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ट्रंप और किम की मोहब्बत में क्या आ गई है दरार?
- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दक्षिण कोरिया
आपको वो वक़्त याद होगा जब अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन एक दूसरे के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गए थे. लेकिन अब ऐसा लगता है कि वे एक दूसरे से बात तक नहीं करते.
बल्कि लगता तो यूं है कि दोनों देश एक दूसरे को घूरे जा रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं कि सामने वाले का अगला क़दम क्या होगा. दोनों में से कोई हार भी नहीं मान रहा.
दोनों नेताओं के बीच दूसरी मुलाक़ात की भूमिका तैयार करने के लिए इस हफ़्ते जो चर्चा होनी थी, वह भी नहीं हो सकी.
किम के सहयोगी और अतिवादी माने जाने वाले किम योंग-चोल को न्यूयॉर्क आकर अमरीकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो से मुलाक़ात करनी थी.
लेकिन बीबीसी को मालूम हुआ है कि जब अमरीकी विदेश मंत्रालय को पता चला कि उत्तर कोरिया से कोई रवाना ही नहीं हुआ है तो उन्होंने बैठक रद्द कर दी.
आधिकारिक संस्करण यही है कि बैठक के लिए नई तारीख़ तय की जाएगी. अमरीकी राष्ट्रपति का कहना है कि चीज़ें जैसी चल रही हैं, वे उससे 'बहुत ख़ुश' हैं और जब तक पाबंदियां लगी हुई हैं वे जल्दी में नहीं हैं.
दक्षिण कोरिया के सिओल में भी पत्रकारों से कहा जा रहा है कि बैठक के मुल्तवी होने के अतिरिक्त अर्थ न निकाले जाएं- क्योंकि अतीत में भी बैठकें टलती रही हैं.
हालांकि दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने 'निराशा' ज़रूर जताई है.
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन ने बीबीसी के एक इंटरव्यू में कहा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय जब उत्तर कोरिया को निरस्त्रीकरण के लिए मनाने की कोशिश कर रहा है तो उन्हें कुछ ऊंच-नीच की भी आशंका है.
लेकिन ऐसा लगता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उत्तर कोरिया से बातचीत और लगातार संवाद की गति खोता जा रहा है.
यहां तक कि निचले स्तर पर भी, उत्तर कोरिया में अमरीका के नए राजदूत स्टीफ़न बीगन को पद संभाले दो महीने हो गए हैं और उनकी अब तक अपने उत्तर कोरियाई समकक्ष उपविदेश मंत्री चोई सुन-हुई से मुलाक़ात नहीं हुई है.
संपूर्ण निरस्त्रीकरण?
इस गतिरोध की जड़ ये है कि उत्तर कोरिया और अमरीका कभी 'निरस्त्रीकरण' के विचार पर पूरी तरह सहमत नहीं हुए.
जब वे निरस्त्रीकरण की बात करते हैं तो उसका मतलब क्या है?
यह सही है कि दोनों नेताओं के बीच सिंगापुर में एक समझौते पर दस्तख़त किए गए थे, लेकिन उस समझौते के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है. यही अधूरी जानकारी अब इस पूरी प्रक्रिया को बाधित कर रही है.
शुरू से ही उत्तर कोरिया का रुख़ साफ़ था. वे एकतरफ़ा निरस्त्रीकरण नहीं करेंगे. वे उसके बदले में कुछ चाहेंगे. इसका मतलब है कि इस वक़्त उन्हें लगता है कि प्रतिबंधों से फ़ौरी राहत पाने के लिए उसके क़दम पर्याप्त हैं.
अमरीका और संयुक्त राष्ट्र दोनों ने उत्तर कोरिया पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं.
उत्तर कोरिया के क़रीब 90 फ़ीसदी निर्यात पर प्रतिबंध है, जिसमें कोयला, लौह अयस्क, सी फ़ूड और कपड़ा वगैरह है. उसके तेल ख़रीदने की भी सीमा तय है. अगर किम जोंग-उन अपने देश की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना चाहते हैं और ऐसा वादा उन्होंने अपने देशवासियों से किया है तो वे इन पाबंदियों से निजात ज़रूर चाहेंगे.
हालांकि अमरीका कहता रहा है कि 'संपूर्ण निरस्त्रीकरण' के बिना पाबंदियों से कोई राहत नहीं मिलेगी.
अभी यह अभिमान से भरा एक अवास्तविक लक्ष्य लगता है.
क्या अमरीका समझौता करेगा?
रूस ने इस हफ़्ते उत्तर कोरिया के तटों पर जारी पाबंदियों पर चर्चा के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई थी.
लेकिन संयुक्त राष्ट्र में उस वक़्त की अमरीकी राजदूत निकी हेली का रुख़ साफ़ था,"ख़तरा अब भी मौजूद है. उत्तर कोरिया के पास अब भी परमाणु तकनीक और संयंत्र हैं और उन्होंने अब तक पर्यवेक्षकों को वहां जांच के लिए आने की इजाज़त नहीं दी है."
कई जानकारों का मानना है कि अमरीका को अपने रुख़ में कुछ बदलाव करना चाहिए. यह प्रक्रिया पूरी तरह दम तोड़ दे, उससे पहले थोड़ा झुक जाना चाहिए. लेकिन अब तक ट्रंप प्रशासन की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है.
तो अगर अमरीका झुकने को तैयार नहीं है तो उत्तर कोरिया क्या करेगा? पिछले हफ़्ते उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय के इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिकन स्टडीज़ की ओर से जारी बयान में एक धमकी दी गई.
इस बयान मे कहा गया कि "रिश्तों में सुधार और पहले से जारी पाबंदियों में बड़ी विसंगति है" और अमरीका "हमारी बार-बार दोहराई जाने वाली मांग समझे बिना और अपना रुख़ बदले बिना ही अहंकार में शेखी बघार रहा है."
इस बयान के बाद ये कयास लगाए गए कि अमरीका अगर पाबंदियां नहीं हटाता है तो उत्तर कोरिया अपना परमाणु कार्यक्रम फिर शुरू कर सकता है.
यहां यह भी ध्यान में रखना ज़रूरी है कि अमरीका और संयुक्त राष्ट्र के कई ख़ुफिया अध्ययन दावा करते हैं कि उत्तर कोरिया में हथियारों का निर्माण और संचय दोनों ही जारी हैं.
लेकिन उसने मिसाइल और परमाणु हथियारों का परीक्षण करना बंद कर दिया है जिसे अमरीकी राष्ट्रपति अपनी निजी जीत मानते हैं. वह तो यह घोषणा भी कर चुके हैं कि "अब उत्तर कोरिया से कोई परमाणु ख़तरा नहीं रह गया है."
उत्तर कोरिया के पास विकल्प
तो हां, उत्तर कोरिया के पास एक विकल्प है. वो इस वक़्त एक मिसाइल का परीक्षण कर सकता है जिसके बाद अमरीकी राष्ट्रपति को शर्मसार होना पड़ सकता है.
लेकिन इसके साथ बहुत बड़े ख़तरे नत्थी हैं.
यह अप्रत्याशित कहे जाने वाले डोनल्ड ट्रंप का गुस्सा भड़का सकता है. उन्हें पसंद नहीं है कि उनका प्रशासन कमज़ोर दिखे. मिसाइल परीक्षण की एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय निंदा होगी और पाबंदियों से राहत मिलने के आसार भी जाते रहेंगे.
इसी के साथ ही उत्तर कोरिया के अपने पड़ोसी दक्षिण कोरिया से सुधरते संबंध भी बिगड़ जाएंगे. कई कंपनियां उत्तर कोरियां में निवेश की तैयारी कर रही हैं.
किम जोंग-उन के पास दूसरा विकल्प है कि वो अपने कुछ वादे पूरे करे. वह पर्यवेक्षकों को पुंगेरी में अपने एकमात्र ज्ञात परमाणु परीक्षण स्थल तक आने दे. उत्तर कोरिया ने मई में यहां कुछ धमाकों से परमाणु परीक्षण स्थल को ख़त्म करने का दावा किया था और इसकी तस्वीरें कैमरे पर दर्ज की गई थीं.
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून का कहना है कि किम जोंग-उन ने उनसे कहा था कि वे पर्यवेक्षकों को प्रवेश देंगे और ख़बरें ये भी हैं कि दक्षिण कोरिया में इसकी तैयारियां भी चल रही हैं. इससे उत्तर कोरिया को बातचीत में तोल-मोल करने की सहूलियत भी मिलेगी.
इसके अलावा किम योंगब्योन न्यूक्लियर फेसिलिटी को भी बंद कर सकते हैं. उत्तर कोरिया ने पहले भी उसे बंद करने का वादा किया था, लेकिन अमरीका की ओर से बड़े क़दम लिए जाने के बाद ही.
यहां यह ज़िक्र ज़रूरी है कि उत्तर कोरिया में मेरी जिन लोगों से बात होती है वे बताते हैं कि एक नौजवान नेता के तौर पर किम जोंग-उन कई तरह के दबावों का सामना कर रहे हैं. उनके आस पास कई सैन्य अतिवादी हैं जो निरस्त्रीकरण नहीं चाहते हैं और जो अमरीकी निवेदनों के आगे झुकते हुए भी नहीं दिखना चाहते.
प्योंगयांग के खेल
शायद दोनों पक्ष ये सोच रहे हैं कि वे बस इस पर कुछ देर तक 'टाइमपास' करते हुए इंतज़ार कर सकते हैं. उत्तर कोरिया के अगले क़दम लेने तक अमरीका अपनी पाबंदिया जारी रख सकता है.
उत्तर कोरिया अपनी चेतावनियां जारी रखते हुए दूसरे कूटनीतिक रिश्ते विकसित कर सकता है.
हालांकि अमरीका के लिए यह एक बड़ा जुआ होगा. उत्तर कोरिया के परमाणु ज़ख़ीरे को अमरीका के रक्षा और ख़ुफ़िया प्रमुख इसे एक आपात समस्या मानते हैं.
यह ख़तरा अब भी बना हुआ है. जब तक यह गतिरोध क़ायम है, बहुत आसार हैं कि उत्तर कोरिया अपने हथियार बनाता रहेगा.
अमरीका का कहना है कि किम और ट्रंप के बीच अगली मुलाक़ात अगल साल होगी. लेकिन समझौते के ब्यौरों पर सहमति के लिए यह ज़रूरी है कि निचले स्तर पर भी दोनों तरफ़ के अधिकारियों के बीच संवाद होता रहे.
काग़ज़ पर उन ज़रूरी ब्यौरों के बिना यह मामला एक कूटनीतिक गतिरोध में तब्दील हो जाएगा और ट्रंप जिस नीति को सफल बता चुके हैं, उसके धराशायी होने का ख़तरा भी बना रहेगा.
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