भारतीय नाविक समुद्र में जहाँ फँसे थे, वो कितना ख़तरनाक

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ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट से लगभग 3200 किलोमीटर दूर समुद्र के बीचोबीच फंसे भारतीय नाविक अभिलाष टोमी को बचा लिया गया है.
वो पारंपरिक नाव से अकेले समुद्री यात्रा कर रहे थे. अभिलाष उस 'गोल्डन ग्लोब' रेस में भाग ले रहे थे, जिसमें अकेले समुद्री यात्रा करते हुए पूरी दुनिया का चक्कर काटना होता है.
हिंद महासागर में भीषण तूफ़ान के कारण उनकी नाव क्षतिग्रस्त हो गई थी और वो समुद्र के बीचोबीच फँस गए थे.
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क़रीब चार दिनों की मशक्कत के बाद उन्हें बचा लिया गया.
लेकिन बीच समंदर में जहां वो फंसे थे, क्या वो मौत के मुंह में फंसने जैसा था? या वो कितना ख़तरनाक था?
दक्षिण हिंद महासागर विशाल है और इसकी विशालता के कारण यहां इंसानी गतिविधियां बहुत कम होती हैं. यहां किसी के ग़ायब हो जाने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
अभिलाष टोमी की नाव 'थूरिया' का मस्तूल (वह स्तंभ जिससे पाल बंधा रहता है) पिछले शुक्रवार को भीषण तूफ़ान के कारण टूट गया था.

गोल्डन ग्लोब रेस के आयोजकों का कहना है कि अभिलाष ऑस्ट्रेलिया की तट से तीन हज़ार किलोमीटर के सुरक्षित दायरे से बाहर फंसे थे, जिसकी वजह से उन्हें तत्काल बचा पाना मुश्किल था.
ऑस्ट्रेलिया के समुद्री सुरक्षा प्राधिकरण भी इसे दायरे से बाहर वाले समुद्री इलाक़े को दुर्लभ पहुंच वाला मानता है. हालांकि फ़्रांस की मछली पकड़ने वाली नाव उस इलाक़े के नजदीक थी, जिसकी वजह से अभिलाष को बचा पाना संभव हुआ.


फ़्रांस की नाव सुरक्षित इलाक़े के अंदर ही थी, जहां से अभिलाष की नाव तक पहुंच पाना आसान हुआ. स्थिति बदतर हो सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
अंतरराष्ट्रीय समुद्र बचाव संघ के डेविड जर्डाइन स्मिथ का कहना है कि समुद्र के बहुत बड़े हिस्से में इंसानी गतिविधियां बहुत कम होती है, इसलिए इसके आकार और इलाक़े को समझना मुश्किल होता है.
वो कहते हैं कि जब इन इलाक़ों में थूरिया की तरह कोई नाव फंसती है तो तटरक्षक उन्हें इसलिए नहीं बचा पाते हैं कि वो इलाक़ा उनकी नावों की पहुंच से बाहर होता है.
डेविड जर्डाइन स्मिथ कहते हैं कि अगर फँसे व्यक्ति को बचाने में जल्दी नहीं की जाती है तो वो मर सकता है या फिर डूब सकता है.

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अंतरराष्ट्रीय क़ानून क्या कहता है
अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक़ जहाज के कैप्टन को समुद्र में फँसे व्यक्ति को बचाना होता है. उस वक़्त यह नहीं देखा जाता है कि वो किस देश का नागरिक है.
क़ानून कहता है कि अगर कैप्टन फँसे व्यक्ति को बचाने में समर्थ है तो उसे तत्काल मदद करनी चाहिए.
रॉयल नाविक संघ का कहना है कि अगर आप अटलांटिक महासागर में फँसते हैं तो आप आसानी से मदद पा सकते हैं. वो समुद्री इलाक़ा इतना व्यस्त होता है कि आप दूसरे जहाजों से हाथ हिलाकर मदद मांग सकते हैं. लेकिन अभिलाष जहां फंसे थे, वहां से यह संभव नहीं है.
डेविड जर्डाइन स्मिथ का कहना है कि अगर एक बचाव दल उस असुरक्षित इलाक़े में पहुंच भी जाता है तो उसे घायल व्यक्ति को लेकर लौटने में मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. वहां समुद्री लहरें आपके अनुकूल नहीं होती हैं. अभिलाष के मामले में बचाव दल का काम काफ़ी सराहनीय है.
संयोग कहें कि फ़्रांस के बचाव दल के पहुंचने से पहले वहां तूफ़ान कमजोर पड़ने लगा था और 14 मीटर तक उठने वाली लहरें थमने लगी थीं.

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कितना ख़तरनाक था वो समुद्री इलाक़ा
लंबी दूरी में अकेलापन नाविकों की यात्राओं का हिस्सा होता है. लेकिन अभिलाष जिस जगह फंसे थे, वो किसी तट से दूरी के मामले में समुद्री दुनिया का सबसे ख़तरनाक इलाक़ा नहीं था.
साल 1992 में क्रोएशियाई-कनाडा मूल के सर्वे इंजीनियर हर्वोजे लूकाटेला ने उन समुद्री इलाक़ों पर काम किया था, जहां इंसानों का पहुंचना बहुत ही मुश्किल है.
उन्होंने दक्षिण प्रशांत महासागर के एक इलाक़े को सबसे ख़तरनाक बताया था. 'प्वाइंट नेमो' नाम का यह इलाक़ा डुसी द्वीप से क़रीब 2688 किलोमीटर दूर है.
'प्वाइंट नेमो' के चारों तरफ़ हज़ारों किलोमीटर दूर जो भी तट हैं, वहां कोई नहीं रहता है. ऐसे में हर्वोजे ने इसे सबसे ख़तरनाक बताया था.
अभिलाष को बचाव दल एम्सटर्डम द्वीप ले गया था. यह द्वीप फ़्रांस क्षेत्र में आता है, जहां अस्थायी तौर पर ज्वालामुखी पर शोध कर रहे लोग रहते हैं और वहां एक अस्पताल भी है.
वहां अभिलाष का इलाज चल रहा है. उनके ठीक होने के बाद उन्हें ऑस्ट्रेलियाई नौसेनिकों को सौंप दिया जाएगा, जिसके बाद उनकी आगे की यात्रा शुरू होगी.
साल 2015 में ज्वालामुखी पर शोध करने वाले ईरिक क्लेमेटी ने एम्सटर्डम द्वीप को पृथ्वी का सबसे एकाकी ज्वालामुखी बताया था.


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