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फ्रांसीसी पत्रकार का दावा, रफ़ाल डील में रिलायंस के चयन पर इसलिए उठे हैं सवाल
- Author, शशांक चौहान
- पदनाम, बीबीसी प्लानिंग एडिटर, भारतीय भाषाएं
2016 में 36 रफ़ाएल विमानों की ख़रीद को लेकर फ़्रांसीसी अख़बार मीडियापार्ट में छपी ख़बर ने भारत में राजनीतिक भूचाल ला दिया है.
फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने मीडियापार्ट को दिए इंटरव्यू में कहा कि रफ़ाएल सौदे में रिलायंस का नाम ख़ुद भारत सरकार ने सुझाया था.
उनके इस बयान के बाद विपक्षी पार्टियों के आरोपों को बल मिला और उन्होंने सरकार पर हमलावर तेवर अख़्तियार कर लिए.
दरअसल, पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के इस बयान में दावा किया गया है कि रफ़ाएल विमान बनाने के 58 हज़ार करोड़ रुपये के समझौते के लिए भारत सरकार ने ही अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप की कंपनी रिलायंस डिफ़ेंस का नाम सुझाया था और फ़्रांस के पास इस संबंध में कोई विकल्प नहीं था.
फ्रांस्वा ओलांद के हवाले से किया गया यह दावा भारत सरकार के बयान से उलट है.
भारत सरकार कहती रही है कि फ़्रांसीसी कंपनी दसो एविएशन ने ख़ुद अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफ़ेंस का चुनाव किया था.
रिलायंस से चयन से आश्चर्य
बीबीसी ने पूर्व राष्ट्रपति का इंटरव्यू करने वाले मीडियापार्ट के दो पत्रकारों में से एक एंटॉन रॉगेट से रफ़ाएल-ओलांद से जुड़े कुछ सवाल पूछे.
पढ़ें, उनका जवाब.
रफ़ाएल विमानों की ख़रीद से जुड़ी अस्पष्ट स्थितियां अब तक फ़्रांसीसी राजनीति या मीडिया में मुद्दे नहीं थे.
लेकिन, दसो कंपनी के साझीदार के रूप में रिलायंस के चयन से, जिसका इस मामले में कोई अनुभव नहीं है, ख़ास हलकों में कई लोगों को आश्चर्य हुआ.
हमने अपनी पड़ताल में इसी 'क्यों' का जवाब विस्तार से बताया है.
हमारे प्रकाशन ने कई बातों का ख्याल रखा.
रिलायंस के सामने दो बेहद अहम सवाल
फ़िल्म के लिए पैसों के प्रबंध के लिए जूली गायेट (ओलांद की गर्लफ़्रेंड), फ्रांस्वा ओलांद और फ़िल्म 'माई फ़ेमिली' के निर्माता सभी ने यह घोषणा की कि फ़िल्म में रिलायंस की भागीदारी का रफ़ाएल डील से कोई लेना-देना नहीं है.
इससे दो सवाल उठते हैं, जिसका भारतीय कंपनी (रिलायंस) जवाब देना नहीं चाहती है:
पहला, रफ़ाएल की बिक्री के लिए भारत पहुंचे तत्कालीन फ़्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के दौरे के दिन यानी 25 जनवरी 2016 को ही अनिल अंबानी ने फ़िल्म की फाइनेंसिंग की घोषणा क्यों की?
दूसरा, वो फ़्रांसीसी फ़िल्म जिसमें न तो भारत का कोई संदर्भ था और ना ही भारत में इसका वितरण किया जाना था, रिलायंस एंटरटेनमेंट की उसमें क्या रुचि थी?
कई तकनीकी और सुरक्षा सवालों से जुड़ा दूसरा सवाल दसो के साझीदार के रूप में रिलायंस के चयन से जुड़ा था.
यह पता होना चाहिए कि रफ़ाएल की बिक्री फ़्रांस में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा था. सभी सरकारें (सभी राजनीतिक दलः लिबरल, सोशलिस्ट, ..) इन विमानों के निर्यात की कोशिश में शामिल रही हैं.
फ़ैसले में अधिकारी भी शामिल
काफी समय तक, रफ़ाएल को निर्यात के लिए अयोग्य या बेकार माना जाता था. लेकिन ओलांद के राष्ट्रपति काल (2012-2017) में अंततः इसकी बिक्री शुरू हुई (मिस्र, क़तर, भारत), इसमें उन देशों का भी सकारात्मक समर्थन रहा.
फ़्रांसीसी क़ानून के तहत, दसो सैद्धांतिक रूप से अपने भारतीय साझीदार को चुनने के लिए स्वतंत्र था.
लेकिन, यहां फ़्रांस में हर कोई जानता है कि इस फ़ैसले में अधिकारी भी शामिल थे.
इसके अलावा, जब फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि उनके पास कोई विकल्प नहीं था तो इसका मतलब ये था कि फ़्रांसीसी सरकार इसके (रफ़ाएल के) निर्यात को असरदार बनाना चाहती थी, खासकर 126 विमानों के पहले ऑर्डर के रद्द किए जाने के बाद.
हमारी रिसर्च अब भी जारी है.
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