फ़्रांस में क्यों चल रही राजस्थान जैसी लू?

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- Author, माल सिरेट
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
इस समय यूरोप में गर्मी से लोगों का बुरा हाल है. कई इलाक़ों में राजस्थान जैसी भीषण गर्मी पड़ रही है.
शुक्रवार को फ़्रांस में तापमान रिकॉर्ड 45.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. यहां तक कि सरकारों को सेहत से संबंधित चेतावनी जारी करनी पड़ रही है.
गर्मी के कारण यूरोप में कई लोगों को की मौत हो चुकी है. गर्म हवाओं या लू से जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ी हैं.
विमान संचालन से लेकर रेल पटरियों में विकृति के चलते ट्रेनों का संचालन प्रभावित हुआ है. इसके चलते स्कूलों को बंद करने से लेकर हवा की गुणवत्ता को लेकर अलर्ट जारी किए गए हैं.
तापमान अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. लेकिन अपेक्षाकृत ठंडा समझे जाने वाले यूरोप में तापमान इतना क्यों बढ़ रहा है?
क्या है कारण?
उत्तरी अफ़्रीका, पुर्तगाल और स्पेन से आने वाली गर्म हवाओं के कारण जब हवा का दबाव बढ़ता है तो उत्तरी यूरोप में गर्म हवाएं चलती हैं, इससे तापमान और भी बढ़ता है.
इस समय सहारा के रेगिस्तान से गर्म हवा आ रही है.
यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियाम रेंज वेदर फ़ोरकास्ट से जुड़े टिमोथी हेवसन कहते हैं कि जून में आसमान साफ़ रहने का मतलब है कि तापमान और बढ़ेगा.

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वो कहते हैं, मिट्टी अगर सूखी है तो इसका मतलब है कि वाष्पीकरण कम होगा, जो कि आम तौर पर ज़मीन को ठंडा रखने का काम करता है.
ब्रिटेन के मौसम विभाग में विशेषज्ञ ग्रैम मैगडे ने बीबीसी को बताया कि आम तौर पर तापमान में उतार-चढ़ाव प्राकृतिक रूप से होता है लेकिन इस समय दुनिया औद्योगिकरण से पहले की अपेक्षा एक डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म है. इसलिए सख़्त मौसम से बार-बार साबका पड़ेगा.
यूरोप में सबसे अधिक 48 डिग्री सेल्सियस तापमान जुलाई 1977 रिकॉर्ड किया गया था. लेकिन इसके बाद 20 सर्वाधिक गर्म साल पिछले 22 सालों में दर्ज किए गए.
विश्व मौसम संगठन के अनुसार, इनमें 2015 से 2018 के बीच के साल शीर्ष चार में आते हैं.
क्या मानवीय गतिविधियां ज़िम्मेदार हैं?
पिछले साल पूरे यूरोप में गर्म हवाओं के चलने पर वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन ग्रुप ने एक अध्ययन किया था.
इसमें पाया गया कि उच्च तापमान के लिए मानवीय गतिविधियां अधिक ज़िम्मेदार हैं.
ग्रुप की रिपोर्ट के अनुसार, यही ढर्रा चलता रहा तो 2040 के दशक तक पूरे यूरोप में हर दूसरे साल गर्मी का यही हाल होने वाला है और 2100 ईस्वी तक तापमान में 3-5 डिग्री सेल्सियस का इजाफ़ा हो सकता है.

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दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जलवायु अलग-अलग हैं.
आम तौर पर हीवेव या गर्म हवा या लू तब माना जाता है जब कम से कम तीन दिनों तक तापमान सामान्य से पांच डिग्री या इससे अधिक रहे.
हेवसन का कहना है कि रात का तापमान, आर्द्रता और हवा की रफ़्तार पर भी ये निर्भर करता है.
उनके अनुसार, हवा की धीमी रफ़्तार और उमस से गर्म हवा का ख़तरा बढ़ता है.
ज़्यादा गर्म हवाएं चलने का असर बड़े शहरों में अधिक होता है, जहां इंसानी गतिविधियां अधिक हैं. बड़ी-बड़ी इमारतें हैं, कंक्रीट के ढांचे और सड़कें हैं.
वो कहते हैं, "इस बार का हाल यूरोप में साल 2015 की भीषण गर्मी जैसा है."
उस समय यूरोप का दक्षिणी और केंद्रीय हिस्सा लू के प्रकोप से त्रस्त था और अधिकतम तापमान जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड में दर्ज किया गया था.

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लू ख़तरनाक क्यों है?
अधिक तापमान तो सभी पर असर डालेगा लेकिन पानी कमी यानी डीहाइड्रेशन, तापमान से अधिक ऊर्जा का क्षय और लू लगने का परिणाम गंभीर हो सकता है. बुज़ुर्गों और बच्चों जिन्हें दिल, किडनी और सांस संबंधी बीमारियां हैं, उनके लिए ये प्राणघातक भी हो सकता है.
हेवसन कहते हैं, "लू इसलिए ख़तरनाक है क्योंकि इससे इंसान का शरीर अपने अंदर के तापमान को नियंत्रित करने में असफल हो जाता है."
मौसम विभाग के विज्ञानी मैडगे का कहना है कि अगर रात का तापमान 25 डिग्री से नीचे नहीं आता है तो बीमार व्यक्तियों को और परेशानी हो सकती है.
स्वास्थ्य कर्मियों का कहना है कि अगर सिरदर्द हो, भूख ख़त्म हो, चक्कर आए, अधिक पसीना बहे, सांस तेज़ चलने लगे या अधिक प्यास लगे तो उसे सबसे पहले ख़ुद को ठंडा करना चाहिए.
कब लगती है लू?
अगर किसी व्यक्ति के शरीर का तापमान 40 डिग्री से अधिक हो जाए तो समझा जाना चाहिए कि उस पर लू के असर होने की पूरी आशंका है.
इसके लिए तुरंत स्वास्थ्य सहायता की ज़रूरत पड़ती है.
अगर पसीना बहना बंद हो जाए और सांस लेने में दिक्क़त होने लगे तो ये ख़तरे का संकेत है.

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लू की वजह से बेहोशी हो सकती है और विभिन्न अंगों पर असर या फिर मौत भी हो सकती है.
एक अध्ययन में पाया गया कि 2003 की भीषण गर्मी के बाद, पूर्व के सालों की अपेक्षा 70,000 अधिक लोगों की जान गई.
गर्म प्रदेशों में जैसे ऑस्ट्रेलिया और उत्तर अफ़्रीका और मध्य पूर्व के देशों में जहां गर्मियों में आम तौर पर तापमान 50 डिग्री होता है, वहां भी ऐसी दिक्क़तें आ सकती हैं.
मैडगो का कहना है, "इन जगहों पर गर्मी से बचने के लिए आधारभूत ढांचा मौजूद होता है लेकिन भीषण गर्मी के असर का सामना हर कहीं करना ही होता है."
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