तुर्की में महिलाएं डालने लगीं बिना हिजाब की तस्वीरें

तुर्की, हिजाब

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सोशल मीडिया पर मस्ती के साथ शुरू हुआ #10YearChallenge अब अपने साथ कुछ महत्वपूर्ण और गंभीर मुद्दे भी ले आया है.

तुर्की में महिलाओं ने ये चैलेंज पूरा किया है और अपनी दस साल पुरानी हिजाब पहने हुए तस्वीर की आज की तस्वीर से तुलना की है.

लेकिन, इन तस्वीरों का मकसद उम्र का अंतर दिखाना नहीं बल्कि हिजाब पहनने और उसे छोड़ने का अंतर दिखाना है.

महिलाओं ने अपनी दो तस्वीरें डाली हैं जिनमें से एक हिजाब पहने हुए है और दूसरी बिना हिजाब के साथ. इसके साथ ही महिलाओं ने हिजाब छोड़ने के कारण भी बताए हैं.

जब कई महिलाएं ऐसा करने लगीं तो इसे लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई.

तुर्की में हिजाब पहनना लंबे समय से विवादित मसला रहा है. सार्वजनिक संस्थानों में हिजाब पहनने पर सालों से प्रतिबंध लगा हुआ था और स्टूडेंट्स को हिजाब के साथ विश्वविद्यालय जाने की मनाही है.

लेकिन, पिछले कुछ सालों में राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन ने धीरे-धीरे इन प्रतिबंधों में ढील दी है.

हिजाब

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धर्मनिरपेक्षतावादी लोग हिजाब को राजनीतिक और धार्मिक कट्टरता के चिह्न के तौर पर देखते हैं और अर्दोआन पर धार्मिक एजेंडा चलाने का आरोप लगाते हैं.

कई महिलाओं को सामाजिक दबाव के चलते हिजाब पहनना पड़ता है. इस संबंधी में उठती आवाज़ों के कारण ये मसला तुर्की में उठता रहा है.

#10YearChallenge में लोग अपनी 10 साल पुरानी तस्वीर डाल रहे हैं लेकिन हिजाब की कुछ तस्वीरें एक साल पुरानी ही हैं क्योंकि उन महिलाओं ने हाल ही में हिजाब छोड़ने का फैसला लिया है.

ऐसे में वो महिलाएं 10 की जगह #1yearchallenge हैशटैग का इस्तेमाल कर रही हैं.

इन्हीं में से एक हैं नज़ान जिन्होंने पैराग्लाइडिंग करते हुए अपनी एक तस्वीर शेयर की है.

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा है, ''यह ज़ाहिर करना बेहद मुश्किल है कि जो आप सोचते हैं वो करने का अहसास कितना खूबसूरत होता है.''

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एक अन्य महिला जोसफिन ने लिखा है, ''मैं ऐसे किसी से बात की जिसे सात साल की उम्र में अपना सिर ढकना पड़ा था, जिसे 14 साल की उम्र में बेच दिया गया था (स्टूडेंट रहते हुए) लेकिन वो जिसने कभी संघर्ष करना नहीं छोड़ा. मैं उन महिलाओं से कह रही हूं जिनके दिलों में तूफ़ान है वो खुद को अकेली ने समझें, कभी हार न मानें...''

इस तरह के कई ट्वीट को एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'यू विल नेवर वॉक अलॉन' ने रीट्वीट किया.

सोशल मीडिया पर अपनी कहानी शेयर करना तुर्की की उन महिलाओं को हिम्मत देगा जिन्होंने हिजाब छोड़ दिया है या जो ऐसा करने के बारे में सोच रही हैं.

पहचान छुपाने की शर्त पर इस वेबसाइट की संस्थापक ने बीबीसी तुर्की को बताया कि उनका म​कसद तुर्की की महिलाओं को ये अहसास कराना है कि वो अकेली नहीं हैं और उनके मुश्किल वक़्त में कई और महिलाएं उनके साथ हैं.''

वह कहती हैं, ''13-14 साल की उम्र में किसी को भी वो पहनने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए जो ताउम्र उनके साथ बना रहने वाला है.''

कुछ और किस्से

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बुस्रानुर कहती हैं, ''कोई भी जो चाहता है, वो कह सकता है. हम आज़ाद हैं और इसका हमारे माता-पिता व परिचितों से कोई संबंध नहीं है. हमारे विचार हमारे बारे में हैं और हम क्या कर सकते हैं इसे लेकर हमारी सोच आज़ाद हैं. हम दूसरों की हमारे लिए निर्धारित की गईं भूमिकाएं नहीं निभाएंगे.''

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एक अन्य यूजर @mistiktanrica ने लिखा है, ''मैं हमेशा मुस्कुराती रहती हूं लेकिन ज़िंदगी हमेशा फूला की सेज नहीं होती. इमाम हतिप रिलिजियस हाई स्कूल से ग्रेजुएट होने के तौर पर मैं ही थी जो विश्वविद्यालय में हिजाब पहनने के अधिकार के लिए लड़ रही थी. लेकिन, अब पिछले आठ सालों से मैं हिजाब न पहनने के लिए लड़ रही हूं. आंतरिक द्वंद्व से निपटने में मुझे एक लंबा समय लगा और पांच सालों तक यह मेरे करीबियों और समाज से मेरी लड़ाई की तरहा रहा.''

दूसरा नज़रिया

हालांकि, इस मुहिम के ख़िलाफ़ भी लोग कमेंट कर रहे हैं. कुछ हिजाब पहनने के अपने अधिकार की वक़ालत कर रहे हैं.

एक यूजर एलिफ़ ने ट्वीट किया है, ''#1yearchallenge हम बड़े हो गए हैं, सुंदर और आज़ाद हो गए हैं. हम अपने हिजाब के साथ आज़ाद हैं. आपको जो सोचना है, सोचते रहिए. यह हमारा अपना विश्वास है. हम सिर्फ़ अपने बारे में कह सकते हैं, आपके बारे में नहीं.''

पुरुष भी बहस का हिस्सा

सिर्फ़ महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुष भी इस बहस का हिस्सा बन गए हैं.

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एक यूजर एडमआर्स लिखते हैं, ''कोई भी अपनी मर्ज़ी से ख़ुद को ढक सकता है या खुला रख सकता है. इससे किसी को मतलब नहीं होना चाहिए. मैंने उन लोगों की तस्वीरें देखी हैं जिन्होंने पिछले कुछ दिनों में हिजाब उतारा है. मुझे लगता है कि कुछ हद तक यह खोखली बात है! आपको हिजाब पहनने वालों और न पहनने वालों दोनों की ​इज़्ज़त करनी चहिए. अपमान करती हुईं टिप्पणियां करना बंद करें!''

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एक अन्य यूजर 'ज़ायनो' ने लिखा है, ''हिजाब से आज़ादी से जोड़ना कट्टरता है. आज़ादी बिना किसी के दबाव के अपनी मर्ज़ी से कुछ करने की क्षमता होना है. कभी-कभी, ख़ुद को ढकना भी आज़ादी होती है.''

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