लैटिन अमरीकी देशों के मूल निवासियों की तुलना में गोरे और एशियाई मूल के अमरीकियों के पास स्वास्थ्य बीमा की सुरक्षाहोने की संभावना ज़्यादा है.

इलाज के दौरान भी अस्पताल में नस्लीय भेदभाव एक बड़ा रोल निभाता है. मिसाल के लिए अमरीका के अस्पतालों में मेडिकल स्टाफ़ जैसे कि नर्सें भी अफ्रीकी मूल के अमरीकियों के साथ बात करना कम ही पसंद करते हैं.

2016 की एक स्टडी में पता चला है कि अमरीका में मेडिकल साइंस के छात्रों में ये सोच होने की संभावना ज़्यादा थी कि गोरे लोगों के मुक़ाबले, कालों को दर्द का अनुभव कम होता है. अब जब इलाज करने वाले की सोच में ही भेदभाव होगा तो वहां आर्थिक और शैक्षिक असमानताएं और गहरा असर करती हैं. यही वजह है कि अमरीका में काले अमरीकी लोगों को गोरों के मुक़ाबले बेहतर इलाज नहीं मिल पाता.

मास्क पहने लोग

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पूरी दुनिया में जोखिम वाले पेशों में ज़्यादातर ऐसे ही लोग होते हैं जो निम्न जाति के होते हैं या फिर वो समाज के कमज़ोर तबक़े से ताल्लुक़ रखते हैं. मिसाल के लिए लंदन में ट्रांसपोर्ट के पेशे में 26.4 फ़ीसद लोग एशियाई, काले या समाज के अन्य कमज़ोर वर्ग के लोग हैं. रोज़गार दिलाने में रंग रूप भी एक बड़ी वजह है.

जो लोग अच्छे रंग रूप वाले नहीं हैं, उनमें बड़ी संख्या बेरोज़गारों की है. फिर वो कम पैसे में काम करने को मजबूर होते हैं. या फिर जोखिम वाले काम करते हैं. अगर ये भी नहीं होता तो वो लोगों को खाना पहुंचाने का काम करते हैं. जिससे दिन भर का ख़र्च तो निकल जाता है लेकिन वो कभी अपना आने वाला कल सुरक्षित नहीं कर पाते.

अमरीका में खेतों में काम के लिए अक्सर लैटिन अमरीका से लोग पलायन करके आते हैं. खेतों में वो जिस तरह काम करते हैं वहां न तो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो सकता है, और न ही उन्हें किसी तरह की स्वास्थ्य सेवा दी जाती है. अमरीका में खेतिहर मज़दूरों में शुगर की बीमारी होने की संभावना बहुत ज़्यादा होती है. साथ ही कीटनाशकों के बीच रहने के कारण इनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कमज़ोर हो जाती है. कुल मिलाकर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में ऐसे लोग किसी भी बीमारी का शिकार होने पर सबसे ज़्यादा परेशानी का सामना करते हैं.

अमरीका के जनजातीय लोगों से लेकर दर-दर भटकने वाले रोहिंग्या तक, दुनिया भर में सभी ग़रीब लोग झुंड में रहते हैं. जहां कोई भी संक्रमण तेज़ी से फैल सकता है. कोविड-19 जैसी महामारी का संक्रमण तो और भी ज़्यादा तेज़ी से फैलने की आशंका होती है. इन लोगों के पास आइसोलेशन में रहने के लिए जगह ही नहीं है. साथ ही बार-बार हाथ धोने के लिए न तो इनके पास साबुन के पैसे हैं और न ही साफ़ पानी उपलब्ध है.

एशियाई अमरीकी आयोग के बाहर प्रदर्शन

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ब्रिटेन में जितने भी बांग्लादेशी, चीनी और भारतीय मूल के परिवार रहते हैं, उनमें बुज़ुर्गों और बच्चों की संख्या ज़्यादा है. इस उम्र के लोगों को कोरोना वायरस का संक्रमण बहुत आसानी से हो सकता है. कोरोना वायरस के संकट की वजह से दक्षिण अफ्रीका के डरबन और अन्य बड़े शहरों में झुग्गी झोपड़ियां तोड़ी जा रही हैं. ऐसे में बेसहारा लोगों की बड़ी संख्या सड़कों पर आ गई है. इन लोगों में बड़ी आबादी काले लोगों की है.

यहां ये याद रखना ज़रुरी है कि रहन-सहन में अंतर सिर्फ़ आय में असमानता की वजह से नहीं है. बल्कि ये रंग, नस्ल और जाति के आधार पर बरसों से सोच समझ कर किया जा रहा पृथक्करण है.

इसके अलावा कोरोना वायरस के संकट काल में कुछ समूहों को उनके धर्म के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है. जैसे कि भारत में कहा जा रहा है कि मुसलमान कोरोना फैलाने के लिए फल सब्ज़ियों पर थूक रहे हैं. बहुत से लोग उन्हें कोरोना जिहादी कह कर बुलाने से भी परहेज़ नहीं करते.

नक्शे पर

दुनिया भर में पुष्ट मामले

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स्रोत: जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसियां

आंकड़े कब अपडेट किए गए 5 जुलाई 2022, 1:29 pm IST

इसी तरह अमरीका में भी अफ़वाह फैलाई जा रही है कि काले लोग कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता रखते हैं. मास्क पहनने के मामले में भी काले लोग पीछे हैं. मास्क पहनने पर उनकी तुलना अपराधियों से की जा रही है. अमरीका में तो एशियाई मूल के अमरीकियों को, खास तौर से महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है. उन पर थूका जा रहा है.

ख़र्तूम में पेटिंग

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हर देश में कई अलग अलग भाषाएं बोलने वाले लोग रहते हैं. लेकिन, ज़्यादातर देशों में कोविड-19 से बचने के दिशा निर्देश आम तौर पर अंग्रेज़ी में ही जारी किए जा रहे हैं. जिसे समझना सभी के लिए मुश्किल हो रहा है. कम पढ़े-लिखे लोग डॉक्टर की भाषा भी आसानी से नहीं समझ पा रहे हैं. सोशल डिस्टेंसिंग जैसे विचार को गांव देहात के लोगों के लिए समझना मुश्किल है. ये भी एक तरह का भेदभाव ही है.

हाथ धोता बच्चा

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जो लोग अभी इलाज से वंचित हैं या कम संसाधनों के चलते बीमार हो सकते हैं. उन्हें स्वास्थ्य सेवा देना सरकार की ज़िम्मेदारी है. गरीब बस्तियों और शरणार्थी शिविरों में रहने वालों को साफ़ पानी, साबुन और मास्क मुहैया कराए जाने चाहिए. इसमें स्वयंसेवी संगठन भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. लोगों को रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले सप्लीमेंट दिए जाने चाहिए. ग़रीबों को अपने ही समाज का अहम हिस्सा मानकर उनकी मदद करना हमारी ज़िम्मेदारी है. अगर ऐसा नहीं किया गया तो जितने लोग कोरोना वायरस से मरेंगे, उससे कहीं ज़्यादा ग़रीबी, भुखमरी और पैसे वालों के भेदभाव भरे बर्ताव से मर जाएंगे.

भारत में कोरोनावायरस के मामले

यह जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाती है, हालांकि मुमकिन है इनमें किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के नवीनतम आंकड़े तुरंत न दिखें.

राज्य या केंद्र शासित प्रदेश कुल मामले जो स्वस्थ हुए मौतें
महाराष्ट्र 1351153 1049947 35751
आंध्र प्रदेश 681161 612300 5745
तमिलनाडु 586397 530708 9383
कर्नाटक 582458 469750 8641
उत्तराखंड 390875 331270 5652
गोवा 273098 240703 5272
पश्चिम बंगाल 250580 219844 4837
ओडिशा 212609 177585 866
तेलंगाना 189283 158690 1116
बिहार 180032 166188 892
केरल 179923 121264 698
असम 173629 142297 667
हरियाणा 134623 114576 3431
राजस्थान 130971 109472 1456
हिमाचल प्रदेश 125412 108411 1331
मध्य प्रदेश 124166 100012 2242
पंजाब 111375 90345 3284
छत्तीसगढ़ 108458 74537 877
झारखंड 81417 68603 688
उत्तर प्रदेश 47502 36646 580
गुजरात 32396 27072 407
पुडुचेरी 26685 21156 515
जम्मू और कश्मीर 14457 10607 175
चंडीगढ़ 11678 9325 153
मणिपुर 10477 7982 64
लद्दाख 4152 3064 58
अंडमान निकोबार द्वीप समूह 3803 3582 53
दिल्ली 3015 2836 2
मिज़ोरम 1958 1459 0

स्रोतः स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय

11: 30 IST को अपडेट किया गया

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