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भारत-पाकिस्तान: देर भले हो गई है मगर अंधेर नहीं: वुसत की डायरी
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी के लिए
जब हर तरफ़ वहशत डेरे डालने लगे तो अचानक से कोई उम्मीद आकर कांपता हुआ हाथ थाम लेती है. ये कहते हुए कि, 'मैं हूं ना.'
ऐसे में ये बात भी कितनी असाधारण लगती है कि लाखों में कोई एक या दो व्यक्ति थे जिन्होंने ब्यूरोक्रेट बनकर देश और जनता की ख़्वाब देखा होगा और फिर वो बड़े अफ़सर बन भी गए हों.
पर एक दिन ये सोचकर अपना सारा भविष्य एक त्यागपत्र में रख दें कि हमारा दिल नहीं मानता कि जो हमसे करने को कहा जा रहा है या देश को जिस दिशा में ले जाया जा रहा है, हम भी उसी बहाव में बहते चले जाएं.
'ये रही आपकी नौकरी, संभालिए.' मायूसी के हाले में से झांकती ये ख़बर भी कितनी अच्छी लगती है कि जंतर-मंतर पर छोटी सी भीड़ नारे लगा रही हो कि तुम देश के साथ जो कर रहे हो हमारे नाम पर, मत करो.
या सीमा पार किसी अख़बार में आग लगाने वाले कॉलमों के बीच छपा ये लेख भी कितना महत्वपूर्ण लगता है कि 'दो एटमी पावरों का जोश हमें सिर्फ़ नरक की ओर ही धकेल सकता है.'
जो माहौल बन चुका है, उसमें ये बात भी कितनी आशाजनक लगती है कि कश्मीर तो सुलटे या न सुलटे मगर करतारपुर कॉरिडोर की प्रक्रिया पटरी से किसी हाल में नहीं उतरनी चाहिए.
भारत से फ़िलहाल सारा व्यवहार बंद रहेगा मगर जीवन रक्षक दवाओं में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल पाकिस्तान लाने पर कोई पाबंदी नहीं होगी.
ऐसे समय में जब दोनों ओर मुंह से आग निकल रही हो, दहकते मीडिया पर 'तांडव नाच' की तैयारी दिखाई जा रही हो, कोई ऐसी गाली न बची हो जो न दी जा सके, कोई ऐसा आरोप जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे पर न लगाया जा रहा हो.
नीचा दिखाने वाले तरकश से तीरों की बारिश न हो रही हो, यहां तक कि चंद्रयान मिशन के चंद्रमा पर उतरने की असफलता को भी ट्विटर की सान पर चढ़ा दिया जाए और पाकिस्तान के साइंस और टेक्नॉलजी के वज़ीर फ़वाद चौधरी ये ट्वीट करें कि 'जो काम आता नहीं, उसका पंगा नहीं लेते डियर इंडिया'.
इस पर गालम गलौज़ के छिड़ने वाले युद्ध के बीचोंबीच अगर चंद पाकिस्तानी ट्विटर या फ़ेसबुक पर लिखें कि भारत साइंस और टेक्नॉलॉजी में हमसे बहुत आगे है, या 'ग़म न करो, अगली कोशिश कामयाब होगी' या 'फ़वाद चौधरी को ये ट्वीट तब करना चाहिए था जब पाकिस्तान चांद पर न सही, अंतरिक्ष में ही कोई रॉकेट छोड़कर दिखाता'.
कश्मीर की गर्मागर्मी में भी ये जवाबी ट्वीट बताते हैं कि देर भले हो गई हो मगर अंधेर नहीं हुआ है. रौशनी की अपनी दुनिया है. दुख है तो बस इतना कि आख़िर हमें आना इस पर ही पड़ता है, भले वक़्त बर्बाद किए बगैर आ जाओ या लंबा चक्कर काटकर तबाही के रास्ते आओ. आना तो पड़ेगा.
तो फिर अक्लमंदी क्या हुई? इसका जवाब भी क्या रॉकेट साइंस ही देगी?
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