अमरीका-रूस का समझौता टूटा तो भारत भी आएगा चपेट में

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अमरीका और रूस लंबे समय से एक-दूसरे पर 31 साल पुरानी इंटरमीडिएट रेंज (आईएनएफ़) न्यूक्लियर फ़ोर्स संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे थे. मगर अब पहले अमरीका ने और फिर रूस ने इस संधि को स्थगित कर दिया.
शीतयुद्ध के बीच तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाने वाली इस संधि के टूटने का ख़तरा पैदा हो गया है. अगर ये संधि टूटती है तो ये पूरी दुनिया की शांति के लिए बड़ा झटका होगा.
अमरीका के राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन और सोवियत संघ के आठवें और आख़िरी नेता मिख़ैल गोर्बाचेव ने 8 दिसंबर, 1987 को इस ऐतिहासिक संधि पर हस्ताक्षर किए थे.
समझौते के बाद रोनल्ड रीगन ने अपने संबोधन में कहा था, "पहले हुई संधियों की तुलना में इस संधि में यह नहीं कहा गया है कि हम यथास्थिति बनाए रखेंगे. हथियारों की होड़ रोकने की बात भी नहीं की गई है. बल्कि इतिहास में पहली बार हथियारों को घटाने की बात की गई है. यानी अमरीका और सोवियत संघ की परमाणु मिसाइलों को हटाने की बात हुई है."
उनकी ये पंक्तियां वाकई ऐतिहासिक थीं, क्योंकि इस संधि ने शीत युद्ध में उलझी दो महाशक्तियों के बीच न सिर्फ़ तनाव ख़त्म किया था बल्कि भरोसा भी कायम किया था.

शांति की शुरुआत
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अमरीका और सोवियत संघ के बीच छिड़ा राजनीतिक और वैचारिक संघर्ष ख़त्म होने का नाम नहीं ले रहा था. 70 के दशक के मध्य में रूस ने अपने यूरोपीय हिस्से में ऐसी मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात कर दी थीं, जहां से पश्चिमी यूरोप को निशाना बनाया जा सकता था. इससे अमरीका और उसकी यूरोपीय सहयोगी चिंतित हो उठे थे.
इंटरमीडिएट रेंज की मिसाइलें इसलिए ख़तरनाक मानी जाती हैं क्योंकि ये चंद मिनटों में तबाही मचा सकती हैं. वहीं इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों की रेंज भले लंबी हो, मगर उन्हें दूरी तय करने में भी ज़्यादा समय लगता है.
दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर रशियन ऐंड सेंट्रल एशियन स्टडीज़ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर अमिताभ सिंह बताते हैं कि आईएनएफ़ संधि के बाद दोनों देशों ने बड़ी संख्य़ा में परमाणु मिसाइलों को नष्ट किया था.

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अमिताभ कहते हैं, "ये वो दौर था जब शीतयुद्ध समाप्त होने को था. रीगन और गोर्बाचेव के बीच यह समझौता दोनों देशों और यूरोप में दशकों से चले आ रहे गतिरोध को खत्म करने की दिशा में एक अच्छी पहल था.
इस समझौते में तय किया गया कि 500 से 5500 किलोमीटर तक मारक क्षमता वाली मिसाइलों को नष्ट किया जाए. सोवियत संघ ने क़रीब 2000 और अमरीका ने 600 मिसाइलों को नष्ट किया था.
इस संधि का पूरा फ़ोकस यूरोप को लेकर था. सोवियत संघ की मिसाइलों के जवाब में अमरीका अपने नैटो सहयोगियों के यहां यूरोप में न्यूक्यिलर मिसाइल तैनात करता और फिर वे इन्हें एक-दूसरे के ख़िलाफ इस्तेमाल कर सकते थे. इस सैन्य रणनीति को म्यूचुअल अश्योर्ड डिस्ट्रक्शन (MAD) कहा जाता है."

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रीगन-गोर्बाचेव की भूमिका
1980 में रोनल्ड रीगन अमरीका के राष्ट्रपति बने और 1985 में रूस में मिख़ैल गोर्बाचेव सत्ता में आए. ये वो दौर था जब हथियारों को होड़ के कारण मंद होती अर्थव्यवस्था के चलते सोवियत संघ की ताकत कम हो रही थी.
गोर्बाचेव अपेक्षाकृत युवा नेता थे और वह अपने सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहते थे. इसके लिए हथियारों की होड़ पर रोक लगाना ज़रूरी था. ऐसे में 80 के दशक के मध्य में रीगन और गोर्बाचेव ने बातचीत की पहल की. 1987 आते-आते दोनों ने इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज़ ट्रीटी पर दस्तख़त किए.

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दोनों देशों ने अपने यहां 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर की रेंज वाली मिसाइलें नष्ट की और एक-दूसरे की टीमों को अपने यहां जांच करने के लिए भी आने दिया.
ये पहला मौक़ा था जब दुनिया को यक़ीन हुआ कि शीत युद्ध ख़त्म हो सकता है. जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर कनैडियन, यूएस ऐंड लैटिन अमरीकी स्टीडीज़ के प्रोफेसर चिंतामणि महापात्रा बताते हैं-
"इस समझौते के कारण यूरोप से 5000 किलोमीटर तक परमाणु हथियार ले जाने वाली मिसाइलें हट गईं. जब ये समझौता हुआ तो कोल्ड वॉर ख़त्म करने की दिशा में पहला क़दम था. बाद में सोवियत संघ का विघटन हो गया और शीत युद्ध का अंत हो गया. लेकिन आईएनएफ़ ट्रीटी को सांकेतिक रूप से परमाणु हथियारों को ख़त्म करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है. इसे लेकर पूरी दुनिया ख़ुश थी. भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी इस समझौते की प्रशंसा की थी."

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नए हथियार बना रहा अमरीका?
जो हथियार महज कुछ मिनटों में तबाही मचा सकते थे, आईएनएफ़ संधि ने उन्हें म्यूज़ियमों में पहुंचा दिया. सोवियत संघ का विघटन भी हो गया, मगर अमरीका और रूस इस समझौते का सम्मान करते रहे.
लेकिन बाद में धीरे-धीरे दोनों देशों में विश्वास कम होता गया. 2002 में अमरीका एंटी बैलिस्टिक मिसाइल ट्रीटी से पीछे हट गया, जिसपर 1972 में दस्तख़त हुए थे.
प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा बताते हैं कि जब भी अमरीका में रिपब्लिकन राष्ट्रपति बनते हैं, हथियारों और सुरक्षा को लेकर उनका रवैया अलग रहता है और इसी कारण डोनल्ड ट्रंप अब आईएनएफ़ से पीछे हटने की दिशा में बढ़ रहे हैं.
प्रोफ़ेसर महापात्रा बताते हैं, "ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं. रिपब्लिकन राष्ट्रपति आर्म्स कंट्रोल में यक़ीन नहीं रखते. उनका मानना है कि अमरीका जो-जो नए हथियार बना सकता है, वे उसे बनाने चाहिए. वे मानते हैं कि सिर्फ़ समझौतों पर दस्तख़त करके अमरीका अपनी रक्षा नहीं कर सकता. 2002 में बुश 1972 में साइन हुई एंटी बैलिस्टिक मिसाइट ट्रीटी से हट गए थे. उस समय रूस ने काफ़ी शोर किया था मगर कुछ हुआ नहीं था. आईमएफ़ ट्रीटी मिसाइलों को रोकने का बेहतरीन नमूना थी, अब उसपर भी संकट आ गया है."

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प्रोफ़ेसर महापात्रा का यह भी मानना है कि संभवत: अमरीका नई क़िस्म के हथियारों पर रिसर्स एंड डिवेलपमेंट का काम कर रहा है और जल्द ही उन्हें तैनात करना चाहता है, इसीलिए ट्रीटी से हटना चाहता है.
असल वजह क्या है?
2007 में रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने कहा था कि आईएनएफ़ संधि उनके देश के हितों के लिए ठीक नहीं है. मगर अब अमरीका का कहना है कि लंबे समय से रूस ख़ुद इस संधि का उल्लंघन कर रहा है.
अमरीका का आरोप है कि रूस ने 9M729 ( जिन्हें नैटो SSC-8 के नाम से पहचानता है) मिसाइलें तैनात की हैं जिनकी रेंज 500 किलोमीटर से अधिक है और यह संधि का स्पष्ट उल्लंघन है. तैनात किए हैं जिनकी रेंज 500 किलोमीटर से अधिक है और यह संधि का खुला उल्लंघन है.
अब अमरीका ने रूस को 60 दिन का समय दिया है ताकि वह कथित तौर पर तैनात मिसाइलों को बटाकर नष्ट करे. मगर रूस ने भी अमरीका की तर्ज़ पर इस संधि को स्थगित कर दिया है.

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दोनों देशों में भले ही आरोपों का दौर चल रहा हो लेकिन जानकारों का यह भी मानना है कि अमरीका के इस कदम का असल मकसद, चीन पर लगाम कसना भी हो सकता है, जो तेज़ी से बड़ी शक्ति के रूप में उभरा है.
डॉक्टर अमिताभ सिंह बताते हैं कि रूस और अमरीका के बीच का यह समझौता जिस रेंज के हथियारों को प्रतिबंधित करता है, उस रेंज के हथियार अन्य देश भी बना रहे हैं.
वह कहते हैं, "आईएमएफ़ ट्रीटी तो सिर्फ अमरीका- सोवियत संघ और बाद में रूस और अमरीका के लिए ही लागू होती है. चीन और उत्तर कोरिया इससे बाहर हैं. जिस समय इस संधि पर हस्ताक्षर हुए थे, तब यह काफ़ी शक्तिशाली संधि थी. मगर आज यह इसलिए कमज़ोर है क्योंकि भले ही संभावनाएं कम हों, मगर हो सकता है कि चीन भी उस रेंज के हथियार बनाकर तैनात कर रहा है जो रूस और अमरीका के लिए प्रतिबंधित हैं."

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भारत पर भी होगा असर
प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा का मानना है कि इस संधि के टूटने के बाद हथियारों की होड़ शुरू होगी, जिसके बाद अमरीका एक नया समझौता चाहेगा जिसमें रूस के अलावा चीन भी हो और भारत समेत अन्य देश भी.
प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं, "अगर ये संधि टूटी तो देशों के बीच नई क़िस्म के हथियारों की दौड़ शुरू हो जाएगी. वे एक-दूसरे के मुक़ाबले में हथियार बनाएंगे. अमरीका और रूस दोनों नए-नए हथियार बना रहे हैं. इसका असर बाक़ी देशों पर भी पड़ेगा. चीन और भारत पर भी. मुझे लगता है कि अमरीका ये कोशिश कर रहा है कि आने वाले दिनों में अगर नया समझौता हो तो उसमें चीन भी शामिल हो. वैसे भी चीन और अमरीका के बीच इस समय गतिरोध बना हुआ है. ऐसे में वह चीन को भी शामिल करना चाहता है इसमें."
प्रोफ़ेसर चिंतामणि संभावना जताते हैं कि इस तरह के समझौते में भारत, पाकिस्तान, ईरान को शामिल करने की कोशिश भी हो सकती है.

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डॉक्टर अमिताभ सिंह भी मानते हैं कि वैश्विक स्तर पर अमरीका का प्रभुत्व बनाए रखने और अपनी बात मनवाने के लिए डोनल्ड ट्रंप आक्रामक रणनीति अपना रहे हैं ताकि दूसरों पर अपनी शर्तों पर समझौते के लिए दबाव बना सकें.
वह कहते हैं, "ट्रंप की विदेश नीति का मकसद है, अपने हिसाब से समझौता करने के लिए दबाव बनाना. ये समझौता हथियारों को लेकर नहीं, बल्कि आर्थिक आधार पर होता है. ट्रेंड पर नज़र डालें तो दिखता है कि ट्रंप की मौजूदा विदेश नीति ऐसी है कि संकट पैदा करके दुनिया में अमरीका का दांव बढ़ाया जाए. दांव तभी बढ़ेगा जब अमरीका की दूसरों की राह में रोड़े अटकाने की क्षमता बढ़ेगी. इस हद तक कि वह अपनी बातें मनवा सके."

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मगर क्या बाक़ी देश आएंगे दबाव में?
सवाल यह उठता है कि अगर अमरीका यह चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई संधि हो जिसमें परमाणु हथियार ले जाने वाली मिसाइलें बनाने वाले अन्य देश भी शामिल हों तो इस काम मेंआईएनएफ़ संधि का टूटना कैसे मददगार हो सकता है? रूस, चीन, भारत या अन्य देश किसी ऐसे समझौते के लिए कैसे तैयार हो जाएंगे, जैसा अमरीका चाहता है?
इन सवालों के जवाब में प्रोफ़ेसर चिंतामणि कहते हैं, "आईएनएफ़ के टूटने पर हो सकता है कि हथियारों की नई रेस शुरू हो जाए. ऐसे में अमरीका और रूस को ही नहीं, चीन को भी हथियारों पर पैसा खर्च करना पड़ेगा. जब हथियारों की होड़ शुरू होगी तो इन देशों में अंदर से दबाव बनेगा कि ज़रूरी कामों के बजाय हथियारों पर क्यों इतना खर्च कर रहे हो. फिर मजबूरन तंग आकर मुख्य शक्तियों को बैठकर कोई संधि करनी होगी कि हथियारों पर नियंत्रण लगाया जाए. ट्रंप इसका संकेत भी दे चुके हैं कि वह नए समझौते के लिए तैयार हैं जिसमें पूरी दुनिया का फ़ायदा हो."
अमरीका चाहता है कि उसके प्रतिद्वंद्वी हथियार बनाने में उलझे रहें और ख़ुद वह दुनिया की अर्थव्यवस्था को मैनेज करता रहे. अमरीका के पास इकनॉमी और टेक्नॉलजी की ताकत है और ऐसे में वह अपनी धाक बनाए रखेगा.

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प्रोफ़ेसर चिंतामणि महापात्रा कहते हैं, "अमरीका की आर्थिक स्थिति अच्छी है जबकि चीन की मंद पड़ रही है और रूस की उतनी अच्छी नहीं है. अमरीका के पास इतना पैसा है कि वह नए हथियार बना सकता है. उसकी रणनीति है कि प्रतिद्वंद्वी देशों को हथियारों की दौड़ में ऐसे उलजाओ कि उनकी आर्थिक स्थिति ही ख़राब हो जाए. वे पैसे हथियारों पर ही लगाते रहें. सोवियत विघटन का एक कारण यह भी था कि पैसा विकाय कार्यों के बजाय हथियारों पर लगता रहा."
आईएनएफ़ संधि अभी अमरीका और रूस दोनों पक्षों की ओर से स्थगित है, पूरी तरह टूटी नहीं है मगर हथियारों की होड़ शुरू होने के संकेत मिलने लगे हैं.
रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन ने कहा है कि वो नए हथियार बनाना शुरू करेंगे. हालांकि उनका कहना है कि वह किसी होड़ में शामिल नहीं होंगे और जब तक अमरीका छोटी और मध्यम दूरी के हथियार तैनात नहीं करता, वो भी हथियार तैनात नहीं करेंगे.
लेकिन 31 साल पहले पूरी दुनिया के दिल से विश्वयुद्ध की आशंका को दूर करने वाली आईएनएफ संधि के टूटने की आशंका ने एक बार फिर यूरोपीय देशों के लिए परेशानी तो पैदा कर ही दी है.
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