अनुच्छेद 370 पर यूएन में ये देश भारत का दे सकते हैं साथ

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- Author, सलीम रिज़वी
- पदनाम, न्यूयॉर्क से, बीबीसी हिंदी के लिए
अमरीका का कहना है कि भारत सरकार ने अमरीकी सरकार को कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बारे में न तो पहले से कोई चर्चा की और न ही पहले से कुछ बताया था.
अमरीकी विदेश मंत्रालय की दक्षिण एशिया की कार्यकारी सहायक सेक्रेटरी एलिस वेल्स ने एक ट्वीट में लिखा, "समाचार पत्रों में रिपोर्टिंग के उलट, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने के बारे में भारतीय सरकार ने अमरीकी सरकार के साथ न ही पहले चर्चा की और न ही पहले से सूचित किया."
भारत की एक समाचार वेबसाइट 'द प्रिंट' ने ख़बर छापी थी कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बॉल्टन को कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने की सरकारी योजना के बारे में फ़रवरी में बताया था.

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भारत दौरे पर आएंगी अमरीकी अधिकारी
एलिस वेल्स फ़िलहाल पाकिस्तान में पहले से तय दौरे पर हैं जहां वो अफ़ग़ानिस्तान समेत अन्य मुद्दों पर पाकिस्तानी अधिकारियों से बातचीत कर रही हैं.
इसके बाद एलिस वेल्स भारत का भी पहले से तय दौरा करेंगी.
वहीं, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को ख़त्म किए जाने के बाद नाराज़ पाकिस्तान ने विरोध के तौर पर भारत से राजनयिक संबंध सीमित करने और द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध तोड़ने की घोषणा की है.
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा है कि दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास में नियुक्ति के लिए चुने गए अपने राजदूत को वह दिल्ली नहीं भेजेंगे और इस्लामाबाद से भारतीय राजदूत अजय बसारिया को पाकिस्तान से चले जाने को कहा गया है.
उधर चीन ने भी कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म किए जाने और राज्य को दो हिस्सों में बाँटने पर चिंता जताई है.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने कहा, "चीन जम्मू-कश्मीर के ताज़ा हालात को लेकर गंभीरता से चिंतित है. कश्मीर मुद्दे पर चीन की स्थिति स्पष्ट रही है. अंतरराष्ट्रीय आम सहमति भी है कि कश्मीर का मुद्दा ऐसा मुद्दा है जो भारत और पाकिस्तान को अपने अतीत से मिला है. संबंधित पक्षों को संयम बरतने और विवेकपूर्ण तरीक़े से कार्य करने की आवश्यकता है."
लद्दाख के विषय पर चीन के प्रवक्ता ने कहा, "चीन हमेशा से सीमा के पश्चिमी क्षेत्र में चीनी क्षेत्र को भारत के प्रशासनिक क्षेत्र में शामिल करने का विरोध करता है. हमारी यह ठोस नीति है और अपरिवर्तित बनी हुई है."
चीन के प्रवक्ता ने कहा, "हाल ही में भारत ने एकतरफ़ा घरेलू क़ानून बदलकर चीन की संप्रभुता की उपेक्षा की है. यह अस्वीकार्य है और प्रभाव में नहीं आएगा. हम भारत से आग्रह करते हैं कि वह सीमा के प्रश्न के संबंध में अपने शब्दों और व्यवहारों में विवेक इस्तेमाल करे, दोनों पक्षों के बीच हुए समझौतों का सख़्ती से पालन करते हुए ऐसे क़दम उठाने से बचे जो सीमा के प्रश्न को और जटिल कर सकते हैं."
भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठन क़ानून भारत का आंतरिक मामला है.
भारत ने कहा है कि भारत दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दख़ल नहीं देता है और दूसरे देशों से भी ऐसी ही उम्मीद करता है.

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चीन के बाद संयुक्त राष्ट्र ने की आलोचना
उधर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी कश्मीर में कर्फ़्यू लगाकर फ़ोन और इंटरनेट को बंद करके आम लोगों पर पाबंदियां लगाने के लिए आलोचना की है.
जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के प्रवक्ता ने एक बयान में कहा कि इससे क्षेत्र में मानवाधिकार के हालात और बिगड़ेंगे.
पाकिस्तान ने कश्मीर के मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को भी एक पत्र लिखा है जिसमें भारत पर अंतर्राष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया है.
ख़बरें हैं कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान विभिन्न देशों के राजनेताओं से भी संपर्क करके उन्हें कश्मीर के बारे में अपना रुख़ बयान कर रहे हैं.
पाकिस्तान की कोशिश है कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत के ख़िलाफ़ मामला आगे बढ़ाए.

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'भारत की संप्रभुता को दिया जाएगा महत्व'
लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि भारत एक आज़ाद देश है और उसकी संवैधानिक स्वायत्तता और संप्रभुता किसी भी अंतर्राष्ट्रीय क़ानून से ऊपर मानी जाएगी.
अमरीका की डेलवेयर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान कहते हैं, "संप्रभुता की एक परिभाषा होती है संवैधानिक स्वायत्तता और भारत एक गणतंत्र है और बीजेपी पार्टी चुनाव जीत के आई है. इसलिए भारत क़ानूनी तौर पर तो सही है. लेकिन जिस तरह से सरकार ने यह फ़ैसला लागू किया है वह चिंता का विषय है."
"जिन लोगों की किस्मत बदलेगा यह फ़ैसला उनको इस प्रक्रिया से ही अलग रखा गया है और साफ़ है कि उनकी सहमति भी नहीं ली गई. तो प्रक्रिया तो सही है लेकिन जिस तरह से किया वो अलोकतांत्रिक है."
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं और अमरीका, रूस, चीन, ब्रिटेन, और फ्रांस स्थायी सदस्य हैं.

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भारत को किन देशों का मिल सकता है साथ
कुछ अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि कश्मीर के इस मामले में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को ब्रिटेन, फ़्रांस के साथ-साथ रूस और अमरीका से भी हिमायत मिल सकती है.
पाकिस्तान यह भी मांग कर रहा है कि संयुक्त राष्ट्र इस मामले में तथ्यों का जायज़ा लेने के लिए एक खोजी दल का भी गठन करे.
वैसे पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मामला कई वर्षों से उठाता रहा है. लेकिन जब भी पाकिस्तान ने कश्मीरियों को स्वायत्तता दिए जाने या उस इलाक़े में सुरक्षाबलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने को लेकर मानवाधिकार से संबंधित मामलों में कश्मीर का ज़िक्र संयुक्त राष्ट्र के किसी भी मंच से किया तो भारत ने हमेशा उसे नकार दिया.
संयुक्त राष्ट्र में विभिन्न मौक़ों पर पाकिस्तान को चीन की हिमायत मिलती रही है.
भारत यह कहता रहा है कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह उसका अंदरूनी मामला है. भारत इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि इस मुद्दे को शिमला समझौते के तहत द्विपक्षीय तौर पर ही हल किया जा सकता है.
पिछले कई वर्षों से भारत संयुक्त राष्ट्र में गहन कूटनीति के ज़रिए सदस्य देशों को इस बात से भी अवगत कराता रहा है कि पाकिस्तान में मौजूद लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आंतकी गुट भारत में आतंकी हमले करते रहते हैं और यह भी कि पाकिस्तान ऐसे आतंकी गुटों को पनाह और समर्थन देता रहा है.
इस मामले में हाल ही में आतंकी गुट जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा वैश्विक आतंकवादी भी घोषित किया गया.
इसके अलावा मुंबई हमलों का ज़िम्मेदार आतंकी हाफ़िज़ सईद को भी अमरीका और संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी घोषित किया है और अमरीका ने उस पर एक करोड़ डॉलर का इनाम भी रखा हुआ है.

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मध्यस्थता से बात निकली आगे
पिछले महीने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के अमरीका दौरे के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने कश्मीर में मध्यस्थता की पेशकश की थी लेकिन भारत ने उसे सिरे से नकारा दिया था.
लेकिन अब कश्मीर मुद्दे पर इस तरह की मध्यस्थता से बात बहुत आगे जा चुकी है. अब भारत ने कश्मीर को भारत का ही हिस्सा बना लिया है.
अमरीका में मीडिया में कश्मीर के मुद्दे पर चर्चा जारी है और कई अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इस बात से भी चिंतित हैं कि कश्मीर में भारत सरकार ने आम लोगों की कोई राय नहीं ली और उनके नेताओं समेत इस सारे मामलों में लोगों को बाहर रखा गया है.
कई समाचार पत्रों में यह चर्चा है कि किस तरह कई दिनों से कश्मीर में भारत ने आम लोगों को कर्फ़्यू लगाकर घरों में बंद किया हुआ है और स्थानीय नेताओं को भी नज़रबंद कर रखा है.
कई अख़बारों में कश्मीर में अनुच्छेद 370 के ख़त्म किए जाने की निंदा की गई है और कहा गया है कि इससे दक्षिण एशिया के इलाक़े में अस्थिरता बढ़ने का ख़तरा है.
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