पाकिस्तान: तबलीगी जमात को आख़िर सिंध में विरोध क्यों झेलना पड़ रहा है

तबलीगी जमात

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    • Author, रियाज़ सोहेल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, कराची

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के ऐतिहासिक शहर थट्टा में मौजूद कोरोना कंट्रोल सेंटर में दो दिन पहले एक फ़ोन कॉल आई.

इस कॉल में शिकायत की गई कि मुहम्मद खान सूमरो गांव में तबलीगी जमात (धार्मिक समूह) के लोग मौजूद हैं और इससे स्थानीय आबादी को चिंता हो रही है. इस सूचना पर अधिकारियों और पुलिस वहां पहुंची और दस लोगों को थट्टा के सिविल हॉस्पिटल पहुंचाया गया.

ये शिकायत केंद्रीय बाजोरा परिषद के चेयरमैन हसन सुमरो ने कंट्रोल रूम में दर्ज कराई थी.

सुमरो ने बीबीसी को बताया कि लोग कोरोना वायरस के फैलने से डरे हुए थे और जब यह खबर मीडिया में आई कि रायविंड में हुए एक सालाना जलसे में शामिल होने वाले धार्मिक समूह के लोगों में कोरोना वायरस फैल गया है तो यह डर कई गुना बढ़ गया. उन्होंने कहा कि इन्हीं चिंताओं को देखते हुए उन्होंने कंट्रोल रूम में शिकायत की.

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अस्पताल भेजे गए तबलीगी लोग

सिविल हॉस्पिटल के एक अधिकारी के मुताबिक, "धार्मिक समूह के सदस्य अलग-अलग इलाकों के 20 लोगों को यहां ले आए. इनमें से दो में कोरोना के लक्षण दिख रहे थे. इन दोनों को वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया, लेकिन अन्य किसी भी शख्स में इस वायरस के लक्षण नहीं दिखाई दिए हैं."

सिंध हेल्थ डिपार्टमेंट ने पुष्टि की है कि रायविंड में हुए जलसे से लौटे चार लोगों को कोरोना वायरस से संक्रमित पाया गया है. धार्मिक समूह का रायविंड में 10-12 मार्च के बीच अंतरराष्ट्रीय जलसा हुआ था. इसमें हजारों की तादाद में स्थानीय और विदेशी लोगों ने शिरकत की थी.

सिंध में थट्टा ही इकलौता ऐसा जिला नहीं है जहां पर तबलीगी जमात के लोगों को स्थानीय लोगों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. लरकाना जिले के सैहर कस्बे की मस्जिद में भी तबलीगी जमात के लोगों की मौजूदगी का विरोध किया गया और स्थानीय लोगों ने इसकी शिकायत प्रशासन से कर दी.

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बैन लगाने की मांग

इसके बाद डोकरी तहसील से स्वास्थ्य विभाग की टीम आई और इन लोगों की जांच की गई. डोकरी के तहसील हॉस्पिटल के मेडिकल अफ़सर अज़ीम शाह ने कहा कि इन लोगों में कोरोना का कोई लक्षण नहीं दिखा है.

ख़ैरपुर जिले के पाका चंग इलाके के लोगों ने पुलिस से शिकायत की, लेकिन पुलिस ने कोई एक्शन नहीं लिया. स्थानीय जर्नलिस्ट सदाक़त मेमन ने बताया कि तबलीगी लोगों में स्थानीय लोगों के साथ अफ़गानिस्तान और दूसरे मुल्कों के लोग भी शामिल हैं.

फ़ेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर तबलीगी लोगों को कई मस्जिदों और इलाकों में पहचाना गया है. कई लोग इनके पिक्चर्स और वीडियोज़ डालकर तबलीगी जमात पर बैन लगाने की मांग कर रहे हैं.

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जमात की गतिविधियों पर रोक की मांग

सोशल डिवेलपमेंट पर काम करने वाले एक वैश्विक संगठन से जुड़े हुए मसूद लोहार ने फ़ेसबुक पर पोस्ट डाली की अगर तबलीगी जमात पर बैन नहीं लगाया गया तो कोरोना वायरस पूरे देश में फैल जाएगा.

शहादतकोट के रहने वाले मुराद पंडरानी ने भी इसका सपोर्ट किया है. उन्होंने कहा कि सिंध सरकार को तुरंत इस जमात की गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए. कराची के शुजा कुरैशी ने मांग की है कि जमात की मजहबी तकरीरों पर रोक लगनी चाहिए.

सिंधी जर्नल 'अफ़ेयर' के एडिटर अली अहमद रिंद ने अपने दोस्त को कोट करते हुए लिखा कि उनका दोस्त अपने बच्चों को कराची से शिकारपुर ले गया ताकि वह उन्हें कोरोना वायरस से बचा सके.

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लॉकडाउन और आवाजाही पर लगी पाबंदियां

धर्म उपदेश देने वाले उनके पास आए थे, जिन्हें देखकर वह आक्रामक हो गया. उसने ईंट उठाई और उनके पीछे दौड़ते हुए चिल्लाया, 'तुम खुद को कोरोना से मार ही लोगे, और हम लोगों को भी अपने साथ मरवा दोगे.'

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सीनेटर सस्सी पलेजू ने भी तबलीगी जमात के लोगों से दरख्व़ास्त की है कि वे अपने घरों में ही बंद रहें. उन्होंने बीबीसी को बताया कि लॉकडाउन और आवाजाही पर लगी पाबंदियों के रायविंड के धर्म प्रचार करने वाले लोग थट्टा, ख़ैरपुर, लरकाना और उमरकोट जैसे कई जिलों में आ रहे हैं.

उन्होंने कहा, 'रायविंड में हुए हालिया जलसे में शिरकत करने वालों की स्क्रीनिंग नहीं हुई है, ऐसे में इनमें कोरोना हो सकता है. मेरे जिले थट्टा में आने वालों में ख़ैबर पख़्तूनख्व़ा और पंजाब के मौलवियों के अलावा एक अफ्रीकी नागरिक भी शामिल है. तबलीगी जमात के लोगों को खुद को अपने इलाकों या घरों तक सीमित रखना चाहिए.'

इमरान खान और मौलाना तारिक जमील

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क्या है तबलीगी जमात?

तबलीगी जमात का जन्म भारत में 1926-27 के दौरान हुआ. एक इस्लामी स्कॉलर मौलाना मुहम्मद इलियास ने इस काम की बुनियाद रखी थी. परंपराओं के मुताबक, मौलाना मुहम्मद इलियास ने अपने काम की शुरुआत दिल्ली से सटे मेवात में लोगों को मजहबी शिक्षा देने के जरिए की. बाद में यह सिलसिला आगे बढ़ता गया.

तबलीगी जमात की पहली मीटिंग भारत में 1941 में हुई थी. इसमें 25,000 लोग शामिल हुए थे. 1940 के दशक तक जमात का कामकाज अविभाजित भारत तक ही सीमित था, लेकिन बाद में इसकी शाखाएं पाकिस्तान और बांग्लादेश तक फैल गईं. जमात का काम तेजी से फैला और यह आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया.

तबलीगी जमात का सबसे बड़ा जलसा हर साल बांग्लादेश में होता है. जबकि पाकिस्तान में भी एक सालाना कार्यक्रम रायविंड में होता है. इसमें दुनियाभर के लाखों मुसलमान शामिल होते हैं.

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धार्मिक उपदेशों का काम कैसे होता है?

सिंध और पंजाब में धर्मोपदेश से जुड़े हुए अहमद खान (असली नाम छिपा लिया गया है) कहते हैं कि उन्होंने सुना है कि तबलीगियों को सिंध के ग्रामीण इलाकों की मस्जिदों से निकाल दिया गया है, लेकिन इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटना उनके सहयोगियों के साथ नहीं हुई है.

उन्होंने कहा कि वह सुक्कुर, भट्ट शाह, हाला जैसे सिंध के कई हिस्सों का दौरा कर चुके हैं. तबलीगी जमात का गठन कराची के मक्की मस्जिद में होता है. जहां से समूहों को पूरे प्रांत में भेजा जाता है. अहमद खान के मुताबिक, उन्हें इलाकों की चिट दी जाती है जिसमें मस्जिदों का ब्योरा होता है. वहां ये लोग पहुंचते हैं.

"इन समूहों में आठ से दस लोग शामिल होते हैं. इनमें दो लोग सेवा के लिए होते हैं जो कि खाना बनाते हैं. यह दस दिन का दौरा होता है जिसमें दस मस्जिदों में जाना होता है. ये सुबह जल्दी निकलते हैं और लोगों और दुकानदारों से नजदीकी मस्जिद में पहुंचने के लिए कहते हैं. सुबह 10 बजे ये हदीस पढ़ते हैं. दो लोग बाहर जाते हैं और लोगों को बताते हैं. कई बार गैर-मुस्लिमों को भी धर्म-उपदेश दिए जाते हैं. हालांकि, हमें मना किया गया है कि हम गैर-मुस्लिमों को धर्म शिक्षा न दें."

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तबलीगी जमात का केंद्र

स्थानीय लोगों को धर्म की बातें बताने के बाद ये समूह रायविंड आ जाते हैं जो कि तबलीगी जमात का केंद्र है. यहां ये लोग तीन दिन बिताते हैं.

अहमद खान के मुताबिक, ये अपनी रिपोर्ट रायविंड में देते हैं. इसके बाद अगले 27 दिन के लिए समूह गठित किए जाते हैं, जो कि ज्यादातर पंजाब जाते हैं.

मजहबी पार्टियों और आंदोलनों पर नजर रखने वाले जर्नलिस्ट सबूख सैयद कहते हैं कि तबलीगी जमात की कुछ किताबें हैं. इनमें से एक फाज़िल-ई-आमाल यानी क्रियाओं के आचरण है और दूसरी किताब फाजिल-ई-सदाक़त यानी दान के आचरण हैं. दोनों किताबों के लेखक मौलाना मुहम्मद जकारिया हैं.

वह बताते हैं, "अलग-अलग मस्जिदों में इन किताबों को पढ़ने को तालीम का नाम दिया गया है. किसी भी नमाज़ के बाद इनकी पढ़ाई होती है."

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