ईरान में विरोध-प्रदर्शन: सरकार विरोधी कौन हैं?

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- Author, रियलिटी चेक टीम
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
ईरान ने जब यह स्वीकार किया कि उसकी सेना ने 'ग़लती से' (जिसे मानवीय भूल बताया गया) यूक्रेन के यात्री विमान को मार कर गिरा दिया तो वहां की सरकार के ख़िलाफ़ राजधानी तेहरान और अन्य शहरों में विरोध प्रदर्शन किए गए.
176 लोग को ले जा रहे इस विमान में ईरान के 86 नागरिक थे. इसके अलावा विमान में कनाडा, यूक्रेन, ब्रिटेन, अफ़ग़ानिस्तान और स्वीडन के नागरिक भी थे. मिसाइल हमले में इन सभी यात्रियों की मौत हो गई थी.
हालांकि अधिकारियों ने ये भी कहा था कि विमान पर जान-बूझ कर मिसाइल नहीं दाग़ी गई थीं.
11 जनवरी को ईरान ने यह स्वीकार किया और इसके बाद जो विरोध प्रदर्शन किया गया उसमें सरकार विरोधी नारे भी लगाए गए.
ऐसे में सवाल ये है कि ईरान में विपक्ष कितना ताक़तवर है? और ईरान की हुकूमत के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे ये प्रदर्शनकारी आख़िर चाहते क्या हैं? वो किस के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं. साथ ही प्रशासन ने अतीत में ऐसे विरोध प्रदर्शन होने पर क्या किया?

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ईरान में सड़कों पर उतर कर हुकूमत के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करने वाले लोगों की ज़्यादातर संख्या राजधानी तेहरान में ही देखने को मिली है. हालांकि इस्फ़हान जैसे शहरों में भी काफ़ी तगड़े विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं. इन प्रदर्शनकारियों में ज़्यादातर यूनिवर्सिटी के छात्र हैं. हालांकि, इनमें बड़ी तादाद ईरान के मध्यम वर्ग के लोगों की भी है, जो विमान के गिराए जाने की वजह से मारे गए लोगों को लेकर नाराज़ हैं.
इन प्रदर्शनकारियों ने अधिकारियों की इस बात के लिए निंदा की है कि उन्होंने शुरू में इस दुर्घटना का सच नहीं बताया. लेकिन, प्रदर्शन के दौरान, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला ख़मेनेई और इस्लामिक हुकूमत के ख़िलाफ़ भी नारेबाज़ी होते सुना गया है.
बीबीसी की राना रहीमपुर कहती हैं कि, 'जो प्रदर्शनकारी हैं, उन में से ज़्यादातर छात्र हैं. जो विदेशों में सफ़र करने का ख़र्च उठा सकते हैं. विमान दुर्घटना में मारे गए लोगों का इन प्रदर्शनकारियों में से कई के साथ परिचय रहा होगा.'
वैसे अब तक तो इस बात के संकेत नहीं मिले हैं कि ईरान में हुकूमत के ख़िलाफ़ सड़क पर उतरे लोगों की नुमाइंदगी कोई एक शख़्स कर रहा है. अमरीका की पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के ईरानी मूल के प्रोफ़ेसर फ़ातेमेह शम्स कहते हैं कि, 'ये कहना मुश्किल है कि इन प्रदर्शनों के पीछे किसी एक शख़्स का हाथ है, जिस के पीछे ये सभी प्रदर्शनकारी एकजुट हो गए हैं.'

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ईरान में किस तरह का सियासी विपक्ष है?
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में चुनाव तो होते हैं. लेकिन, सभी राजनीतिक दलों को इस्लामिक गणराज्य की पाबंदियों के दायरे में रह कर ही सियासी गतिविधियां चलाने की इजाज़त है. ईरान में हुए 2016 के संसदीय चुनावों में ईरान की गार्जियन काउंसिल ने क़रीब आधे प्रत्याशियों की उम्मीदवारी को रद्द कर दिया था.
ईरान की ये गार्जियन काउंसिल ही, सभी प्रत्याशियों की ईरान की इस्लामिक व्यवस्था के प्रति वफ़ादारी को परखता है. और इस साल फरवरी में होने वाले संसदीय चुनावों में हज़ारों संभावित उम्मीदवारों को दोबारा चुनाव के अयोग्य ठहरा दिया गया है. इन में देश के 90 फ़ीसद मौजूदा सांसद शामिल हैं.
ईरान में कोई भी उम्मीदवार या सियासी समूह अगर इस्लामिक गणराज्य के ख़िलाफ़ सोच रखता है, या फिर उसे पूरी तरह बदलना चाहता है, तो उसे चुनाव लड़ने से रोक दिया जाता है.
ईरान की गार्जियन काउंसिल राष्ट्रपति पद के संभावित प्रत्याशियों पर भी चुनाव न लड़ने की पाबंदी लगा सकती है. अगर ईरान की संसद से कोई ऐसा क़ानून पारित हो जाता है, जो ईरान के संविधान और इस्लामिक क़ानूनों के ख़िलाफ़ है, तो इस के पास ये अधिकार भी है कि वो इस क़ानून को भी वीटो कर सके.
आयतुल्लाह अली ख़मेनेई, ईरान की राजनीतिक व्यवस्था के शिखर पर बैठे नेता हैं. वो ही ईरान की गार्जियन काउंसिल या संरक्षक परिषद् के आधे सदस्यों को नियुक्त करते हैं. ईरान के सर्वोच्च नेता ही देश की सेनाओं पर नियंत्रण रखते हैं. ईरान की सुरक्षा, रक्षा और विदेश नीति के प्रमुख मसलों से जुड़े फ़ैसले भी ख़मेनेई ही करते हैं.
तो, हक़ीक़त में ईरान की संसद और राष्ट्रपति के पास सीमित अधिकार ही होते हैं. भले ही वो देश में किसी परिवर्तन का समर्थन करते हों. ईरान में हुकूमत के ख़िलाफ़ कई ऐसे आंदोलन भी चल रहे हैं, जो नस्लीय अल्पसंख्यक समुदायों जैसे-कुर्दों, अरबों, बलूचों और अज़रबैजानियों को और अधिक स्वायत्तता देने की मांग कर रहे हैं. इन में से कई संगठन जैसे डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ ईरानियन कुर्दिस्तान तो कई दशकों से ईरान की सरकार के ख़िलाफ़ हथियारबंद आंदोलन भी चला रहे हैं.

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क्या ईरान में विपक्ष का कोई नेता भी है?
ईरान में कई बरसों से सुधारवाद का आंदोलन भी चल रहा है. देश के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद ख़ातमी इस के अगुवा माने जाते हैं. मोहम्मद ख़ातमी, वर्ष 1997 से 2005 तक ईरान के राष्ट्रपति रहे थे. उन्होंने, अपने शासन काल के दौरान सीमित स्तर पर सामाजिक और आर्थिक सुधार भी किए थे.
ख़ातमी ने पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारने का इरादा रखने के भी संकेत दिए थे. हालांकि, ईरान में व्यापक बदलाव लाने की ख़ातमी की कोशिशों पर रूढ़िवादी लोगों ने रोक लगा दी थी. जिस के बाद मोहम्मद ख़ातमी सियासी तौर पर ख़ुद भी हाशिए पर चले गए थे. उन की आवाजाही और मीडिया से बात करने पर भी कई तरह की पाबंदियां लगा दी गई थीं.
2009 में ईरान की हुकूमत के सामने एक बहुत बड़ी चुनौती उस वक़्त खड़ी हुई, जब राष्ट्रपति चुनाव में कट्टरपंथी महमूद अहमदीनेजाद की जीत हुई. राष्ट्रपति चुनाव में हारे प्रत्याशियों, मीर हुसैन मुसावी और मेहदी करौबी ने चुनाव के नतीजों को चुनौती दी थी. वो ईरान के 'ग्रीन मूवमेंट' के नेताओं के तौर पर मशहूर हुए थे.
दोबारा राष्ट्रपति चुनाव कराने की मांग को लेकर दसियों लाख लोग ईरान की सड़कों पर उतरे थे. लेकिन, अयातुल्लाह ख़मेनेई ने कहा कि चुनाव के नतीजे वाजिब हैं. इसलिए दोबारा राष्ट्रपति चुनाव नहीं होंगे

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विरोध-प्रदर्शन करने वालों पर सख़्त कार्रवाई
उस साल दोबारा राष्ट्रपति चुनाव कराने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर ईरान की हुकूमत ने सख़्त कार्रवाई की थी. जिस में विपक्षी दलों के दर्जनों समर्थकों के मारे जाने की ख़बरें आई थीं.
सरकार का विरोध कर रहे कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया गया था. मीर हुसैन मुसावी और मेहदी करौबी तो उस घटना के एक दशक से ज़्यादा वक़्त गुज़र जाने के बाद आज भी नज़रबंद हैं. हाल के बरसों की बात करें, तो 2017 के आख़िर में और साल 2018 की शुरुआत में देश की ख़राब होती आर्थिक स्थिति के ख़िलाफ़ भी ईरान की जनता सड़कों पर उतरी थी.
ईरान के कई हिस्सों में बेरोज़गारी की दर बहुत ज़्यादा है. इस का सब से बुरा असर देश के युवा तबक़े पर पड़ा है. वहीं, ईरान का मध्यम वर्ग जो आम तौर पर धनाढ्य माना जाता है, वो भी इन विरोध प्रदर्शनों के लिए युवाओं के साथ सड़कों पर उतरा था. इन लोगों की नाराज़गी राष्ट्रपति हसन रूहानी से थी.
हसन रुहानी जो आम तौर पर तो नरमपंथी माने जाते हैं, मगर वो देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने में नाकाम रहे थे. इन विरोध प्रदर्शनों में शामिल लोगों ने देश के नेताओं के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी की और प्रदर्शन के दौरान, लोगों को ईरान में राजशाही को दोबारा बहाल करने की मांग करते हुए भी सुना गया था.
ईरान के रजा शाह पहलवी को 1979 में इस्लामिक क्रांति के ज़रिए सत्ता से बेदख़ल कर दिया गया था.
ईरान में नवंबर 2019 में एक बार फिर से विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे. तब सरकार ने एलान किया था कि वो पेट्रोल के दाम 50 फ़ीसदी बढ़ाने जा रही है. सरकार का कहना था कि ईरान पर पश्चिमी देशों की आर्थिक पाबंदियों की वजह से उसे ये क़दम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है. ख़ास तौर से अमरीका ने ईरान के साथ पहले हुई परमाणु समझौते से पीछे हटने के बाद नई पाबंदियां लगाने का एलान किया था.
ईरान की हुकूमत के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ लोगों के विरोध-प्रदर्शन को बड़ी निर्दयता से कुचल दिया गया था. सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनों को कुचलने के लिए ख़ूनी अभियान चलाया था. एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि ईरान के सुरक्षा बलों की सख़्ती में 304 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. हालांकि समाचार एजेंसी रायटर ने ईरान सरकार के इस अभियान में 1500 से ज़्यादा लोगों के मारे जाने की रिपोर्ट दी थी.
ईरान के अधिकारियों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर किए गए इन दोनों दावों को ग़लत बता कर ख़ारिज कर दिया था. इस दौरान, ईरान में इंटरनेट पर भी पाबंदी लगा दी गई थी, जो पांच दिनों तक लगी रही थी. जिस से ईरान, पूरी दुनिया से कट गया था.

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इन हालिया विरोध प्रदर्शनों की सब से ख़ास बात ये है कि ये नेतृत्व विहीन रहे हैं. आम लोग किसी नेता के बग़ैर ही सरकार के ख़िलाफ़ ज़मीनी स्तर पर नाराज़गी का इज़हार कर रहे हैं. और, अवाम की आवाज़ उठा रहे हैं. उन की नाराज़गी की मुख्य वजहें बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी और अमीर-ग़रीब के बीच बढ़ती खाई है.
हालांकि, बार-बार लोगों का ग़ुस्सा भड़क उठने के बावजूद, ईरान की सरकार इन पर क़ाबू पाने में सफल रही है. लोगों की नाराज़गी से निपटने के लिए ईरान की इस्लामिक हुकूमत ने विपक्षी नेताओं पर सख़्त पाबंदियों से लेकर, जनता की आवाज़ को दबाने वाले क़दम उठाने तक का सहारा लिया है.
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