क्या ईरान से युद्ध की ओर बढ़ रहा है अमरीका?

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- Author, जॉनथन मारकस
- पदनाम, कूटनीतिक संवाददाता
अमरीका क्या ईरान के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है? इस बात को लेकर दो दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं.
पहला नज़रिया अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के प्रशासन का पसंदीदा है. उनका मानना है कि ईरान कुछ तो ग़लत कर रहा है.
कहा जा रहा है कि अमरीकी ठिकानों पर हमलों की आशंका को देखते हुए प्रतिक्रिया की तैयारियां की जा रही हैं. हालांकि इसे लेकर बहुत कम जानकारी सार्वजनिक हो पाई है.
अमरीका ने मध्य पूर्व में अतिरिक्त सेना और साज़ो-सामान की तैनाती की है. साथ ही इराक़ से उसने ग़ैर-महत्वपूर्ण राजनयिक कर्मचारियों की संख्या घटा दी है. ऐसी ख़बरे हैं कि वह युद्ध की योजनाओं पर भी विचार कर रहा है.
ईरान के लिए संदेश साफ़ है- अगर मध्य पूर्व में अमरीकी ठिकानों पर किसी भी तरह से हमला हुआ, फिर वह ईरान ने किया हो या फिर इसके परोक्ष संगठन या सहयोगियों ने, इसका कड़ा जवाब सैन्य ढंग से दिया जाएगा.

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वहीं, दूसरा दृष्टिकोण इस पूरे संकट के लिए अमरीका को ज़िम्मेदार बताता है.
ज़ाहिर है, यह नज़रिया ईरान का है मगर ट्रंप प्रशासन के तौर-तरीक़ों के कई अमरीकी आलोचक भी यही सोच रखते हैं.
यही नहीं, ट्रंप के कई मुख्य यूरोपीय सहयोगी भी इसी तरह की चिंता जताते हैं.
इस दृष्टिकोण के मुताबिक़, ट्रंप प्रशासन में मौजूद 'ईरान हॉक्स' यानी ईरान को लेकर आक्रामक रुख़ रखने वाले लोगों, जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन और विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो, को एक मौक़ा नज़र आ रहा है.
इस नज़रिये के हिसाब से इन लोगों का मक़सद ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है. वे मानते हैं कि अगर बहुत आर्थिक दबाव डालने पर भी क़ामयाबी नहीं मिली तो सही समय आने पर सैन्य कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटा जाएगा.

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कौन सा नज़रिया सही
ये दोनों दृष्टिकोण मौजूदा स्थिति की अलग-अलग हिसाब से व्याख्या करते हैं. दोनों ही अपने पक्ष में कुछ बातों को उभारते हैं तो कुछ तथ्यों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं.
मगर इस मामले को लेकर बनने वाली समझ का उतना ही महत्व है, जितना इस मामले में ज़मीनी सच्चाई का. दरअसल दोनों को मिलाकर ही इस मामले का 'सच' सामने आता है.
और सच्चाई यह है कि अमरीका और ईरान के बीच का विवाद भले ही कि किसी पूर्व-निर्धारित योजना के बिना अचानक उभरा हो, मगर ट्रंप के सत्ता में आने के बाद से ही ऐसे हालात की आशंका जताई जा रही थी.
इसमें कोई शक नहीं कि मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता जा रहा है.
2015 में ईरान और दुनिया के शक्तिशाली देशों के बीच हुए परमाणु समझौते के दौरान जिन प्रतिबंधों को हटाया गया था, इस समझौते के टूट जाने के बाद वे फिर से ईरान पर लागू हो गए हैं.
इससे ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है. ईरान ने चेताया है कि वह अपनी परमाणु गतिविधियों पर लगाई रोक को ख़त्म कर सकता है.

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...तो परमाणु समझौते से पीछे हट जाएगा ईरान
डोनल्ड ट्रंप का सत्ता में आना इस पूरे मामले में अहम मोड़ रहा.
राष्ट्रपति ने एक साल पहले ईरान से हुआ परमाणु समझौता तोड़ दिया और ईरान के ख़िलाफ़ अधिकतम दबाव की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया.
ईरान अब तंग आ चुका है. वह यूरोपीय देशों से कह रहा है कि हमारी ख़राब होती अर्थव्यवस्था की मदद करो. वह धमकी दे रहा है कि अगर उन्होंने ऐसा नहीं किया तो वह परमाणु समझौते से पीछे हट जाएगा.
ऐसा हुआ तो ट्रंप प्रशासन को और बहाना मिल जाएगा.
अब बहुत कुछ ट्रंप प्रशासन के अंदर होने वाली हलचल और मौजूदा हालात पर ईरान के आकलन पर निर्भर करता है.

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जोखिम भरी है ईरान की रणनीति
ईरान को लेकर युद्ध की बात पर ट्रंप के अपने अधिकारियों की राय बंटी हुई है और ऐसी रिपोर्ट्स हैं कि राष्ट्रपति ख़ुद भी इस योजना को लेकर ज़्यादा उत्साहित नहीं हैं.
यह बात ज़ाहिर है कि वह विदेशों में सेनाएं भेजने के विरोधी हैं. मगर अमरीकी सेनाओं या ठिकानों पर हमला हुआ तो शायद ही ट्रंप चुपचाप बैठे रहें.
लेकिन ज़रूरी नहीं कि ईरान में भी हालात ऐसे ही नज़र आएं.
हो सकता है कि ईरान सोच रहा हो कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन को एक तरह से उनके बॉस के ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर लेगा, तनाव इतना बढ़ा देगा कि बोल्टन को अपनी रणनीति सार्वजनिक करनी पड़े और उनके लिए मुश्किल हो जाए.
अगर ईरान ऐसा सोचता है तो यह बहुत ही जोखिम भरी रणनीति है.

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इराक़ युद्ध से अलग होगा
भले ही अमरीका के मध्य पूर्व के मुख्य सहयोगी इसराइल और सऊदी अरब किनारे बैठकर तमाशा देख रहे हैं लेकिन ट्रंप के यूरोपीय सहयोगी हालात को देखकर बेचैन हैं.
स्पेन, जर्मनी और नीदरलैंड्स ने तनाव का हवाला देते हुए इस क्षेत्र में अमरीकियों के साथ सैन्य गतिविधियों को रोक दिया है.
यह ईरान और अमरीका के बीच संघर्ष को लेकर कयास लगाने का समय नहीं है फिर भी यह 2003 के इराक़ युद्ध से अलग होगा.
ईरान सद्दाम हुसैन के इराक़ से बहुत अलग है. यहां बड़े पैमाने पर ज़मीन से दाख़िल होकर आक्रमण करना संभव नहीं. यह हवाई और समुद्री संघर्ष होगा और इससे पूरा मध्य पूर्व सुलग सकता है.

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कूटनीतिक ग़लती कर रहा है अमरीका?
जब ट्रंप सत्ता में आए थे, कुछ लोगों ने आशंका जताई थी कि विदेश नीति के मामले में अमरीका से कोई बड़ी भयंकर ग़लती हो सकती है.
मगर अब ईरान को लेकर पैदा हुई स्थिति दिखाती है कि एक बड़ा संकट उभर रहा है जिसमें अंतरराष्ट्रीय समझौतों का विरोध, जिन क्षेत्रीय शक्तियों के अपने एजेंडा हैं उन पर ज़्यादा निर्भर होना, लंबे समय से नैटो के सहयोगी रहे देशों के साथ तनाव और सबसे अहम अमरीका के वास्तविक कूटनीतिक हितों की पहचान करने और उन्हें पूरा करने में नाकाम रहना जैसे कई सारे पहलू हैं.
जब एक बार फिर बड़ी शक्तियों के बीच होड़ मची हुई है, जब अमरीका विदेशों से अपने सैनिकों को बुला रहा है और उनका रुख़ उभरते हुए चीन और उत्साहित रूस की ओर हो रहा है तब अमरीका की कूटनीतिक प्राथमिकताओं में ईरान कहां से आ गया?

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ईरान से कितना बड़ा ख़तरा?
क्या ईरान से इतना ख़तरा है कि एक बड़े संघर्ष का ख़तरा मोल लिया जाए? बहुत से अमरीकी कूटनीतिक पंडित इसका जवाब 'ना' में देंगे.
बहुत से कूटनीतिक पंडित मानते हैं कि ईरान पर लगाम लगाना और अमरीकी हितों को नुक़सान पहुंचने पर बदले की धमकी देना ज़रूरी हो सकता है मगर युद्ध की ओर बढ़ना ज़रूरी नहीं.
मामला बेशक युद्ध की ओर नहीं 'बढ़ रहा' मगर ऐसा लगता है कि पूरी प्रक्रिया अनिच्छा से हो रही है और इसमें लोगों के पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं.
लेकिन अगर कोई संघर्ष होता है तो यह अमरीकियों और ईरानियों की समझदारी भरे फ़ैसले लेने की अक्षमता और दूरगामी सोच की कमी का परिणाम होगा.
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