क्या चीन और अमरीका के बीच छिड़ चुका है नया शीत युद्ध?

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चीनी टेक्नोलॉजी कंपनी ख़्वावे (Huawei) ने कहा है कि कंपनी ने कोई ग़लत काम नहीं किया है. ख़्वावे की ओर से ये बयान अमरीका में इस फ़र्म पर कई आपाराधिक मुक़दमा दर्ज़ कराए जाने के बाद आया है.
इतना ही नहीं, ख़्वावे ने ये भी दावा किया है कि ख़्वावे की चीफ़ फ़ाइनैंशियल ऑफ़िसर और कंपनी के संस्थापक की बेटी मेंग वानज़ाओ ने भी कोई अपराध नहीं किया है, हालांकि मेंग को बीते महीने कनाडा में गिरफ़्तार कर लिया गया था.
अमरीका में ख़्वावे पर जो अपराधिक मामले दर्ज हुए हैं उनमें वित्तीय धोखाधड़ी, न्याय की राह में अवरोध उत्पन्न करना और तकनीक की चोरी जैसे संगीन मामले शामिल हैं. माना जा रहा है कि इन मामलों के दर्ज होने से चीन और अमरीका के बीच तनाव और भी बढ़ सकता है.
अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी एफ़बीआई ने एक के बाद एक करके कुल 23 मामले ख़्वावे पर दर्ज किए हैं.
यह एक नया शीत युद्ध है जिसमें दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देश चीन और अमरीका ट्रेड वॉर को आगे बढ़ाते हुए तकनीक का अगला बादशाह बनने के लिए भिड़ रहे हैं.
कुछ हफ़्ते पहले चीन की टेक्नोलॉजी कंपनी ख़्वावे (Huawei) दुनिया की सबसे बड़े टेलिकॉम नेटवर्क उपकरण बनाने वाली कंपनी थी जिसने पूरी दुनिया में कई देशों के साथ 5G नेटवर्क मुहैया करवाने के क़रार किए हुए हैं.
मगर अब यह एकाएक ढह सी गई है. अमरीका ने चीन पर ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन करने और पश्चिमी देशों की सरकारी एजेंसियों में हैकिंग करने के आरोप क्या लगाए, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और अमरीका जैसे दुनिया के सबसे अहम बाज़ारों में इसकी हालत ख़राब हो गई.
ब्रिटेन और कनाडा में कंपनी को ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ सकता है.
इससे चीन की उस महत्वाकांक्षा को झटका लगा है जिसके तहत वह तकनीक की दुनिया का मुख्य खिलाड़ी बनना चाहता है. मगर चीन आसानी से हार मानने के मूड में नहीं है.
नाराज़ चीनी ग्राहक अमरीकी चीज़ों के बहिष्कार की मांग कर रहे हैं. वे एप्पल के फ़ोन और टैबलेटों से इसकी शुरुआत करना चाहते हैं. जबकि वहां के मीडिया को लग रहा है कि कहीं अमरीकियों ने चुपके से कोई अघोषित युद्ध तो नहीं छेड़ दिया है.

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चीन बनाम अमरीका- 'कोल्ड वॉर 2.0'
यह विवाद उस समय से परवान चढ़ा है जब से मेंग वानज़ाओ को कनाडा में गिरफ़्तार किया गया. अमरीका उनका प्रत्यर्पण चाहता है.
अमरीका का आरोप है कि उनकी कंपनी चीन की सरकार की करीबी है और ईरान को टेलिकॉम उपकरण बेच रही है. अगर उन्हें दोषी पाया जाता है तो 30 साल जेल की सज़ा सुनाई जा सकती है.
एलिसन हार्वर्ड केनेडी स्कूल के बेल्फ़र सेंटर फ़ॉर साइंस एंड इंटरनैशनल अफ़ेयर्स के निदेशक हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया, " उन्हें जैसे भी हालात में गिरफ्तार किया गया हो, इससे चीन में यह चिंता पैदा हो गई है कि उनके ख़िलाफ नया शीत युद्ध छेड़ दिया गया है."
वह कहते हैं कि चीनी अधिकारी ताज़ा घटनाक्रम को इस बात की पुष्टि मान रहे हैं कि अमरीकी प्रशासन वैश्विक स्तर पर उनके रास्ते में आने वाला है.
एशिया, यूरोप और अमरीका के तकनीकी मामलों के जानकार भी मान रहे हैं कि यह नया शीतयुद्ध है जिसमें चीन और अमरीका इस बात के लिए लड़ रहे हैं कि अगले दशक में टेक्नॉलोजी का अग्रदूत कौन होगा.
मेंग कहती हैं कि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया, मगर उन्हें हिरासत में लिया जाना दिखाता है कि अमरीका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध किस स्तर पर पहुंच चुका है.
एलिसन कहते हैं कि चीन हर क्षेत्र में ख़ासकर सभी अहम तकनीकों के क्षेत्र में अमरीका का मुक़ाबला करेगा.
वह कहते हैं, "जो कोई सुरक्षा के मामले में अमरीका पर आश्रित है, अमरीकी सरकार उन्हें यह समझाने की कोशिश कर रही है कि वे अपने टेलिकॉम या इंटरनेट नेटवर्क से जुड़े कामों के लिए ख़्वावे के उपकरण न खरीदें क्योंकि वे सुरक्षित नहीं हैं."

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ख़्वावे के क़ारोबार को नुक़सान पहुंचेगा
चीन पर हैकिंग के आरोप लगने और फिर प्रतिबंध तोड़कर ईरान को टेलिकॉम उपकरण बेचने के आरोप ख़्वावे के बिज़नेस के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं.
भला कौन सरकार चाहेगी कि वह अपने देश के टेलिकॉम सिस्टम को ऐसी कंपनी के हाथ सौंप दे जिसपर चुपके से चीन के लिए जासूसी करने का आरोप है.
2015 के बाद से ख़्वावे टेलिकॉम नेटवर्क उफकरणों की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी रही है. इसने एरिक्सन, नोकिया, सैमसंग और ज़ेडटीई जैसी प्रतियोगी कंपनियों को पीछे छोड़कर यह मुक़ाम हासिल किया था.
ख़्वाले का कहना है कि उसने 25 कॉमर्शियल 5G क़रार किए हैं और विभिन्न देशों को 10 हज़ार से ज़्यादा 5जी स्टेशन भेजे हैं. अनुमान है कि इससे 2018 में उसका राजस्व 100 बिलियन डॉलर को पार कर जाएगा.
लेकिन अमरीका का दावा है कि ख़्वावे का चीन के प्रशासन के साथ क़रीबी है और वह चीनी प्रशासन को अन्य देशों के टेलिकॉम सिस्टम का एक्सेस दे सकती है. यह दावा ख़्वावे की राह में बड़ी अड़चन पैदा कर सकता है.

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ख़्वावे इन सभी दावों को खारिज करते हुए कहती है कि इस तरह के किसी हमले का कोई सबूत नहीं है. मगर इसकी छवि, इसका क़ारोबार प्रभावित होना शुरू हो चुका है.
ख़्वावे के मौजूदा सीईओ केन हू कहते हैं, "भले ही कुछ बाज़ारों में हमारी कंपनी को लेकर डर पैदा करने की कोशिश करके हमारी तरक्की को रोकने का प्रयास किया गया है मगर हम गर्व से कह सकते हैं कि हमारे ग्राहक अब भी हमपर विश्वास करते हैं."
मगर कंपनी पहले जहां लगभग हर बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में अपने उपकरण बेचती थी मगर अब अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया है.
ब्रितानी सरकार ने अमरीका के साथ मिलकर चीन पर हैकिंग का आरोप लगाया है. वहीं ब्रिटेन की सीक्रेट इंटेलिजेंस सर्विस एमआई 6 के प्रमुख एलेक्स यंगर ने हाल ही में कहा है कि ब्रिटेन के टेलिकॉम नेटवर्क में ख़्वावे की भूमिका को लेकर "हमें चर्चा करनी होगी."
तो ये चार देश एक-दूसरे के साथ ख़ुफ़िया सूचनाएं साझा करने वाले पांच देशों के समूह 'फ़ाइव आइज़' के सदस्य हैं. पांचवाँ देश कनाडा है, जहां पर मेंग को हिरासत में रखा गया है.

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गिरफ़्तारी, बदले में हुई गिरफ़्तारियां और फिर आरोप
फिलहाल अमरीका और चीन के बीच तकनीक को लेकर छिड़े शीत युद्ध का अंत होता नहीं दिखता.
20 दिसंबर को अमरीका और ब्रिटेन ने चीन पर बड़े पैमाने पर साइबर अभियान चलाने का आरोप लगाया और कहा कि हमारे सिस्टमों में घुसपैठ करके अनाधिकारिक तरीके से छेड़छाड़ की गई है. इनका दावा था कि व्यापारिक, रक्षा तकनीक से जुड़ी कंपनियों, अमरीकी सरकार की एजेंसियों और अमरीकी नेवी समेत कम से कम 45 संस्थाओं या संस्थानों के कंप्यूटरों को हैक किया गया.
ताज़ा मोड़ तब आया जब अमरीका ने दो चीनी नागरिकों पर यूरोप, एशिया और अमरीका में हैकिंग अभियान चलाने के मामले में अभियुक्त बनाया. उनपर चीन के द्वीपक्षीय और अंतरराष्ट्रीय समझौतों को तोड़ने का अभियोग चलाया जा रहा है.
चीन का विदेश मंत्रालय कहता है कि ये आरोप भ्रामक और आधारहीन हैं और तुरंत इन्हें वापस लिया जाना चाहिए.
इसी महीने जब कनाडा में मेंग को अरेस्ट किया गया था, उसके बाद चीन ने कनाडा के दो नागरिकों (एक कारोबारी और दूसरा पूर्व डिप्लोमैट) को हिरासत में ले लिया था. उन्हें 'राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डालने' के संदेह में हिरासत में लिया गया था.

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ख़्वावे: चीन की भविष्य की उम्मीद
ख़्वावे के मौजूदा सीईओ केन हू कहते हैं कि जो देश उनकी कंपनी को बैन करेंगे, उन्हें उस समय नुक़सान काअहसास होगा जब दुनिया अगली जेनरेशन के मोबाइल इंटरनेट यानी 5जी को अपना रही होगी.
चीन ने अपने ऊपर लगे आरोपों पर न सिर्फ आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है बल्कि वहां पर टेक्नॉलोजी के विश्लेषकों ने भी ऑनलाइन खुलकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है. ग्राहक भी ग़ुस्से में हैं और वे एप्पल के सामान को न सिर्फ़ छोड़ रहे हैं बल्कि इनका पूरी तरह से बहिष्कार करना चाहते हैं.
मगर ऐसा क्यों है कि चीन के आम लोग ख्वावे की अधिकारी की गिरफ़्तारी को लेकर इतने गंभीर हैं और इसे लेकर प्रतिक्रिया दे रहे हैं?
अगर चीन के मीडिया और ऑनलाइन फ़ोरम पर नज़र दौड़ाएं तो इस सवाल का जवाब मिल जाता है. ख़्वावे को चीन के लोग भविष्य की उम्मीद के तौर पर देखते हैं.

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एशियाई अख़बार द डिप्लोमैट में एक अनाम कमेंटेटर ने लिखा है, "ख़्वावे प्रतीक है कि चीन मज़बूत और शक्तिशाली बन सकता है. अभी जो किया जा रहा है, उसके ज़रिए ट्रंप दरअसल चीन को सज़ा देना चाहते हैं."
टेक विशेषज्ञ वांग शादोंग कहते हैं कि चूंकि चीन ने अमरीका को उसी के खेल में मात दी है, ऐसे में अब उसे निशाना बनाया जा रहा है. वह कहते हैं, "अमरीका ने जो फ़्री मार्केट इकोनॉमी विकसित की थी, ख़्वावे ने उसी में क़ामयाबी के झंडे गाड़कर सबसे ऊंचा स्थान हासिल किया है."
वांग कहतके हैं कि अमरीका इस खेल में हार बर्दाश्त नहीं कर सकता और इसीलिए उसने ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी और जापान जैसे सहयोगियों से अपील की है कि वे ख़्वावे के उपकरण इस्तेमाल न करें और जिन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें हटा दें.
जापान ने एलान किया है कि वह ख़्वावे, ज़ेडटीई और अन्य चीनी टेलिकॉम कंपनियों से किए गए सौदों का रिव्यू करेगी.

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ज़ेडटीई (ZTE) का भूत
ख़्वावे का अपने भविष्य को लेकर चिंतित होना लाज़िमी है क्योंकि उसने देखा है कि 2018 में ZTE के साथ क्या हुआ था.
ZTE भी टेलिकॉम इंडस्ट्री में चीन की दिग्गज कंपनी थी मगर अमरीकी कॉमर्स डिपार्टमेंट ने पाया कि इसने उत्तर कोरिया और ईरान पर लगे प्रतिबंधों को तोड़ते हुए उनके कारोबार किया है. इसके बाद ZTE के शेयर लड़खड़ा गए और कंपनी को उस तिमाही में एक बिलियन डॉलर का घाटा उठाना पड़ा.
अब किसी भी अमरीकी कंपनी को ZTE को कोई सामान बेचने पर रोक लगी हुई है. ZTE अमरीका में डिज़ाइन किए गए चिप पर निर्भर थी. वहीं ब्रिटेन के नैशनल साइबर सिक्यॉरिटी सेंटर ने चेताया है कि देश की सुरक्षा में ख़तरा होने के कारण ZTE के उपकरणों को इस्तेमाल करना ठीक नहीं है.
इस विवाद में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है. अगर ख़्वावे पर लगे कोई भी आरोप सही साबित होते हैं तो इससे चीन का दुनिया का सबसे बड़ा टेक प्लेयर बनने का ख़्वाब चकनाचूर हो सकता है.
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