OIC विदेश मंत्रियों की बैठकः सऊदी अरब की कश्मीर पर हिचकिचाहट से पाकिस्तान मायूस

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- Author, सहर बलोच
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता
जेद्दा में इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी के तहत 'काउंसिल ऑफ़ फ़ॉरेन मिनिस्टर्स' (सीएफएम) का 45वां सत्र रविवार से शुरू होकर 11 फरवरी तक चलेगा.
लेकिन इस सत्र में अब ज्यादा दिलचस्पी इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि सऊदी अरब ने पाकिस्तान की कश्मीर पर सीएफएम का सत्र बुलाने की मांग अब तक स्वीकार नहीं की और ख़बरों के अनुसार सऊदी अरब की हिचकिचाहट पाकिस्तान के लिए मायूसी की वजह बन रही है.
इसी बारे में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने मलेशिया के अपने हालिया दो दिवसीय दौरे में एक मलेशियाई थिंक टैंक से बात करते हुए कहा कि ओआईसी भारत प्रशासित कश्मीर में हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर एक मत नहीं है.
इमरान ख़ान ने कहा, "हम बंटे हुए हैं.... हम अभी तक कश्मीर पर ओआईसी का सत्र नहीं बुला सके हैं."
लेकिन इसी बारे में पाकिस्तानी विदेश विभाग के एक उच्च अधिकारी ने बीबीसी को बताया, "ये सच है कि सऊदी अरब हिचकिचा रहा है. मैंने खुद मानवाधिकारों के उल्लंघन पर आधारित रिपोर्ट ओआईसी के स्वतंत्र स्थाई मानवाधिकार आयोग की तरफ़ से पेश की, लेकिन इसके बावजूद कुछ खास प्रगति नहीं हो सकी."

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सीएफएम क्या है?
अगस्त, 2019 में जब भारत ने कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म किया तो उसके साथ-साथ कश्मीर पर द्विपक्षीय वार्ता का रास्ता भी बंद हो गया.
इसके बाद से पाकिस्तान कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर की समस्या से संबंधित अपना पक्ष रखता आ रहा है और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों पर भारत के ख़िलाफ़ कार्रवाई की उम्मीद भी रखता है.
ओआईसी 57 मुस्लिम बहुसंख्यक देशों का संगठन है इसके अंतर्गत ज़्यादातर समितियां मुस्लिम देशों में होने वाली समस्याओं पर काम करती हैं.
इन सभी देशों के प्रमुखों की व्यस्तता और हर हफ्ते मुलाक़ात मुमकिन न होने की वजह से सीएफ़एम यानी इन देशों के विदेश मंत्रियों की एक परिषद बना दी गई है,जो इन देशों की आपसी और दूसरे देशों के साथ समस्याओं पर बातचीत करती है.
पाकिस्तान के विदेश विभाग के एक उच्च अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि ओआईसी का सीएफएम सत्र दूसरा बड़ा निर्णायक सत्र है.

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विदेशी नीति पर असर
सीएफएम सत्र या विदेश मंत्रियों की परिषद की बैठक हर साल विभिन्न सदस्य देशों में होती है. अब तक पाकिस्तान ने चार सीएफएम सत्र साल 1970, 1980, 1993 और 2007 में आयोजित किए हैं.
जबकि विदेश विभाग के एक उच्च अधिकारी ने बताया कि अगले साल सीएफएम का सत्र इस्लामाबाद में होने की उम्मीद है.
जहां तक इसकी विदेश नीति पर असर डालने की बात है तो इस पर एक सवालिया निशान है. अगर इस मंच को समयबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो सदस्य देश अहम मुद्दों पर दूसरे मुस्लिम देशों की तवज्जो ला सकते हैं.
ओआईसी के तहत शिकायत की कोई खास प्रक्रिया तो नहीं है अलबत्ता कश्मीरियों के अधिकार और भारत प्रशासित कश्मीर में होने वाले उल्लंघनों पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाती रही है.
बीबीसी से बात करते हुए पाकिस्तान के पूर्व विदेश सेक्रेटरी रियाज मोहम्मद खान ने कहा, "सीएफ़एम में शामिल विदेश मंत्रियों का प्रभाव और लॉबी मजबूत होती है, और यह समस्या कश्मीर हो या फलस्तीन... इन तमाम मामलों पर दूसरे देशों को इकट्ठा करने की ताकत रखती है."

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कश्मीर पर सऊदी सहयोग क्यों जरूरी?
रियाज मोहम्मद ख़ान का कहना है, "अंतरराष्ट्रीय मंचों से ज्यादा हर सदस्य देश का अपना-अपना प्रभाव होता है. इस तरह ओआईसी में सऊदी अरब की बहुत अहमियत है. उनका हेडक्वॉर्टर भी वहीं है, फंडिंग भी सऊदी अरब करता है."
इसके साथ ही उनका कहना था कि फलस्तीन के मामले पर भी अगर कोई निर्णायक बात हो सकती है तो वो सऊदी अरब के जरिए ही हो सकती है. लेकिन अब तक फलस्तीन पर अरब लीग के ज़रिए या कमेटी के सत्र के ज़रिए बात नहीं की गई, तो ये दो मामले हैं जो बार-बार कहीं ना कहीं रुक रहे हैं.
इसी बारे में पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर (पीआईआईए) से जुड़े हुए स्कॉलर मासूमा हसन ने बीबीसी को बताया कि कश्मीर के मामले पर जोर जबरदस्ती से काम नहीं चलेगा.
हम (पाकिस्तान) सऊदी अरब को नजरअंदाज नहीं कर सकते. हम तेल वहां से खरीदते हैं और सऊदी अरब पाकिस्तान में अरबों का निवेश कर रहा है तो पाकिस्तान कशमकश में है और आर्थिक तौर पर इस पोजीशन में नहीं है कि सऊदी अरब को तैयार कर सके.

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मलेशिया समिट में सऊदी के कहने पर दौरा रद्द
दिसंबर, 2019 में मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर में मलेशियाई प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद के नेतृत्व में 'कुआलालंपुर समिट' हुई जिसमें पाकिस्तान शामिल नहीं हुआ. इस समिट में पाकिस्तान के शामिल ना होने को सऊदी अरब के दबाव के सन्दर्भ में देखा गया.
इमरान खान ने मलेशिया के हालिया दौरे में पिछले दिसंबर में होने वाली समिट में भाग न लेने के संबंध में बात करते हुए कहा कि वो कुआलालंपुर में होने वाली कॉन्फ्रेंस में इसलिए शामिल नहीं हो सके 'क्योंकि बदकिस्मती से पाकिस्तान के बहुत करीब हमारे कुछ दोस्तों को ये महसूस हुआ कि शायद ये कॉन्फ्रेंस मुस्लिम देशों को बांट देगी.
उन्होंने कहा कि साफ तौर पर ये एक गलतफहमी थी क्योंकि कान्फ्रेंस के होने से जाहिर होता है कि इसका मक़सद मुस्लिम देशों को बांटना नहीं था.
इस घटना के बाद पाकिस्तान का कश्मीर पर सीएफएम का सत्र बुलाने की मांग का मक़सद अदल बदल के तौर पर देखा जा रहा है. यानी पाकिस्तान अब सऊदी अरब से बदले में कश्मीर पर सीएफएम करवाना चाह रहा है, जिसमें सऊदी अरब की दिलचस्पी नहीं है.
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खाड़ी देशों का भारत के प्रति रुख
विदेश कार्यालय के उच्च अधिकारी ने कहा कि हम कैसे बदले की उम्मीद कर सकते हैं? पाकिस्तान को बुरी आर्थिक स्थिति से निपटने के लिए पैसे दिए जाते हैं जिसके बदले में पाकिस्तान अपनी विदेश नीति पर खामोश हो जाता है. खामोश न भी होना चाहे तो मजबूर कर दिया जाता है.
उन्होंने कहा कि 'कश्मीर पर भारत की बर्बर नीतियों के बावजूद तमाम खाड़ी देश भारत में निवेश करने के ख्वाहिशमंद है. इसके नतीजे में कश्मीर में होने वाले मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को दबा दि जाता है.
इसी हवाले से विशेषज्ञों का मानना है कि रविवार को होने वाले सत्र में कश्मीर पर एक या दो संकल्पों के अलावा किसी व्यावहारिक क़दम की उम्मीद जमीनी हक़ीक़त के उलट है.
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कश्मीर डिप्लोमेसी पर विदेश विभाग की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में इस समय विदेश विभाग के कश्मीर से जुड़े फैसले और क्या क़दम उठाये गए, इस पर सवाल किये जा रहे हैं. जिस पर उम्मीद के खिलाफ विदेश कार्यालय ने भी अपनी हालिया ब्रीफिंग में जवाब दिया है.
हाल ही में मानवाधिकार मामलों के मंत्री शिरीन मज़ारी ने विदेश मंत्रालय कि कश्मीर पर किए गए कार्यों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इमरान खान कश्मीर की समस्या को बहुत आगे ले जा चुके हैं, लेकिन उनको संस्थानों की तरफ से खास तौर पर विदेश मंत्रालय से कोई खास सहयोग नहीं मिल रहा है.
उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर में पांच अगस्त, 2019 के बाद से होने वाले सरकारी गतिविधियों पर आवाज़ उठानी चाहिए.
जब विदेश विभाग की प्रवक्ता आयशा फारूकी से इस बारे में सवाल किया गया तो उनका कहना था कि कश्मीर की समस्या कोई एक दिन की घटना नहीं है बल्कि एक प्रक्रिया है जिसका पाकिस्तान एक अहम हिस्सा है.
दूसरी तरफ़, ओआईसी के मंच पर पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारियों का कहना है कि कुछ समय बात करने के लिए सही होते हैं और कुछ कदम उठाने के लिए, इस वक्त पाकिस्तान के लिए बात करना सही है.
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ओआईसी छोड़ना कितना व्यावहारिक ?
जहां एक तरफ विदेश मंत्रालय के कार्यों पर सवाल किए जा रहे हैं तो वही संसद के उच्च सदन के कुछ सदस्यों का कहना है कि पाकिस्तान को ओआईसी से निकल जाना चाहिए. अगस्त, 2019 में कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म होने के बाद सीनेट में बोलते हुए रजा रब्बानी ने कहा था कि ओआईसी का हाल संयुक्त राष्ट्र संघ से भी गया गुज़रा है.
उनका कहना था कि ओआईसी कभी भी मुसलमानों की मदद को नहीं पहुंची चाहे वह 1990 के दशक में बोस्निया और फलस्तीन में होने वाले ज़ुल्म हों या कश्मीर की समस्या हो. उन्होंने आलोचना की कि दुनिया और खासकर मुस्लिम देश मतलब परस्त हो चुके हैं.
लेकिन जब यही सवाल रियाज मोहम्मद खान से किया गया तो उनका कहना था कि ओआईसी को छोड़कर पाकिस्तान क्या हासिल कर लेगा? उल्टा हम और भी अकेलेपन के शिकार हो जाएंगे. इस समय ओआईसी के साथ रहते हुए कश्मीर के मामले पर कोशिश करनी चाहिए.
उनका ये भी कहना था कि चाहे पाकिस्तान सऊदी अरब का साथ दे या ना दे सऊदी अरब पर कोई असर नहीं पड़ेगा जबकि पाकिस्तान को कश्मीर और देश की अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में क़दम सोचकर उठाने होंगे.
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