सऊदी अरब और रूस की लड़ाई जारी रही तो तेल का क्या होगा

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पिछले 30 सालों में तेल की कीमतों में ऐसी गिरावट नहीं देखी गई थी. सोमवार को जब एशिया में बाज़ार खुले तो कच्चे तेल की कीमत 30 फीसदी तक लुढ़क गई.
जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, कुछ ही लम्हों के भीतर एक बैरल कच्चे तेल की क़ीमत 45 डॉलर से गिरकर 31.52 डॉलर हो गई.
खाड़ी युद्ध के बाद से किसी एक कारोबारी दिन में कच्चे तेल की कीमतों में इतनी गिरावट नहीं देखी गई थी.
तेल की कीमतों को ये झटका ऐसे वक़्त में लगा है जब दुनिया कोरोना वायरस के संकट का सामना कर रही है.
कोरोना वायरस की वजह से पूरी दुनिया में तेल की मांग में कमी देखी जा रही है और इसका नतीजा प्रमुख शेयर बाज़ारों में बड़ी गिरावट के रूप में सामने आ रहा है.
सोमवार को तेल कीमतों में आई गिरावट की वजह सऊदी अरब का तेल उत्पादन बढ़ाने का फै़सला है.

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सऊदी अरब का इरादा
इतना ही नहीं सऊदी अरब ने ये भी कहा है कि वो कुछ ख़ास बाज़ारों में अपना तेल 20 फ़ीसदी के डिस्काउंट पर भेजेगा. विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब और रूस के बीच तेल की कीमतों को लेकर होने वाली लड़ाई का ये पहला चरण है.
सऊदी अरब की तेल नीति से जुड़े करीबी सूत्रों के हवाले से फ़ाइनैंशियल टाइम्स अख़बार ने रिपोर्ट दी है कि सऊदी अरब अपना तेल उत्पादन एक करोड़ बैरल प्रतिदिन से भी बढ़ा सकता है और यहां तक कि इसे एक करोड़ दस लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाया जा सकता है.
सऊदी अरब इस समय 97 लाख बैरल प्रतिदिन की दर से उत्पादन करता है. ज़ाहिर है उसका इरादा इससे कहीं ज़्यादा उत्पादन करने का है. ताज्जुब की बात ये भी है कि पिछले शुक्रवार तक सऊदी अरब कच्चे तेल में उत्पादन का पक्ष ले रहा था ताकि पहले से गिरी हुई तेल की कीमतों को संभाला जा सके.
इस साल कच्चे तेल की कीमतों में 20 फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई है और कोरोना वायरस संक्रमण के चलते इस समय जो दुनिया की अर्थव्यवस्था की स्थिति है, उसे देखते हुए तेल की कीमतों का गिरना भी जारी है. ऐसे में सवाल उठता है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि सऊदी अरब ने अपनी रणनीति बदल ली.

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दोस्ती में दरार
सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल निर्यातक देश है. उसे पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन ओपेक का अघोषित नेता भी माना जाता है. सऊदी अरब की मौजूदा क्षमता रोज़ाना एक करोड़ 20 लाख बैरल तेल उत्पादन की है. किसी दूसरे देश की तुलना में तेल उत्पादन बढ़ाना या कम करना, सऊदी अरब के लिए ज़्यादा आसान है.
साल 2014 में जब तेल की कीमतों में गिरावट का दौर शुरू हुआ और ये सिलसिला साल 2016 के आख़िर तक जारी रहा, तो उस दरम्यान 'ओपेक प्लस' नाम से एक समूह अस्तित्व में आया. इसमें ओपेक के देश तो थे ही, साथ ही दूसरे तेल उत्पादक देश भी थे जो ओपेक के सदस्य नहीं थे. 'ओपेक प्लस' में रूस की एक ख़ास जगह थी.
'ओपेक प्लस' का मक़सद उत्पादन में की जाने वाली कटौती को लेकर देशों के बीच तालमेल बिठाना था ताकि कीमतों को संभाला जा सके. ये रणनीति पिछले शुक्रवार तक ठीक से काम कर रही थी. शुक्रवार को कोरोना वायरस की वजह से बने हालात के मद्देनज़र तेल उत्पादन में कटौती के नए प्रस्ताव को रूस ने नामंज़ूर कर दिया.
उत्पादन में कटौती के प्रस्ताव के पीछे ये दलील दी गई थी कि रोज़ान 15 लाख बैरल कमी करने से दुनिया में तेल उत्पादन में 3.6 फीसदी की गिरावट आएगी. कटौती में पांच लाख बैरल का हिस्सा ग़ैर ओपेक देशों के खाते में था.

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तेल का उत्पादन
शुक्रवार को 'ओपेक प्लस' की बैठक के बाद रूस के ऊर्जा मंत्री एलेक्जे़ंडर नोवाक ने कहा, "जहां तक उत्पादन में कटौती की बात है, आज की बैठक के मद्देनज़र एक अप्रैल तक किसी भी देश के लिए तेल उत्पादन में कटौती करना ज़रूरी नहीं है, चाहे वे ओपेक से सदस्य हों या न हो."
रूस के इस रुख को विशेषज्ञ इन संकेतों के तौर पर देख रहे हैं कि अब तेल निर्यात करने वाला हर देश अपने हितों को खुद समझेगा और उसके लिए जिम्मेदार होगा. रूसी तेल कंपनी रोज़नेफ़्ट का कहना है कि शुक्रवार को दिया गया तेल कटौती का प्रस्ताव ओपेक देशों की ताक़त का ग़ैरज़रूरी प्रदर्शन जैसा है.
रोज़नेफ़्ट के प्रवक्ता मिखाइल लियोन्तेव ने रूसी समाचार एजेंसी से कहा, "ये बेतुका है. हम जितने तेल का उत्पादन करते हैं, हम उसे कम कर दें और उसकी सप्लाई हमारे प्रतिस्पर्धी करें. ये और कुछ नहीं बल्कि ताक़त के ज़ोर पर अपनी बात मनवाने जैसा है."
शुक्रवार को बातचीत टूट जाने पर कुछ विशेषज्ञों की राय ये भी है कि रूस उत्पादन में कटौती करने के बजाय तेल की कीमतें कम करने पर काम करे ताकि अमरीकी तेल उत्पादकों को कमजोर किया जा सके. अमरीकी कंपनियों के लिए तेल की उत्पादन लागत ज़्यादा पड़ती है और अगर कीमतें यूं ही गिरती रहें तो उनके लिए मुश्किल बढ़ेगी.

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डिस्काउंट ऑफ़र
हालांकि सऊदी अरब भी रूसी तेल कंपनियों को निशाना बना रहा है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि उसकी नई नीति रूस के ख़िलाफ़ कीमतों को लेकर लड़ाई के दरवाज़े खोल रही है. फ़ाइनैंशियल टाइम्स के अनुसार, सऊदी अरब ने उत्तर पश्चिमी यूरोप के खरीददार देशों को आठ डॉलर प्रति बैरल से ज़्यादा की रियायत देने की पेशकश की है.
उत्तर पश्चिमी यूरोप के ये देश अब तक रूस के ग्राहक रहे हैं. सऊदी अरब ने एशिया के लिए चार से छह डॉलर और अमरीकी बाज़ार के लिए सात डॉलर प्रति बैरल छूट की ऑफ़र की है.
सऊदी तेल कंपनी आरामको के वाइस प्रेसीडेंट रह चुके सादाद अल-हुसैनी ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, "तेल की मांग में कमी और गिरते बाज़ार के मद्देनज़र बेहद कम कीमतें ऑफ़र करके सऊदी अरब अपनी कारोबारी स्थिति को बचाने की कोशिश कर रहा है."
सादाद अल-हुसैनी की राय में मौजूदा हालात से उबरने के बाद सऊदी अरब और रूस दोनों ही मजबूर होकर उभरेंगे जबकि दूसरे तेल उत्पादक जिनके यहां या तो उत्पादन लागत ज़्यादा है या फिर वे राजनीतिक रूप से अस्थिर हैं, उन्हें वित्तीय मुश्किलों का सामना करना होगा.

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सऊदी अरब को ज़्यादा नुक़सान
रूस के पास इस समय 170,000 मिलियन डॉलर का एक सॉवरेन फंड है जो हाल के सालों में तेल से हुए मुनाफे से बना है. माना जा रहा है कि तेल की कीमतों की लड़ाई जारी रही तो रूस इस फंड से हालात संभाल सकता है. लेकिन तेल उत्पादक दूसरे देशों पर इसका असर पड़ना तय है.
और ये भी सच है कि रूस और सऊदी अरब भी इससे अछूते नहीं रहने वाले हैं. आख़िरी बार जब सऊदी अरब और ओपेक के उसके साथी देशों ने अमरीकी तेल कंपनियों की हालत ख़राब करने के लिए सस्ते तेल की बाढ़ ला दी थी तो कच्चे तेल की कीमत 30 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे चली गई थी.
फिलहाल के लिए ऐसा लग रहा है कि कीमतों की इस लड़ाई में सऊदी अरब को ज़्यादा नुक़सान हो रहा है. सोमवार को जब शेयर बाज़ार खुले तो आरामको की शेयर कीमतों में नौ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई जबकि सऊदी अरब के अपने शेयर बाज़ार में सोमवार को आठ फीसदी से ज़्यादा की गिरावट हुई.
अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण की योजना को पलीता लग सकता है. मोहम्मद बिन सलमान की ज़्यादातर योजनाओं के लिए पैसा आरामको के शेयरों की बिक्री से ही आ रहा है. लेकिन दांव पर दूसरे तेल उत्पादक देशों का भी बहुत कुछ लगा हुआ है.

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वेनेजुएला की स्थिति
बेकर इंस्टीट्यूट ऑफ़ राइस यूनिवर्सिटी में ऊर्जा रणनीति पर रिसर्च करने वाले फ्रांसिस्को मोनाल्डी कहते हैं, "आरामको ने पिछले दो दशक में सबसे बड़ी कटौती की है. अगर रूस और सऊदी अरब के बीच लड़ाई यूं ही जारी रही तो तेल की ज़्यादा सप्लाई और कोरोना संकट के मिलेजुले असर की वजह से तेल की कीमतें बेतहाशा गिर सकती हैं."
विशेषज्ञों का कहना है कि नए हालात में वेनेजुएला की निकोलस मादुरो सरकार को सबसे ज़्यादा नुक़सान हो सकता है. फ्रांसिस्को मोनाल्डी कहते हैं कि वेनेज़ुएला के लिए एक तरफ़ तो तेल कीमतों में गिरावट और दूसरी तरफ़ प्रतिबंध से बदतर स्थिति होने जा रही है.
अमरीकी प्रतिबंधों की मार झेल रहे ईरान की अर्थव्यवस्था भी काफी हद तक तेल से होने वाली कमाई पर निर्भर करती है. कीमतों की इस लड़ाई का खामियाजा उसे भी भुगतना पड़ सकता है. ब्राजील, अंगोला और नाइजीरिया भी कीमतों की लड़ाई के लंबे समय तक जारी रहने से प्रभावित होने वाले हैं.

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मुद्रा बाज़ार की स्थिति
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़ अस्सी के दशक के बाद से नॉर्वे की मुद्रा में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है.
मेक्सिको की मुद्रा पेसो में भी आठ फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि रूस और सऊदी अरब दोनों के निशाने पर रहने वाली अमरीकी तेल कंपनियां भी कीमतों की लड़ाई का नुक़सान उठाएंगी.
कई अमरीकी कंपनियां पहले से कर्ज में डूबी हुई हैं. उनमें से कुछ ने तो हाल के सालों में अपना बिज़नेस ही बंद कर लिया है. कुछ स्टाफ़ में छंटनी कर रही हैं.
किसी भी सूरत में अगर आज कोई फ़ायदे में लग रहा है तो वो कार ड्राइवर और ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोग हैं जो कम पैसे में अपना टैंक भर सकते हैं.
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