हिजाब में तलवारबाज़ी करती मुस्लिम बालाएं

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हैदराबाद से
उनके लिबास पूरी तरह पारंपरिक हैं, सलवार, जंपर, और हिजाब भी, लेकिन उनके हाथों में लाठियां और तलवार यूं नाचती हैं कि अच्छे-अच्छों के छक्के छुड़ा दे.
ये लड़कियां हैं हैदराबाद के एक मुस्लिम स्कूल की जिन्हें आत्मरक्षा के लिए मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि लोग ये 'जान सकें कि मुस्लिम लड़कियां किसी भी क्षेत्र में किसी से कम नहीं.'
फरीहा कहती हैं कि वो 'छठी क्लास में पढ़ती थीं' जब उन्होंने मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ज्वायन की' और अब उसमें वो 'काफ़ी महारत हासिल कर चुकी हैं.'
प्रिंसिपल महमूद अली साजिद इस प्रशिक्षण के शुरू किये जाने का दिलचस्प क़िस्सा सुनाते हैं - उनके स्कूल के एक पूर्व छात्र ने वोवीना नाम के इस मार्शल आर्ट में नाम कमाया, फिर उन्हें इसे शुरू करने की सलाह दी तो महमूद अली को ख़्याल आया कि क्यों न ऐसी ट्रेनिंग वो अपने स्कूल की लड़कियों को दिलवायें.
महमूद अली कहते हैं, "एक तरह का आत्मविश्वास पैदा होता है आपमें अगर आप ये जानते हैं कि आप किसी हमले से निपटने की क्षमता रखते हैं, इसलिए हमने ये ट्रेनिंग शुरू की और ये सिर्फ़ छात्राओं को दिया जाता है."
लेकिन अभिभावकों को तैयार करना आसान नहीं था.
कोच मीर वहाज़ अली ख़ान कहते हैं, "मुस्लिम समाज पारंपरिक है इसमें लड़कियों के खेल को लेकर कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी जाती, चाहे वो वॉलीबॉल हो, फ़ुटबॉल या क्रिकेट और यहां तो सवाल मार्शल आर्ट्स में हिस्सा लेने का था."
शायद परंपरागत लिबास में ही ट्रेनिंग का दिया जाना और कुछ लड़कियों के राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पदकों के हासिल करने से अभिवावकों के मिजाज़ में थोड़ी नरमी आई हो. हालांकि एक समय राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीत चुकीं फरीहा को प्रतियोगिता में शामिल होने के लिए भी घरवालों से लंबी जद्दोजहद करनी पड़ी थी.
फरीहा बताती हैं, "जब मैं नेशनल चैंपियनशिप के लिए असम जाना चाहती थी तो मेरे घरवाले उसकी इजाज़त नहीं दे रहे थे. हालांकि मेरे पिताजी मेरे पक्ष में थे और उन्होंने बड़ी मुश्किल से दूसरों को तैयार करवाया और मैंने चैंपियनशिप जीत ली."
गुवाहाटी शहर में हुई मार्शल आर्ट्स की इस प्रतियोगिता में सिर्फ़ दो मुस्लिम लड़कियां शामिल हुईं, दोनों हैदराबाद के इसी स्कूल से थीं. सुमैया भी गुवाहाटी गई थीं. हाल में उन्होंने इंटर डिस्ट्रिक्ट कंपटीशन में गोल्ड मेडल जीता है.
जाहिर है कोच मीर वहाज़ अली ख़ान छात्रों को लगातार मिल रही कामयाबी से ख़ुश हैं. ट्रेनिंग के बारे में वो हमें बताती हैं, "हम सबसे पहले फ़िटनेस बनाते हैं, क्योंकि अगर फ़िटनेस रहेगी तभी वो आत्मरक्षा कर पाएंगी. इसलिए सबसे पहले उनको एक स्वस्थ शरीर देना हमारा लक्ष्य होता है जिसके बाद हम उन्हें आत्मरक्षा के लिए दूसरे तरह की ट्रेनिंग देते हैं."
वोवीना एक वियतमानी मार्शल आर्ट है जिसमें शरीर और मस्तिष्क दोनों की ट्रेनिंग पर ज़ोर दिया जाता है. इसमें सिर्फ हाथों से यानी हैंड टू हैंड और हथियारों के साथ लड़ाई - दोनों शामिल होते हैं. कुछ पूर्व छात्राओं जैसे ग़ाज़िया सुल्ताना और .... ने तो स्कूल छोड़ने के बाद भी मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग जारी रखी है.

फिरोज़ा जबीं अब सुबह में ख़ुद ट्रेनिंग लेती हैं और शाम में दूसरी लड़कियों को ट्रेनिंग देना शुरु कर दिया है.
महमूद अली कहते हैं, 'जिस तरह हमारे बच्चे असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में चैंपियनशिप जीतकर आए हैं, कल अगर ये गेम ओलंपिक में फिर से शामिल हो जाता है और हमारी लड़कियां वहां मेडल लाने में कामयाब होती हैं तो भारत का नाम रौशन होगा.'
ओलंपिक की बात तो भविष्य की है लेकिन महमूद अली ने आज कम से कम एक दक़ियानुसी समझे जाने वाले समाज के एक वर्ग के सोच को बेहतर दिशा देने की नई पहल ज़रूर कर दी है.
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