हिजाब से तलाक़ लेती ईरानी सिनेमा की औरत

कैमेरे के पीछे कियानूश अयारी की फ़िल्म 'कानापे' की शूटिंग

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इमेज कैप्शन, कैमेरे के पीछे कियानूश अयारी की फ़िल्म 'कानापे' की शूटिंग
    • Author, पपौरिया माहरौयान
    • पदनाम, बीबीसी फारसी सेवा

यूं तो ईरानी सिनेमा दुनिया भर में अपने प्रोग्रेसिव रुख के लिए मशहूर है लेकिन उसकी पर्दानशीं नायिकाएं पर्दे पर बेपर्दा नहीं हुआ करती हैं.

पिछले साल कियानूश अयारी की फ़िल्म, ईरानी फ़िल्म फ़ेस्टिवल 'फ़ज्र' से बाहर कर दी गई थी. निर्देशक कियानूश अयारी की फ़िल्म 'कानापे' (एक फ़्रेंच शब्द जिसका मतलब 'सोफ़ा सेट' होता है) को 'फ़ज्र' फ़िल्म फ़ेस्टिवल से इसलिए निकाला गया था क्योंकि इस फ़िल्म की महिला कलाकारों ने अपने सर पर दुपट्टा नहीं डाला था.

'कानापे' में महिला कलाकार विग पहनकर कैमरे के सामने आई थीं. हालांकि इस पर अयारी ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि "ये आम बात है. इस का अंदाज़ा पहले से ही लग रहा था."

कियानूश अयारी ने 'कानापे' के साथ ही ये भी साफ़ कर दिया कि आगे से वो ऐसी कोई फ़िल्म ही नहीं बनाएंगा जिसमें उसकी महिला कलाकरों को एकांत में या फ़िल्म के अन्य कलाकार जो उनके सगे-संबंधी हों, के सामने अपने सर पर दुपट्टा डाली हुई हों.

ईरानी क्रांति के बाद जब वहां हिजाब अनिवार्य हो गया, तब से ही ईरान के फ़िल्म जगत में महिला कलाकारों के लिए हिजाब या सर पर दुपट्टा रखना ज़रूरी कर दिया गया.

ये पाबंदी तब भी लागू होती है जब पर्दे पर महिला कलाकार एकांत में हो या फिर अपने ऐसे सहयोगी पुरुष कलाकारों के सामने जो फ़िल्म में उस महिला के सगे-संबंधी का किरदार निभा रहे हों.

ईरान, सिनेमा

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इमेज कैप्शन, पैगम्बर मोहम्मद की ज़िंदगी पर बनी फ़िल्म 'इम्पायर ऑफ़ फ़ेथ' का एक दृश्य

हिजाब रखना अनिवार्य

ये बात ईरानी फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों के लिए बड़ी चिंता का सबब रही है. ईरानी इंक़लाब के दो-एक साल के भीतर जितनी भी फ़िल्में बनाई गईं, वे सब के सब इंक़लाब के पहले के दिशा-निर्देशों के तहत बनी थीं.

उस वक्त तक ईरान में हिजाब या सर पर दुपट्टा रखना अनिवार्य घोषित नहीं किया गया था लेकिन जब फ़िल्में बन कर तैयार हो गईं और उनकी रिलीज़ का समय आया तो ईरानी सिनेमा के लिए ये लक्ष्मण रेखा खींच दी गई.

इसका नतीज़ा ये निकला कि बहुत सी फ़िल्में हमेशा के लिए डिब्बा बंद रह गईं. कई फ़िल्म निर्देशकों का ये भी कहना है कि ईरानी फ़िल्म दर्शकों के लिए ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं है. लेकिन ये दर्शक ये भी नहीं चाहते कि महिला कलाकार हिजाब डालकर या दुपट्टा ओढ़ कर सोयें या जब उनके पिता या पति घर पर हों तो वो पूरी तरह से पर्दानशीं रहें.

हिजाब का ये मुद्दा उस वक़्त और मुश्किल खड़ी करता है जब फ़िल्म की कहानी का संबंध आज के ईरानी समाज, ख़ासकर इंक़लाब के बाद के ईरानी समाज या ईरान के बाहर के समकालीन समाज से न हो.

ईरानी महिला कलाकर तरानेह अलीदूस्ती फ़िल्म 'शहरज़ाद' में
इमेज कैप्शन, ईरानी महिला कलाकर तरानेह अलीदूस्ती फ़िल्म 'शहरज़ाद' में

हिजाब की जगह पर हैट

ईरानी फ़िल्मों और धारावाहिकों में पुरुष कलाकार को महिला के किरदार में पेश करने की पहली कोशिश अली हातेमी के टीवी सीरियल 'हज़ार दस्तान' (हजार हाथें) में हुई थी. ये फ़िल्म उस समय बननी शुरू हुई थी जब हिजाब अनिवार्य घोषित नहीं हुआ था.

1940 के दशक के प्लॉट पर बुनी गई इसकी कहानी के ज़्यादातर हिस्सों का 1980 दशक में फ़िल्मांकन हो चुका था और हुआ यूं कि इसके साथ हिजाब अनिवर्य घोषित हो गया.

इस धारावाहिक की कहानी के अनुसार महिला कलाकारों को बिना हिजाब के सिर पर केवल टोपी रखनी थी और कुछ निचले स्तर के कलाकारों को विग पहन कर अभिनय करना था.

फोटो से ये ज़ाहिर भी होता है कि ये टोपी हिजाब जैसी लगती है. एक बात ये भी है कि ईरानी क्रांति के शुरुआती सालों में बनी ज़्यादातर फ़िल्मों की कहानी का संबंध शाह के शासन-काल से है.

इनमें महिला कलाकारों को हैट पहने हुए अक़सर देखा जा सकता है. हिजाब की जगह पर हैट का इस्तेमाल असल में हिजाब से भागने की शुरुआती कोशिश थी. ये कोशिश आज भी उन ऐतिहासिक फ़िल्मों में देखी जा सकती है जिसकी कहानी ईरानी क्रांति के पहले के दौर की है.

इस का ताज़ा नमूना धारावाहिक 'शहरज़ाद और मुअम्मा-ए-शाह' है, क्योंकि इस सीरियल के कुछ दृश्यों में हैट के अलावा विग का भी इस्तेमाल किया गया है.

अली अकबर की फ़िल्म 'आदम-ए-बर्फ़ी' (बर्फ़ का आदमी) का एक सीन
इमेज कैप्शन, अली अकबर की फ़िल्म 'आदम-ए-बर्फ़ी' (बर्फ़ का आदमी) का एक सीन

महिलाओं के रोल में मर्द

पश्चिमी दुनिया से थिएटर जब ईरान आया था तो शुरू में महिला कलाकारों की बहुत अधिक कमी थी. ऐसे में पुरुष कलाकार ही इस कमी को पूरा करते थे. वे न केवल महिलाओं का किरदार निभाते बल्कि औरतों जैसी आवाज़ भी पैदा करने की कोशिश करते थे.

ऐसे कलाकारों और उनके अभिनय को 'ज़नपोश' नाम से जाना जाने लगा. फिर ईरानी क्रांति के बाद जब इस्लामी क़ानून और परंपरा की सीमाएं तय कर दी गईं तो महिलाओं के किरदार को वास्तविक रंग में पेश करने के लिए फिर से 'जनपोश' की सहायता ली गई.

लेकिन इस बार इसका मक़सद कुछ और था. हालांकि क्रांति से पहले की ईरानी फ़िल्मों में और विश्व के अन्य देशों की फ़िल्मों में 'ज़नपोश' कलाकारों का अभिनय सामान्य सी बात रही है. लेकिन क्रांति के बाद की ईरानी फ़िल्मों में पुरुष द्वारा महिलाओं का रोल निभाने के पीछे कुछ और ही मक़सद था.

दरअसल, हिजाब और स्त्री का पुरुष के शरीर से छू जाना, एक ऐसी बात थी जो परेशानी का सबब बन रही थी. ईरानी क्रांति के बाद मोहसिन मख़मल्बाफ़ की साल 1986 में आई 'दस्तफ़रोश' पहली बड़ी फ़िल्म है जिसमें एक पुरुष कलाकार ने एक महिला का किरदार निभाया.

ईरान, सिनेमा

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इमेज कैप्शन, ईरानी अभिनेत्री गोलशिफ़्ते फराहानी 'दरख्ते गुलाबी' के सेट पर, ये फ़िल्म 1998 में रिलीज़ हुई थी

ईरान का सेंसर बोर्ड

मोहसिन मख़मल्बाफ़ ने इस फ़िल्म में एक बूढ़ी औरत को बिना हिजाब के दिखाया था. इस प्रयोग पर मख़मल्बाफ़ ने बीबीसी को बताया, "इस रोल के लिए किसी बुजुर्ग महिला कलाकार की ज़रूरत थी जो एक तरह से नामुमकिन था."

लेकिन मोहसिन ने ये माना कि उन पर इस किरदार बिना हिजाब के न दिखाने का भी दबाव था और इस सूरत में केवल यही रास्ता बचा था कि कोई पुरुष कलाकार ये रोल निभा ले. ईरानी फ़िल्मों में सबसे ज़्यादा मशहूर 'ज़नपोश' अभिनय दाऊद मीरबाक़ी की फ़िल्म 'आदम-ए-बर्फ़ी' में देखने को मिला.

अकबर अबदी ने इस फ़िल्म में जनाने किरदार को अपनी वेषभूषा, आव-भाव और आवाज़, हर लिहाज से बखूबी अंजाम दिया. लेकिन ये फ़िल्म सालों ईरान के सेंसर बोर्ड में मंजूरी की आस में अटकी रही.

पर एक रोज़ सेंसर बोर्ड ने ये फ़िल्म पास कर दी और 'आदम-ए-बर्फ़ी' ईरानी सिनेमा के इतिहास में सबसे ज़्यादा लाभ कमाने वाली फ़िल्मों में से एक बन गई. हिजाब के अलावा फ़िल्म के दूसरे कलाकारों (चाहे वे महिला किरदार के नाते-रिश्तेदार ही क्यों न हो) के शरीर से स्पर्ष भी एक बड़ी वजह थी, जिस के कारण महिलाओं के रोल के लिए पुरुषों को चुना गया.

फ़रीमाह फ़रजामी फ़िल्म 'सुर्ब' (जस्ता या रांगा) का एक सीन

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इमेज कैप्शन, फ़रीमाह फ़रजामी फ़िल्म 'सुर्ब' (जस्ता या रांगा) का एक सीन

मुंडा हुआ सर

शिया धार्मिक मौलवियों के फ़तवों के मुताबिक़ ग़ैर महरम पुरुष को स्त्री के सर का बाल दिखाई देना हराम है. और इस फ़तवे पर सभी शिया धर्म गुरु एकमत हैं. इस फ़तवे के मद्देनज़र ईरानी फ़िल्म निर्देशकों ने कहानी के अनुसार हिजाब से बचने के लिए महिला कलाकारों के सर के बाल ही कटवा दिए.

हालांकि इन फ़िल्मों को रूढ़ीवादी संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा. लेकिन आखिरकार फ़िल्म की रिलीज़ को इजाजत मिल गई. 'सुर्ब' ऐसी पहली फ़िल्म थी जिसमें महिला कलाकार ने मुंडे हुए सर के साथ अभिनय किया था.

मसूद कीमयाई की इस फ़िल्म में फ़रीमाह फ़रजामी ने एक ऐसी स्त्री का रोल निभाया है जो टाइफ़स रोग से ग्रस्त हैं. इस वजह से उसके सिर के बाल झड़ गए हैं और वो फ़िल्म में बिना बाल के दिख रही हैं. इस फ़िल्म के लिए निर्देशक मसूद कीमयाई के सामने ये पेशकश रखी गई कि वे विग के जरिए मुंडा हुआ सिर दिखाएं.

लेकिन कीमयाई ने कहा कि नहीं उसका सिर कैमरे के सामने ही मुंडाओ. कुछ सालों बाद सर मुंडाए बिना हिजाब की महिला अभिनेत्री मनूचेहर हादी की 'क़रनतीनेह' फ़िल्म में देखी गई और इस पर भारी बवाल खड़ा हो गया. इस फ़िल्म में स्त्री का किरदार कैंसर से पीड़ित है और केमोथेरापी के कारण उसके सिर के बाल झड़ गए हैं.

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इमेज कैप्शन, तेहरान का एक सिनेमा घर, मोहसिन मख़मल्बाफ़ की फ़िल्म 'ट्रिप टू कंधार' का पोस्टर

महिला का किरदार

फ़िल्म की नायिका बिना हिजाब के ही परदे पर आई हैं. अली असमती की 'शेफ़्तगी' में भी ऐसी ही स्थिति सामने आई. इसमें महिला कलाकार रूया तैमूरियान ने मुंडे हुए सिर के साथ अभिनय किया था. सेंसर बोर्ड ने ये शर्त रखी कि फ़िल्म की अभिनेत्री रूया तैमूरयान के लिए 'डिजिटल टोपी' इस्तेमाल की जाए.

तब जाकर फ़िल्म को सर्टिफिकेट मिला. इसी तरह अब्बास किया रुसतुमी की फ़िल्म 'दह' (दस) में सिर मुंडाई हुई महिला का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री ने बताया कि अपने बालों को इस तरह कटाना बहुत ही मुश्किल था लेकिन फ़िल्म के किरदार को वास्तविक रूप देने के लिए उन्होंने ऐसा किया और नंगे सिर कैमेरे के सामने वह आईं.

लेकिन ईरान के इस्लामी मार्गदर्शक मंत्रालय ने इस फ़िल्म पर रोक लगा दी. बाद में जब इस फ़िल्म का प्रदर्शन हुआ तो लोगों ने शिया धर्म गुरुओं से ये फ़तवा चाहा कि महिला अभिनेत्रीयों का सर मुंडाकर बिना हिजाब के फ़िल्म में अभिनय करना क्या है?

क्या इस पर भी वही फ़तवा लागू होगा जो सिर के बाल के साथ बिना हिजाब के परदे पर आने पर होता है.

कतायून रेयाही धारावाहिक 'यूसुफ़ पयांबर' में
इमेज कैप्शन, कतायून रेयाही धारावाहिक 'यूसुफ़ पयांबर' में

ईरानी सिनेमा में विग

ज़्यादातर शिया धर्म गुरु जैसे आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई और आयतुल्लाह सीसतानी महिला कलाकारों के लिए विग का प्रयोग मजहब के हिसाब से वाजिब नहीं मानते. लेकिन इस्लामी मार्गदर्शक मंत्रालय ने अलग-अलग स्थिति में अलग-अलग ढंग से इस विषय पर कार्रवाई की है.

ईरान के सांस्कृतिक अधिकारी बीते सालों से ये कहते आए हैं कि हिजाब से बचने के लिए छलावे के तौर पर विग का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, लेकिन ऐसी फ़िल्मों की भी संख्या कम नहीं है जिसमें हिजाब की जगह विग का इस्तेमाल किया गया हो.

मोहसिन मख़मलबाफ़ ने बीबीसी को बताया कि फ़िल्म 'नासिरुद्दिन शाह, आक्तूर-ए-सिनेमा' में एक लुर क़बाइली लड़की के किरदार को दिखाने के लिए फ़िल्म की अभिनेत्री फ़ातेमा मोतमिद आर्या विग का इस्तेमाल करती है लेकिन फ़िल्म को सेंसर बोर्ड से पास कराने के लिए उसमें एक ऐसा सीन जोड़ जाता है कि एक जगह विग मोतमिद आर्या के सिर से गिर जाता है और विग के अंदर से उस का हिजाब बाहर दिखाई देता है.

फ़रजल्लाह सलहशवर के धारावाहिक 'यूसुफ़ पयांबर' में महिला किरदारों के लिए इस प्रकार के विग का चयन किया गया है जो स्पष्ट रूप से कृत्रिम लगता है. मगर अब भी इसी प्रकार के विग के इस्तेमाल वाली फ़िल्मों के रिलीज़ में 'कठिनाई' आती है.

कुछ समय पहले रिलीज़ हुई 'आब-ए नबात-ए चूबी' की शुरुआत में ही ये लिखा गया कि फ़िल्म की दो महिला अभिनेत्रियों ने विग का इस्तेमाल किया है. इस फ़िल्म को बग़ैर किसी परेशानी के पास कर दिया गया. लेकिन इसके साथ ही इसी विग ने कियानूश की फ़िल्म 'कानापे' की रिलीज़ में मुश्किल खड़ी कर दी.

अब्बास कियारोसतोमी

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इमेज कैप्शन, अब्बास कियारोसतोमी अपनी फ़िल्म की पटकथा इस तरह लिखते थे कि इसकी नौबत ही नहीं आती थी कि उनकी महिला अभिनेत्री अपने घर में अकेली हो या अपने पति के साथ बिना हिजाब के हो

संपादन और पटकथा

बहुत सारे निर्देशकों ने ये कोशिश की है कि घर के भीतर हिजाब से बचने के लिए या मिसाल के तौर पर ऐसे सीन के लिये जहां एक दूसरे का बोसा लेना हो या मां के गोद में बेटे का आना, जहां दोनों एके दूसरे से सालों बाद मिले हों, ऐसे में पटकथा में ऐसा परिवर्तन किया जाए कि इस प्रकार के सीन की ज़रूरत ही न पड़े या सीन को इस प्रकार से छांट दें कि असामान्य न लगे.

रख़शान बनी एअतमादी की फ़िल्म 'बानूई-ए ओरदीबेहिश्त' (ओरदीबेहिश्त महीने की महिला) के एक मशहूर सीन में फ़िल्म की अभिनेत्री मेनूफ़रशची जब अपने बेड रूम में जाती है और अपने सर के स्कार्फ़ को उतारने ही वाली है कि सीन समाप्त हो जाता है.

फ़िल्म मेकर अब्बास कियारोसतोमी ये कहते हैं कि ईरान में फ़िल्म निर्माण के दौरान उन्होंने ये सीख लिया कि सेंसर बोर्ड को किस तरह से गच्चा दिया जा सकता है. अब्बास कियारोसतोमी अपनी फ़िल्म की पटकथा इस तरह लिखते थे कि इसकी नौबत ही नहीं आती थी कि उनकी महिला अभिनेत्री अपने घर में अकेली हो या अपने पति के साथ बिना हिजाब के हो.

उन्होंने बीबीसी फ़ारसी के साथ एक बातचीत में कहा था कि "मेरे फ़िल्म में आप किसी स्त्री को नहीं देखेंगे कि जो घर में या अपने पति या अपने बेटे के आसपास बिना हिजाब के हो. ये इसलिये नहीं है कि मैं हिजाब का विरोधी हूं. ये सच है कि हिजाब हमारे देश में एक सामाजिक क़ानून है और आपका इस में विश्वास है या नहीं है लेकिन आप को इस का सम्मान करना पड़ता है और मैं इसका बिलकुल भी विरोधी नहीं हूं."

इसके बावजूद उन्हें हिजाब को लेकर अपनी फ़िल्मों के लिये सेंसर का विरोध झेलना पड़ा. उन्हें कहा गया कि उनकी फ़िल्म 'दह' में कई जगह बेहिजाबी दिखाई गई है और उन सीन को काट दिए जाने के बाद ही फ़िल्म को रिलीज़ का प्रमाणपत्र मिलेगा.

ईरानी फ़िल्मों में विदेशी अभिनेत्रियों को लिए जाने से काफ़ी लाभ हुआ है जैसे फ़िल्म 'मन सालवादोर नीसतम' ने करोड़ों का बिज़नेस किया
इमेज कैप्शन, ईरानी फ़िल्मों में विदेशी अभिनेत्रियों को लिए जाने से काफ़ी लाभ हुआ है जैसे फ़िल्म 'मन सालवादोर नीसतम' ने करोड़ों का बिज़नेस किया

विदेशी कलाकार

अस्सी के दशक के आख़िरी सालों में कुछ ईरानी फ़िल्में विदेशों में काफ़ी लोकप्रिय हूईं. इस लोकप्रियता के कारणों से एक कारण विदेशी अभिनेत्रीयों का ईरानी फ़िल्मों में अभिनय करना भी शामिल था. मगर इसके बावजूद ईरानी फ़िल्मों में काम करने वाली विदेशी अभिनेत्रियों को पहनावे और वेशभूषा के मामले में कोई छूट नहीं दी गई.

लेकिन इधर हाल के सालों में ये छूट दी गई है कि ईरानी फ़िल्मों में काम करने वाली विदेशी अभिनेत्री बिना हिजाब के अभिनय कर सकती है, अगर फ़िल्म की शूटिंग विदेशों में हुई हो. माज़यार मीरी की फ़िल्म 'किताब-ए-क़ानून' साल 1999 में बन कर तैयार हुई. इस फ़िल्म को लेकर भी ईरान में हिजाब की समस्या खड़ी हुई.

इस फ़िल्म में परविज़ परसतूई ने एक ऐसे ईरानी का अभिनय किया है जिसकी नियुक्ति लेबनान में होने के कारण वह लेबनान जाता है और वहां पर उसे एक ईसाई लड़की से प्रेम हो जाता है जो हिजाब नहीं डालती है. फिर ईरानी लड़के से शादी के बाद वह ईसाई लड़की मुसलमान हो जाती है और ईरान आकर हिजाब भी डालने लगती है.

बाद के सालों में ऐसी बहुत सारी फ़िल्में बनीं जिसमें ईरानी पुरुषों को विदेशी महिला से प्रेम हो जाता है. ऐसी फ़िल्मों में अक़सर महिला अभिनेत्री को जब तक ईरान से बाहर दिखाया गया है तो वह बिना हिजाब के है. मिसाल के तौर पर कुछ फ़िल्में जैसे 'मन सालवादोर नीसतम' और 'सलाम बंबई' पिछले कुछ ही वर्षों में बनी हैं.

साल 2012 में आई 'इसतरदाद' (प्रत्यार्पण) एक और फ़िल्म है, जिसमें विदेशी अभिनेत्री ने बिना हिजाब के रोल किया है. अली ग़फ़्फ़ारी की ये फ़िल्म दूसरी फ़िल्मों से इसलिए थोड़ा अलग है कि इसमें विदेशी अभिनेत्री ईरानी महिला के किरदार में है, और निर्देशक भी हिजाब के छल छलावे जैसे टोपी या विग के प्रयोग, से हट कर बेलोरशियन अभिनेत्री अलीसा काचर की आवाज़ को डब किया है.

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