पापुआ न्यू गिनी बनेगा अमरीका के ख़िलाफ चीन का हथियार?

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- Author, करिश्मा वास्वानी
- पदनाम, एशिया बिज़नेस संवाददाता
"जो देश संरक्षणवाद की नीति अपनाते हैं, निश्चित तौर पर उनका विनाश हो जाता है."
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमरीका की 'अमरीका फर्स्ट पॉलिसी' के संदर्भ में ये बात कही. जिनपिंग ने एशिया पैसिफ़िक इकोनॉमिक कॉर्पोरेशन समिट (एपेक) के दौरान ये बयान दिया, जहां चीन और अमरीका के बीच चला आ रहा व्यापारिक गतिरोध मुख्य मुद्दा रहा.
बीते कई महीनों से दोनों देशों के बीच व्यापारिक संघर्ष चल रहा है. कभी अमरीका अपने दांव चलता है तो कभी चीन पलटवार करता है.
अमरीका का तर्क है कि उसने जो टैरिफ़ लगाए हैं वो चीन की अनुचित व्यापार नीतियों का परिणाम है.
दोनों ही देशों का कहना है कि मौजूदा टैरिफ़ अरबों डॉलर का हो चुका है और आने वाले समय में ये और भी बढ़ सकता है.
हालांकि शी जिनपिंग ने आने वाले समय में तनाव के बढ़ने को लेकर चेतावनी दी है.
उन्होंने कहा, "इतिहास टकराव से भरा पड़ा है, चाहे वो शीत युद्ध के रूप में हो, ख़ूनी जंग के तौर पर हो या फिर व्यापारिक युद्ध के रूप में लेकिन सच्चाई यही है कि युद्ध चाहे कोई भी हो, उससे कोई विजेता नहीं पैदा होता."

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पापुआ न्यू गिनी की राजधानी पोर्ट मोर्सबी में हुई समिट पहली बार आधिकारिक बयान जारी किए बिना ख़त्म हो गई. मेजबान देश के प्रधानमंत्री पीटर ओ नील ने कहा कि दो बड़े देशों (चीन और अमरीका) के बीच सहमति नहीं बन सकी. चेयरमैन का बयान बाद में जारी किया जाएगा.
में शी जिनपिंग ने मौजूदा व्यापारिक हालातों के बारे में कहा कि इस तरह अड़चनें पैदा करना, आर्थिक संबंधों को तोड़ना अर्थशास्त्र के क़ानून को तोड़ना है. ये सालों से चले आ रहे व्यापारिक नियमों का उल्लंघन है.
उन्होंने कहा "ये कोई दूरगामी सोच नहीं है और निश्चित तौर पर ये विनाश का रास्ता है." चेतावनी भरे शब्दों में उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए हैं वे सिर्फ़ ख़ुद को दुनिया के बाकी देशों से काट रहे हैं. वे दिशा भटक चुके हैं.
जब तक चीन नहीं बदलेगा, हम भी ऐसे ही रहेंगे
लेकिन शी जिनपिंग के ठीक बाद अमरीकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने कहा कि चीन टैरिफ़ की बात कर रहा है लेकिन सच्चाई यही है कि ये सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी अंसतुलित व्यापार नीतियों का परिणाम है.
उन्होंने कहा "अमरीका अपने तरीक़े में तब तक बदलाव नहीं लाएगा जब तक कि चीन अपनी नीतियों में बदलाव नहीं लाएगा."
हालांकि उनका ये बयान अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के उस बयान के ठीक एक दिन बाद आया है जिसमें उन्होंने कहा था कि वो पूरी तरह आश्वस्त हैं कि चीन और अमरीका के बीच डील हो जाएगी.
हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि अगले महीने अर्जेंटीना में होने वाले जी-20 समिट को देखते हुए इस समझौते में कुछ मुख्य मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है, जिसका मतलब ये हुआ कि राष्ट्रपति अब भी इसे पूरी तरह स्वीकार नहीं करते हैं. राष्ट्रपति ट्रंप पहले भी ऐसा ही बयान दे चुके हैं.

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विश्व व्यापार का इतना बड़ा सम्मेलन एक ग़रीब देश में क्यों?
पापुआ न्यू गिनी की राजधानी पोर्ट मोर्सबी में इन दिनों अक्सर लोग इस बात पर हंस पड़ते हैं कि आख़िर चीन किस वजह से शहर की मुख्य सड़क को बनाने के लिए पैसे देने को राज़ी हो गया.
लोग आपस में बात करते हैं कि पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री ने चीन के राष्ट्रपति से पूछा होगा कि वो पोर्ट मोर्सबी में कितनी चौड़ी और लंबी सड़क चाहते हैं?
इस पर चीन के राष्ट्रपति ने कहा होगा, 'अरे चिंता की कोई बात नहीं है. सिर्फ़ इतनी होनी चाहिए कि यहां से हमारे टैंक आसानी से गुज़र जाएं, जैसे हमारे यहां गुज़रते हैं.'
इस तरह के कई किस्से आजकल इस शहर के लोगों की ज़ुबान पर हैं. पहली दफ़ा सुनने में ये बातें मज़ेदार लग सकती हैं लेकिन ये बातें बीजिंग के बढ़ते प्रभाव से उपजी चिंताओं की ओर भी इशारा करती हैं.
चीन इतना निवेश क्यों कर रहा है?
पापुआ न्यू गिनी की राजधानी पोर्ट मोर्सबी में एपेक समिट के दौरान घूमते हुए मेरे गाइड ने मुझे वो-वो जगहें दिखाईं जो इस समिट के लिए चीन की मदद से तैयार की गईं हैं. सड़कें, मुख्य समारोह स्थल यहां तक की बस स्टॉप बनाने में भी चीन का पैसा लगा है.

एक बेहद ग़रीब देश ने उस समारोह की मेज़बानी की जिसमें दुनिया भर के तमाम बड़े व्यापारिक नेता शामिल हुए और विश्व व्यापार से जुड़ी बातों पर चर्चा की.
लेकिन चीन का यहां इस तरह शामिल होना और इतना रुझान दिखाना कोई नया नहीं है.
बीते एक दशक की बात करें तो प्रशांत क्षेत्र में चीनी सहायता और उसके निवेश में काफी वृद्धि हुई है. लॉवी इंस्टीट्यूट के हालिया अध्ययन में भी इस बात का ज़िक्र है.
इंस्टीट्यूट के पैसिफ़िक ऐड मैप के मुताबिक़, चीन ने पापुआ न्यूगिनी में साल 2016 में क़रीब 21 मिलियन डॉलर का निवेश किया था. एक साल बाद ही उसने इस निवेश का तीन गुना, पापुआ न्यू गिनी में ख़र्च किया.

अब इसे कुछ इस तरह देखते हैं...
चीन इस देश में भरपूर निवेश कर रहा है लेकिन ऑस्ट्रेलिया अब भी सबसे आगे है. इस देश की 70 फ़ीसदी सहायता राशि अब भी अपने पूर्व औपनिवेशिक शासक देश से आती है.
पापुआ न्यूगिनी एपेक का सबसे ग़रीब सदस्य है और देश की क़रीब 40 फ़ीसदी जनसंख्या एक डॉलर प्रति दिन से भी कम पर गुज़ारा करती है. ये आंकड़े यूएन के हैं.
स्थानीय लोगों ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया सालों से यहां निवेश करता आ रहा है. शिक्षा और अच्छी सरकार के लिए वो लंबे समय से इस देश में निवेश कर रहा है.
वहीं चीन का निवेश पापुआ न्यूनिगी के उस क्षेत्र में है जिसे वो फिलहाल सबसे ज़रूरी बताता है और वो है, यहां आधारभूत संरचना विकसित करना.
पापुआ न्यू गिनी के बिज़नेस काउंसिल डाउवेरी हेनाओ के एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर का कहना है कि चीन हमारे लिए सड़कें बना रहा है, पुल बना रहा है और वो आगे भी ऐसा करता रहेगा.
"और ये सिर्फ़ पापुआ न्यूगिनी में नहीं हो रहा है, ये पूरे प्रशांत क्षेत्र में किया जा रहा है."

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आख़िर ये देश क्यों है इतना अहम?
वो कहते हैं कि ये सबकुछ चीन की नीतियों का हिस्सा है. ये कई अरब डॉलर का प्रोग्राम है जिसका मक़सद चीन को दुनियाभर से व्यापार और निवेश के माध्यम से जोड़ना है.
हालांकि पापुआ न्यू गिनी में चीन का निवेश अभी बहुत कम है लेकिन आधारभूत संरचनाओं में निवेश करने की चीन की इस नीति को देखते हुए ही ऑस्ट्रेलिया ने पिछले हफ़्ते ही एक बिलियन डॉलर पैसिफ़िक फंड की घोषणा की है. इसे चीन के बढ़ते प्रभाव का जवाब माना जा रहा है.
वहीं दूसरी ओर पापुआ न्यू गिनी में पैसा लगाने के चीन के क़दम की आलोचना करने वालों का कहना है कि चीन से पैसे आने में पारदर्शिता एक बड़ा मुद्दा है. ये पैसा कैसे आता, किसके माध्यम से आता और किसके पास आता है, ऐसे तमाम सवाल है जिसमें पारदर्शिता की ज़रूरत है.
इसका एक कारण सरकार की कमी भी है और यहां फैला भ्रष्टाचार भी है. लेकिन एक बात यह भी है कि चीन पैसा पहले लगाता है और सवाल बाद में करता है.
कई बार इसका नतीजा ये होता है कि पैसा ऐसे प्रोजेक्ट्स पर ख़र्च हो जाता है जो ग़ैर-ज़रूरी होते हैं या बेकार होते हैं. जबकि उसी पैसे को देश के दूसरे अहम हिस्सों जैसे स्वास्थ्य सेवाओं पर ख़र्च किया जा सकता है.
राजनीतिक रंग
बीज़िग का पापुआ न्यू गिनी में पैसा लगाने का कारण कोई एक नहीं है. इसके पीछे आर्थिक और कूटनीतिक दोनों ही वजहें हैं.

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पापुआ न्यू गिनी कई प्राकृतिक ख़जानों से भरपूर है. ये देश कई दुर्लभ खनिजों से भरा पड़ा है. इसके अलावा प्रशांत क्षेत्र के ये देश ताइवान समर्थक देशों का एक तिहाई हैं. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन इस वजह से भी यहां प्रभाव स्थापित करना चाहता है.
लेकिन ये चीन की दूरगामी कूटनीतिक सोच है और इससे कई बड़े सवाल खड़े होते हैं.
लॉवी इंस्टीट्यूट के जॉनथन प्राइक पूछते हैं कि इन सबको आप किस तरह देखती हैं?
"ऑस्ट्रेलिया और अमरीका जैसे देशों का सबसे बड़ा डर ही यही है कि आने वाले बीस-तीस सालों में बीजिंग का मक़सद प्रशांत क्षेत्र में स्थायी सैन्य बेस स्थापित कर लेना है. शायद यही वजह है कि आप देख रहे हैं कि वॉशिंगटन और कैनबरा कैसी प्रतिक्रिया दे रहे हैं."

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सबसे ताज़ातरीन युद्ध भूमि
पापुआ न्यू गिनी, गुआम से महज़ कुछ हज़ार किलोमीटर की दूरी है. गुआम में अमरीकी बेस है.
अमरीकी डिपार्टमेंट ऑफ़ डिफ़ेंस की एक हालिया रिपोर्ट में चीन की बढ़ती सैन्य ताक़त पर रोशनी डाली गई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अपनी सेना का विस्तार करने के लिए तटस्थ है. "वो प्रशांत क्षेत्र में अपना बेस बनाना चाहती है ताकि वो पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमरीका और दूसरे सहयोगी बलों को ये स्पष्ट कर सके कि वो उन पर हमला करने में सक्षम है, जिसमें गुआम भी शामिल है."
हालांकि ज़्यादातर जानकार इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते हैं कि कभी ऐसा होगा.
लेकिन ये बात भी सही है कि चीन को लेकर ये डर ही है जिसकी वजह से अमरीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश प्रशांत क्षेत्र पर इतना ध्यान दे रहे हैं. ऐसे में पापुआ न्यू गिनी को सौगात देने वालों में अब कई देशों के नाम शामिल हो गए हैं.
सारे तारों को जोड़कर देखें तो समझ आता है कि मौजूदा समय में पापुआ न्यू गिनी आज के समय की सबसे ताज़ातरीन युद्ध भूमि है, जहां चीन और दूसरे यूरोपीय देश अपनी आर्थिक और राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं.
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