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क्या रफ़ाल सौदा मोदी सरकार का सबसे बड़ा सिरदर्द है?
- Author, नवीन नेगी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या रफ़ाएल सौदा भारतीय सियासत में एक ऐसा जिन्न बन गया है जो केंद्र सरकार की तमाम कोशिशों के बाद भी बोतल में बंद नहीं हो पा रहा है?
इससे जुड़ी कुछ ना कुछ ऐसी नई जानकारियां सामने आती जा रही हैं जिन्हें लेकर केंद्र सरकार के सामने लगातार मुश्किल सवाल खड़े हो रहे हैं.
रफ़ाएल सौदे में कीमतें बढ़ने का मुद्दा तो विपक्ष पिछले कई महीनों से उठा ही रहा था लेकिन शुक्रवार को फ़्रांस की मीडिया में आए पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के एक बयान ने इस पूरे मामले पर नए 'सवाल और शक' पैदा कर दिए.
फ्रांस की मीडिया में देश के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद का बयान आया जिसमें दावा किया गया था कि रफ़ाएल विमान बनाने के समझौते के लिए 'भारत सरकार ने ही रिलायंस डिफेंस का नाम सुझाया था और फ़्रांस के पास इस संबंध में कोई विकल्प नहीं था'.
इसे लेकर भारत में सियासी गहमागहमी शुरू हो गई. जहां एक तरफ विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर हो गया तो वहीं रक्षा मंत्रालय की तरफ से भी सफाई पेश की गई और कहा गया कि 'ओलांद के बयान की जांच की जाएगी'.
इस बीच फ़्रांस की मौजूदा सरकार की तरफ से इस पूरे मसले पर एक बयान दिया गया, जिसमें कहा गया है कि इस सौदे में किस कंपनी का चयन किया जाना था, इसमें 'फ़्रांस सरकार की कोई भूमिका नहीं रही'.
ओलांद के बयान में कितना दम
फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति ओलांद के बयान को लेकर जो हलचल हुई, वो बेवजह नहीं है. जिस वक़्त रफ़ाएल सौदा हुआ उस समय ओलांद ही फ़्रांस के राष्ट्रपति थे.
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन की माने तो ओलांद के बयान को नकारना भारत सरकार के लिए इतना आसान नहीं होगा.
राधिका कहती हैं, ''ये सौदा दोनों देशों की सरकारों के बीच हुआ था, उस समय ओलांद ही फ़्रांस के राष्ट्रपति थे तो उनके किसी बयान को नकारने का सीधा मतलब है कि आप कह रहे हैं कि उस वक़्त के फ्रांस के राष्ट्रपति डील के बारे सच नहीं बोल रहे हैं.''
राधिका कहती हैं कि किसी (पूर्व) राष्ट्रपति के बयान को आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता, अगर महज़ किसी मीडिया हाउस ने अपनी जांच के आधार पर यह आरोप लगाया होता तो शायद एक बार के लिए उसे परे रख भी देते लेकिन ये बात राष्ट्रपति पद पर रह चुका वो आदमी बोल रहा है जो ख़ुद उस समझौते में एक पार्टी थे.
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और पॉलिसी स्टडीज़ के डायरेक्टर उदय भास्कर भी कहते हैं कि ओलांद के बयान को बेहद गंभीरता से लेने की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, ''ओलांद के बयान ने इस पूरे मामले पर और ज़्यादा शक़ करने की वजह दे दी हैं. इसके पहले भारत सरकार कह रही थी फ़्रांस की कंपनी दसो ने खुद रिलायंस का चुनाव किया था जबकि ओलांद उसके उलट बोल रहे हैं. अभी लगता है कि इस मामले में और भी कई छिपी हुई बातें सामने आ सकती हैं.''
मोदी पर कितना असर
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में हुए रफ़ाएल सौदे पर कांग्रेस पार्टी शुरुआत से ही सवाल उठाती रही है. ओलांद के बयान के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार से तीखे सवाल पूछे हैं.
राधिका रामाशेषन की राय है कि कांग्रेस के लिए पिछले पांच साल में ये सबसे बड़ा मौक़ा है जिसके ज़रिए वो मोदी सरकार पर खुलकर हमला कर सकती है.
वो कहती हैं, ''अभी तक मोदी सरकार की यह खासियत रही थी कि उनके कार्यकाल पर किसी तरह के भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे थे, लेकिन अब कांग्रेस पार्टी के हाथ रफ़ाएल सौदे जैसा मुद्दा लग गया है. देखना ये होगा कि जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ प्रचार किया था और लोगों के सामने भ्रष्टाचार के मुद्दे रखे थे क्या उसी तरह कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को भुना पाती है या नहीं.''
वहीं दूसरी तरफ उदय भास्कर कहते हैं, ''राजनीति में धारणाओं का खेल चलता हैं, पिछले लंबे वक़्त से रफ़ाएल सौदे पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. अब खुद फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति का यह बयान आया है. ये धारणाएं मोदी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही हैं. भले ही आगे चलकर सच जो भी निकले लेकिन इस पूरे मामले ने मोदी सरकार के प्रति एक तरह की धारणा तो बना ही दी है.''
बोफ़ोर्स बनाम रफ़ाएल
कांग्रेस पार्टी जब भी मोदी सरकार से रफ़ाएल सौदे से जुड़े सवाल पूछती है तो जवाब में उसके सामने भी बोफ़ोर्स घोटाले से जुड़े सवाल उठा दिए जाते हैं.
राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते हुए साल 1986 में भारत ने स्वीडन से लगभग 400 बोफोर्स तोप खरीदने का सौदा किया था जिसकी कीमत लगभग एक अरब तीस करोड़ डॉलर थी.
बाद में इस सौदे धांधली और रिश्वत लिए जाने के आरोप लगे. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि साल 1989 में राजीव गांधी की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी लोकसभा का चुनाव हार गई.
राधिका रामाशेषन कहती हैं, "उस दौरान भी स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट ने राजीव गांधी पर सवाल उठा दिए थे और अब फ़्रांस की मीडिया में तो खुद पूर्व राष्ट्रपति का बयान प्रकाशित हुआ है ऐसे में ये मामला भी भाजपा के लिए बोफ़ोर्स जैसा ही सिरदर्द बनकर उभरेगा."
उदय भास्कर भी इस बात की तस्दीक करते हैं और कहते हैं कि बोफ़ोर्स घोटाले के आरोप भी कभी साबित नहीं हो सके लेकिन उनकी वजह से राजीव गांधी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी. उसी तरह अब रफ़ाएल सौदे में मोदी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं.
वे कहते हैं, ''बोफ़ोर्स के वक़्त भाजपा ने बहुत जोर-शोर से वो मुद्दा उठाया था. उसी तरह से अब चुनाव के वक़्त पर विपक्ष पार्टी और खासतौर से कांग्रेस भी मोदी सरकार को इसी तरह घेरने की कोशिश करेगी.''
रफ़ाएल विमानों की ख़रीद के लिए भारत और फ्रांस के बीच पिछले साल सितंबर में समझौता हुआ था. समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ दोनों के बीच ये समझौता 36 जंगी विमानों के लिए हुआ है. पहले 18 विमानों का सौदा हुआ था लेकिन अब भारत फ्रांस से 36 विमान खरीद रहा है.
जब लड़ाकू विमानों की ख़रीदारी के लिए टेंडर निकाला गया था, तब मुक़ाबले में कुल छह कंपनियों के विमान थे. पर एयरफोर्स ने रफ़ाएल को सबसे बेहतर पाया.
इस बीच रफ़ाएल विमान बनाने वाली फ़्रांसीसी कंपनी दसो एविएशन ने भी इस पूरे मसले पर एक बयान जारी किया है जिसके अनुसार भारत से सहयोगी कंपनी का चुनाव उन्होंने खुद किया था और अपनी पसंद के आधार पर ही रिलायंस को चुना था.
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