नेहरू को 'मरहबा रसूल असलाम' कहने वाला सऊदी कैसे बना पाकिस्तान का ख़ास

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    • Author, टीम बीबीसी हिन्दी
    • पदनाम, नई दिल्ली

अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत रहे हुसैन हक़्क़ानी ने सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान के पाकिस्तान दौरे पर एक ट्वीट किया है. इस ट्वीट में उन्होंने 1976 की एक न्यूज़ रिपोर्ट के कतरन को शेयर किया है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की यह न्यूज़ रिपोर्ट सऊदी अरब के तत्कालीन किंग ख़ालिद के छह दिवसीय पाकिस्तान दौरे की है.

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को उम्मीद थी कि सऊदी वित्तीय मदद बढ़ाएगा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यह सऊदी किंग का पहला पाकिस्तान दौरा है.

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इसी रिपोर्ट के एक हिस्से की तस्वीर को ट्वीट करते हुए हुसैन हक़्क़ानी ने लिखा है, ''यह 1976 की न्यूज़ रिपोर्ट है. 43 साल बाद, सऊदी का दूसरा नेता और वही उम्मीदें?'' हुसैन हक़्क़ानी के इस ट्वीट पर पाकिस्तानियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. हालांकि कुछ लोगों ने समर्थन भी किया है.

ठहर गया पाकिस्तान

रविवार की रात सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान पाकिस्तान पहुंचे तो मानो पूरा पाकिस्तान ठहर गया हो. प्रिंस सलमान पहली बार पाकिस्तान पहुंचे हैं. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और सेना प्रमुख सलमान के स्वागत में एयरपोर्ट पर खड़े थे.

ख़ुद इमरान ख़ान गाड़ी चलाकर सलमान को अपने आवास पर ले आए. दोनों की मुलाक़ात में इमरान ख़ान की बॉडी लैंग्वेज से साफ़ झलक रहा था कि वो अपनी हर बात में आभार जता रहे हैं.

सलमान के दौरे को लेकर पाकिस्तानी मीडिया और सत्ता में महीनों से हलचल थी. पाकिस्तानी मीडिया में तो रोज़ क़यास लगाए जाते थे कि सलमान इस दौरे में पाकिस्तान को कितने अरब डॉलर की मदद करेंगे.

दरअसल, पाकिस्तान अपने अस्तित्व में आने के बाद से सबसे भयानक आर्थिक संकट से गुजर रहा है. हालत ये है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार 9 अरब डॉलर हो गया है जबकि बांग्लादेश का 33 अरब डॉलर है.

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पाकिस्तान को सलामान के दौरे से बेशुमार उम्मीदें हैं. लेकिन क्या पाकिस्तान के मर्ज़ की दवा सऊदी है या फिर पाकिस्तान के पास सऊदी के अलावा कोई विकल्प नहीं है?

सऊदी अरब को पाकिस्तान सुरक्षा का भरोसा दिलाता है. पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है और उसके लगता है कि इस हथियार के दम पर मध्य-पूर्व में टकराव की स्थिति बनी तो वो सऊदी के साथ मज़बूती से खड़ा रहेगा.

इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पहले विदेशी दौरे के लिए सऊदी को ही चुना था. ख़ान ने इस दौरे में कहा था कि पाकिस्तान किसी बाहरी ताक़त को सऊदी पर हमला नहीं करने देगा.

अभी सऊदी में 25 लाख से ज़्यादा पाकिस्तानी काम करते हैं. इनमें से लगभग मज़दूर हैं. ये हर साल पाकिस्तान में अपने परिवारों के लिए 5 से 6 अरब डॉलर की रक़म भेजते हैं और ये पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था के लिए काफ़ी अहम है.

अरब न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब इंटेलिजेंस के प्रमुख प्रिंस तुर्की बिन फ़ैसल ने पाकिस्तान और सऊदी के रिश्तों के बारे में कहा था, ''संभवतः दो देशों के बीच का यह सबसे निकटतम संबंध है.''

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1960 के दशक से ही पाकिस्तानी सैनिक सऊदी के शाही शासन की सुरक्षा में लगे हैं. इसके साथ ही पाकिस्तान सऊदी के सैनिकों और पायलटों को ट्रेनिंग देता है. 1969 में पाकिस्तान ने यमन की सेना के आक्रमण को रोकने में मदद की थी.

ईरान-इराक़ युद्ध में भी पाकिस्तान ने अपनी सेना को सऊदी अरब भेजा था. 2016 की रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब पाकिस्तानी हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है. पाकिस्तान ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी ने इसका खुलकर समर्थन किया था.

सऊदी अरब ने 1998 से 1999 तक 50 हज़ार बैरल तेल मुफ़्त में दिया था. सऊदी ने ऐसा तब किया जब उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे थे.

अफ़ग़ानिस्तान से रूसी सेना वापस गई तो संयुक्त अरब अमीरात के अलावा सऊदी अरब एकमात्र देश था जिसने काबुल में तालिबान शासन का समर्थन किया था. इसके साथ ही कश्मीर मसले पर भी सऊदी अरब पाकिस्तान की लाइन के साथ रहा है.

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सऊदी अरब अपनी नीतियों और कार्रवाइयों को लेकर सुन्नी मुसलमान देशों को भरोसे में लेते रहा है. शिया मुस्लिम देश ईरान को लेकर सऊदी की सुन्नी गोलबंदी जगज़ाहिर है. यमन में सऊदी के नेतृत्व वाले देशों की कार्रवाई में भी सुन्नी बनाम शिया का ही बड़ा रोल है.

पाकिस्तान भी सुन्नी मुसलमान बहुल देश है. हालांकि यमन में वो सऊदी के साथ सीधे तौर पर नहीं है लेकिन अन्य कई तरह के सैन्य समर्थन दे रहा है.

1980 के दशक में सऊदी ने अफ़ग़ानिस्तान से सोवियत सेना के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए पाकिस्तान के ज़रिए ही अफ़गान मुजाहिदीनों को तैयार किया था. इसी का नतीजा हुआ कि तालिबान का जन्म हुआ और फिर अल-क़ायदा सामने आया.

पाकिस्तान में बेहिसाब सऊदी फंड की एक बड़ी आलोचना भी है. यह आलोचना पाकिस्तान के भीतर भी होती है कि सऊदी के फंड से पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरता बढ़ी है. सऊदी का शाही शासन इस्लामिक रूढ़िवादी और वहाबी विचारधारा को प्रोत्साहित करता है.

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ऐसे में सऊदी के फंड से पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरता और रूढ़िवाद को ऊर्वर ज़मीन मिली. सऊदी की मदद से पाकिस्तान में धार्मिक स्कूल और मदरसे ख़ूब खुले. पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरता के कारण हज़ारों पाकिस्तानियों की जान भी गई.

अरब न्यूज़ ने लिखा है, ''1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध के तीन साल बाद तत्कालीन प्रिंस सुल्तान बिन अज़ीज़ पाकिस्तान गए थे और तभी दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को लेकर समझौता हुआ था. 1970 के दशक में भारत के परमाणु लक्ष्यों को लेकर भी ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को मदद की थी.

सऊदी अरब की पाकिस्तान के साथ दोस्ती भले बहुत मज़बूत है लेकिन वो भारत की भी उपेक्षा नहीं करता है. 1956 के सितंबर महीने में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सऊदी अरब के दौरे पर गए थे.

इस दौरे पर सऊदी की भीड़ ने नेहरू के स्वागत में 'मरहबा रसूल अल सलाम' मतलब शांति के दूत आपका स्वागत है के नारे लगाए थे. हालांकि 1970 के दशक में अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत संघ की सेना के ख़िलाफ़ पाकिस्तान ने मुजाहिदीनों को खड़ा करने में मदद की और सऊदी का झुकाव पाकिस्तान की तरफ़ बढ़ता गया.

सऊदी ने कभी ख़ुद को भारत से पूरी तरह अलग नहीं किया. दोनों देशों ने पारस्पपिक आर्थिक हितों को ध्यान में रख संबंधों को कायम रखा. सऊदी में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी भी काम करते हैं.

सऊदी में भारतीय बड़ी नौकरी भी करते हैं और मज़दूरों के काम भी. वक़्त के साथ भारतीयों की संख्या बढ़ती गई. 2016 में सऊदी में काम करने वालों भारतीयों की संख्या बढ़कर क़रीब 30 लाख पहुंच गई.

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अगर खाड़ी के सभी देशों को मिला दिया जाए तो भारतीयों की संख्या 73 लाख हो जाती है और इन्होंने 2015 में भारत में अपने परिजनों के 36 अरब डॉलर भेजे थे.

भारत की आर्थिक प्रगति और बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों के कारण सऊदी अरब के लिए भारत तेल का बड़ा ख़रीददार बन गया है. आर्थिक ज़रूरतों के बाद दोनों देशों के अहम होते रिश्तों के कारण 2006 में सऊदी के किंग अब्दु्ल्ला का दौरा हुआ.

इस दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्तों में और प्रगाढ़ता आई.

अब तो भारत और सऊदी अरब आर्थिक रूप से एक दूसरे के लिए काफ़ी अहम हो गए हैं. 2014-15 में दोनों देशों के बीच 39.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान और सऊदी के बीच 6.1 अरब डॉलर का ही व्यापार हुआ.

भारत और सऊदी में आर्थिक संबंध काफ़ी मज़बूत हैं लेकिन पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा संबंध काफ़ी तगड़े हैं. हालांकि अब भारत और सऊदी अरब के अलावा बाक़ी के खाड़ी देशों से रक्षा संबंध भी बढ़ रहे हैं.

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इसकी शुरुआत 2010 में हो गई थी जब मनमोहन सिंह सऊदी के दौरे पर गए थे. भारत और सऊदी ने 2014 में एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें सूचनाओं के आदान-प्रदान और सैन्य ट्रेनिंग जैसी चीज़ें शामिल थीं.

प्रधानमंत्री मोदी भी सऊदी के दौरे पर गए और उनका शाही शासन से गर्मजोशी से स्वागत किया था. मोदी को सऊदी का सर्वोच नागरिक सम्मान भी दिया गया.

भारत और सऊदी के बढ़ते संबंधों के बीच पाकिस्तानी नेताओं को भी अहसास हुआ कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अपने-अपने हितों के बुनियाद पर बनते हैं.

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