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गिलगित-बल्तिस्तान के लोग पाकिस्तान से कितने ख़ुश
- Author, शुमाइला ज़ाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, स्कर्दू (गिलगित बल्तिस्तान) से
83 साल के रुस्तम अली अपनी उम्र के हिसाब से काफ़ी सक्रिय हैं. उनके बेटे पाकिस्तान स्थित बलिस्तान के स्कर्दू ज़िले में एक घर बना रहे हैं और वो भी वहीं गए हुए थे. बल्तिस्तान का इलाक़ा भारत के लद्दाख की सीमा से मिलता है.
रुस्तम अली के बेटे का घर अभी पूरा नहीं बना है. उसकी अधूरी इमारत ऊंचे पहाड़ों के बीच तनकर खड़ी है. रुस्तम लगातार अपने पोते से बात कर रहे थे, साथ ही वो उस अधूरी इमारत में सीमेंट लगी दीवार पर अपनी उंगलियां भी फिरा रहे थे. ऐसा करते-करते वो अचानक रोने लगे.
रुस्तम चलोंखा गाँव के रहने वाले हैं. साल 1971 के पहले तक कारगिल सेक्टर का ये गाँव पाकिस्तान का हिस्सा हुआ करता था लेकिन 1971 के युद्ध में भारत ने इस पर अधिकार कर लिया था.
रुस्तम रोते हुए बताते हैं, "मुझे अपना घर और गाँव हर पल याद आता है. मुझे अब भी सब कुछ याद है- पुल, फलों का बगीचा और रास्ते. हर रात सपनों में मैं ख़ुद को वहीं पाता हूं."
रुस्तम जब ये बताते हैं, आंसू उनकी आंखों से लुढ़क कर उनके गालों पर गिरने लगते हैं.
रुस्तम अकेले नहीं हैं, यहां दर्जनों ऐसे परिवार हैं जो गिलगित बल्तिस्तान क्षेत्र में भारत के अधिपत्य वाले गाँवों में रह रहे हैं.
वो गाँव जो लगभग पिछले 50 वर्षों से भारत के हिस्सा हैं, उनके मन में अब भी उम्मीद है कि वो कभी न कभी अपने परिवार से दोबारा मिलेंगे.
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'हमारी संपत्ति से दूर रहे भारत सरकार'
मगर ये उम्मीद अब धीरे-धीरे धूमिल पड़ने लगी है. ख़ासकर जब से भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर को ख़ास दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और 35-A को ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है.
अनुच्छेद 370 भारत प्रशासित कश्मीर को अपना अलग संविधान, अलग ध्वज और एक अलग राज्य होने की स्वायत्तता देता था. रक्षा, विदेश और सूचना के अलावा बाकी सभी मामलों को जम्मू-कश्मीर अपने स्तर पर संभालता था.
वहीं अनुच्छेद 35-A जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को विशेष दर्जा देता था और राज्य में सिर्फ़ वही लोग संपत्ति ख़रीद या रख सकते थे जो वहां के स्थायी निवासी हैं.
रुस्तम अली जैसे हज़ारों शरणार्थियों और उनकी संपत्तियों के लिए अनुच्छेद 370 और 35 ए एक सुरक्षा कवच की तरह था. अब उन्हें लगता है कि उनसे ये सुविधा भी छीन ली गई है.
रुस्तम अली सिसकते हुए और रुंधी आवाज़ में कहते हैं, "भारत सरकार को हमारी संपत्ति लेने का कोई हक़ नहीं हैं. मैं उनसे कहना चाहता हूं कि वो इससे दूर रहें. हम अपने इलाक़े में राजाओं की तरह हुआ करते थे लेकिन अब हमसे सब कुछ छीन लिया गया है, हम भिखारी बन गए हैं."
भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा सीमा रेखा खींचे जाने से पहले गिलगित-बलिस्तान जम्मू-कश्मीर की राजसी सियासत का हिस्सा था. बाद में पाकिस्तान ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया और ये पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर का हिस्सा बन गया.
भारत, चीन, पाकिस्तान...सबके लिए अहम
बेमिसाल प्राकृतिक सौंदर्य, बर्फ़ से ढके पहाड़ों, ख़ूबसूरत घाटियों और फलों के बगीचों वाले गिलगित-बल्तिस्तान की सुंदरता अद्वितीय है, मगर इसकी भौगोलिक स्थिति इसे भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के लिए और ज़्यादा महत्वपूर्ण बना देती है.
इसकी सीमाएं चार देशों भारत, पाकिस्तान, चीन और तजाकिस्तान से मिलती हैं. इनमें से तीन देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं. इतना ही नहीं, गिलगित बल्तिस्तान चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडॉर (CPEC) का प्रवेश मार्ग भी है.
मोटे तौर पर देखा जाए तो पाकिस्तान के अधिपत्य वाले गिलगित-बल्तिस्तान में हालात कमोबेश काबू में ही रहे हैं. हालांकि यहां के कुछ राष्ट्रवादी पाकिस्तान सरकार के 'दोहरे रवैये' से हमेशा नाख़ुश ज़रूर रहे हैं.
हमने तीन अलग-अलग राष्ट्रवादी समूहों के प्रतिनिधियों से स्कर्दू के शांत और सुदूर इलाके में स्थित होटल में मुलाक़ात की. शब्बीर मेहर, अल्ताफ़ हुसैन और अली शफ़ा राष्ट्रवादी समूहों के प्रतिनिधि हैं और आम लोगों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं.
जब ये हमसे मिले, तीनों ग़ुस्से और कड़वाहट से भरे थे.
'हमें बेवकूफ़ बना रहा है पाकिस्तान'
राष्ट्रवादी नेता शब्बीर मेहर गिलगित-बल्तिस्तान डेमोक्रेटिक फ़्रंट के लीडर हैं.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान इस क्षेत्र को अपना कहने से कतराता रहा है और हमेशा ये कहता रहा है कि गिलगित-बल्तिस्तान कश्मीर विवाद से जुड़ा है इसलिए तब तक पूरी तरह नहीं अपनाया जा सकता, जब तक कश्मीर मुद्दे का हल न निकल जाए. लेकिन ज़मीन पर ये इसके ठीक उलट बर्ताव करता है."
शब्बीर का दावा है कि पाकिस्तान ने ख़ुद आज से दशकों पहले 35A से मिलता-जुलता वो क़ानून ख़त्म कर दिया जो इस क्षेत्र के लोगों को विशेष सुविधाएं देता था.
वो कहते हैं, "35-A और स्टेट सब्जेक्ट रूल (एसएसआर) एक जैसे थे. भारत ने स्थानीय लोगों के हक़ छीनने के लिए 35-A ख़त्म कर दिया और यहां के संसाधनों पर क़ब्ज़ा करने के लिए गिलगित-बल्तिस्तान में एसएसआर ख़त्म कर दिया गया है. हम दोनों की ही निंदा करते हैं. पाकिस्तान में एसएसआर और जम्मू-कश्मीर में 35-A बहाल होना चाहिए.''
शब्बीर ग़ुस्से से कहते हैं, "हमारी तीन पीढ़ियां बिना पहचान के गुज़र गईं. हम अपने भविष्य को लेकर भी निश्चिंत नहीं हैं, लोग पागल हो गए हैं. सीपीईसी हमारी ज़मीन से होकर गुज़र रहा है और हमें इससे कुछ नहीं मिल रहा है."
राष्ट्रवादियों का मानना है कि पाकिस्तान का रुख़ गिलगित-बल्तिस्तान के लोगों के साथ न्यायसंगत नहीं रहा है.
बल्तिस्तान यूथ अलायंस के अली शफ़ा कहते हैं, "वो हमसे गिलगित बल्तिस्तान के संयोजन का वादा करते हमें 72 वर्षों से बेवकूफ़ बना रहे हैं और हमारे स्थानीय नेता भी अपने व्यक्तिगत हितों के लिए इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. अगर हम अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाते हैं तो वे हमें गद्दार करते हैं. कश्मीरियों के लिए रोने की बजाय उन्हें यहां एएसआर बहाल करना चाहिए.
बल्तिस्तान यूथ फ़ेडरेशन के नेता अल्ताफ़ हुसैन भी अली शफ़ा से सहमति जताते हैं.
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'जनमत संग्रह कराए संयुक्त राष्ट्र'
वो कहते हैं, "हम कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन करते हैं और भारत सरकार के क़दम की कड़ी निंदा करते हैं. हमारी मांग है कि संयुक्त राष्ट्र इन विवादित क्षेत्रों में जनमत संग्रह कराए. अगर ये मुमकिन नहीं है तो पाकिस्तान को एसएसआर बहाल करना चाहिए और भारत को अनुच्छेद 370."
गिलगित-बल्तिस्तान भी कभी कश्मीर के महाराजा के नियंत्रण में था.
हालांकि पाकिस्तान ने हमेशा यही कहा कि उसके पास ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड या कागज़ नहीं है. बाद में 1974 में पाकिस्तान सरकार ने प्रशासनिक और न्यायिक सुधार के रास्ते एसएसआर को निष्प्रभावी भी कर दिया था.
इन सभी राजनीतिक जटिलताओं से दूर नायला बतूल सीमा के उस पार बसे अपने परिवार के लिए बेहद चिंतित है. नायला भी कारगिल के चलोंखा गांव से ताल्लुक रखती हैं. वो बीते पाँच अगस्त से अपने परिवार से संपर्क नहीं कर पाई हैं.
नायला कांपती हुई आवाज़ में कहती हैं, "हमें मीडिया से जो कुछ भी पता चल रहा है, वो परेशान करने वाला है. हमें मालूम नहीं कि हमारे परिवार के लोग किन हालात में हैं. उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया है या उन्हें तंग किया जा रहा है. वो कर्फ़्यू में हैं या बाहर, उनके पास कुछ खाने को भी है या नहीं, औरतें और बच्चे कैसे हैं...हमें कुछ नहीं मालूम. हम पूरी तरह असहाय हैं.''
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